NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
रफ़ाल डील और बोफोर्स मामले में समानता होते हुए भी बड़ा अंतर : एन राम
“…तब सौदे में भ्रष्टाचार की बू आई क्योंकि कीमत बहुत अधिक थी, और वायु सेना को भी वह नहीं मिला जो उसने मांगा था।” वरिष्ठ पत्रकार एन राम के साथ किए गए एक साक्षात्कार के संपादित अंश

आकिब खान
16 Mar 2019
Translated by महेश कुमार
Rafale Scam

हाल ही में द हिंदू में प्रकाशित खोजी लेखों की एक श्रृंखला ने विवादास्पद रफ़ाल विमान सौदे पर राजनीतिक बवंडर खड़ा कर दिया है। हिंदू की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) इस सौदे में 'समानांतर बातचीत' कर रहा था, इसमें भ्रष्टाचार विरोधी खंड और सत्यनिष्ठा संधि को हटा दिया गया, जबकि फ्रांस ने भारत द्वारा खरीदे गए 36 रफ़ाल जेट विमानों के लिए कोई बैंक गारंटी देने से इनकार कर दिया, जिसकी वजह से प्रत्येक विमान की कीमत 41 प्रतिशत बढ़ गयी, हम यहां रिपोर्ट के लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एन राम के साथ किए गए एक साक्षात्कार के संपादित अंश को पेश कर रहे हैं :

क्या आपको लगता है कि रफ़ाल घोटाला नरेंद्र मोदी के लिए अभिशाप बनेगा?

एन. राम : इसकी शुरुआत करना बहुत ही रहस्यमय था। इसे अचानक घोषित किया गया था और मुझे लगता है कि सभी प्रक्रियाओं का उल्लंघन या उन्हें बाईपास कर दिया गया था। यह उनके सभी वरिष्ठ अधिकारियों के लिए भी आश्चर्य की बात थी। निर्णय लेने की प्रकृति काफी चौंकाने वाली थी। इस सौदे के लिए लोगों ने कुछ भी तैयार नहीं किया था, खासकर किसी भी प्रमुख रक्षा सौदे पर क्योंकि अतीत में, बोफोर्स घोटाले के बाद, सरकारों ने इस पैमाने पर रक्षा सौदों या सैन्य सौदों पर हस्ताक्षर करने में काफी सावधानी बरती थी। इसलिए, इससे एक बड़ा झटका लगा जब अत्याधुनिक लड़ाकू विमान खरीदने के सौदे के लिए पूरी तरह से नई रूपरेखा की घोषणा की गई।

और तब सौदे में भ्रष्टाचार की बू आई क्योंकि कीमत बहुत अधिक थी, और वायु सेना को भी वह नहीं मिला जो उसने मांगा था, सामान्य प्रक्रियाओं का पालन या सिर्फ उल्लंघन ही नहीं किया गया था बल्कि यह भारत के राष्ट्रीय खजाने के लिए एक बड़े नुकसान की तरह लग रहा था। सितंबर 2016 में अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद से कुछ विवरणों को स्पष्ट रूप से उभरने में कुछ समय लगा। लेकिन यह पूरी तरह से निर्णय लेने की प्रक्रिया में पूरी तरह से हेरफेर करने के बारे में है जो कि सार्वजनिक हित के खिलाफ जाते देखा गया है, और कुछ व्यावसायिक समूह वगैरह के पक्ष में था। इसमें कोई पारदर्शिता नहीं बरती गयी थी।

वर्तमान सरकार ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को हटा दिया और बहुत कम विमान खरीदे। ऐसा क्यूं किया? आपका शोध क्या दिखाता है?

