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रफ़ालः फ्रांसीसी सीनेट का दस्तावेज़ क्या मोदी के झूठ का पर्दाफाश करता है?
फ्रांस के सीनेट का दस्तावेज़ आरएफपी वापसी शुरू करने की तारीख़ को लेकर नए तथ्यों का पर्दाफाश करता है। इस तरह क्या सुप्रीम कोर्ट को सौंपा गया भारत सरकार द्वारा अहस्ताक्षरित दस्तावेज़ 36 रफ़ाल विमान पर मोदी के एकतरफा फैसले को छिपाने का एक प्रयास था?
रवि नायर
24 Jan 2019
Rafale

फ्रांस के सीनेट का दस्तावेज़ आरएफपी वापसी शुरू करने की तारीख़ को लेकर नए तथ्यों का पर्दाफाश करता है। इस तरह सुप्रीम कोर्ट को सौंपा गया भारत सरकार द्वारा अहस्ताक्षरित दस्तावेज़ 36 रफ़ाल विमान पर मोदी के एकतरफा फैसले को छिपाने का एक प्रयास था?

ऐसे समय में जब मोदी सरकार विवादास्पद रफ़ाल सौदे पर खुद को बचाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कहानियों को गढ़ने की कोशिश कर रही है ठीक इसी वक्त फ्रांस से नई जानकारी सामने आ रही है जिनमें से कुछ तो पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में हैं जो कई सवाल खड़े करता है।

भारतीय सुप्रीम कोर्ट के "रफ़ाल फैसले" के पैरा 19 में लिखा है "ये गतिरोध मार्च 2015 में आरएफपी की वापसी की प्रक्रिया के परिणाम स्वरुप हुई।" शीर्ष कोर्ट 126 एमएमआरसीए (मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रोपोजल (आरएफपी) का उल्लेख कर रहा था जिसमें डसॉल्ट को चुना गया था और जिसके साथ 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गई रफ़ाल की घोषणा तक बातचीत चल रही थी। लगता है गतिरोध के बारे में ये वाक्य भारत सरकार द्वारा सौंपे गए एक अहस्ताक्षरित और बिना तारीख वाले दस्तावेज़ से उद्धृत किया गया था। सार्वजनिक डोमेन में रखे गए इस दस्तावेज़ में मोदी सरकार ने पैरा 18 में अदालत को बताया: “जैसे ही अनुबंध वार्ता गतिरोध पर पहुंची और आरएफपी का अनुपालन सुनिश्चित नहीं किया जा सका तो मार्च 2015 में आरएफपी वापसी की प्रक्रिया शुरू की गई और 126 एमएमआरसीए के लिए आरएफपी को जून 2015 में वापस ले लिया गया।”

इस दस्तावेज़ में बाद का हिस्सा सही है क्योंकि रक्षा मामले की संसदीय स्थायी समिति की 2016-17 की रिपोर्ट में इस तरह लिखा गया है “126 एमएमआरसीए की ख़रीद के लिए आरएएफपी औपचारिक रूप से 24 जून 2015 को वापस ले ली गई थी”। राज्यसभा को इसके बारे में पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर द्वारा जुलाई 2015 के आख़िर में बताया गया था। सरकार का कहना कि "आरएफपी वापसी की प्रक्रिया मार्च 2015 में शुरू की गई थी" असत्य लगता है, और फ्लाईअवे हालत में 36 रफ़ाल विमानों के लिए फ्रांस के साथ समझौते की घोषणा करने के लिए मोदी के एकतरफा निर्णय को छिपाना है।

10 जून 2015 को फ्रांस के सीनेट में विदेश मामलों, रक्षा और सशस्त्र बलों की समिति की बैठक हुई। इस बैठक के मिनट में सीनेटर जीन-पियरे रफ़रिन का उल्लेख है जो इस समिति के अध्यक्ष थें, उन्होंने कहा: “भारत के लिए 36 रफ़ाल खरीदने का निर्णय भारत के प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान किया गया था। समझौते को अमली जामा पहनाने के लिए तकनीकी चर्चा सबसे बेहतर परिस्थितियों में हो रही है।” यह वाक्य कि “36 रफ़ाल खरीदने का निर्णय भारत के प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान हुआ” काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि फ्रांस के अधिकारियों को इस तरह की चर्चा होने का पहले से पता नहीं था। और यह स्पष्ट रूप से पीएम मोदी द्वारा लिए गए एकतरफा फैसले की ओर इशारा करता है।


