NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर
साल 2013 में डॉलर के मुक़ाबले रूपये गिरकर 68 रूपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया तभी मज़बूत होगा जब देश में मज़बूत नेता आएगा।
अजय कुमार
10 May 2022
dollar and rupee
Image courtesy : Mint

भारतीय रुपया का हाल यह है कि रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। खबर लिखने तक एक डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया गिरकर 77.39 रुपए तक पहुंच चुका है। कहने वाले कह देंगे कि रूस और यूक्रेन की लड़ाई की वजह से दुनिया की माल सपलाई टूट चुकी है। जितने सामान की मांग है उतनी सपलाई नहीं हो पा रही है। इसलिए डॉलर के बदले पहले से ज्यादा रुपया देना पड़ रहा है। यह बात एक हद तक ठीक है। लेकिन इसके अलावा भी कुछ बातें है, जिस पर गौर करना चाहिए।  

साल 2013 में डॉलर के मुकाबले रूपये गिरकर 68 रूपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुकाबले रुपया तभी मजबूत होगा जब देश में मजबूत नेता आएगा। उस समय कहा जा रहा था कि यह बताना मुश्किल है कि डॉलर के मुकाबले रुपया ज्यादा गिर रहा है या कांग्रेस पार्टी? कांग्रेस पार्टी और रूपये के गिरने में होड़ लगी है। 2018, 2019, 2020 और 2021 में लगातार रुपया कमज़ोर होता गया– 2.3 प्रतिशत से लेकर 2.9 प्रतिशत तक कमज़ोर हुआ। चार साल से भारत का रुपया कमज़ोर होता जा रहा है। अब यह कमजोर होकर सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। यानी यह बात समझने वाली है कि डॉलर के मुकाबले रूपये की कमजोर होने की कहानी रूस और यूक्रेन की लड़ाई के बाद ही शुरू नहीं हुई है, बल्कि यह तबसे चली आ रही है जब से तथाकथित मजबूत नेता यानि नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं। तब से लेकर अब तक डॉलर के मुकाबले रुपया गिरते गया है। भाजपा के मुताबिक मजबूत नेता के आजाने के बाद से डॉलर के मुकाबले रुपया में मजबूती होनी चाहिए थी लेकिन यह पहले से ज्यादा मजबूत होने की बजाए कमजोर हो गया। रूपये के गिरने से जुड़े जरूरी कारणों के पड़ताल के साथ उन बातों को भी में ध्यान रखना जरूरी है कि मौजूदा वक्त की सरकार ने तब कहा था जब वह विपक्ष में थी।

जानकारों का कहना है कि जब तक रूस और यूक्रेन की लड़ाई चलती रहेगी और डॉलर के मुकाबले रुपया वैसे ही गिरता रहेगा। जब लड़ाई खत्म हो जाएगी उसके बाद भी रुपया लंबे समय तक गिरेगा। यह तब तक गिरता रहेगा जब तक दुनिया की टूटी हुई माल सप्लाई फिर से मुकम्मल नहीं हो जाती। रही बात रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया की तो वह रुपया का गिरना नहीं रोक पाएगी क्योंकि आरबीआई को पता है कि आने वाले दिनों में भी कच्चे तेल की कीमतों भी बढ़ती रहेंगी। स्टील सहित कई सामानों की कीमत बढ़ती जाएँगी। कीमतों में होने वाली इस बढ़ोतरी को ध्यान में रखकर बाजार के लोग सामान इकट्ठा करने की कोशिश में लगे होंगे। और अगर आरबीआई डॉलर के मुकाबले रुपया का विनिमय दर नियंत्रित करती है तो विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बाहर निकलेगा। विदेशी मुद्रा भंडार में बहुत अधिक कमी के हालात से आरबीआई बचना चाहती है।

