NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राजस्थान विधानसभा चुनाव : क्या माकपा बन सकती है कांग्रेस और बीजेपी का विकल्प?
राज्य के इतिहास में शायद पहली बार कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ वामपंथ भी एक बड़ी ताक़त बनकर उभर सकती है। राजस्थान में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) 29 सीटों पर लड़ रही है और राज्य में माकपा के बड़े नेता अमरा राम को राजस्थान लोकतान्त्रिक मोर्चा (तीसरे मोर्चा) ने मुख़्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है।
ऋतांश आज़ाद
27 Oct 2018
CPI(M)

इस बार राजस्थान के चुनाव देखने लायक होंगे क्योंकि राज्य के इतिहास में शायद पहली बार कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ वामपंथ भी एक बड़ी ताक़त बनकर उभर सकती है। राजस्थान में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) 29 सीटों पर लड़ रही है और राज्य में माकपा के बड़े नेता अमरा राम को राजस्थान लोकतान्त्रिक मोर्चा (तीसरे मोर्चा) ने मुख़्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। राज्य में कांग्रेस और बीजेपी को टक्कर देने के लिए राजस्थान लोकतान्त्रिक मोर्चा बनाया है जिसमें जनता दल (सेक्युलर), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी और एमसीपीआई (यू) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी शामिल हैं। 

यह राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ है कि राज्य के चुनावों में वामदलों ने अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया है। इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि राज्य के इतिहास में वाम आंदोलन कभी भी इतना ताक़तवर नहीं था। जानकार इसकी वजह सूबे में सामंतवाद के व्यापक प्रभाव को बताते हैं। बहरहाल माकपा की ताक़त राज्य में सबसे ज़्यादा सीकर, हनुमानगढ़, गंगानगर, बीकनेर और चूरू ज़िलों में बताई जा रही है। इसकी वजह इलाके में लगातार ज़ोर पकड़ते किसान आंदोलन है, जो माकपा से जुड़े किसान संगठन अखिल भारतीय किसान सभा के अगुवाई में चलाया जा रहा है। 

पार्टी ने इन्हीं क्षेत्रों में 29 सेटों पर लड़ने की घोषणा कर चुकी है जिसमें से 15 सेटों पर ज़ोरदार मुकाबले की उम्मीद है। यहाँ पार्टी सीकर में 6 सीटों पर, 3 चूरू, 3 हनुमानगढ़, 3 बीकानेर और 2 नागौर सेटों पर लड़ेगी। गौरतलब है कि 2008 के विधानसभा चुनावों में पार्टी इसी इलाके से 3 सीटों पर विजयी रही थी। इससे पहले 2003 के विधान सभा चुनावों में पार्टी को सिर्फ 1 सीट मिली थी। लेकिन 2013 में बीजेपी के लहर के चलते पार्टी को एक भी सीट प्राप्त नहीं हुई थी। 

राजस्थान में पार्टी का आंदोलन से जुड़ा इतिहास रहा है। इन्हीं आंदोलनों का नतीजा है कि आज पार्टी एक विकल्प बनकर उभर पायी है। 2008 में तीन सीटों पर जीत की वजह यह थी कि पार्टी और अखिल भारतीय किसान सभा का पानी और बिजली को लेकर आंदोलन चला। 2004 में यह आंदोलन गंगानगर, बिकानेर और हनुमानगढ़ ज़िले में हुआ था। हुआ यह था कि 2002  में कांग्रेस सरकार ने इंदिरा गाँधी नहर के पानी की सप्लाई किसानों के लिए कम करने का निर्णय लिया था जिसे लागू बीजेपी सरकार ने किया। 2004 में वसुंधरा राजे की बीजेपी सरकार ने उसको लागू किया। जहाँ पहले किसानों को प्रति हज़ार हेक्टेरयर 5.23 क्यूसेक पानी मिलता था वहीं हज़ार हेक्टेयर पर अब उन्हें 3.5 क्यूसेक पानी मिलने लगा। इसके खिलाफ किसान सभा ने आंदोलन किया कई लोग जेल गए और कइयों ने पुलिस दमन सहा। लेकिन आखिरकार बीजेपी सरकार को उनकी माँगे माननी पड़ी और फिर से उतना ही पानी मिलने लगा। 

