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मज़दूर-किसान
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राजनीति
राजस्थान में मज़दूरों के जीवन को बर्बाद करते श्रम सुधार
मोदी सरकार राज्य के श्रम कानून में हो रहे बदलावों की सराहना कर रही है, लेकिन न्यूज़क्लिक टीम द्वारा किए गए अध्ययन में इन सुधारों से श्रमिकों के वेतन, कार्यभार और नौकरी की सुरक्षा पर विनाशकारी प्रभाव दिखाई देता है।
सुबोध वर्मा
05 Aug 2019
Translated by महेश कुमार
labour in rajasthan
Image Courtesy: YouTube

इस साल जुलाई महीने में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में राजस्थान द्वारा श्रम कानून में लाए गए बदलाव की सराहना की गई है। इसके लिए तर्क यह दिया गया है कि "प्रतिबंधात्मक" श्रम कानूनों को बदलने से रोजगार बढ़ेगा और औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी आएगी क्योंकि मालिक, मजदूर को काम पर रखने या न रखने के लिए आज़ाद होंगे। बड़े कारखानों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है और उत्पादन बढ़ा है, इसके लिए सरकार ने विभिन्न आंकड़े पेश किए हैं।

 बात घुमाने वाले सरकार के मास्टरों ने जिस बात का खुलासा नहीं किया है वह यह है कि बदले हुए श्रम कानून के तहत मजदूरों को कितनी मजदूरी मिल रही है। 2016-17 तक उपलब्ध एनुअल सर्वे ऑफ़ इंडस्ट्रीज के तहत - राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार द्वारा 2014-15 में किए श्रम सुधार की वजह से वेतन वृद्धि धीमी हो गई है, इसलिए नियमित श्रमिकों की जगह अब ठेकेदारी वाले मज़दूर ले रहे है, और प्रति कर्मचारी उत्पादन में वृद्धि हो रही है,जो कि अपने आप में भारी शोषण का संकेत है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि CMIE की महीने की श्रृंखला  के अनुसार बेरोजगारी में लगातार वृद्धि हुई है। संक्षेप में, श्रम सुधारों ने राज्य में श्रमिकों के जीवन को पुरी तरह से नष्ट कर दिया है।

 श्रम कानूनों में किए गए बदलावों में औद्योगिक विवाद अधिनियम और कारखाना अधिनियम के लिए पात्रता सीमा को बढ़ाना भी शामिल है, इस प्रकार मालिकों को काम पर रखने और निकालने, या काम करने की तय स्थिति लिए स्वतंत्र लगाम दी गई है। श्रमिकों के लिए ट्रेड यूनियन बनाने के लिए पात्रता को 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है यानि इससे कम संख्या पर काम करने वाले श्रमिक अब यूनियन नहीं बना सकेंगे।

 चूंकि मोदी सरकार अब नए केंद्रीय श्रम कानूनों (चार संहिताओं) को पारित करने की प्रक्रिया में है, जो मौजूदा सुरक्षात्मक श्रम कानूनों को समाप्त करने की जद में हैं, इस मामले में राजस्थान एक उदाहरण है जो एक आईना है और बताता है कि देश के बाकी हिस्सों में श्रमिकों के लिए क्या बचा है।

ठेकेदारी के रोज़गार में बढ़ोतरी

 जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट से पता चलता है, कारखानों में (संगठित) क्षेत्र में कुल कर्मचारियों की संख्या का 43 प्रतिशत ठेकेदारी के तहत काम करने वाले श्रमिकों का हिस्सा है जोकि एक आश्चर्यजनक बढ़ोतरी है। श्रम कानून सुधारों के लागू होने से पहले ही यह संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इतना बड़ा उछाल चौंकाने वाला है। इसका मतलब है, कम मजदूरी, ज्यादा असुरक्षित नौकरी और ज्यादा काम, और बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के श्रमिक से काम लिया जा रहा है।

 chart 1.PNG

राजस्थान ने ठेका श्रम अधिनियम  मे संशोधन कर आवेदन की सीमा को बढ़ाकर 20 से 50 व्यक्ति कर दिया है।

