NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
न्यूजीलैंड
‘सभ्यताओं के टकराव’ का सिद्धांत बना मानवता का शिकारी
भारत की तरह, दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इस्लाम और मुसलमानों के प्रति घृणा और भय के भाव की जडें, इतिहास की संकीर्ण समझ में हैं।
राम पुनियानी
24 Mar 2019
Translated by अमरीश हरदेनिया
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : CNN.com

न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च में 15 मार्च 2019 को हुए भीषण नरसंहार ने दुनिया को दहला दिया है। हत्यारा ब्रेंटन हैरिसन टेरेंट, ऑस्ट्रेलियाई नागरिक है। दो मस्जिदों पर हुए इस हमले में करीब 50 लोग मारे गए, जिनमें से नौ भारतीय मूल के थे। टेरेंट ने इस कत्लेआम की सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग करने के लिए अपने सिर पर एक कैमरा लगा रखा था। उसने यह खून-खराबा इसलिए किया क्योंकि उसका मानना था कि मुस्लिम प्रवासी और उनके द्वारा की जाने वाली हिंसा, यूरोप के लिए बड़ा खतरा है। यह आतंकवादी, मुसलमानों से गहरी नफरत करता है और कट्टर नस्लवादी है। उसने यह घृणित काण्ड अंजाम देने से पहले एक लम्बा वक्तव्य, जिसे वह “श्वेत राष्ट्रवाद का घोषणापत्र” कहता है, सोशल मीडिया पर पोस्ट किया।

दुनिया भर में इस कुत्सित हत्याकांड की तीव्र प्रतिक्रिया हुई। न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री, 38-वर्षीय जेसिंडा अर्डर्न, जो कि दुनिया की सबसे कम आयु के राज्यप्रमुखों में से एक हैं, ने कहा कि हमले के शिकार लोग, जिनमें से कई प्रवासी या शरणार्थी हो सकते हैं, “हम में से हैं” और उन पर गोलियां चलने वाला “हम में से नहीं है”। प्रधानमन्त्री के वक्तव्य का मुख्य स्वर यह था कि उनका देश “विविधता, करुणा और आश्रय” का पर्यायवाची है। उन्होंने कहा “मैं लोगों को यह आश्वस्त करना चाहती हूँ कि हमारी सभी एजेंसियां, हमारी सीमाओं सहित, सभी स्थानों पर, उपयुक्त कार्रवाई कर रही हैं।”

दिल को छू लेने वाले अपने भाषण में, पोप ने कहा, “इन दिनों, युद्ध और टकराव, जो मानवता का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं, के दर्द के अलावा, हमारे सामने क्राइस्टचर्च, न्यूज़ीलैंड पर भयावह हमले के पीड़ित हैं...मैं हमारे मुस्लिम भाइयों और उनके समुदाय के साथ खड़ा हूँ...।”

भारत की तरह, दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इस्लाम और मुसलमानों के प्रति घृणा और भय के भाव की जडें, इतिहास की संकीर्ण समझ में हैं। मुसलमानों के प्रति घृणा में, 9/11 के बाद तेजी से वृद्धि हुई। अब तो इतिहास का एक नया संस्करण तैयार हो गया है जो मुस्लिम आक्रान्ताओं पर केन्द्रित है। भारत की तरह, यूरोप में भी इस संस्करण में चुनिन्दा तथ्य शामिल किये गए हैं। यूरोप पर कई आक्रमण हुए, परन्तु इतिहास का यह संस्करण केवल तुर्क साम्राज्य - जिसके शासक मुस्लमान थे - के हमले पर जोर देता है।

टेरेंट का ‘घोषणापत्र’, नफ़रत और नीचता से लबरेज है परन्तु उससे राजनीति और इतिहास को सम्प्रदायवादी चश्मे से देखने वाले कई लोग सहमत होंगे। यह भी दिलचस्प है संप्रदायवादियों के एजेंडे में अतीत का बदला लेने की चाहत शामिल है। “इतिहास में यूरोप की सरज़मीं पर हमलों में मारे गए सैकड़ों हज़ार लोगों की मौत का बदला लेना,” क्राइस्टचर्च के हत्यारे के एजेंडा का भाग था। टेरेंट जैसे लोगों को वहशी बनाने में पश्चिमी मीडिया के ज़हरीले प्रचार की कम भूमिका नहीं है। वहां का मीडिया, मुसलमानों की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करता आ रहा है। कई समाचारपत्र और मीडिया समूह जैसे इंग्लैंड का डेली मेल  और अमेरिका का फॉक्स न्यूज़, मुसलमानों के दानवीकरण में सबसे आगे हैं। इसके साथ ही, कई वेबसाइटें हैं जो प्रवासियों और विदेशियों से घृणा करना सिखा रही हैं। इस सब के कारण मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं। मुसलमानों को बेईमान, गिरे हुए लोग और दूसरे दर्जे का नागरिक बताया जा रहा है। मुसलमानों के बारे में इसी तरह के पूर्वाग्रह और गलत धारणाएं भारत में भी प्रचलित हैं। पश्चिम में तो अब मुस्लिम महिलाओं द्वारा हिजाब पहनना, इस बात का पर्याप्त सबूत मान लिया गया है कि वे यूरोप की संस्कृति और वहां के आचार-विचार के विरुद्ध हैं। क्या ऐसा ही कुछ हम भारत में भी नहीं सुनते?