भारत की अर्थव्यवस्था अगर पहले से मजबूत होती तो इस तरह के मार से गुजरती तो आम लोगों पर उतना ज्यादा असर नहीं पड़ता जितना एक कमजोर अर्थव्यवस्था होने के चलते पड़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा की वजह से डॉलर की मांग बढ़ेगी। यानी सरकार को एक बैरल कच्चे तेल के लिए पहले के मुक़ाबले ज्यादा पैसा देना पड़ेगा। डॉलर लेने के लिए रुपया की मारामारी बढ़ेगी। आर्थिक जानकार भी यही बात कहते हैं कि रुपया डॉलर के मुकाबले गिरता क्यों है? इसके कई कारण हैं? लेकिन एक कारण जो साफ-साफ सामने दिखता है, वह यह है कि जब रुपया रखने वालों के पास डॉलर खरीदने के लिए मारामारी बढ़ जाती है, तो डॉलर की रुपए के मुकाबले कीमत बढ़ जाती है। सामान्य अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो जब डॉलर की सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा होती है, तो डॉलर की कीमत बढ़ जाती है। रूस से आयात पर प्रतिबंध लगने के बाद तो कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई कम हो जाएगी लेकिन डिमांड जस की तस बनी रहेगी। यानी प्रति बैरल कीमतों में इजाफा लंबे समय तक चलता रहेगा। भारत की पहले से बर्बाद अर्थव्यवस्था से बन रहे रुपए की कीमत आगे और भी कमजोर होती रहेगी।

जब देश के बाहर से तेल महंगा आएगा तब तेल की कीमतें बढ़ेंगी। यह सब महंगा होने का मतलब है कि रोजमर्रा के कई सामान और सेवाएं महंगी होंगी। यानी कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत रुपया की कमजोरी से लेकर आम आदमी के लिए महंगाई का कहर बनकर गिरती रहेंगी।

इसे भी पढ़िए ; युद्ध, खाद्यान्न और औपनिवेशीकरण

भारत की अर्थव्यवस्था चालू खाता घाटे वाली व्यवस्था है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था से कमजोर अर्थव्यवस्था है। भारत में आयात, निर्यात से अधिक होता है। यानी भारत से कॉफी, मसाले जैसे सामान और तकनीकी सेवाओं का जितना निर्यात होता है, उससे कई गुना अधिक आयात होता है। भारत में विदेशी व्यापार हमेशा नकारात्मक रहता है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की वजह से यह और अधिक नकरात्मक होगा। एक डॉलर के मुकाबले रुपया और अधिक गिरेगा।

रुपया कमजोर होने की वजह से कम मुनाफे की उम्मीद कर विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बजार से अपना निवेश किया हुआ पैसा बाहर निकाल रहे हैं। केवल मार्च में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट स्टॉक मार्केट से अब तक तकरीबन 14721 करोड़ रुपया बाहर निकाल चुके हैं। आगे और भी विदेशी निवेश की बिकवाली होगी। इसलिए डॉलर और रुपए का अंतर और अधिक बढ़ेगा।

इसे भी पढ़े ; क्या दुनिया डॉलर की ग़ुलाम है?

खाने के तेल का भी बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाया जाता है। फर्टिलाइजर में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी विदेशों से आते हैं। इसलिए डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट की मार उन किसानों पर भी पड़ेगी जिन किसानों के लिए डॉलर किसी सपने के सरीखे है। यही हाल इलेक्ट्रॉनिक सामानों के साथ भी होने वाला है। सप्लाई साइड की कमी दुनिया के बाजार को महंगा करेगी। ऐसे में भारत की सरकार और व्यापारियों को विदेशी बाजार से सामान और सेवा लेने के लिए ज्यादा पैसा देना पड़ेगा।

