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भारत
राजनीति
राजनीतिक हथियार के रूप में बलात्कार का इस्तेमाल करने की सावरकर ने दी थी मंजूरी
कथुआ मामले में संघ परिवार द्वारा अभयुक्तों को मूक समर्थन उनके प्रतीक सावरकर की सलाह से ही निकला है।
सुबोध वर्मा
17 Apr 2018
Translated by महेश कुमार
सावरकर

तीन दिनों तक एक मंदिर में छुपकर आठ कठुआ के अभियुक्तों ने जिन्होंने आठ साल की एक लड़की के साथ बर्बरता, अपहरण, बलात्कार और हत्या की साजिश रची, इस घटना ने भारत को चौंका दिया। देश भर में बड़े पैमाने पर इस घटना का विरोध किया गया और जल्दी से न्याय दिलाने के लिए पूरे देश में आक्रोश फ़ैल गया। एक तथ्य जो तस्वीर से धीरे-धीरे उभरा उसके मुताबिक़, वह यह है कि: बकेरवाल (एक मुस्लिम खानाबदोश जनजाति) लड़की का अपहरण करने की षड्यंत्र की ठोस योजना बनाई गई थी और इन लोगों द्वारा बकेरवाल जनजाति से अड़ोस - पड़ोस में छुटकारा पाने के स्पष्ट उद्देश्य के साथ इन लोगों द्वारा यह अपरहण नियोजित किया गया था। हालांकि आप इसे एक टुकड़े के रूप में देख सकते हैं,  लेकिन तथ्य यह है कि यह एक मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक कट्टर हिंदु समुदाय की साजिश थी। जम्मू क्षेत्र में सालों से हिंदू समुदाय के दिमाग में संघ परिवार द्वारा बोई गयी और उसके द्वारा पैदा की गई जहरीली नफरत की अंतिम अभिव्यक्ति थी।

ईसिस एक संबंध के कारण आरएसएस/भाजपा समर्थक हिंदू सेना के स्वरुप में विरोध प्रदर्शन किया जब आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया, वकीलों ने कठुआ के सत्र न्यायालय में आरोपपत्र दायर करने का विरोध किया और जम्मू बंद का आह्वान किया था (हालांकि यह फ्लॉप हुआ), और दो भाजपा मंत्रियों ने आरोपी के समर्थन में एक रैली में भाग लिया।

उन्नाव और कथुआ मामले के बीच समानता है, जहां पीड़ित मुस्लिम नहीं है, लेकिन आरोपी भाजपा के एक निर्वाचित विधायक हैं। समानता बलात्कारियों और हत्यारों को समर्थन की तत्काल रैली में निहित है, कानून के कारणों को बाधित करने के प्रयास, विचलनकारी रणनीति और दोषी को बचाने के लिए राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल है।

यह असिफा के साथ और उन्नाव में बलात्कार पीड़ित के अन्याय करना होगा - अगर यह केवल कुछ विकृत, सत्ता में चूर पागल पुरुष को दण्ड से परे या फिर किसी पागल जंगली क रूप में सीए देखा जाता है। राजनीतिक या अन्य विरोधियों पर शक्ति का प्रयोग करने के साधन के रूप में बलात्कार की विचारधारा, या बल के माध्यम से अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए एक हथियार के रूप में, संघ परिवार अपने अनुरुप चिह्न 'वीर' सावरकर के दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। आरएसएस और प्रधानमंत्री मोदी ने खुद उसकी तस्वीर पर फूल चढ़ाकर अक्सर सावरकर का जिक्र करते हैं, जो तस्वीर अब अब संसद के सेंट्रल हॉल में है और जिसे अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में प्रधान मंत्री रहते स्थापित किया था।

विनायक दामोदर सावरकर, ने अपनी एक पुस्तक ‘भारत के छः शानदार युग’ में स्पष्ट रूप से कहते है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार करना उचित है और जब ऐसा अवसर हो और ऐसा नहीं किया जाता है, तो वह सदाचारी या उदार नहीं बल्कि उसे कायरता माना जाएगा। (मुम्बई स्थित स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक द्वारा उपलब्ध कराए गए ऑनलाइन संस्करण का अध्याय का आठवा हिस्सा देखें) ।

