NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राजनीति का जेंडर असेसमेंट
एक मतदाता के रूप में महिला सशक्त हो रही है लेकिन सत्ता अब भी उससे बहुत दूर है।
वर्षा सिंह
23 Jan 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Feminism In India

इस वर्ष के आम चुनाव के लिए देश की विभिन्न प्रमुख पार्टियों ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है। आजादी के बाद से अब तक की राजनीति का जेंडर असेसमेंट करें तो महिलाओं को निराशा ही मिली है। एक मतदाता के रूप में महिला सशक्त हो रही है लेकिन सत्ता अब भी उससे बहुत दूर है।

आज़ादी हासिल करने के साथ ही हमारे देश में महिलाओं को मतदान का अधिकार मिल गया। जबकि पश्चिमी देशों की महिलाओं ने मतदान का अधिकार हासिल करने के लिए लंबा संघर्ष किया। मतदान के लिहाज़ आजादी के बाद के दशकों में बतौर मतदाता महिलाएं कम ही सामने आईं। लेकिन अब चुनाव दर चुनाव महिला मतदाताओं की संख्या में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है। और किसी भी सरकार को चुनने में अब वे निर्णायक भूमिका में हैं।

महिला मतदाता जागरुक मतदाता भी मानी जाती हैं। महिलाओं को समाज में बराबरी पर लाने के लिए पंचायत स्तर के चुनाव में 33 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई। तमाम किंतु-परंतु के साथ ये व्यवस्था ग्रामीण स्तर पर महिलाओं के पक्ष में गई है। कई राज्यों में पंचायत स्तर पर महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण हासिल है। उत्तराखंड भी इनमें से एक है। लेकिन इससे आगे राज्य या केंद्र में बतौर विधायक और सांसद महिलाओं की मौजूदगी बेहद कम है। पंचायत चुनावों में पचास फीसदी आरक्षण वाले उत्तराखंड की विधानसभा में महिलाओं की संख्या कभी दहाई तक भी नहीं पहुंच सकी।

इससे क्या हम ये मानें कि सत्ता महिलाओं को मतदाता के तौर पर इस्तेमाल कर रही है, लेकिन जब उन्हें चुनकर सदन तक पहुंचाने की बारी आती है, तो महिलाओं को टिकट देने से लेकर वोट देने तक जनता का अपेक्षित विश्वास नहीं मिलता है।

महिलाओं को क्यों नहीं मिल पा रही सत्ता

वर्ष 2018 के आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में भी कहा गया कि कुल आबादी का 49 फीसदी हिस्सा होने के बावजूद राजनीति में महिलाओं की संख्या बेहद कम है। रिपोर्ट में कहा गया कि घरेलू जिम्मेदारियां, समाज में महिलाओं को लेकर परंपरागत स्थिति, परिवार का सहयोग न मिलना, राजनीति की राह में महिलाओं की मुख्य बाधाएं हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण 2018 के मुताबिक इजिप्ट, भारत, ब्राजील, मलेशिया, जापान, श्रीलंका और थाईलैंड ऐसे देश हैं जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व 15 प्रतिशत से भी कम है। इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन और यूएन वुमन रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 तक, लोकसभा की 542 में से 64 सीटों के साथ महिलाओं की मौजूदगी 11.8 फीसदी थी। जबकि राज्यसभा की 245 में से 27 सीटों के साथ महिलाओं की मौजूदगी महज 11 फीसदी थी। अक्टूबर 2016 के आंकड़ों से बताया गया कि देशभर की कुल 4,118 विधायकों की सीटों पर मात्र 9 फीसदी महिलाएं थीं। साथ ही यह भी बताया गया कि वर्ष 2010 से 2017 के बीच लोकसभा में महिलाओं की संख्या में मात्र एक फीसदी का इजाफा हुआ है। अब हम वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े हैं। इन आंकड़ों के साथ अगली लोकसभा की क्या तस्वीर बनेगी, इसका अंदाज़ा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है।

क्या होता यदि राजनीति में महिलाओं की संख्या अधिक होती?

