NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सावित्रीबाई फुले और न्यायपूर्ण समाज की कल्पना
महेश कुमार
05 Jan 2015

देश में सावित्रीबाई फुले की जयंती मनाई जा रही है। सावित्रीबाई फुले भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक बदलाव की अग्रणी समाज सुधारक नेत्री और साथ ही एक प्रसिद्ध कवयित्री भी थी। वे ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के खिलाफ अनवरत संघर्ष करती रही। उन्होंने वंचित तबके,  खासकर स्त्री और दलितों,  के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और जनशिक्षा और महिला शिक्षा की सबसे बड़ी पैरोकार बनी। उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोले तथा समाज में व्याप्त सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ जंग लड़ी। सावित्रीबाई फुले का जीवन संघश्पूर्ण जीवन रहा, उस समय शिक्षा ब्राहमणों का ही विशेषाधिकार माना जाता था। दलित तबकों के बच्चों को शिक्षा का कोई अधिकार नहीं था। वह समय था जब अछूतों की छांया को छूना भी पाप माना जाता था। उस समय सावित्रीबाई फुले और उनके पति और बड़े समाज सुधारक ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ जंग छेड़ी। उस वक्त 1848 में उन्होंने पुणे में नारायण पेठ के भीडे वाडा में लड़कियों की शिक्षा के लिए पहले स्कूल की स्थापना की। 1851 तक उन्होंने तीन स्कूलों की स्थापना की जिनमें करीब 150 युवतियां पढ़ रही थी। 1852 में सावित्रीबाई फुले ने “महिला सेवा मंडल” की स्थापना की जिसका काम महिलाओं में अपने प्रति और समाज के प्रति महिला शिक्षा और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना था। उन्होंने पनिकविता के जरिए कईं आह्वाहन किये जिनमें सबसे बड़ा आह्वाहन उन्होंने सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फेंकने की बात कही हैं।

                                                                                                                                    

जाओ जाकर पढ़ो-लिखो

 बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती

काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो

ज्ञान के बिना सब खो जाता है

ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है

इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो

दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो

 तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है

 इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो

 ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो

आज जब पुरे देश में धर्मांतरण का सवाल उठाया जा रहा है जोकि अपने आप में एक अप्रसांगिक सवाल है, सावित्रीबाई फुले की शिक्षा और उनके उदगार धर्मांतरण की इस मुहीम पर सवाल खड़ा करते हैं। तथाकथित ‘घर वापसी’ के नाम पर दलितों और आदिवासियों को उसी हिन्दू धर्म में वापस लाने की कवायद काफी बौनी ओर राजनीती से प्रेरित लगती है क्योंकि हिन्दू धर्म की जाती व्यवस्था के चलते ही लाखों-लाख गरीब दलित और आदिवासियों ने किसी अन्य धर्म की बागडोर अपने हाथों में थामी। ये लोग दुसरे धर्मों में समानता के अधिकार के लिए गए। वह लग बात है कि वे इन धर्मों में जा कर भी दलित ही कहलाये। सदियों से छुआछुत और सामाजिक, आर्थिक व सामाजिक जुल्म के शिकार ये तबकें हिन्दू धर्म के पैरोकारों से निराश हो चले थे। और अमूमन आज भी यही स्थिति जारी है। दलित और आदिवासियों का शोषण और उनकी महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार जारी है। ग्रामीण भारत में तो स्थिति बहुत खराब है, यहाँ उनकी ज़मीनों पर कब्ज़े से लेकर उनके ऊपर शारीरिक हमले जारी हैं।   

