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रामचरण मुंडा की मौत पर दो मिनट का मौन!
सोचने का सवाल है कि क्या इन मौतों को महज तकनीकी गड़बड़ियों तक न्यूनीकृत किया जा सकता है? क्या इसके कोई संरचनागत कारण नहीं हैं? ‘आखिर अधिक अनाज पैदा करने के बावजूद हम भूख की समस्या को मिटा क्यों नहीं पा रहे हैं।’
सुभाष गाताडे
18 Jun 2019
Munda

‘‘रामचरण मुंडा, उम्र 65 साल को विगत दो माह से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन नहीं दिया गया था। हमारे अधिकारियों ने इसकी सत्यता की पड़ताल की है।’’ 

लातेहार, झारखण्ड के डिप्टी कमीशनर जनाब राजीव कुमार द्वारा लातेहार के दुरूप गांव के रहने वाले उपरोक्त आदिवासी की मौत पर की ऐसी स्वीकारोक्ति बहुत कम देखने में आती है।

अपनी पत्नी चमरी देवी और बेटी सुनिला कुमारी के साथ रामचरण गांव में ही रहते थे। उनके बेटे की मौत दो साल पहले टीबी के चलते हुई थी। राशन डीलर की बात मानें तो चूंकि इलाके में इंटरनेट की सेवा में दिक्कते हैं, और राशन वितरण के लिए ऑनलाइन बायोमेट्रिक सिस्टम कायम किया गया है, इसलिए रामचरण को अनाज नहीं दिया जा सका था। 

भूख से मौत.jpg

इस मामले की असलियत कभी सामने आएगी इस पर संदेह है।

वैसे भूख से होने वाली मौतें अब देश में अजूबा चीज़ नहीं रही। 

दो साल पहले झारखण्ड के ही सिमडेगा जिले के कारीमाटी गांव की 11 वर्षीय हुई संतोषी की मौत के बाद ऐसी मौतों पर लोगों एवं समाज की अधिक निगाह गयी थी। पता चला था कि पूरा परिवार कई दिनों से भूखा था और राशन मिलने के भी कोई आसार नहीं थे क्योंकि राशन कार्ड के साथ आधार लिंक न होने के चलते उनका नाम लिस्ट से हटा दिया गया था। अपनी मां के गोद में ‘भात भात कहते हुए दम तोड़ी संतोषी की दास्तां ने लोगों को विचलित किया था। 

इसे पढ़ें : झारखण्ड: भूख से मौत का बढ़ता सिलसिला

संतोषी की मौत के एक साल बाद ‘राइट टू फूड कैंपेन’ (अन्न के अधिकार के लिए मुहिम) के संघर्षरत कार्यकर्ताओं ने बाकायदा एक सूची जारी की थी कि वर्ष 2015 से ऐसी कितनी मौतें हुई हैं। उन्होंने बताया कि जहां भूख के चलते कथित मौतों की संख्या56 है जबकि इनमें से 42 मौतें 2017 और 2018 के दरमियान हुई हैं। उनका यह भी कहना रहा है कि ‘इन मौतों में से अधिकांश मौतें आधार प्रणाली के चलते हुई हैं क्योंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की गड़बड़ियों, नेटवर्क की समस्याओं आदि के चलते वह अपना अनाज प्राप्त नहीं कर सके थे।

जानेमाने अर्थशास्त्राी जां द्रेज और उनके सहयोगियों द्वारा झारखंड के 32 गांवों के एक हजार परिवारों का किया गया अध्ययन इसी बात की ताईद करता है, जिसके मुताबिक आधार लिंक न होने, या लिंक होने के बावजूद अंगूठे के न पहचानने के चलते अनाज से वंचित लोगों का अनुमान 20 फीसदी है। निश्चित तौर पर यह सभी ऐसे लोग हैं जिन्हें ऐसे सस्ते अनाज की सबसे सख्त जरूरत है,उसकी उपलब्धता/अनुपलब्धता लोगों के जीवन मरण को निर्धारित करती है।   

विडम्बना ही रही है कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने बार बार स्पष्ट किया हो कि राशन कार्ड अगर आधार लिंक न भी हो तो उसे अनाज से वंचित न किया जाए, भले ही सरकारों की तरफ से दावे किए जाते रहते हों कि बायोमेट्रिक आईडेंटिफिकेशन (जीवमितिक शिनाख्त) के अनिवार्य किए जाने के बावजूद किसी को अनाज से वंचित नहीं किया जा रहा है, लेकिन यही देखने में आ रहा है कि जमीनी हक़ीकत इन दावों से मेल नहीं खाती रही है।

सोचने का सवाल है कि क्या इन मौतों को महज तकनीकी गड़बड़ियों तक न्यूनीकृत किया जा सकता है? क्या इसके कोई संरचनागत कारण नहीं हैं?