1 अक्टूबर 2013 को हुई इसी समिति की बैठक के मिनट में इस तरह उल्लेख है: “भारत की लिए, रफ़ाल भारतीय विमान बेड़े का हिस्सा है जिसकी पहले से ही अपनी उपकरण सूची है, जिसे विमान संयोजन की आवश्यकता है। दूसरी ओर कतर के लिए, यह फ्रांस के काफी करीब है, जो उत्पादन प्रबंधन के लिए अधिक लचीलापन देता है।” ये बिंदु स्पष्ट करता है कि इस विशेष सौदे में भारतीय वायु सेना द्वारा जोड़ा गया तथाकथित “भारत-विशिष्ट संवर्द्धन” कुछ भी नया नहीं था बल्कि 2007 के आरएफपी में एक वर्णित आवश्यकता थी। कुछ लोग ऐसा ही तर्क देने की कोशिश करते हैं।


24 जून 2015 को डसॉल्ट एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर फ्रांस के सीनेट में थें जो "वर्ष 2015 से 2019 तक (फ्रांस के) रक्षा से संबंधित सैन्य कार्यक्रमों और अन्य प्रावधानों" से संबंधित चर्चा पर सीनेटरों को सवाल का जवाब दे रहे थें। सीनेटर रफ़रिन जो सीनेट में विभिन्न पदों पर रहे जैसे कि उपसभापति, विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष, रक्षा और सशस्त्र बल, आर्थिक मामलों की समिति के उपाध्यक्ष रहे हैं उन्होंने ट्रेपियर से कहा, “अध्यक्ष महोदय आपसे फिर मिलना एक खुशी की बात है। यह हम सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ये समिति आपकी गतिविधि के प्रति बहुत सचेत था। मिस्र और कतर को 24-24 रफ़ाल की बिक्री अनुबंध साथ ही भारत के साथ 36 विमान सौदे को मूर्त रुप देना इस उत्पाद की प्रतिस्पर्धा की पुष्टि करता है। आप हमें भारत के साथ बातचीत की प्रगति के बारे में भी बता सकते हैं।”

अपने विस्तृत जवाब में ट्रेपियर ने कहा: “भारत के साथ बातचीत चल रही है। वर्तमान अनुबंध एमएमआरसीए अनुबंध के तहत 18 प्रारंभिक विमानों के बजाय फ्रांस में उत्पादित 36 विमान देने को लेकर है। जहां तक 126 विमान पूरा करने के लिए अतिरिक्त 90 विमानों की बात है जैसा कि शुरु में उल्लेख किया गया था तो आज यह निश्चित नहीं है। लेकिन भारतीय अधिकारियों के "मेक इन इंडिया" के अनुरोधों को पूरा करने के लिए भविष्य में इन मांगों का स्थानीय स्तर पर निर्माण करना बेहतर होगा।"

उपर्युक्त कथन दो बातों को स्पष्ट करता है। अ) जैसा कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने मार्च 2015 में 126 विमानों के लिए आरएफपी को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू नहीं की थी। अगर उसने किया था तो डसॉल्ट एविएशन के सीईओ के रूप में ट्रैपियर को उस निर्णय के बारे में पता होता क्योंकि भारत डसॉल्ट के साथ बातचीत कर रहा था न कि आरएफपी के तहत 126 रफ़ाल के लिए फ्रांस की सरकार से। आ) ट्रेपियर के कथन से यह स्पष्ट होता है कि वह भारत से अपेक्षा कर रहा था कि वह एमएमआरसीए आरएफपी में उल्लेख किए गए छह स्क्वाड्रन तक पहुँचने के लिए 90 और रफ़ाल के लिए आदेश दे जिसकी उसे ज़रुरत थी और उसे 24 जून 2015 तक इसे रद्द करने की जानकारी भी नहीं थी। इससे पता चलता है कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया और शायद यही कारण था कि उसने "अहस्ताक्षरित और बिना तारीख वाला" दस्तावेज़ कोर्ट में जमा किया।