सावरकर बताते हैं कि अतीत में हिंदुओं ने 'आत्मघाती' कदम उठाया और (पैरा 452) मुस्लिम महिलाओं पर दया दिखाई उन्हें आसानी से सौहार्दपूर्ण और उदार भावना से माफ़ कर दिया। वे छत्रपति शिवाजी के रूप में ऐसे प्रसिद्ध आंकड़ों का उदाहरण देते हैं जिसमें (पैरा 450) कल्याण के मुस्लिम गवर्नर की बहु को छोड़ देते हैं, और पेशवा चिमाजी आप्टे ने भी इसी तरह बसेन के पोर्तुगीज गवर्नर की पत्नी को अनुचित छोड़ने की अनुमति दी थी।

भावुक स्वर में सावरकर का तर्क है कि जब मुसलमान उत्पीड़क हिंदू महिलाओं को दंडित कर रहे थे, हिंदू विजयी को भी मुस्लिम महिलाओं के साथ वाही व्यवाहर करना चाहिए था।

उन्होंने लिखा, (पैरा 451में) "एक बार वे इस भयावह आशंका से कि मुस्लिम महिला भी हिंदुओं की जीत के मामले में उसी स्थिति में खड़ी हैं, जैसे मुस्लिम विजेता के सामने हिंदु महिलायें तो भविष्य में वे इस तरह हिन्दू महिलाओं को छेड़ने की हिम्मत नहीं करेंगे।"

उनका तर्क है कि हिंदुओं ने अगर मुस्लिम महिलाओं के साथ बुरा व्यवहार किया होता तो, उनकी स्थिति आज की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर होती:

"मान लीजिए कि यदि भारत के शुरुआती मुस्लिम आक्रमणों के समय से, हिंदुओं ने भी, जब भी वे युद्ध के मैदानों पर विजयी हुए या होते थे, उन्हें उसी तरह मुस्लिम के साथ व्यव्हार किया होता या किसी अन्य तरीके से उन्हें दंडित किया होता, अर्थात् बल के द्वारा, और फिर उन्हें उन्ही के डेरे में शोषित किया जाता, तो? फिर उनके दिल में यह भयानक आशंका रहती और वे किसी भी हिंदू महिला के खिलाफ अपने बुरे कृत्य करने की हिम्मत नहीं करते। "(पैरा 455)

गलत धारणा के अलावा, जो "हर हिंदू अपने माता के दूध पीने से लगता है" (पैरा 42 9-430) कि धार्मिक सहिष्णुता एक गुण है, सावरकर इसे हिंदूओं के बीच "मूर्खता की धारणा" के रूप में पहचानता है कि "एक मुस्लिम महिला के साथ किसी भी तरह का संबंध इस्लाम में धर्म का मतलब था (पैरा 453) उन्हें बलात्कार से बचने का कारण। वह लिखते हैं कि इस धारणा ने "मुस्लिम स्त्री वर्ग" (पैरा 454) को दंडित करने से हिंदू पुरुषों पर रोक लगाई थी।

यदि कोई मुस्लिम महिलाओं के प्रति सहानुभूति महसूस करता है, तो सावरकर उन सभी गलतियों के जरिए मुमकिन बहस को आगे बढाता है कि जैसाकि मुस्लिम महिलाएं करती हैं जिसमें वे हिंदू लड़कियों को लुभाने और उन्हें "मुस्लिम केंद्रों जैसे मस्जिदों में भेजती हैं" और आमतौर पर मुस्लिम पुरुषों को उनके हिंदुओं के खिलाफ हिंसा में इस्तेमाल करवाती हैं।

आरएसएस इस तरह के प्रचार करती रही है और इसकी वजह से संघ परिवार के अनुयायियों में वीर सावरकर बहुत प्रशंसनीय नायक बने हुए है। संवारकर के इस विचार ने हिंदू दंगाइयों को गुजरात (2002) और मुजफ्फरनगर (2013) में मुस्लिम महिलाओं पर भयावह अत्याचार करने और कई अन्य लोगों को प्रेरित करने की प्रेरणा दी है।

इसलिए, कथुआ या उन्नाव के बलात्कारियों और हत्यारों के लिए, जो भी उनकी मनोवैज्ञानिक मजबूरी हो, नैतिक और वैचारिक जीवन शक्ति वीर सावरकर के अलावा किसी और से नहीं ली गई है आश्चर्य नहीं कि संघ परिवार के लिए निंदा करने या कार्रवाई करन इसलिय इतना मुश्किल हो जाता है। यह आश्चर्य की बात है कि भाजपा/संघ के सदस्यों की सूची महिलाओं के खिलाफ अपराधों करने में विस्तारित हो जाती है।

सावरकर
बीजेपी
संघ परिवार
BJP-RSS
Unnao Rape Case
Kathua Minor Rape

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