इसी तरह 2000 में किसानों को दी जाने वाली बिजली को 6. 6 बिलियन से 3.8 बिलियन यूनिट्स कर दिया गया था। साथ ही बिजली की कीमतों में कांग्रेस सरकार ने लगातार बढ़ोत्तरी की। बीजेपी ने 2003 में सत्ता में आने से पहले कहा था कि वह बिजली के दाम कम करेगी और यूनिट्स को भी बढ़ाया जायेगा। लेकिन सत्ता में आने के बाद 1.10 रुपये प्रति यूनिट बिजली महंगी कर दी गयी और पहले जीतनी बिजली भी नहीं दी गयी। माकपा ने इसके खिलाफ भी लम्बा आंदोलन चलाया और आखिर सरकार को किसानों के सामने झुकना पड़ा। माकपा राज्य कमेटी के सदस्य गुरचरण मौर का कहना है कि इसके बाद से आज तक किसानों के लिए बिजली की कीमत नहीं बढ़ी हैं। यह किसान सभा के द्वारा किये गए आंदोलनों की ही सफलता थी। 

हालाँकि 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। लेकिन 2017 से शेखावाटी इलाके में चल रहे किसान आंदोलन ने इस बार पार्टी की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। इसकी मुख्य वजह है कि पिछले साल के किसान आंदोलन, जिनके सामने वसुंधरा राजे सरकार को झुकना पड़ा था। 

दरअसल केंद्र सरकारों की बाज़ार परस्त नीतियों की वजह से किसान लगातार कर्ज़ों में डूबते जा रहे हैं। इन्हीं नीतियों को राजस्थान में सरकारों ने भी आगे बढ़ाया है। यही वजह थी कि किसान पूर्ण कर्ज़ा माफ़ी ,लागत का डेढ़ गुना दाम, पेंशन,पशु व्यापार की दोबारा बहाली और दूसरी माँगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। नवंबर 2017 में इस आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा और 13 दिनों के लिए कई ज़िलों में चक्का जाम कर दिया। आखिरकार वसुंधरा सरकार ने किसानों की माँगे लिखित में मानी। लेकिन उन्हें ज़मीन पर नहीं लागू कियाI जिसके बाद किसानों ने आंदोलन को जयपुर तक ले जाने की बात की और राज्य भर में किसान नेताओं की गिरफ्तार किया गया। लेकिन आखिर जीत किसानों की हुई। सरकार ने उन किसानों के 50,000 रुपये तक के क़र्ज़ माफ़ किये जिनका खाता कॉर्पोरेटिव बैंकों में था। इस वजह से किसानों का 8 हज़ार करोड़ रुपये क़र्ज़ माफ़ हुए। हालाँकि पेंशन और दूसरी कई माँगों को अब भी लागू नहीं किया गया है। लेकिन फिर भी यह सूबे में वाम आंदोलन की सबसे ऐतिहासिक जीत है। 

इसी से उत्साहित पार्टी का यह दवा है कि इन विधानसभा चुनावों के बाद माकपा राज्य में एक बड़ी ताक़त बनकर उभरेगी। गुरचरण मौर का कहना है कि इस बार उम्मीद है राजस्थान में वो होगा जो इससे पहले दूसरे राज्य में नहीं हुआ। पार्टी सूत्रों का कहना है कि फिलहाल बीएसपी और आम आदमी पार्टी के लोगों से बात चल रही है। अगर यह दोनों भी इस मोर्चे में शामिल होते हैं तो पार्टी को उम्मीद है कि त्रिशंकू विधानसभा की सूरत में कर्णाटक चुनावों जैसे नतीजे आ सकते हैं। 

किसान आंदोलन के साथ ही माकपा और उससे जुड़े संगठन राज्य में लिंचिंग के खिलाफ भी पुरज़ोर तरीके से सामने आते रहे हैं। राजस्थान मॉब लिंचिंग का गढ़ बनकर उभरा है और एमनेस्टी इंटरनेशनल की हाल में आयी रिपोर्ट के हिसाब से वह हेट क्राइम में 3 नंबर का राज्य है। इन अपराधों का सबसे पुरज़ोर विरोध किसान सभा और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने किया है। इसके साथ ही माकपा से जुड़ा स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़आई) भी राज्य में सरकारी स्कूलों के निजीकरण के खिलाफ लड़ता रहा है। जिसमें उसने जीत भी हासिल की है और फिलहाल सरकार ने सरकारी स्कूलों को निजी हाथों में देने के काम को रोका है। हाल ही में हुए छात्र संघ के चुनावों में एसएफ़आई ने 27 कॉलेजों अध्यक्ष की सीट हासिल की है। 