इसी सीनेट की बैठक में सीनेटर जोएल गुएरियॉ ने ट्रैपियर को अनुबंधों के लिए बधाई देने के बाद कहा: “... भारत के साथ समझौते के अनुसार उसकी एचएएल कंपनी के साथ काम साझा करने की बात है। यह क्या है और हमारे राष्ट्रीय विकास के लिए इसके परिणाम क्या होंगे?” हालांकि ऐसा लगता है कि इस सवाल का उद्देश्य फ्रांस में रोज़गार के अवसरों के नुकसान को लेकर था लेकिन ट्रेपियर ने इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। बल्कि उन्होंने इस सवाल का कोई भी जवाब नहीं दिया।

फ्रांस के सीनेट का एक और दस्तावेज़ कुछ दिलचस्प आंकड़े बताता है। "2019 के लिए बजट विधेयक: रक्षा बलों के लिए उपकरण" में अनुलग्नक 1 का शीर्षक "2019 के बजट में वित्त पोषित प्रमुख हथियार कार्यक्रम" में लिखा है, "(रफ़ाल) कार्यक्रम को अंजाम देने की लागत 01/2018 के मुताबिक 47.7 बिलियन यूरो है। यह लागत 286 रफ़ाल के लक्ष्य से मेल खाती है।” इस दस्तावेज़ में इस 286 विमान की अव्यवस्था को बताया गया है। इसमें लिखा गया है “एलपीएम 2014-2019 की परियोजना पर विचार करने से पहले इस कार्यक्रम की कुल लागत 2014 के मूल्य स्तर पर 46.4 बिलियन यूरो हुआ और रफ़ाल बी (110 विमानों के लिए) के एक इकाई का लागत (विकास लागत को छोड़कर) 73 मिलियन यूरो, रफ़ाल सी (118 विमान के लिए) का 68 मिलियन यूरो और रफ़ाल एम (58 विमानों के लिए)। 78 मिलियन यूरो होता है।”

रक्षा क्षेत्र से संबंधित 2016 के मसौदा वित्त कानून पर राष्ट्रीय रक्षा और सशस्त्र बल समिति द्वारा एक फैक्ट शीट के खंड VII में कहा गया है “वर्ष 2015 में फ्रांस ने अपना पहला रफ़ाल निर्यात अनुबंध जीत लिया। पहला अनुबंध जो लागू हुआ वह संबद्ध हथियारों के साथ 24 रफ़ाल के लिए मिस्र के साथ हस्ताक्षर किया गया था जिसकी कुल लागत 5.2 बिलियन यूरो (इस राशि में एफआरईएमएम की बिक्री भी शामिल है) थी।” एफआरईएमएम एक युद्ध पोत है और इसकी कीमत (फ्रेंच वर्जन) लगभग 860 मिलियन यूरो होने का अनुमान है।

मोदी सरकार का कहना है कि उसने 36 रफ़ाल को "आपातकालीन आवश्यकता" को पूरा करने के लिए फ्लाईअवे कंडिशन में लाने का ऑर्डर दिया। लेकिन विमान सितंबर 2019 से पहले आना शुरू नहीं होगा यदि सब कुछ योजना के अनुसार होता है। 20 जनवरी को द इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है भारत-विशिष्ट संवर्द्धन (आईएसई) सितंबर-अक्टूबर 2022 तक पूरी तरह से चालू हो जाएगा। जब तक आईएसई पूरी तरह से चालू नहीं हो जाता तब तक फ्रांस रफ़ाल का एफ4 (अगला अपग्रेड वर्जन) शामिल करना शुरू करेगा! इसी लेख में रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि भारत पहले ही फ्रांस को 34,000 करोड़ रुपए का भुगतान कर चुका है और 36 रफ़ाल के लिए कुछ महीनों में 13,000 करोड़ रुपए का भुगतान किया जाएगा। इसका मतलब है कि एक भी विमान दिए जाने से पहले मोदी सरकार 63,870 करोड़ रुपए (आज की विनिमय दर के अनुसार) में से कुल समझौता मूल्य का 73.5% का भुगतान करेगी! लेकिन वह उन कार्यों के लिए एचएएल (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) को 15,000 करोड़ रुपए से कम का भुगतान नहीं कर सकती है जो वह पहले ही कर चुका है!

