NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
साल 2019 का चुनाव दुनिया के इतिहास का सबसे खर्चीला चुनाव
सेण्टर फॉर मीडिया स्टडीज की रिपोर्ट के तहत साल 2019 के चुनाव में तकरीबन 60 हजार करोड़ रूपये खर्च हुए। यानी हर एक लोकसभा क्षेत्र पर तकरीबन 100 करोड़ और हर एक वोट की कीमत 700 रुपए। यह इतना बड़ा खर्च है कि इसे दुनिया में अभी तक किसी भी जगह, किसी भी तरह के चुनाव पर हुए खर्चें में सबसे अधिक खर्चा माना जा रहा है।
अजय कुमार
04 Jun 2019
CMS Report

चुनाव के परिमाण में हार-जीत दिखाई देती है। लेकिन चुनावी खर्चे की तस्वीर पढ़ने पर ऐसा लगता है कि लोकतंत्र में  केवल हार और हार से सामना हो रहा है । सेण्टर फॉर मीडिया स्टडीज की रिपोर्ट के तहत साल 2019 के चुनाव में तकरीबन 60 हजार करोड़ रूपये खर्च हुए। यानी हर एक लोकसभा क्षेत्र पर तकरीबन 100 करोड़  और हर एक वोट की कीमत 700 रुपए। यह इतना बड़ा खर्च है कि  इसे दुनिया में अभी तक किसी भी जगह, किसी भी तरह के चुनाव पर हुए खर्चें में सबसे अधिक खर्चा माना जा रहा है। इस पूरे खर्चें में 15 -20 फीसदी खर्चा कांग्रेस और 45 -55 फीसदी खर्चा भाजपा का है। इस चुनाव में सबसे अधिक कैंपेन और प्रचार में 20 -25 हजार करोड़ रूपये खर्च किया गया। इतने खर्च के बाद चुनाव केवल चुनाव नहीं रह जाता, एक तरह की ऐसी रस्मआदायगी दिखनी लगती है, जिसमे केवल वही जीत सकता है, जिसके पास अकूत पैसा हो ताकि पानी की तरह पैसा बहाया जा सके।

Table Final.JPG

उम्मीदवार का कुल खर्चा जहाँ पर 24 हजार करोड़ रहा वहीं दलों का कुल खर्चा 20 हजार करोड़ । यानी कुल खर्च का तकरीबन 40 फीसदी खर्चा उम्मीदवारों से जुड़ा है और 35 फीसदी खर्चा राजनीतिक दलों से। यह रिपोर्ट कहती है कि चुनावी खर्चें में अधिक इजाफा का कारण यह भी है कि करोड़पति उम्मीदवारों की संख्या बढ़ रही है। यह लोग अपना खर्चा भी वहन करते हैं, साथ में अपने दल को भी पैसा देते हैं। कुछ लोकसभा उम्मीदवारों का खर्चा राजनीतिक पार्टियां खुद वहन करती हैं लेकिन अब ऐसी उम्मेदवारों की संख्या में कमी आने लगी है। फिर भी यह देखने को मिलता है, जो पार्टी सत्त्ता में मौजूद होती है, उसके द्वारा अपने लोकसभा उम्मीदवारों का ज्यादा खर्चा उठाया जाता है। पूरी चुनावी खर्च का तकरीबन एक तिहाई खर्च के लिए पैसा कहां से आया, इसका कोई हिसाब -किताब नहीं है।  यानी एक तिहाई  चुनावी राशि के सोर्स का कोई अता पता नहीं है।  

साल 1998  के चुनाव में कुल खर्चा 9 हजार करोड़ था।  साल 2014 में बढ़कर 30 हजार करोड़ हो गया।  और अचानक से  साल 2019 में बढ़कर 60 हजार करोड़ हो गया।  यानी केवल एक  चुनाव में  तकरीबन दो गुना की बढ़ोतरी हुई।  इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आने वाला चुनाव कितना अधिक महंगा होगा।

Table 2.JPG

इतने अधिक पैसे की भरपाई  के लिए राजनीतिक  दलों का सहारा रियल एस्टेट, खनन, कॉर्पोरेट /इंडस्ट्री / व्यापर, ठेकेदार, चिट फण्ड - वित्तीय सेवाएं, शैक्षिक उद्यम, विदेशी ,नॉन रेजिडेंट इंडियन, फिल्म ,टेलीकॉम आदि से जुड़े संगठन और लोग बनते है।  यानी इन दोनों के बीच अगर जबरदस्त गठजोड़ है तो चुनावी हार जीत के लिए जमकर पैसा बहाया जा सकता  है। 

