NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
राजस्थान: तथाकथित सुधारों की प्रयोगशाला
प्रांजल
01 Oct 2014

केंद्र में राजनैतिक बदलाव के बाद लगातार आर्थिक सुधारों के नाम पर काफी हलचल देखने को मिली है। जिसके तहत सरकार ने अनेक क्षेत्रों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने और नियमों में बदलाव की मानो झड़ी सी लगा दी। रक्षा क्षेत्र में ४९ और रेलवे में बुनियादी ढांचे को विकसित करने हेतु १०० प्रतिशत विदेशी निवेश को मंज़ूरी, उदहारण के तौर पर हमारे सामने मौजूद हैं । साथ ही केंद्र सरकार ने अपरेंटिसशिप अधिनियम, फैक्ट्री लॉ और इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट में बड़े बदलाव किए हैं जो मुख्यतः मज़दूर विरोधी हैं और साथ ही बड़े पूंजीपतियों को लाभ पहुचाने वाले भी। पर यह बदलाव अचानक लाए गए हैं, यह मान लेना सरासर गलत होगा। इन “तथाकथित” सुधारों की प्रयोगशाला काफ़ी पहले राजस्थान की भाजपा सरकार द्वारा तैयार कर ली गई थी । आज केंद्र जो भी बदलाव कर रहा है, वह तो मात्र उस रूपरेखा का सरल अनुसरण है । इस पूरी योजना को सुनियोजित ढंग से अमल में लाया गया जिसकी शुरुआत मूलभूत क्षेत्रों में बदलाव लाकर की गई।

                                                                                                           

                                                                                                                                                                                            मजदूरों के लिए अच्छे दिन कहाँ?

प्राथमिक क्षेत्र और बदलाव

आर्थिक सुधार के नाम पर सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे रह रहे व्यक्तियों को मिलने वाले खाद्य पदार्थों पर छूट को कम कर दिया है। पहले हर परिवार को जहाँ 35 किलो राशन १ रूपए प्रति किलो के हिसाब से मिलता था, अब २५ किलो राशन २ रूपए के मूल्य पर मिलेगा। परिणामस्वरुप लगभग 38 लाख व्यक्ति इससे प्रभावित होंगे। साथ ही गेहूं और धान पर प्रति क्विंटल मिल रहे १५० रूपए के बोनस को भी बंद करने का फैसला लिया गया है। ताजुब की बात यह है कि एक तरफ जब ३० लाख टन से अधिक अनाज खुले स्थानों में पड़ा सड़ रहा है, सरकार बचाव कदम के तौर पर ऐसे जन-विरोधी फैसले ले रही है । साथ ही यह भी सुनने में आया है कि राजस्थान की भाजपा सरकार शिक्षा के क्षेत्र में अमूलचूक परिवर्तन लाने की तैयारी कर रही है, जिसमे २८,००० प्राथमिक विद्यालयों को बंद करना शामिल है।  इस प्रक्रिया से इन विद्यालयों में काम कर रहे ५०,००० से अधिक “विद्यार्थी मित्र” को अपने रोज़गार से हाथ धोना पड़ेगा । अंतर्विरोध तो मानो इस सरकार के लिए आम बात है, एक तरफ ये नए रोजगार लाने की बात कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ मौजूद नौकरियां ख़त्म भी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही । राजस्थान सरकारी शैक्षणिक संस्थानों के मामले में पहले से ही काफी पीछे था। निजी संस्थानों की ऊँची फीस वैसे ही बहुमत की पहुँच के बाहर होती है, और अब इन सरकारी संस्थानों का बंद होना, इस वर्ग के लिए दोहरी मार सिद्ध होगा। अगर इन सभी “सुधारों” को गौर से देखा जाए, तो यह सरकार द्वारा सार्वजनिक व्यय में कटौती की ओर संकेत करते हैं ।

                                                                                                                                                    

                                                                                                                                                                           देश की आर्थिक नीतियों में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की क्या जगह? 