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अपने लिखित जवाब में तर्क दिया कि वह सौदे की क़ीमत का खुलासा नहीं कर सकती क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करेगा और कुछ अनूठे कारणों से एससी ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया। रफ़ाल फैसले के पैरा 25 में यह कहा गया है कि "वायु सेनाध्यक्ष को क़ीमत के विवरण के खुलासे के बारे में बताया गया है, जिसमें हथियार के बारे में मूल्य निर्धारण विवरण शामिल हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकते हैं।" डासॉल्ट एविएशन ने अपने वेबसाइट पर रफ़ाल के साथ हथियारों का विवरण दिया है। फ्रांसीसी सीनेट के दस्तावेज पर्याप्त हैं जो रफ़ाल से जुड़े हथियारों का विवरण बताते हैं। यह दस्तावेज़ उनमें से एक है। 2007 के आरएपपी में लगभग इसी तरह का कहा गया है- (ए) एक्टिव बीवीआर मिसाइल (बी) ऑल एस्पेक्ट एयर टू एयर मिसाइल (सी) एंटी शिप मिसाइल - 100 किमी रेंज (डी) मीडियम रेंज मिसाइल - 200 किमी रेंज (ई) स्टैंड-ऑफ पीजीएमएस- 40 किमी रेंज (एफ) एलजीबी (जी) गन अम्यूनिशन (एच) एंटी-रेडिएशन मिसाइल।

डसॉल्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित विवरण यह स्पष्ट करता है कि ये फ्रांसीसी कंपनी कभी भारत में फाइटर जेट निर्माण तकनीक को हस्तांतरित नहीं करेगा। "इंडिया - अ क्रिटिकल चैलेंज" शीर्षक के एक लेख में कंपनी का कहना है कि उसने साल 2017 में महाराष्ट्र के नागपुर में एक संयंत्र का निर्माण शुरू किया। यह सुविधा भारत के रक्षा क्षेत्र में सबसे बड़े एकल विदेशी निवेश का प्रतिनिधित्व करती है। यह पहले फाल्कन 2000 के लिए कल पुर्जों को बनाएगा फिर धीरे-धीरे अगले पांच वर्षों में उत्पादन को बढ़ाएगा।"


फ्रांसीसी दूतावास द्वारा प्रकाशित एक स्पष्टीकरण इस अंतर-सरकारी समझौते (आईजीए) पर ज़्यादा ही कुछ बयां कर रहा है जिसे मोदी सरकार ने फ्रांस के साथ हस्ताक्षर किया था। इसमें लिखा गया है "36 रफ़ाल विमान भारत को आपूर्ति करने को लेकर फ्रांसीसी और भारतीय सरकारों के बीच 23 सितंबर 2016 को अंतर-सरकारी समझौते पर किए गए हस्ताक्षर केवल इस उपकरण की डिलीवरी और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के मामले में फ्रांसीसी सरकार के दायित्वों से संबंधित है।" इसलिए यह समझें कि अगर डसॉल्ट या इसके कोई भी साथी रफ़ाल के रखरखाव के लिए कल पुर्जे या किसी अन्य पुर्जों की आपूर्ति करने में विफल रहते हैं तो फ्रांसीसी सरकार जिम्मेदार नहीं होगी? अगर ऐसा है तो मोदी सरकार ने आईजीए पर कानून और न्याय मंत्रालय और आईएएफ द्वारा उठाए गए आपत्तियों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है।

संक्षेप में फ्रांसीसी सीनेट के दस्तावेजों में लिखा है, ए) 36 रफ़ाल खरीदने का निर्णय पीएम मोदी द्वारा लिया गया एकपक्षीय निर्णय था। बी) मोदी सरकार के सौदे में और 2007 आरएफपी आईएएफ द्वारा अनुरोध किए गए निर्देशों और हथियारों में कोई अंतर नहीं है। सी) मार्च 2015 में आरएफपी वापस लेने की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई थी जैसा कि सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार ने दावा किया था। डी) भारत विशिष्ट संवर्द्धन पूरी तरह से प्रमाणित और चालू हो जाने तक रफ़ाल का एफ 4 मानक आ जाएगा और ई) भारत ने आपातकालीन खरीद नहीं किया था जैसा कि सरकार द्वारा प्रायोजित किया गया और एडवांस में अभी भी कुल अनुबंध मूल्य का लगभग 75% का भुगतान कर रही है जबकि एचएएल के लंबित बकाये का भुगतान नहीं कर रही है।

 

(रवि नायर ने रफ़ाल घोटाले का खुलासा किया था और वह इस विषय पर एक पुस्तक लिख रहे हैं। ये उनके निजी विचार हैं।) 


 


 

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