एन. राम : शोध से पता चलता है कि यह मनमाना निर्णय था। जो न तो कोई वाणिज्यिक या वित्तीय समझ रखता है, न ही वायु सेना के लिए इसमें कोई समझदारी नज़र आती है। क्योंकि वे सात स्क्वाड्रन चाहते थे, और अब उन्हें केवल दो मिलने वाले हैं। और इस योजना का हिस्सा एक प्रसिद्ध सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी, एचएएल का उपयोग करके स्वदेशी क्षमताओं को विकसित करने का था। हालाँकि, इसे अब खिड़की से बाहर फेंक दिया गया है, यह कहते हुए कि इससे समय ज्यादा लग रहा था। बेशक, इसमें बहुत लंबा समय लगा है लेकिन आपने भी इसमें योगदान दिया है।

मुझे लगता है कि वे यूरोफाइटर के ऑफ़र पर विचार कर सकते थे, या तो इस ऑफर के लिए जा सकते थे या फिर इसका इस्तेमाल कर फ्रेंच को झुकाने के लिए इसकी ताकत का उपयोग कर सकते थे। लेकिन निर्णय लेने की मनमानी प्रकृति के कारण, आधिकारिक तौर पर स्वीकृत वार्ताकारों की पीठ के पीछे पीएमओ और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार द्वारा समानांतर वार्ता आयोजित की गई थी। रक्षा मंत्रालय में कानून द्वारा गठित सात-सदस्यीय भारतीय वार्ता टीम के मामले में, उनकी स्थिति लगभग हर मुद्दे पर कम-कीमत, बैंक गारंटी,संप्रभु गारंटी से लेकर डिलीवरी शेड्यूल तक रही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि समानांतर वार्ता भारतीय पक्ष के बजाय फ्रांसीसी पक्ष के साथ ज्यादा दिखे।

एचएएल को बाहर किया, तो किसे लाया गया?

एन. राम : किसी को भी नहीं लाया गया था, लेकिन दिलचस्पी ऑफसेट में थी। प्रारंभ में, ऐसा लग रहा था कि कुछ ऑफसेट साझेदार वही करेंगे जो एचएएल करने जा रहा था,लेकिन यह बहुत स्पष्ट नहीं था। उनमें से कुछ सैन्य क्षेत्र के बजाय कार्यकारी व्यापार जेट का निर्माण करेंगे। मुझे पता नहीं है कि इसका क्या कनेक्शन है, क्योंकि आप स्वदेशी रक्षा क्षमता को मजबूत करने वाले थे, आप दूसरों को तोहफे प्रदान नहीं करते जो व्यापारिक रूप से मुसीबत में हो सकते हैं।

कारोबारी अनिल अंबानी सौदे में शामिल हो गए, यह कैसे हुआ?

एन. राम : वह पेरिस गए और इस सौदे के बारे में बहुत बड़ा दावा किया। यहां तक कि प्रेस में भी इसकी सूचना दी गई थी। यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि अनिल अंबानी के संयुक्त उद्यम के साथ निवेश का आकार क्या होगा। लेकिन मुझे लगता है कि उन्होंने कहा है कि वह एक कार्यकारी जेट बनाएंगे, चाहे उसका रक्षा से कोई लेना-देना हो, जिसके बारे में हमें पता नहीं है।

क्या आप भ्रष्टाचार की सीमा के बारे में विस्तार से बता सकते हैं?

एन. राम : उदाहरण के लिए, निर्धारित प्रक्रिया में भ्रष्टाचार विरोधी धाराएँ होनी थी। सौदे में कोई कमीशन एजेंट या उस पर कोई अनुचित प्रभाव नहीं होना चाहिए- इसे सत्यनिष्ठा संधि कहा जाता है। और खरीदार, भारत सरकार, को इस मामले में वाणिज्यिक आपूर्तिकर्ताओं-डसाल्ट और एमबीडीए फ्रांस के खातों की किताब तक पहुंच होगी – जो उनके खातों की जांच करने के लिए खुला होगा, इस मामले की जांच करने के लिए कि वे कहीं किसी को रिश्वत या कमिशन तो नहीं दे रहे हैं। हालाँकि, फ्रांसीसी पक्ष ने इसे इस बहाने से नकार दिया कि यह एक दो सरकारों की बीच का अंतर-सरकारी समझौता है।

वास्तव में, यह एक अंतर-सरकारी समझौता नहीं है यदि इन आपूर्ति प्रोटोकॉल को वाणिज्यिक निजी कंपनियों द्वारा निष्पादित किया जाना है। क्या उन्होंने कमीशन दिया है? या वे कमीशन देने जा रहे हैं? क्या उन्होंने अनुचित प्रभाव का इस्तेमाल किया है? वे खातों की किताब में क्या छिपा रहे हैं? ये सब सवाल उठते हैं, जिससे भ्रष्टाचार पर संदेह होता है।

सरकार भ्रष्टाचार विरोधी धारा को क्यों खत्म करना चाहेगी? कुछ छिपाने के लिए?