तो शायद हमारा समाज महिलाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होता। देश के अहम फैसलों में महिलाओं की भागीदारी होती। एक शोध रिपोर्ट कहती है कि गांवों में पंचायत स्तर पर जो सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, वहां महिला नेतृत्व किशोर उम्र की लड़कियों को करियर बनाने और बेहतर शिक्षा हासिल करने के लिए प्रभावित करता है। जबकि वे गांव जिन्हें कभी महिला नेतृत्व नहीं मिला तुलनात्मक अध्ययन में उनकी स्थिति अच्छी नहीं थी। शोध में 495 गांवों की 11 से 15 वर्ष के बीच की करीब 8,453 किशोरियों का अध्ययन किया गया। (स्रोत :  (https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3394179/)

क्या राजनीतिक दल महिलाओं को बतौर मतदाता इस्तेमाल करते हैं ?

या वे सचमुच महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना चाहते हैं। उत्तराखंड की कुछ महिलाओं के नज़रिये से भी ये समझा जा सकता है। 

सोना सजवाण टिहरी जिला पंचायत की अध्यक्ष हैं। उन्हें सर्वश्रेष्ठ जिला पंचायत अध्यक्ष का पुरस्कार भी मिला। वे कहती हैं कि राजनीतिक पार्टियां हमें टिकट ही नहीं देतीं, टिकट के लिए पुरुष आगे रहते हैं, महिलाओं का नंबर ही नहीं आता। सोना कहती हैं कि राजनीति में शीर्ष पदों पर महिलाएं अच्छा कार्य कर रही हैं। किसी भी विभाग में देख लें तो महिलाएं पुरुषों से ज्यादा अच्छा कार्य कर रही हैं। विधानसभा चुनाव में भी वे अच्छा प्रदर्शन कर सकती हैं। लेकिन हम पर भरोसा ही नहीं किया जाता, इसलिए हम क्या करें।

पौड़ी के यमकेश्वर से विधायक रितु खंडूड़ी कहती हैं कि पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण है, इस वजह से हम पंचायतों में आ जाते हैं। उससे आगे हमारी राह थोड़ी मुश्किल हो जाती है। रितु के मुताबिक हमें जब भी मौका मिले तो उसे हाथ से न जाने दें और पुरुषों की तुलना में थोड़ा ज्यादा श्रम कर लें तो ज्यादा बेहतर होगा। वह मानती हैं कि महिलाओं को अब भी राजनीति में बराबर की भागीदारी के लिए आरक्षण की जरूरत है।

उत्तराखंड महिला मंच की अध्यक्ष कमला पंत कहती हैं कि आज भी महिला की स्थिति समाज में न तो आर्थिक रूप से मजबूत है, न सामाजिक रूप  से मज़बूत है, इसलिए वो राजनीतिक रूप से मजबूत नहीं है। परिवार और  समाज में ही निर्णय लेने में उनकी कोई भागीदारी नहीं होती है। ज्यादातर महिलाएं अब भी राजनीतिक रूप से सोच नहीं पातीं। कमला कहती हैं कि महिलाओं को राजनीति में 33 फीसदी आरक्षण अभी नहीं मिल पा रहा। लेकिन कोई भी पार्टी ये हिम्मत या साहस नहीं कर पा रही है कि वो खुद पार्टी के अंदर महिलाओं को 50 फीसदी टिकट दे। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इन पार्टियों के अंदर राजनीतिक तौर पर महिलाओं का क्या सम्मान है। आधी आबादी महिला है लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिला नहीं खड़ी है।

सीपीआई-एमएल के नेता इंद्रेश मैखुरी कहते हैं कि राजनीति भी समाज की तरह ही पुरुष वर्चस्व वाली और पितृसत्तात्मक है। राजनीति में आगे आने के लिए जिस तरह के मौके महिलाओं को मिलने चाहिए, राजनीतिक दलों के सेटअप में वे हैं ही नहीं। इंद्रेश कहते हैं कि महिला मतदाता किसे वोट करे इस पर भी अक्सर परिवार के पुरुष का ही नियंत्रण होता है। वे मानते हैं कि जहां भी मौका मिला महिलाओं ने अच्छा प्रदर्शन करके दिखाया है। इसके बावजूद महिलाओं के लिए राजनीति में आगे आने का रास्ता बहुत मुश्किल है। इंद्रेश कहते हैं कि लोकतंत्र को इस रूप में देखना है कि उसमें सब हिस्सों का प्रतिनिधित्व हो, लेकिन इसे इस तरह नहीं देखा जाता, जबतक कि कानूनी अनिवार्य बाध्यता न हो। वे महिला आरक्षण का बिल पारित न होने का सवाल भी उठाते हैं। इस मुद्दे पर राजनीति में एक-दूसरे के विरोधी दल भी एकजुट हो जाते हैं कि इसे नहीं पारित होने देना है।