‘आखिर अधिक अनाज पैदा करने के बावजूद हम भूख की समस्या को मिटा क्यों नहीं पा रहे हैं।’ भूख की विकराल होती समस्या को एक अलग कोण से सम्बोधित करने की कोशिश अग्रणी पत्रिका ‘इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली’ में की गयी थी। लेख में बताया गया था कि अगर नीतिगत स्तर पर देखें तो ‘भूख के मुददे से सीधे नहीं सम्बोधित किया जाता बल्कि उसे आर्थिक विकास के बड़े परिप्रेक्ष्य में रखा जाता है और यह उम्मीद की जाती है कि समाज की सम्पदा छन छन कर नीचे आएगी और भूख की समस्या का समाधान करेगी।’ यह समझ कई ‘‘गलत अवधारणाओं पर टिकी होती है, जिसका ताल्लुक भूख और अन्य सामाजिक संरचनाओं के अन्तर्सम्बन्ध पर टिका होता है। अधिक से अधिक कह सकते हैं कि यह वह एक अप्रत्यक्ष तरीका है जो भारत के सामने खड़ी भूख की विकराल समस्या को तुरंत सम्बोधित नहीं करता।’’

इसी आलेख में इस प्रश्न पर भी विचार किया गया कि भूख की समस्या से निपटना हो तो ‘‘आय वितरण की नीतियों को अमल में लाना होगा, जो सामाजिक न्याय के उददेश्यों को मजबूत करती हों न कि नवउदारवाद के तहत आर्थिक कार्यक्षमता के तर्कों को पुष्ट करती हों।’ प्रोफेसर प्रवीण झा और नीलाचला आचार्य को उद्धृत करते हुए कहा गया था ‘‘अधिकतर विकासशील मुल्कों में सबसे बड़े मुददों में से एक होता है, सामाजिक सुरक्षा के लिए सार्वजनिक प्रावधान, ताकि भूख और अनाज सुरक्षा को सम्बोधित किया जा सके जो पर्याप्त ‘‘राजकोषीय/फिस्कल’’ या ‘‘व्यय’’ के दायरे से जुड़ा होता है। इस नज़रिये के विपरीत कि ऐसे मुल्क जिनका सकल घरेलू उत्पाद कम है, वह ऐसे दायरे का निर्माण नहीं कर सकते हैं, लेखक द्वय ने इस बात पर जोर दिया था कि आय के निम्न स्तरों पर भी सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है।’’ 

मालूम हो कि इस सन्दर्भ में भारत अफ्रीकी मुल्क इथोपिया से बहुत कुछ सीख सकता है जिसकी प्रति व्यक्ति आय भारत के चौथे हिस्से के बराबर है और जिस मुल्क को बीसवीं सदी में तमाम अकालों का सामना करना पड़ा। आज की तारीख में अन्न सुरक्षा के कई सूचकांक - जैसे बच्चों के पोषण दरों को लेकर - इथोपिया की तुलना में भारत में बदतर हैं। अगर अन्न असुरक्षा से निपटने के दोनों मुल्कों के अनुभवों पर गौर करें तो दिखता है कि इस ‘‘दक्षिण एशियाई पहेली’’ को - जिसके तहत तेज आर्थिक विकास और गरीबी के कम करने के बावजूद अन्न असुरक्षा बेहद अधिक है -  समझना हो तो इन दोनों मुल्कों की बच्चों के पोषण और सैनिटेशन की नीतियों पर गौर किया जा सकता है, जो उसके जन्म से उसके 1,000 दिन के होने तक अमल में आती है।

अंत में, प्रश्न उठता है कि भूख की विकराल होती समस्या के बावजूद उसे लेकर यहां हंगामा खड़ा होता क्यों नहीं दिखता ?दरअसल यह हकीकत है कि चाहे भूख हो या कुपोषण हो दोनों भारतीय राजनीति के लिए गैरमहत्वपूर्ण विषय हैं। इसे हम सत्ता के अलमबरदारों के तकरीरों में ही नहीं बल्कि संसद में चल रही बहसों या उठ रहे प्रश्नों में भी देख सकते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक संसद में उठाए गए सवालों में से महज 3 फीसदी बच्चों से जुड़े थे और जिनमें से 5 फीसदी प्रारंभिक देखभाल और विकास पर केन्द्रित थे जबकि भारत एक ऐसा मुल्क है जहां बच्चों की म्रत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक है। यही स्थिति मीडिया की भी है। 