एन. राम : यह सवाल हमने पूछा है। यह एक सुरक्षित तरीका है जो आपकी प्रक्रिया में आवश्यक है, फिर आप इसे क्यों हटाएँगे? वार्ताकारों ने इसकी मांग की थी। विधि और न्याय मंत्रालय को सुरक्षा प्रक्रियाओं की आवश्यकता थी, लेकिन पीएमओ की समानांतर वार्ता ने इसे खत्म कर दिया। यदि आप रिपोर्ट को पढ़ते हैं, तो इसी तरह के हर मुद्दे पर, फ्रांसीसी पक्ष ने कहा कि यह पहले से ही उनके साथ सहमत है, इसलिए यह मामला खत्म हो गया है। यहां तक कि अगर इसे केवल एक सौदेबाजी के रूप में उपयोग करने के लिए, आप यदि यूरोफाइटर सौदे पर विचार करते, तो फ्रांसीसी अधिक उचित मूल्य दे सकते थे।

अगर हम पुलवामा हमले के बाद अब मोदी की बात सुनें, तो वे रफ़ाल सौदे में देरी के लिए कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। उन्होंने पूरी कहानी को ही पलट दिया। आप इसे कैसे देखते हैं?

एन. राम : यह एक प्रमुख मुद्दा होगा, और अब, निश्चित रूप से, वे हाइपर राष्ट्रवाद, अंधराष्ट्रीयता, युद्धोन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि वास्तव में युद्ध में नहीं जा रहे हैं,इस बुरी कथा को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लगातार युद्ध की बात कर रहे हैं। क्योंकि आप दो परमाणु देशों के साथ युद्ध में नहीं जा सकते हैं, हर कोई यह बात जानता है, लेकिन वे इसका उपयोग कर रहे हैं, ताकि रफ़ाल पर कोई चर्चा न हो। मोदी कह रहे हैं कि उन्होंने इसमें देरी की ... यह सच है, इसमें देरी हुई, लेकिन देरी उनकी अवधि के दौरान हुई है, क्योंकि वे 2014 से सत्ता में हैं, और वे आसानी से इन मुद्दों पर आगे बढ़ सकते थे, जिससे मेक इन इंडिया इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया होता। यदि फ्रांसीसी सहमत नहीं थे, तो आप यूरोफाइटर के पास जा सकते थे, जिसके बारे में वायु सेना का कहना है कि वह भी समान रूप से अच्छा है।

वे दोनों वायु सेना की योग्यता को पूरा करते हैं, एकमात्र अंतर मूल्य और वितरण कार्यक्रम में है और इसी तरह, आप इसे कितनी जल्दी प्राप्त कर सकते हैं। वे इन प्रक्रियाओं के पीछे यह कहते हैं कि हम यूरोफाइटर विकल्प पर विचार नहीं कर सकते, यह कहते हुए कि ये प्रक्रियाएँ हमें रोकने के लिए पहले से ही मौजूद हैं। इसलिए, एक तरफ आप यूरोफाइटर ऑफ़र को रोकने के लिए प्रक्रियाओं के माध्यम से जाते हैं या यूरोफाइटर ऑफ़र को देखते हैं या यहां तक कि कीमतों की तुलना करने के लिए इसका उपयोग करते हैं और दूसरी तरफ, आप 36विमान के साथ नए रफ़ाल सौदे को हड़पने की प्रक्रिया से पूरी तरह से दूर चले जाते हैं। इसलिए, मुझे लगता है कि यह निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर कदाचार है। यह एक बड़ा मुद्दा होगा, मुझे लगता है।

क्या यह चुनावों के लिए निर्णायक होगा?