पुराने कानून, “नए सुधार”

हाल ही में केंद्र सरकार ने “अच्छे दिन” लाने के लिए नीतियों में जो अनेक बदलाव किए हैं उनकी शुरुआत राजस्थान में कुछ महीने पहले ही हो गई थी । फिर चाहे वह अपरेंटिसशिप अधिनियम में किए गए बदलाव हो या फैक्ट्री लॉ में । श्रम कानूनों में सबसे बड़ा बदलाव लाते हुए राजस्थान सरकार ने छंटनी की सीमा १०० से बढाकर ३०० कर दी है। अर्थात पहले किसी भी कारखाने के मालिक को १०० से अधिक मज़दूरों को नौकरी से हटाने के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी, जो संख्या 3०० कर दी गई है। सरल शब्दों में कहा जाए तो मज़दूरों की चट भर्ती और पट छंटनी। एक तरफ यह बदलाव जहाँ कारखाना मालिकों को खुली छूट देगा कि वे जब चाहे मज़दूरों को काम से निकाल सकें, वहीँ दूसरी तरफ यह मज़दूरों को भी कारखाना मालिक की हर बात मानने पर मजबूर करेगा। फिर वो न्यूनतम वेतन से कम पर काम करने का आदेश ही क्यूँ न हो। साथ ही अपरेंटिसशिप अधिनियम में बदलाव लाते हुए भाजपा सरकार ने खुद शासन को यह ताकत दे दी है कि वह निर्धारित कर सके किस कारखाने में कितने व्यक्ति प्रशिक्षण लेंगे। साथ ही उन्होंने अनेक और क्षेत्रों को भी खोल दिया है जहाँ अपरेंटिस भर्ती किए जा सकते हैं। अब कारखानों के मालिक अनेक श्रमिक अपरेंटिस के नाम पर रख सकते हैं , जिनका वेतन सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन होगा। मतलब कम दाम में कुशल कारीगर। और तो और अगर यह संख्या २५० से ऊपर जाती है तो इस वेतन का ५०% सरकार देगी। इस तरह एक तीर से दो निशाने लगाये जा रहें हैं। एक तरफ पूंजीपतियों का मुनाफ़ा बढेगा, दूसरी तरफ सरकार कम खर्च करके नए रोजगार उपलब्ध कराने का दंभ भी भर सकेगी। और भी अनेक बदलाव इस शासनकाल में लाए गए हैं जिसमे कॉन्ट्रैक्ट श्रम कानून के तहत उन्ही कंपनियां को लाना जहाँ मजदूरों की संख्या ५० से अधिक है भी शामिल है । अभी यह संख्या २० है। 

प्रतिरोध के स्वर का दमन

इन बदलावों के साथ, राजस्थान सरकार ने प्रतिरोध के स्वर दबाने के भी कदम उठाये थे, जो अब केंद्र सरकार अपना रही है। इसमें मज़दूर संगठनो के दायरे को सीमित करना भी शामिल है। जहाँ पहले कोई भी संगठन बनाने के लिए उस कारखाने के १५% मज़दूरों की ज़रूरत होती थी, वही अब ये सीमा ३० % कर दी गई है। इस “सुधार” के बाद श्रमिको के पास संगठन बनाने की ताकत कम हो जाएगी और परिणामस्वरुप न तो वे न्यूनतम वेतन मांग सकेंगे, न ही मूलभूत सुविधाएँ। ध्यान दिया जाए तो क्रमशः एक तरफ फ़ैक्ट्री मालिकों को अधिक छूट और दूसरी तरफ श्रमिको के अधिकारों का हनन साफ़ देखने को मिल रहा है।