दलित और आदिवासी उत्थान के लिए धर्मांतरण की नहीं बल्कि उनके लिए सामान शिक्षा प्रणाली, आर्थिक अधिकार, रोज़गार और जमीन तथा घर का अधिकार का होना जरूरी है। बिना सामाजिक-आर्थिक तरक्की के दलित-आदिवासी और पिछड़े तबकों की तरक्की असंभव है। कट्टर हिन्दू संगठन या आर.एस.एस. द्वारा जो धर्मांतरण की मुहीम चलाई जा रही है वह सावित्रीबाई फुले की लड़ाई और संघर्ष के खिलाफ है। क्योंकि सावित्रीबाई फुले ने गरीब और वंचित तबकों के लिए गुलामी के बंधन को तोड़ने के लिए शिक्षा को सबसे बड़े हथियार के रूप में पेश लिया। उन्होंने ब्राह्मणवादी ढांचे को ध्वस्त करने की आवाज़ उस वक्त उठायी थी जब समाज इस व्यस्था की जकड़ में कैद था। इसलिए “घर वापसी’ अन्यायपूर्ण ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म में नहीं बल्कि समानता और न्यायपूर्ण समाज में होनी चाहिए जिसकी लौ सावित्रीबाई फुले ने १५० से भे ज्यादा वर्षों पहले जगाई थी।

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सावित्रीबाई फुले
धर्मांतरण
आर.एस.एस
ब्राह्मणवादी
महिला सेवा मंडल
ज्योतिबा फुले भाजपा
दलित

Related Stories

झारखंड : क्या रंग लाएगा अबकी बार आदिवासियों का वार ?

दलित चेतना- अधिकार से जुड़ा शब्द है

दलितों आदिवासियों के प्रमोशन में आरक्षण का अंतरिम फैसला

राजकोट का क़त्ल भारत में दलितों की दुर्दशा पर रोशनी डालता है

मनुष्यता के खिलाफ़ एक क्रूर साज़िश कर रही है बीजेपी: उर्मिलेश

सावित्रीबाई फुले : जीवन जिस पर अमल किया जाना चाहिए

'भीमा कोरेगाँव' ने लोगों को दमनकारी सामाजिक तंत्र से लड़ने को प्रेरित किया

अगर वह सच को सच मान ले तो संघ परिवार के पास बचेगा क्या?

अमेरिका में दक्षिणपंथ का उभार

धर्मनिरपेक्ष राजनीति को अपने आलस से निकलने की ज़रूरत है : प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद


बाकी खबरें

  • Employment
    नीलू व्यास
    भारत में नौकरी संकट जितना दिखता है उससे अधिक भयावह है!
    01 Feb 2022
    सामान्य तथ्य यह है कि इच्छुक छात्र सरकारी नौकरियों की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन निजीकरण, डिजिटलीकरण एवं ऑटोमेशन में लगातार वृद्धि के चलते इनमें लगातार कमी होती जा रही है।
  • Election Commission
    भाषा
    निर्वाचन आयोग ने गौतमबुद्ध नगर में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 10 प्रत्याशियों को नोटिस जारी किए
    01 Feb 2022
    चुनाव और कोविड के मद्देनज़र गौतमबुद्ध नगर में 1 फरवरी से लेकर 31 मार्च तक दो महीने के लिए धारा 144 लागू की गई है। इसके अलावा जेवर से चुनाव लड़ रहे सपा-रालोद के प्रत्याशी अवतार सिंह भड़ाना और उनके…
  • Rajeshwar Singh
    भाषा
    सरकार ने ईडी अधिकारी राजेश्वर सिंह को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दी, लड़ सकते हैं चुनाव
    01 Feb 2022
    कई विवादों में रहे सिंह ने पिछले साल के अंत में वीआरएस के लिए आवेदन दिया था। सूत्रों ने बताया कि वह भाजपा के टिकट पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ सकते है।
  • Yogi
    असद रिज़वी
    यूपी चुनाव : वे मुद्दे जो भाजपा के लिए बन सकते हैं मुसीबत! 
    01 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का “हिंदुत्व” का मुद्दा चलता दिख नहीं रहा है। भगवा पार्टी अब विपक्षियों के सहयोगियों को तोड़ने या कम से कम उन्हें लेकर लोगों के मन में शक…
  • Rural India
    भरत डोगरा
    बजट '23: सालों से ग्रामीण भारत के साथ हो रही नाइंसाफ़ी से निजात पाने की ज़रूरत
    01 Feb 2022
    कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों के लिए कम पैसों का आवंटन इंडिया और भारत के बीच के आय और जीवन स्तर के लिहाज़ से बनी चौड़ी खाई की व्याख्या करता है, लेकिन क्या सरकार के कान पर जूं भी रेंग रही है ?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License