एन. राम : कोई भी मुद्दा निर्णायक नहीं है, मेरा मानना है कि वास्तव में निर्णायक मुद्दे आजीविका के मुद्दे हैं। और अगर आप जनमत सर्वेक्षणों को देखें, तो अभी और पहले, भी एक बार फिर आम तौर पर शीर्ष मुद्दा बेरोजगारी होगा, अन्य आजीविका के मुद्दे मूल्य वृद्धि हैं, और भारत जैसे देश में ग्रामीण संकट, कृषि संकट, वे शीर्ष मुद्दे हैं। अब भी वे शीर्ष मुद्दे होंगे, चाहे यह अति राष्ट्रवाद हो या रफ़ाल, हम यह नहीं कहेंगे। लेकिन भारत में किसी भी चुनाव में आजीविका मुद्दे सबसे ज्यादा मायने रखते हैं।

रफ़ाल सौदा बोफोर्स से कैसे अलग है?

एन. राम : निर्णय लेने में समानता है। बोफोर्स सौदे और रफ़ाल सौदे में भी, निर्णय लेने के लिए पेशेवर मानकों को लागू नहीं किया गया था। बोफोर्स में, उदाहरण के लिए, बोफोर्स के प्रतिद्वंद्वी, फ्रांसीसी होवित्जर सभी सैन्य परीक्षण में पहले आए, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप के माध्यम से, बोफोर्स को प्राथमिकता दी गई। और फिर आपने पाया कि इसमें कमीशन भुगतान, रिश्वत, कमीशन के रूप में प्रच्छन्न, प्रतिशत भुगतान शामिल है, इसलिए सब कुछ... अनुबंध के हिस्से के तौर पर दिया गया था, पैसा इन लोगों के गुप्त स्विस बैंक खातों में चला गया और वे शुरू में छिपे हुए थे, हमें बाद में पता चला कि वे कौन थे।

रफ़ाल में, पैसे का निशान अभी तक नहीं मिला है। लेकिन निर्णय लेना आम बात है, लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि भ्रष्टाचार विरोधी धाराएं, सत्यनिष्ठा समझौता को इस सब से हटा दिया गया, अगर ऐसा हुआ है तो भ्रष्टाचार को कवर करना आसान होगा। यह बहुत बड़ा अंतर है। बड़ा अंतर यह है कि किसी को भी पैसे का निशान नहीं मिलेगा। वैसे 2G स्पेक्ट्रम के बारे में भी यही बात है, उन्होंने इसे एक बहुत बड़ा घोटाला बताया है। ए राजा, तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ने कहा कि कोई पैसे के लेनदेन का निशान नहीं है, उन्होंने यह कई साक्षात्कारों में कहा, जिसे द हिंदू ने प्रकाशित किया, और यह वही है जो ट्रायल कोर्ट ने पाया। उन्होंने पाया कि किसी भी धन के परिणामस्वरूप भुगतान नहीं किया गया है। इसलिए,आप जिन निर्णयों पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन इसमें रिश्वत का कोई सुराख नहीं है जो उस स्तर पर सीबीआई द्वारा साबित किया जा सके, इसलिए यह बहुत समान है।

सरकार दस्तावेजों को प्रकाशित करने के लिए द हिंदू के खिलाफ जा रही है। क्या आपको लगता है कि खोजी पत्रकारिता भारत में जोखिम भरा काम है?

एन. राम : बेशक, यह दांव पर है। मुझे लगता है कि आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम कानून का एक अप्रिय हिस्सा है। यह 1923 से है, ब्रिटिश राज में, इसका उपयोग भारत के लोगों के खिलाफ उस समय स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ किया। दुर्भाग्य से, यह क़ीमती किताबों में आज़ भी जारी है। प्रकाशनों के खिलाफ इसका इस्तेमाल शायद ही कभी किया गया हो। जो लोग किसी भी गुप्त दस्तावेजों को प्रकाशित करते हैं, उन्हें पूर्व में दंडित नहीं किया गया है। 1981 में, मैं द हिंदू के साथ वाशिंगटन संवाददाता था, और हमने कई गुप्त पत्र प्रकाशित किए, जहां भारत उस समय के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ बातचीत में शामिल था, जो तब इतिहास में क्रेडिट की सबसे बड़ी बहु-पार्श्व ऋण था, 5 बिलियन एसडीआर उस समय लगभग 6.3 बिलियन डॉलर के बराबर था। और बहुत सारे गुप्त कागज थे। किसी ने भी इसके खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम का उपयोग करने के बारे में बात नहीं की थी।