कुल मिलाकर बात यह है कि जब डॉलर रुपए से अधिक मजबूत होता है, तब 1 डॉलर के लिए पहले से ज्यादा रुपये देना पड़ता है तो इसका असर उन पर भी पड़ता है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी डॉलर में लेन-देन नहीं किया होता है। अपने ही देश में वह सारे सामान और सेवा उपलब्ध नहीं हो पाते जिनकी जरूरत जिंदगी को चलाने के लिए जरूरी है। इसके लिए दूसरे देशों पर भी आश्रित होना पड़ता है। दूसरे देश डॉलर में व्यापार करते हैं। डॉलर का महंगा होने का मतलब है फैक्ट्रियों में उत्पादन का महंगा होना। कामकाज की लागत का बढ़ना। लागत के बढ़ने का मतलब महंगाई का होना। लोगों की आमदनी का कम होना और रोजगार की स्थिति पैदा ना होना।

इन सबका जवाब जनकल्याणकारी आर्थिक नीतियां है।  उन नीतियों को जमीन पर प्रभावी से उतारना है। यह सब करने के बजाए झूठ बोला जाता है। मजबूत नेता के मजबूत रुपया होने का तर्क दिया जाता है।  सच के आधे हिस्से के साथ झूठ को मिलाकर गोलबंदी करने की कोशिश की जाती है। चलते चलते नरेंद्र मोदी के झूठ का एक उदहारण देखिये: नरेंद्र मोदी ने कहा था कि साल 1947 में एक डॉलर के मुकाबले एक रुपया था। जबकि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि साल 1947 में एक डॉलर के मुकाबले कितना रुपया था? लेकिन इस झूठ को सच की तरह बरतकर यह फैलाया गया कि कांग्रेस का कामकाज इतना बुरा रहा है कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर 68 रूपये पर पहुंच गया।  

Rupee vs Dollar
Rupee depreciation
Narendra modi
Modi and Congress on Rupee
indian economy

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • hum bharat ke log
    डॉ. लेनिन रघुवंशी
    एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता
    22 Feb 2022
    सभी 'टूटे हुए लोगों' और प्रगतिशील लोगों, की एकता दण्डहीनता की संस्कृति व वंचितिकरण के ख़िलाफ़ लड़ने का सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि यह परिवर्तन उन लोगों से ही नहीं आएगा, जो इस प्रणाली से लाभ उठाते…
  • MGNREGA
    रबीन्द्र नाथ सिन्हा
    ग्रामीण संकट को देखते हुए भारतीय कॉरपोरेट का मनरेगा में भारी धन आवंटन का आह्वान 
    22 Feb 2022
    ऐसा करते हुए कॉरपोरेट क्षेत्र ने सरकार को औद्योगिक गतिविधियों के तेजी से पटरी पर आने की उसकी उम्मीद के खिलाफ आगाह किया है क्योंकि खपत की मांग में कमी से उद्योग की क्षमता निष्क्रिय पड़ी हुई है। 
  • Ethiopia
    मारिया गर्थ
    इथियोपिया 30 साल में सबसे ख़राब सूखे से जूझ रहा है
    22 Feb 2022
    इथियोपिया के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में लगभग 70 लाख लोगों को तत्काल मदद की ज़रूरत है क्योंकि लगातार तीसरी बार बरसात न होने की वजह से देहाती समुदाय तबाही झेल रहे हैं।
  • Pinarayi Vijayan
    भाषा
    किसी मुख्यमंत्री के लिए दो राज्यों की तुलना करना उचित नहीं है : विजयन
    22 Feb 2022
    विजयन ने राज्य विधानसभा में कहा, ‘‘केरल विभिन्न क्षेत्रों में कहीं आगे है और राज्य ने जो वृद्धि हासिल की है वह अद्वितीय है। उनकी टिप्पणियों को राजनीतिक हितों के साथ की गयी अनुचित टिप्पणियों के तौर पर…
  • mathura
    भाषा
    मथुरा में पार्टी विशेष को वोट न देने पर अनुसूचित जाति के लोगों की पिटाई, दस घायल
    22 Feb 2022
    आरोपियों ने रविवार की शाम को यह कहते हुए कुछ लोगों को पीटा कि उनके कहने के बावजूद उनके प्रत्याशी को वोट क्यों नहीं दिया गया। इस घटना में दस लोग घायल हुए हैं जो अनुसूचित जाति के बताए जाते हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License