NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राज्य सरकार कर्मचारियों के लिए अमित शाह के घडियाली आँसू
अधिकांश भाजपा शासित राज्यों में, सरकार नौकरियों को आउटसोर्स किया जा रहा है या यहाँ तक कि उन्हें समाप्त किया जा है, पेंशन को जबरन रूप से निजीकरण और सुविधाओं को कम किया जा रहा है।
सुबोध वर्मा
13 Jan 2018
Translated by महेश कुमार
Amit Shah

हाल ही में, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा में कहा कि अगर लोग आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा सरकार को चुनेंगे तो वह 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करेंगे और सरकारी कर्मचारियों को आगे बढ़ाएंगे। ऐसा करने में, शाह आमतौर पर राज्य के बारे में पूर्ण अज्ञानता दिखाते हैं और भाजपा शासित राज्यों में अपनी पार्टी के कर्मचारी-विरोधी रिकॉर्ड को भुला देते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह शाह भी चुनाव जीतने के लिए भ्रामक और झूठे वादों के विशेषज्ञ हैं। याद रखें कि मोदी ने क्या-क्या घोषणाएँ की थी! कि वे 1 करोड़ नौकरियाँ पैदा करेंगे? शाह भी वैसा ही झूठ का पुलिन्दा खड़ा कर रह हैं।

7वें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) से केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों का वेतन बढ़ा। इन सिफारिशों को मोदी सरकार ने 2016 में स्वीकार किया। इन्हीं के आधार पर विभिन्न राज्य सरकारों को भी अपने कर्मचारियों के लिए समान वेतन संरचनाओं की स्वीकृति घोषित करने की आवश्यकता थी। चूंकि ज्यादातर राज्य नकद की तंगी और व्यय कम करने के विचार से प्रभावित हैं, इसलिए वे 7वें सीपीसी को स्वीकार करने में धीमी गति से चल रहे थे। इसकी वजह से 2016 और 2017 में राज्य सरकार कर्मचारी पूरे देश भर में आंदोलन कर रहे थे।

लेकिन - अमित शाह को नोट करना चाहिए - कई राज्य वेतन स्तर तय करने के लिए केंद्रीय वेतन आयोग का पालन नहीं करते हैं। उन्होंने समय-समय पर वेतन को संशोधित करने के अपने तरीके तैयार किए हैं। ऐसे राज्यों में: केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, त्रिपुरा और पंजाब हैं। केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में, वेतन संशोधन पांच साल में एक बार किया जाता है। तो सरकार कर्मचारियों को वास्तव में उनकी केंद्रीय सरकार की तुलना में बेहतर वेतन देती है।

त्रिपुरा सरकार ने जून 2017 में अपने सभी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए 1 अप्रैल 2017 से वेतन बढ़ाने की घोषणा की। ग्रैच्युटी राशि और साथ ही चिकित्सा और आवास भत्ते भी बढाए, अमित शाह को शायद यह सब पता नहीं है, या वह इसे छिपा रहे हैं। राज्य के वित्त मंत्री भानु लाल सहा का हवाला देते हुए रिपोर्ट के मुताबिक वेतन और पेंशन वृद्धि में 1,242.69 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय हुआ है। वेतन वृद्धि में स्वायत्त निकायों, बोर्ड और पीएसयू के कर्मचारी भी शामिल हैं।

7वें सीपीसी की सिफारिशों को स्वीकार करने वाले अन्य राज्यों की एक त्वरित समीक्षा से पता चलता है कि राजस्व में वेतन वृद्धि 14% से 20% तक है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश सरकार (भाजपा द्वारा संचालित) अपने कर्मचारियों के लिए 14% की वृद्धि को स्वीकार किया। इसके मुकाबले त्रिपुरा एक ऐसा राज्य है जिसने ज़्यादा वृद्धि की है। यह भी अमित शाह को नहीं पता, या फिर इसे कह नहीं रहे।

लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती है। भाजपा की राज्य सरकारों ने पिछले एक दशक में राज्य सरकार कर्मचारियों पर हमले की झड़ी लगा दी है। इसमें नियमित पदों को थोक में निरस्त करना, रिक्त पदों को न भरना और सरकार द्वारा निजी ठेकेदारों को बहुत कम वेतन में रोजगार की आउटसोर्सिंग और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण के बिना लागू करना, जबरदस्ती निजी पेंशन योजना (राष्ट्रीय पेंशन योजना) को लागू करना शामिल है। अमित शाह की त्रिपुरा के कर्मचारियों के लिए चिंता कुछ और नहीं बल्कि मगरमच्छ के आँसू हैं।