बोफोर्स पर, हमने कई सरकारी दस्तावेजों सहित 250 दस्तावेजों को प्रकाशित किया, किसी ने भी प्रकाशनों के खिलाफ 1923 के आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम का उपयोग करने के बारे में बात नहीं की। लोक-उत्साही वकील प्रशांत भूषण ने गुप्त कागजात और दस्तावेजों को उज़ागर किया तो उन्हें अदालत में खींच लिया। उदाहरण के लिए, कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले पर अदालतों को इस तरह के दस्तावेजों को देखने में कोई संकोच नहीं है। प्रशांत भूषण के खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम का उपयोग करने के बारे में किसी ने नहीं सोचा था। इसलिए, यह पहली बार हुआ कि यह उच्चतम न्यायालय में गया, लेकिन अभी इसे देखा जाना बाकी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार और संपादक गिल्ड की स्टेटमेंट से यह स्पष्ट किया गया है और मुझे भी नहीं लगता है कि इसका इस्तेमाल पत्रकारों और वकीलों के खिलाफ किया जाएगा। चलो इंतज़ार करके देखते हैं। लेकिन हमें इसकी चिंता नहीं है। क्योंकि हम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) द्वारा अच्छी तरह से संरक्षित हैं। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार और आरटीआई प्रावधानों द्वारा विशेष रूप से धारा 8 (1i) और 8 (2) जो आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम से आगे निकल जाते हैं, इसलिए हम वास्तव में इसके बारे में चिंतित नहीं हैं।

(आकिब खान मुंबई के एक मल्टी मीडिया पत्रकार हैं। वे  @kaqibb से ट्वीट करते हैं।)

rafale scam
N Ram
the hindu news paper
Narendra modi
modi sarkar
BJP Govt
BOFORS CASE
Hindustan Aeronautics Limited
Modi Government in Rafale Scam
Freedom of Speech and Expression .
Official Secrets Act 1923

बाकी खबरें

  • BIRBHUMI
    रबीन्द्र नाथ सिन्हा
    टीएमसी नेताओं ने माना कि रामपुरहाट की घटना ने पार्टी को दाग़दार बना दिया है
    30 Mar 2022
    शायद पहली बार टीएमसी नेताओं ने निजी चर्चा में स्वीकार किया कि बोगटुई की घटना से पार्टी की छवि को झटका लगा है और नरसंहार पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री के लिए बेहद शर्मनाक साबित हो रहा है।
  • Bharat Bandh
    न्यूज़क्लिक टीम
    देशव्यापी हड़ताल: दिल्ली में भी देखने को मिला व्यापक असर
    29 Mar 2022
    केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के द्वारा आवाह्न पर किए गए दो दिवसीय आम हड़ताल के दूसरे दिन 29 मार्च को देश भर में जहां औद्दोगिक क्षेत्रों में मज़दूरों की हड़ताल हुई, वहीं दिल्ली के सरकारी कर्मचारी और…
  • IPTA
    रवि शंकर दुबे
    देशव्यापी हड़ताल को मिला कलाकारों का समर्थन, इप्टा ने दिखाया सरकारी 'मकड़जाल'
    29 Mar 2022
    किसानों और मज़दूरों के संगठनों ने पूरे देश में दो दिवसीय हड़ताल की। जिसका मुद्दा मंगलवार को राज्यसभा में गूंजा। वहीं हड़ताल के समर्थन में कई नाटक मंडलियों ने नुक्कड़ नाटक खेलकर जनता को जागरुक किया।
  • विजय विनीत
    सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी
    29 Mar 2022
    "मोदी सरकार एलआईसी का बंटाधार करने पर उतारू है। वह इस वित्तीय संस्था को पूंजीपतियों के हवाले करना चाहती है। कारपोरेट घरानों को मुनाफा पहुंचाने के लिए अब एलआईसी में आईपीओ लाया जा रहा है, ताकि आसानी से…
  • एम. के. भद्रकुमार
    अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई
    29 Mar 2022
    इज़रायली विदेश मंत्री याइर लापिड द्वारा दक्षिणी नेगेव के रेगिस्तान में आयोजित अरब राजनयिकों का शिखर सम्मेलन एक ऐतिहासिक परिघटना है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License