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भारत
राजनीति
क़ानूनों की वापसी से मृत लोग वापस नहीं आएंगे- लखीमपुर हिंसा के पीड़ित परिवार
बीजेपी को क़ानूनों की वापसी से राजनीतिक फ़ायदे का अनुमान है, जबकि मूल बात यह है कि राज्य मंत्री अजय मिश्रा अब भी खुलेआम घूम रहे हैं, जो आने वाले दिनों में सरकार और किसानों के बीच टकराव की वजह बन सकता है।
अब्दुल अलीम जाफ़री
22 Nov 2021
farmers
फाइल फोटो

लखनऊ: एक ऐसे वक्त में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीन विवादित कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने के चलते, खुशी की लहर ने पूरी दिल्ली को अपनी जकड़ में ले लिया है, तब 3 अक्टूबर को लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा में जान गंवाने वाले चार किसानों के परिवार और रिश्तेदार उनका मातम मनाने जुटे हुए हैं। 

मृत लोगों के परिवार वालों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा तीन विवादित फ़ैसलों को वापस लेने का फ़ैसला पहले लिया जा सकता था और उससे ना सिर्फ़ लखीमपुर खीरी की घटना के शिकार चार किसान, बल्कि 700 से ज़्यादा किसानों की जान बचाई जा सकती थी। उनका कहना है कि अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है।

बता दें पिछले महीने लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में प्रदर्शन के दौरान चार किसानों पर गाड़ी चढ़ा दी गई थी। इनमें से दो, मोहरनिया गांव में नबी नगर के 22 साल के गुरविंदर और बंजारा तांडा गांव के दलजीत सिंह, बहराइच के रहने वाले थे। जबकि 60 साल के नाचात्तर सिंह और 20 साल के लोवप्रीत सिंह लखीमपुर खीरी के रहने वाले थे। 

दलजीत सिंह की पत्नी परमजीत कौर का कहना है कि अगर सरकार ने पहले फ़ैसला लिया होता, तो मेरे पति अब भी मेरे साथ होते। यह फ़ैसला हमारे दुख-दर्द को कम नहीं कर सकता। 

कौर रुंधी हुई आवाज़ में कहती हैं, "हालांकि प्रधानमंत्री ने तीनों क़ानूनों को वापस लेने का ऐलान किया है, लेकिन उन्होंने ना तो लखीमपुर खीरी की घटना पर दुख जताया और ना ही केंद्रीय राज्य मंत्री अजय सिंह टेनी का इस्तीफा लिया। हमारी लड़ाई सिर्फ़ क़ानून वापस लेने के बाद खत्म नहीं होने वाली है, जब तक अजय मिश्रा इस्तीफा नहीं देगा या गिरफ्तार नहीं होगा, हमें न्याय नहीं मिलेगा।"

इसी तरह का विचार रखते हुए गुरविंदर के चाचा कहते हैं कि किसान एक साल से तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। "जब मैंने मोदी की घोषणा के बारे में सुना, तो मुझे समझ नहीं आया कि मुझे कैसा व्यवहार करना चाहिए, क्या मैं रोऊं या जश्न मनाऊं। मेरा भतीजा भी इसी के लिए कोशिश कर रहा था, लेकिन जब यह फ़ैसला आया है, तब वह हमारे बीच में मौजूद नहीं है।"

अपने बेटे लवप्रीत सिंह की खीरी हिंसा में जान गंवाने वाले सतनाम सिंह कहते हैं कि कृषि क़ानूनों को वापस लेने से उनका दर्द कम नहीं हो जाएगा और इसके लिए जश्न मनाने जैसा कुछ नहीं है।

उन्होंने न्यूज़क्लिक से कहा, "मैंने कृषि क़ानूनों का विरोध करते हुए अपना एकलौता बेटा खो दिया, जो मंत्री के बेटे की एसयूवी के नीचे आ गया था। अगर सरकार को क़ानून वापस लेने हैं, तो किसानों के ऊपर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश करने वाले के मंत्री पिता के खिलाफ़ कुछ क्यों नहीं बोला। जब तक अजय मिश्रा गिरफ़्तार नहीं हो जाता, हमारा संघर्ष जारी रहेगा।"

वह आगे कहते हैं, "कोई जश्न कैसे मना सकता है, जब हमें पता है कि घटना के जिम्मेदार खुलेआम घूम रहे हैं और उन्हीं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ मंच साझा कर रहे हैं। क्या यह दोमुंहापन नहीं है?"

पीड़ित परिवारों ने साफ़ कहा कि चाहे कृषि क़ानून वापस हो जाएं या उन्हें मुआवज़ा मिल जाए, लेकिन उनके अपने वापस नहीं आने वाले हैं। नछत्तर सिंह के बेटे ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, "आज मैं जो कुछ भी हूं, उसे बनाने वाले पिता की यादें की भरपाई पैसे या क़ानूनों को वापस लेने से नहीं हो जाएगी। मंत्री चार किसानों की मौत के लिए जिम्मेदार है और अब भी अपने पद पर बना हुआ है। जब उसे हटा दिया जाएगा और सलाखों के पीछे भेज दिया जाएगा, तभी न्याय मिलेगा।"

शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों कृषि क़ानूनों की वापसी की घोषणा कर दी, जिनके खिलाफ़ किसान एक साल से प्रदर्शन कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य में किसानों के एक हिस्से को क़ानून के फायदों के बारे में "सहमत" ना करवा पाने पर माफ़ी भी मांगी। 

 लेकिन उत्तर प्रदेश के किसान संगठनों को सत्ताधारी बीजेपी की मंशा पर शक है, उनका कहना है कि केंद्र का यू-टर्न "चुनावी स्वहितों और बाध्यताओं" के चलते हुआ है। किसान संगठनों की मांग है कि पिछले एक साल में प्रदर्शन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों को मुआवज़ा दिया जाए और अजय मिश्रा को तुरंत गिरफ़्तार किया जाए। 

सम्युक्त किसान मोर्चा की उत्तर प्रदेश ईकाई ने सवाल पूछते हुए कहा, "सरकार के हठ के चलते इतने सारे लोगों को जान गंवानी पड़ी और इतना ज़्यादा दर्ज उठाना पड़ा। क्या कोई इसके लिए जिम्मेदार है या नहीं? हम कैसे भूलेंगे कि बीजेपी नेता हर दिन हमारे लिए खालिस्तानी, आतंकवादी, पैसा देकर मंगाए गए किसान और पता नहीं क्या-क्या शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे।"

इस बीच निघासन में अजय मिश्रा के इस्तीफ़े के लिए विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाने के लिए एक बैठक बुलाई गई है।

एक अहम आयोजक ने न्यूज़क्लिक को बताया, "अब सरकार ने शर्मनाक तरीके से कृषि क़ानूनों को वापस ले लिया है। इसके ऊपर सरकार एक साल तक पैर रखकर बैठी रही। अब वक़्त आ गया है कि हम उन्हें आगे आने वाले चुनावों में सबक सिखाएं, खासकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में।"

उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में खीरी और आसपास के जिलों से किसान 22 नवंबर को लखनऊ पहुंचेंगे, ताकि वे वहां होने वाली महापंचायत में हिस्सा ले सकें और सरकार पर मिश्रा के इस्तीफ़े और गिरफ्तारी के लिए दबाव बना सकें।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Repeal Cannot Bring Back the Dead, Say Family Members of Lakhimpur Kheri Victims

Lakhimpur Kheri Massacre
Anil Mishra
Lakhimpur Farmers
Ajay Mishra
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