अखिल भारतीय राज्य सरकार कर्मचारी संघ के महासचिव ए. श्रीकुमार, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि पिछले एक दशक में नियमित राज्यों के कर्मचारियों की संख्या लगभग 82 लाख से घटकर 60 लाख हो गई है। यह मुख्य रूप से इसलिए हुआ है क्योंकि त्रिपुरा और केरल को छोड़कर लगभग सभी राज्यों में सरकार नौकरियों को आउटसोर्स किया गया है।

"वास्तव में वेतन आयोग ने सुझाव दिया है कि नियमित नौकरियों को राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ को कम करने के लिए ठेकेदारों को आउटसोर्स किया जाना चाहिए।" श्रीकुमार ने कहा।

दिसंबर 2017 में भाजपा ने महाराष्ट्र सरकार ने घोषणा की कि 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए अपने मॉडल की घोषणा में कहा कि यह कर्मचारियों की संख्या में 30% की कटौती करेगा। इस से जो बचत होगी वह कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि के कारण अतिरिक्त खर्च को पूरा करने में मदद करेगी। महाराष्ट्र में लगभग 19 लाख कर्मचारी हैं जिसमें से लगभग 2 लाख पद खाली हैं। इन पदों को खत्म करने के अलावा करीब 2 लाख कर्मचारियों को सड़कों पर फेंक दिया जाएगा। क्या अमित शाह के दिमाग में त्रिपुरा के लिए यह योजना है?

श्रीकुमार का अनुमान है कि बीजेपी की राज्य सरकारों में करीब 40-50% कर्मचारी ठेके पर हैं। केंद्रीय सरकार स्पष्ट रूप से राज्य की सरकारों को निर्देशित किया है कि केन्द्र प्रायोजित योजनाओं में ठेकेदारी पर रोज़गार दिया जाए। ऐसे कर्मचारियों को अपने निजी नियोक्ताओं (ठेकेदार) से कम वेतन मिलता है, व्यावहारिक रूप से कोई लाभ नहीं होता है और नौकरी की सुरक्षा भी नहीं होती है।

आउटसोर्सिंग प्रक्रिया से सबसे ज़्यादा नुकसान दलित और आदिवासियों को झेलना पड़ता है। चूंकि निजी ठेकेदार आरक्षण नीति का पालन नहीं करते इसलिए दलितों और आदिवासियों के लिए रोज़गार की संभावनाएँ कम हो जाती हैं और ओबीसी के लोगों पर भी इसका खराब प्रभाव पड़ता हैं।

दूसरी तरफ, त्रिपुरा में रिवर्स पॉलिसी के बाद वाम मोर्चा सरकार ने राज्य लोक सेवा आयोग और राज्य में विभिन्न रोजगार एक्सचेंजों द्वारा की गई नियुक्तियों की संख्या देश में सबसे अधिक है, श्रीकुमार ने कहा "त्रिपुरा में पिछले पांच वर्षों में नियमित नौकरियों में 20,000 से अधिक युवाओं को नियुक्त किया गया है। इस नीति ने राज्य के दलित और आदिवासी युवाओं के लिए सुरक्षा और सम्मान की एक नई दुनिया खोल दी है, जिससे उन्हें प्रगति का मौका मिलेगा। "

भाजपा राज्य सरकारों का एक अन्य हमला राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) के उत्साही और जबरन कार्यान्वयन पर किया गया है, जिसमें निजीकरण पेंशन शामिल है। अमेरिकी मॉडल पर आधारित यह योजना, पूर्व एनडीए सरकार द्वारा प्रख्यापित की गई थी। 2003 में, जब एक पेंशन नियामक की स्थापना के बारे में 2004 में कानून यूपीए द्वारा भाजपा के समर्थन से पारित किया गया था। बड़े पेंशन फंड को इक्विटी और बांडों में निवेश किया जाता है, जिससे बाजार संबंधी जोखिम बढ़ते हैं। एक निश्चित कट ऑफ तिथि के बाद कर्मचारियों में शामिल होने के लिए अनिवार्य है, साथ ही उनके वेतन का 10% स्वचालित रूप से निधि में जा रहा है। त्रिपुरा कुछ ऐसे राज्यों में से एक है, जो अपने कर्मचारियों के लिए एनपीएस लागू नहीं कर रही हैं, पुरानी पेंशन योजना को जारी रखा हुआ हैं, जो कर्मचारियों की कड़ी मेहनत से अर्जित किए गए पेंशन का जोखिम नहीं उठाते हैं। क्या अमित शाह ने त्रिपुरा में भी एनपीएस की सिफारिश की है?