इसके साथ ही एक और बात को रेखांकित करने की ज़रूरत है। अगर माकपा यहाँ अपनी ताक़त बढ़ाने में कामयाब होती है तो इससे न सिर्फ राज्य में बल्कि देश भर में वाम मोर्चे के तीसरी ताक़त की तरह उभरने का रास्ता मज़बूत हो सकता है। यह चुनाव 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों को मद्देनज़र और भी ज़रूरी हो जाते हैं। इसीलिए राजस्थान विधानसभा चुनावों में वामदलों और खासकर माकपा की चुनावी मुहीम पर नज़र रखी जानी चाहिए। 

CPI(M)
Rajasthan
Rajasthan Vidhan sabha elections
Rajasthan elections 2018
AIKS
Amra Ram

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

केरल उप-चुनाव: एलडीएफ़ की नज़र 100वीं सीट पर, यूडीएफ़ के लिए चुनौती 

15 राज्यों की 57 सीटों पर राज्यसभा चुनाव; कैसे चुने जाते हैं सांसद, यहां समझिए...

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

छोटे-मझोले किसानों पर लू की मार, प्रति क्विंटल गेंहू के लिए यूनियनों ने मांगा 500 रुपये बोनस

डीवाईएफ़आई ने भारत में धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए संयुक्त संघर्ष का आह्वान किया

इतिहास कहता है- ‘’चिंतन शिविर’’ भी नहीं बदल सका कांग्रेस की किस्मत

कांग्रेस चिंता शिविर में सोनिया गांधी ने कहा : गांधीजी के हत्यारों का महिमामंडन हो रहा है!

2023 विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र तेज़ हुए सांप्रदायिक हमले, लाउडस्पीकर विवाद पर दिल्ली सरकार ने किए हाथ खड़े


बाकी खबरें

  • Gujarat Riots
    बादल सरोज
    गुजरात दंगों की बीसवीं बरसी भूलने के ख़तरे अनेक
    05 Mar 2022
    इस चुनिन्दा विस्मृति के पीछे उन घपलों, घोटालों, साजिशों, चालबाजियों, न्याय प्रबंधन की तिकड़मों की याद दिलाने से बचना है जिनके जरिये इन दंगों के असली मुजरिमों को बचाया गया था।
  • US Army Invasion
    रॉजर वॉटर्स
    जंग से फ़ायदा लेने वाले गुंडों के ख़िलाफ़ एकजुट होने की ज़रूरत
    05 Mar 2022
    पश्चिमी मीडिया ने यूक्रेन विवाद को इस तरह से दिखाया है जो हमें बांटने वाले हैं। मगर क्यों न हम उन सब के ख़िलाफ़ एकजुट हो जाएं जो पूरी दुनिया में कहीं भी जंगों को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं?
  • government schemes
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना के दौरान सरकारी योजनाओं का फायदा नहीं ले पा रहें है जरूरतमंद परिवार - सर्वे
    05 Mar 2022
    कोरोना की तीसरी लहर के दौरान भारत के 5 राज्यों (दिल्ली, झारखंड, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, ओडिशा) में 488 प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना हेतु पात्र महिलाओं के साथ बातचीत करने के बाद निकले नतीजे।
  • UP Elections
    इविता दास, वी.आर.श्रेया
    यूपी चुनाव: सोनभद्र और चंदौली जिलों में कोविड-19 की अनसुनी कहानियां हुईं उजागर 
    05 Mar 2022
    ये कहानियां उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और चंदौली जिलों की हैं जिन्हे ऑल-इंडिया यूनियन ऑफ़ फ़ॉरेस्ट वर्किंग पीपल (AIUFWP) द्वारा आयोजित एक जन सुनवाई में सुनाया गया था। 
  • Modi
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव : क्या पूर्वांचल की धरती मोदी-योगी के लिए वाटरलू साबित होगी
    05 Mar 2022
    मोदी जी पिछले चुनाव के सारे नुस्खों को दुहराते हुए चुनाव नतीजों को दुहराना चाह रहे हैं, पर तब से गंगा में बहुत पानी बह चुका है और हालात बिल्कुल बदल चुके हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License