अगर एनएसएसओ के आकड़ें पे ध्यान दिया जाए तो राजस्थान  में हर १००० में से ९५७ मज़दूर सुरक्षित रोज़गार नहीं पा रहे और ९८८ मजदूर भुगतान की छुट्टी पाने का अधिकार भी नहीं रखता ।अगर अभी हालात इतने दयनीय हैं तो इन सुधारो के बाद के हालात का अंदाज़ा लगाना ज़्यादा मुश्किल नहीं होगा। अब यही सुधार “अच्छे दिनों “ की कल्पना को पूरा करने के लिए केंद्र में भी लागु किए जा रहे हैं। पर यह “अच्छे दिन” मेहनतकश वर्ग के लिए तो नही ही हैं, यह बात पूरी तरह साफ़ है ।

 

 डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

 

भा.ज.पा
मजदूर
श्रम कानून
प्राथमिक शिक्षा
नरेन्द्र मोदी
आर्थिक नीतियाँ

Related Stories

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

दिल्ली के मज़दूरों की एक दिवसीय हड़ताल

जीएसटी ने छोटे व्यवसाय को बर्बाद कर दिया

हिमाचल प्रदेश: एंबुलेंस सेवा पूरी तरह से ठप

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई): इतने वर्षों बाद भी क्या हम इसके उद्देश्यों को पूरा कर पाए?

मीडिया पर खरी खरी – एपिसोड 2 भाषा सिंह के साथ

चीन-भारत संबंधः प्रतिद्वंदी दोस्त हो सकते हैं

श्रमिक अधिकार और इनके प्रति सरकारों का बर्ताव

नकदी बादशाह है, लेकिन भाजपा को यह समझ नहीं आता

फिक्स्ड टर्म जॉब्स (सिमित अवधि के रोज़गार) के तहत : मोदी सरकार ने "हायर एंड फायर" की निति को दी स्वतंत्रता


बाकी खबरें

  • Banaras
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव : बनारस में कौन हैं मोदी को चुनौती देने वाले महंत?
    28 Feb 2022
    बनारस के संकटमोचन मंदिर के महंत पंडित विश्वम्भर नाथ मिश्र बीएचयू IIT के सीनियर प्रोफेसर और गंगा निर्मलीकरण के सबसे पुराने योद्धा हैं। प्रो. मिश्र उस मंदिर के महंत हैं जिसकी स्थापना खुद तुलसीदास ने…
  • Abhisar sharma
    न्यूज़क्लिक टीम
    दबंग राजा भैया के खिलाफ FIR ! सपा कार्यकर्ताओं के तेवर सख्त !
    28 Feb 2022
    न्यूज़चक्र के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार Abhisar Sharma Ukraine में फसे '15,000 भारतीय मेडिकल छात्रों को वापस लाने की सियासत में जुटे प्रधानमंत्री' के विषय पर चर्चा कर रहे है। उसके साथ ही वह…
  • रवि शंकर दुबे
    यूपी वोटिंग पैटर्न: ग्रामीण इलाकों में ज़्यादा और शहरों में कम वोटिंग के क्या हैं मायने?
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में अब तक के वोटिंग प्रतिशत ने राजनीतिक विश्लेषकों को उलझा कर रख दिया है, शहरों में कम तो ग्रामीण इलाकों में अधिक वोटिंग ने पेच फंसा दिया है, जबकि पिछले दो चुनावों का वोटिंग ट्रेंड एक…
  • banaras
    सतीश भारतीय
    यूपी चुनाव: कैसा है बनारस का माहौल?
    28 Feb 2022
    बनारस का रुझान कमल खिलाने की तरफ है या साइकिल की रफ्तार तेज करने की तरफ?
  • एस एन साहू 
    उत्तरप्रदेश में चुनाव पूरब की ओर बढ़ने के साथ भाजपा की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं 
    28 Feb 2022
    क्या भाजपा को देर से इस बात का अहसास हो रहा है कि उसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कहीं अधिक पिछड़े वर्ग के समर्थन की जरूरत है, जिन्होंने अपनी जातिगत पहचान का दांव खेला था?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License