 बढ़ती बेरोज़गारी

 सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार, और नमूना सर्वेक्षणों के आधार पर किए गए अध्य़यन के अनुसार राजस्थान में देश की तुलना में पिछले दो वर्षों में बेरोजगारी दर काफी बढ़ी है (नीचे तालिका देखें)। जुलाई 2019 में, राजस्थान की बेरोजगारी की दर कुल कार्यबल का 10.6 प्रतिशत थी, जबकि भारत की दर 7.5 प्रतिशत है। यह नवउदारवादी बुद्धिजीवियों द्वारा किए गए उन दावों के विपरीत है जिनमें उन्होने कहा और हमेशा कहते हैं कि श्रम कानूनों को कमज़ोर करने से रोजगार में वृद्धि होती है। वास्तव में, राज्य द्वारा रोज़गार को रेगुलर न करने से, काम पर रखने और काम से निकालने की मालिकों के पास मौजूद  बेतहाशा अधिकार अनिवार्य रूप से इस त्रासदी की ओर ले जाती है।

chart 2.PNG

 गिरते वेतन

आश्चर्यजनक ढंग से एएसआई के आंकड़ों बताते है कि 2014-15 के बाद से वेतन/मजदूरी में वृद्धि हुई है क्योंकि भाजपा राज्य सरकार ने  श्रम कानूनों में ढील दे दी थी। इससे पहले, यह औसत 14-15 प्रतिशत प्रति वर्ष था लेकिन 2014-15 में 11.5 प्रतिशत से 2015-16 में 6.1 प्रतिशत और 2016-17 में सिर्फ 3.5 प्रतिशत रह गया था (नीचे चार्ट देखें)। व्यावहारिक रूप से, इसका मतलब यह है कि वास्तविक (मुद्रास्फीति समायोजित) मजदूरी स्थिर है या घट रही है।

 chart 3.PNG

कुछ लोग सोच सकते हैं कि जिन कारखानों में ये श्रमिक कार्यरत हैं, वे अर्थव्यवस्था के धीमे होने की वजह से पीड़ित हैं और इसलिए मालिक लोग बेहतर मजदूरी देने में असमर्थ हैं। हालांकि यह इसमें बढ़ोतरी करने वाला कारक हो सकता है, लेकिन नेट वैल्यू एडेड (एनएवी) के लिए वेतन/मजदूरी का हिस्सा - उत्पादन को तय करने का उपाय - भी घट रहा है। एएसआई के आंकड़ों के अनुसार, 2013-14 में यह 15.6 प्रतिशत से घटकर (2016 में नए श्रम कानूनों को अधिसूचित करने से पहले) 14.3 प्रतिशत हो गया था। स्पष्ट रूप से, मजदूरी का दमन उत्पादन मूल्य से स्वतंत्र रुप से हो रहा है (नीचे चार्ट देखें)।

 chart 4.PNG

बढ़ता दमन

श्रमिकों को काम पर रखने और निकालने के लिए मालिकों द्वारा मजदूरी में वृद्धि और लचीलेपन में गिरावट के बावजूद, एनएवी प्रति मज़दूर बढ़ रहा है (नीचे चार्ट देखें)। इसका मतलब है कि श्रमिक एक ही समय में कहीं अधिक काम कर रहे हैं और ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। यह काम पर रखने और निकालने पर कोई नियंत्रण न होने की कमी का स्पष्ट परिणाम है, जो श्रमिकों को उनकी दक्षता तथा श्रम को बढ़ाने के लिए मजबूर करता है। ऐसा मजदूरी में ठहराव के बावजूद हो रहा है, जो उनके शोषण में हुई तीव्र वृद्धि दर्शाता है।

 chart 5.PNG

 यह सब संगठित क्षेत्र के साथ हो रहा है। कोई भी इस बात की कल्पना कर सकता है कि व्यापक असंगठित क्षेत्र पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा, जहां अधिकांश कानून लागू ही नहीं होते हैं या केवल शिथिल रूप से लागू होते हैं। बड़े उधोगों  द्वारा मज़दूरों के दमन के उदाहरण को सभी छोटे उधोगो द्वारा अनिवार्य रूप से अनुसरण किया जाएगा।

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