उत्तराखंड में अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन (ऐपवा) की संयोजक और सीपीआई-एमएल की राज्य कमेटी की सदस्य विमला रौथाण कहती हैं कि जब एक महिला पहली बार राजनीति में आती है तो पैर घर से निकालने में ही, समाज कहिए या परिवार कहिए, इतनी बाधाएं उसके रास्ते में आती हैं, कि ऐसा लगता है वे कोई गलत कार्य करने जा रही हैं। राजनीति के लिए घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं को सम्मान जनक नजरिये से नहीं देखा जाता। तो शुरूआत में उन्हें बहुत दिक्कत आती है। वे अपने खुद के अनुभवों से बताती हैं कि जब किसी मामले में उस महिला के ज़रिये लोगों को न्याय मिल जाए तो लोगों को समझ आ जाता है कि ये तो सही दिशा में कार्य कर रही है। फिर उसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगता है। तो शुरुआती चरण में जिसने ये विरोध बर्दाश्त कर लिया वही आगे बढ़ेगा। जो नहीं झेल पाया वो पीछे चला जाता है। विमला रौथाण कहती हैं - आम समझ के तहत राजनीति में आना और समाज के जरूरी मुद्दे उठाना महिलाओं का काम नहीं माना जाता। वे मानती हैं कि घर का कामकाज और दबाव भी महिलाओं की राजनीति की राह में सबसे बड़ी बाधा है। यहां महिला के लिए परिवार का सपोर्ट जरूरी हो जाता है।

उत्तराखंड कांग्रेस कमेटी की प्रवक्ता गरिमा माहरा दसौनी कहती हैं कि चुनाव लड़ने के लिए महिलाओं की तरफ से दावेदारी ही कम आती है। उनकी तैयारी विधानसभा लायक नहीं होती। पार्टी की पूरी साख दाव पर रहती है। पार्टी कोशिश करती है कि जीतने वाला कैंडिडेट हो, जिस पर आम सहमति बने, उसे चुनाव लड़ने का टिकट दिया जाये। वे कहती हैं कि महिलाओं पर पारिवारिक बोझ ही इतना ज्यादा होता है कि वो लगातार जनता के संपर्क में नहीं रह पाती। पार्टी पॉलीटिक्स में भी वे मौजूद नहीं रह पाती। उनके ऊपर बच्चों की, मां-बाप की, सास-ससुर की, पति की तमाम जिम्मेदारियां रहती हैं। राजनीति में महिलाएं रुक-रुक कर कार्य करती हैं। जबकि जरूरत है कि उनका जनता के साथ तालमेल लगातार बना रहे।

उत्तराखंड में महिला समाख्या की पूर्व निदेशक गीता गैरोला कहती हैं कि हमारे समाज में अब भी जो परंपरागत सोच है, वो राजनीति को पुरुषों के हिस्से में मानती है। राजनीतिक के दावपेंच, पैंतरे पुरुषों ने अपने तरीके से ईजाद किये हैं और आमतौर पर महिलाओं को राजनीतिज्ञ के तौर पर स्वीकार करने में उन्हें हिचक होती है। हमारे सामने सफल राजनीतिज्ञ महिलाओं के कई उदाहरण हैं, पूरी दुनिया में और भारत में भी। यहां तक कि पाकिस्तान में भी राजनीति में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। वे कहती हैं कि पितृसत्तातक व्यवस्था सत्ता का हस्तांतरण नहीं करना चाहती। जबकि यदि ज्यादा महिलाएं सत्ता में आती हैं तो महिलाओं के लिए जो नीतियां बनती हैं, वे ज्यादा जेंडर फ्रेंडली बन सकती हैं। अभी तो जो नीतियां हैं, वो ही जेंडर फ्रेंडली नहीं हैं। एक तरफ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान चल रहा है और दूसरी ओर लिंगानुपात गिर रहा है। जो बेटियां बची हैं वो सुरक्षित नहीं हैं।