केंद्रीय भाजपा सरकार ने सातवीं सीपीसी को लागू करने के लिए राज्यों की सहायता के लिए धन मुहैया कराने से भी इनकार कर दिया है, श्रीकुमार ने कहा कि उनकी फेडरेशन ने बार-बार केंद्रीय सरकार से आग्रह किया कि कमजोर राज्य सरकारों को धन मुहैया करायें इसके बिना वेतन वृद्धि को लागू करना मुश्किल है फिर भी भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों ने उनके अनुरोधों पर ध्यान नहीं लिया है।

इसका मतलब यह है कि त्रिपुरा और इसकी राज्य सरकार वर्तमान वाम मोर्चे के तहत कर्मचारी ज्यादा बेहतर हैं। बीजेपी उन्हें वेतन वृद्धि के वादे के साथ मुर्ख बनाने का प्रयास कर रही है, लेकिन वह एक छलावे के अलावा कुछ नहीं है बल्कि उनकी सभी कर्मचारी विरोधी नीतियों को त्रिपुरा में तस्करी कर लाने के प्रयास के अलावा कुछ भी नहीं है। अमित शाह केवल चुनाव जीतने के लिए चिंतित हैं, न कि कर्मचारियों के कल्याण के लिए।

Amit Shah
BJP
Tripura
CPC
Modi government
NPS

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया


बाकी खबरें

  • सत्यम् तिवारी
    देश भर में निकाली गई हनुमान जयंती की शोभायात्रा, रामनवमी जुलूस में झुलसे घरों की किसी को नहीं याद?
    16 Apr 2022
    एक धार्मिक जुलूस से पैदा हुई दहशत और घायल लोगों की चीख़-पुकार अभी फ़िज़ा में मौजूद है कि राजधानी दिल्ली सहित देश भर में एक और त्योहार के जुलूस निकाले गए। और वह भी बाक़ायदा सरकारी आयोजन की तरह। सवाल…
  • पलानीवेल राजन सी
    अपनी ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष करते ईरुला वनवासी, कहा- मरते दम तक लड़ेंगे
    16 Apr 2022
    पिल्लूर में स्थानीय समुदायों की लगभग 24 बस्तियां हैं, जो सामुदायिक वन अधिकारों की मांग कर रही हैं, जैसा कि एफआरए के तहत उन्हें आश्वस्त किया गया था।
  • रूबी सरकार
    बुलडोज़र की राजनीति पर चलता लोकतंत्र, क्या कानून और अदालतों का राज समाप्त हो गया है?
    16 Apr 2022
    जिस तरह एक ख़ास धर्म के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए भाजपा की राज्य सरकारें बुलडोज़र को आगे कर रही हैं उससे लोकतंत्र हर रोज़ मरणासन्न स्थिति की ओर जा रहा है। 
  • सत्यम श्रीवास्तव
    कन्क्लूसिव लैंड टाईटलिंग की भारत सरकार की बड़ी छलांग
    16 Apr 2022
    देश में मौजूद ज़मीन के हर एक पीस/प्लॉट का एक आधार नंबर दिया जाना जिसे इस बजट भाषण में यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN) कहा गया है। इसके लिए बाज़ाब्ता ज़मीन के हर टुकड़े के अक्षांश और देशांत…
  • विजय विनीत
    पत्रकारों के समर्थन में बलिया में ऐतिहासिक बंद, पूरे ज़िले में जुलूस-प्रदर्शन
    16 Apr 2022
    पेपर लीक मामले में पत्रकारों की गिरफ़्तारी और उत्पीड़न के खिलाफ आज बलिया में ऐतिहासिक बंदी है। बलिया शहर के अलावा बैरिया, बांसडीह, बेलथरा रोड, रसड़ा और सिकंदरपुर समेत ज़िले के सभी छोटे-बड़े बाज़ार…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License