आखिर भूख जैसी सेक्युलर समस्या को लेकर मीडिया या प्रबुद्ध जनों के विराट मौन को कैसे समझा जा सकता है। निश्चित ही इसके कई कारण तलाशे जा सकते हैं, मगर इसका सबसे प्रमुख कारण ऊंची जातियों द्वारा राष्ट्रीय आख्यान पर किया गया कब्जा दिखता है। भारत के सामने विकराल होती स्वास्थ्य समस्या हो, मगर उसकी अनोखी जाति व्यवस्था की उपस्थिति यह सुनिश्चित करती है कि ऊंची जातियों के लोग इससे अछूते रह जाते हैं। ‘स्क्रॉल’ पर लिखे अपने आलेख में शोएब दानियाल बताते हैं कि ‘भारत के कमजोर और मरणासन्न बच्चों का विशाल बहुमत आदिवासी, दलितों और शूद्र जातियों से ताल्लुक रखता है। इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली में प्रकाशित 2011 के एक अध्ययन के मुताबिक, हिन्दू ऊंची जातियों के तुलना में कम वजन के दलित बच्चे 53 फीसदी अधिक मिलते हैं तो आदिवासी बच्चे 69 फीसदी अधिक हैं।’ फिर इसमें क्या आश्चर्य कि भारत में भूख की समस्या पर इतनी कम चर्चा होती है। 

यह अकारण नहीं कि देश में भूख से होने वाली मौतों को लेकर सरकारें भी गाफिल दिखती हैं। और अपने आधिकारिक जवाब में संसद के पटल पर कह सकती है कि ‘किसी राज्य या केन्द्रशासित प्रदेश के प्रशासन ने ऐसी घटनाओं के बारे में उसे सूचित नहीं किया’’ और खुलेआम अपनी तमाम योजनाओं के बखान में जुट सकती है कि किस तरह वह सस्ते दरों पर गरीबों, वंचितों को अनाज पहुंचाने में मुब्तिला है। पिछली लोकसभा में संसद के पटल पर यही हुआ जब ग्राहक मामलों, अन्न और सार्वजनिक वितरण मामलों के केन्द्रीय राज्यमंत्राी जनाब सी आर चौधरी से यह तारांकित प्रश्न पूछा गया था।


इसमें कोई दोराय नहीं कि भारत के कर्णधार इस सच्चाई से जरूर वाकीफ होंगे कि दुनिया में भूख की समस्या विकराल होती जा रही है और 21वीं सदी में आर्थिक महाशक्ति बनने का इरादा रखनेवाला भारत भी इसका अपवाद नहीं है। अध्ययन बताते हैं कि किस तरह हर साल पचास लाख बच्चे कुपोषण से कालकवलित होते हैं, किस तरह गरीब मुल्कों के दस में से चार बच्चे उसी के चलते कमजोर शरीरों और दिमागों के साथ बड़े होते जाते हैं। हर साल जारी होने वाले ग्लोबल हंगर इंडेक्स अर्थात वैश्विक भूख सूचकांक के आंकड़े भारत की बद से बदतर होती स्थिति को ही रेखांकित करते रहे हैं। अगर 2018 में 119 मुल्कों की कतार में वह103 नम्बर पर स्थित था तो 2017 में यही आंकड़ा 97 पर था। 

मुमकिन है अपनी असफलता छिपाने के लिए वह आइंदा ऐसे तर्क भी देने लगें कि जब दुनिया के बड़े बड़े मुल्क इस चुनौती से निजात नहीं पा रहे हैं, तो अपने जैसे देश की कहां गिनती होगी। 

अन्त में, आज से ठीक पचहत्तर साल पहले भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के तहत चले देशव्यापी अभियान का शीर्षक था ‘भूखा है बंगाल’। इसके तहत पूरे देश के अग्रणी कलाकारों ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान पड़े भयानक अकाल में मरते बंगाल की दास्तां घर घर पहुंचायी थी। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक जिसमें लगभग 25 लाख लोग कालकवलित हुए थे।

इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि आज़ाद हिन्दोस्तां में आज भी भूख से मरते लोगों की दास्तां घर घर पहुंचाने के लिए ऐसी कोई मुहिम फिलवक्त़ नज़र नहीं आ रही है। निश्चित ही यह मौतें उस तरह नहीं सामने आ रही हों, जैसे भूखे बंगाल में सामने आयीं थी, मगर यह मौतें ऐसी मौतें अवश्य हैं जिनसे बचा जा सकता है। इस अभियान का एक गीत पूरे देश में चर्चित हुआ था:

पूरब देस में डुग्गी बाजी, फैला दुख का जाल
दुख की अग्नि कौन बुझाए, सूख गए सब ताल
जिन हाथों ने मोती रोले, आज वही कंगाल
रे साथी, आज वही कंगाल
भूखा है बंगाल रे साथी, भूखा है बंगाल.
 

इसे भी पढ़ें : झारखंड विधान सभा चुनाव 2019 : भूख से मरनेवालों की बढ़ती कतार !

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