अचरज वाली बात तो यह है कि चुनावों  में  खर्चा बढ़ता जा रहा है लेकिन वोट देने के लिए निकलने वाले नागरिकों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी हो रही है।  यानी चुनावी खर्च का पहाड़ नागरिकों को वोट देने के लिए  आकर्षित नहीं  करता।  रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि  अभी तक के चुनावी इतिहास में यह  पहली बार हो रहा है कि योजनाओं के सहारे मतददातों को लुभाने के लिए बैंको के जरिये पैसा दिया जा रहा है।  इस रिपोर्ट की भूमिका में पूर्व चुनाव आयुक्त एस. कुरैशी ने लिखा है कि इस चुनाव में 3377 करोड़ रूपये के माल और नकद की जब्ती हुई। और यह राशि 2014 के चुनाव में हुई जब्ती से तीन गुने से भी अधिक है। इस रिपोर्ट को जारी करते हुए पूर्व चुनाव आयुक्त एस कुरैशी ने कहा कि चुनावी भ्र्ष्टाचार हर तरह के भ्रष्टाचार की जननी है।  अगर कोई चुनाव में करोड़  रूपये खर्च कर रहा है तो सरकार  पर करोड़ रूपये वसूल भी करेगा।

expenditure on election
ECI
lok sabha
Lok Sabha Polls
election commission of India
‘Credibility of the Election Commissio

Related Stories

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

सात बिंदुओं से जानिए ‘द क्रिमिनल प्रोसीजर आइडेंटिफिकेशन बिल’ का क्यों हो रहा है विरोध?

2 सालों में 19 लाख ईवीएम गायब! कब जवाब देगा चुनाव आयोग?

सोनिया गांधी ने मनरेगा बजट में ‘कटौती’ का विषय लोकसभा में उठाया

आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक, 2022 के रहस्य को समझिये

संसद अपडेट: लोकसभा में मतविभाजन के जरिये ‘दंड प्रक्रिया (पहचान) विधेयक’ पेश, राज्यसभा में उठा महंगाई का मुद्दा

दिल्ली के तीन नगर निगमों का एकीकरण संबंधी विधेयक लोकसभा में पेश

अखिलेश यादव ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया

विज्ञापन में फ़ायदा पहुंचाने का एल्गोरिदम : फ़ेसबुक ने विपक्षियों की तुलना में "बीजेपी से लिए कम पैसे"  

दिल्ली नगर निगम चुनाव टाले जाने पर विपक्ष ने बीजेपी और चुनाव आयोग से किया सवाल


बाकी खबरें

  • Ukraine
    स्टुअर्ट ब्राउन
    यूक्रेन: एक परमाणु संपन्न राज्य में युद्ध के खतरे
    03 Mar 2022
    यूक्रेन के ऊपर रूस के आक्रमण से परमाणु युद्ध का खतरा वास्तविक बन गया है। लेकिन क्या होगा यदि देश के 15 परमाणु उर्जा रिएक्टरों में से एक भी यदि गोलीबारी की चपेट में आ जाए?
  • banaras
    विजय विनीत
    यूपी का रणः मोदी के खिलाफ बगावत पर उतरे बनारस के अधिवक्ता, किसानों ने भी खोल दिया मोर्चा
    03 Mar 2022
    बनारस में ऐन चुनाव के वक्त पर मोदी के खिलाफ आंदोलन खड़ा होना भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसके तात्कालिक और दीर्घकालिक नतीजे देखने को मिल सकते हैं। तात्कालिक तो यह कि भाजपा के खिलाफ मतदान को बल…
  • Varanasi District
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव : बनारस की मशहूर और अनोखी पीतल पिचकारी का कारोबार पड़ रहा है फीका
    03 Mar 2022
    बढ़ती लागत और कारीगरों की घटती संख्या के कारण पिचकारी बनाने की पारंपरिक कला मर रही है, जिसके चलते यह छोटा उद्योग ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष रहा है।
  • migrants
    एपी
    एक सप्ताह में 10 लाख लोगों ने किया यूक्रेन से पलायन: संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी
    03 Mar 2022
    संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के आंकड़ों के अनुसार, पलायन करने वाले लोगों की संख्या यूक्रेन की आबादी के दो प्रतिशत से अधिक है। विश्व बैंक के अनुसार 2020 के अंत में यूक्रेन की आबादी…
  • medical student
    एम.ओबैद
    सीटों की कमी और मोटी फीस के कारण मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं छात्र !
    03 Mar 2022
    विशेषज्ञों की मानें तो विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए जाने की दो मुख्य वजहें हैं। पहली वजह है यहां के सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में सीटों की संख्या में कमी और दूसरी वजह है प्राइवेट कॉलेजों…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License