देश के ज्यादातर राज्यों में महिलाओं के मतदान का प्रतिशत बढ़ा है। बल्कि छत्तीसगढ़, राजस्थान या उत्तराखंड में महिलाओं के मतदान का प्रतिशत पुरुषों से अधिक भी रहा है। वोट देने और सरकार चुनने में महिलाओं की स्थिति निर्णायक होती जा रही है। इसलिए महिला मतदाताओं को रिझाने के लिए राजनीतिक दल प्रयास भी कर रहे हैं। तीन तलाक का बिल हो या आशा-आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ाना, इसी की एक कड़ी के रूप में है। महिलाओं को ब्याज में छूट, टैक्स में छूट जैसे लॉलीपॉप भी दिए जा रहे हैं लेकिन संसद में 33 फीसदी आरक्षण नहीं। जबकि आधी आबादी तो पचास फीसदी आरक्षण चाहती है। एक मतदाता के रूप में शुरु हुआ भारतीय महिला का राजनीतिक सफ़र गांव-पंचायत, विधानसभा और फिर संसद तक के पड़ावों तक पहुंचते-पहुंचते पस्त होने लगता है।  

INDIAN POLITICS
Women in Politics
Women Rights
33% Women Reservation
राजनीति में महिलाएं
Gender Assessment of Politics

Related Stories

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

विशेष: क्यों प्रासंगिक हैं आज राजा राममोहन रॉय

लोगों के एक घर बनाने में टूटने और उजड़ जाने की कहानी

कांग्रेस और प्रशांत किशोर... क्या सोचते हैं राजनीति के जानकार?

प्रशांत किशोर को लेकर मच रहा शोर और उसकी हक़ीक़त

'जय श्री राम' के बाद अब 'जय हनुमान' क्यों हैं सहारा?

जनाधार और नेतृत्व के बगैर कांग्रेस को सिर्फ तरकीब से कैसे जितायेंगे पीके

बिहार: आख़िर कब बंद होगा औरतों की अस्मिता की क़ीमत लगाने का सिलसिला?

मुद्दा: क्या विपक्ष सत्तारूढ़ दल का वैचारिक-राजनीतिक पर्दाफ़ाश करते हुए काउंटर नैरेटिव खड़ा कर पाएगा

सामाजिक न्याय का नारा तैयार करेगा नया विकल्प !


बाकी खबरें

  • alternative media
    अफ़ज़ल इमाम
    यूपी चुनावः कॉरपोरेट मीडिया के वर्चस्व को तोड़ रहा है न्यू मीडिया!
    27 Jan 2022
    पश्चिमी यूपी में एक अहम बात यह देखने को मिल रही है कि कई जगहों पर वहां के तमाम लोग टीवी न्यूज के बजाए स्थानीय यूट्यूब चैनलों व वेबसाइट्स पर खबरें देखना पसंद कर रहे हैं। यह सिलसिला किसान आंदोलन के समय…
  • राज कुमार
    गोवा चुनाव: सिविल सोसायटी ने जारी किया गोवा का ग्रीन मेनिफेस्टो
    27 Jan 2022
    गोवा के युवाओं, विभिन्न संस्थाओं और गणमान्य नागरिकों ने मिलकर गोवा का हरित घोषणा-पत्र यानी गोवा का ग्रीन मेनिफेस्टो जारी किया है। इस बारे में हमने आमचे मोलें सिटिज़न मूवमेंट से जुड़े स्वभू कोहली से…
  • कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2.86 लाख नए मामले, 573 मरीज़ों की मौत
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2.86 लाख नए मामले, 573 मरीज़ों की मौत
    27 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,86,384 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 3 लाख 71 हज़ार 500 हो गयी है।
  • sb
    एजाज़ अशरफ़
    मेरा हौसला टूटा नहीं है : कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज
    27 Jan 2022
    जब मैं 21 साल की हुई, तो मैं यह चुनाव करने को लेकर आज़ाद थी कि मैं भारतीय होना चाहती हूं या अमेरिकी होना चाहती हूं। मैंने बुनियादी तौर पर भारतीय होने को चुना, क्योंकि तब तक मैं पहले से ही सामाजिक…
  • Sudan
    पवन कुलकर्णी
    सूडान में तख्तापलट के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन जारी, 3 महीने में 76 प्रदर्शनकारियों की मौत
    27 Jan 2022
    24 जनवरी को तख्तापलट के खिलाफ हुए देश-व्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा तीन और प्रदर्शनकारियों की गोली मार कर हत्या कर दी गई है और दर्जनों लोग घायल हुए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License