नॉर्वे के ईसाई आतंकी एंडर्स बेहरिंग ब्रेइविक ने सन 2011 में, अपनी मशीनगन से 69 युवकों को मौत की नींद सुला दिया था। उसने भी एक घोषणापत्र जारी किया था। उसने इस्लाम को नियंत्रित करने के लिए इजराइल के यहूदी समूहों, चीन के बौद्धों और भारत के हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का सहयोग लेने की बात कही थी। उसने लिखा था, “यह आवश्यक है कि यूरोपीय और भारतीय प्रतिरोध आन्दोलन एक-दूसरे से सीखें और आपस में अधिक से अधिक सहयोग करें। हम लोगों के लक्ष्य लगभग एक से हैं।”

यह ध्यान देने की बात है कि ब्रेइविक के घोषणापत्र और हिन्दू राष्ट्रवाद - या हिंदुत्व - की विचारधारा में इस्लाम, मुसलमानों और उनके साथ सहअस्तित्व के मुद्दों पर कई समानताएं हैं। यूरोप की मुख्यधारा की दक्षिणपंथी पार्टियों की तरह, भारत में भाजपा, नाम के लिए हिंसा की निंदा तो करती है परन्तु मुसलमानों के प्रति घृणा पर आधारित उस सोच की निंदा नहीं करती, जो इस तरह की हिंसा का कारण बनती है।

एक तरह से यह कुत्सित राजनीति, सैम्युअल हंटिंगटन द्वारा प्रतिपादित “क्लैश ऑफ़ सिविलाइज़ेशनस (सभ्यताओं का टकराव)” के सिद्धांत का परिणाम है। सोवियत संघ के विघटन के साथ शीतयुद्ध समाप्त हो जाने के बाद, फुकुयामा ने कहा था कि सोवियत संघ के अंत के बाद, उदारवादी पश्चिमी लोकतंत्र, अंतिम राजनैतिक व्यवस्था होगी। इसी सिलसिले में, हंटिंगटन ने कहा कि “अब (देशों के बजाय) सभ्यताओं और संस्कृतियों में टकराव होंगे। राष्ट्र राज्य, दुनिया के रंगमंच पर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते रहेंगे परन्तु टकराव, राष्ट्रों और विभिन्न सभ्यताओं के बीच होगा। सभ्यताओं का टकराव, वैश्निक राजनीति पर छाया रहेगा। सभ्यताओं के बीच की विभाजक रेखा, युद्ध रेखा बन जाएगी।” इस सिद्धांत के अनुसार, पश्चिमी सभ्यता को पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यता से चुनौती मिल रही है। यही सिद्धांत, अमरीका के इराक व अफ़ग़ानिस्तान सहित कई मुस्लिम देशों पर हमला करने की नीति का आधार बना।

इस सिद्धांत के विरोध में, संयुक्त राष्ट्र संघ ने कोफ़ी अन्नान के महासचिव काल में, “सभ्यताओं का गठबंधन” बनाने की पहल करते हुए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया था, जिसने अपनी रपट में जोर देकर कहा कि दुनिया की प्रगति के पीछे, विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का गठबंधन है। 

आज के दौर में हम देख रहे हैं कि अमरीका की तेल के कुओं पर कब्ज़ा करने की राजनीति के चलते ही अलकायदा जैसे संगठन अस्तित्व में आये और 9/11 का हमला हुआ। अमरीकी मीडिया ने ही “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द गढ़ा। इसी के चलये, श्वेत राष्ट्रवाद उभरा और इस्लाम व मुसलमानों के प्रति घृणा व अविश्वास का वातावरण बना। इस प्रवृत्ति का मुकाबला, विचारधारा के स्तर पर किया जाना होगा। हमें यह समझना होगा कि सभी सभ्यताओं और संस्कृतियों की मूल प्रवृत्ति सद्भाव है, घृणा नहीं; गठबंधन है, टकराव नहीं। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

New Zealand's Christchurch
gunman attacked
Christchurch mosques
Brenton Tarrant
Jacinda Ardern
Racism
islamophobia and right wing party
Conflicts of civilizations

Related Stories

कलरिज़्म के विरोध में उठी है सशक्त आवाज़

फ़ुटपाथ : ट्रंप, मोदी, आदित्यनाथ और इस्लामोफ़ोबिया

नुसरत जहां का दूसरे धर्म में विवाह और देवबंद का फतवा

इस्लामोफ़ोबिया का सफ़ाया करना होगा


बाकी खबरें

  • putin
    अब्दुल रहमान
    मिन्स्क समझौते और रूस-यूक्रेन संकट में उनकी भूमिका 
    24 Feb 2022
    अति-राष्ट्रवादियों और रूसोफोब्स के दबाव में, यूक्रेन में एक के बाद एक आने वाली सरकारें डोनबास क्षेत्र में रूसी बोलने वाली बड़ी आबादी की शिकायतों को दूर करने में विफल रही हैं। इसके साथ ही, वह इस…
  • russia ukrain
    अजय कुमार
    यूक्रेन की बर्बादी का कारण रूस नहीं अमेरिका है!
    24 Feb 2022
    तमाम आशंकाओं के बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला करते हुए युद्ध की शुरुआत कर दी है। इस युद्ध के लिए कौन ज़िम्मेदार है? कौन से कारण इसके पीछे हैं? आइए इसे समझते हैं। 
  • up elections
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    उत्तर प्रदेश चुनाव: ज़मीन का मालिकाना हक़ पाने के लिए जूझ रहे वनटांगिया मतदाता अब भी मुख्यधारा से कोसों दूर
    24 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनाव के छठे चरण का मतदान इस इलाक़े में होना है। ज़मीन के मालिकाना हक़, बेरोज़गारी और महंगाई इस क्षेत्र के कुछ अहम चुनावी मुद्दे हैं।
  • ayodhya
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    यूपी चुनाव: अयोध्यावादियों के विरुद्ध फिर खड़े हैं अयोध्यावासी
    24 Feb 2022
    अयोध्या में पांचवे दौर में 27 फरवरी को मतदान होना है। लंबे समय बाद यहां अयोध्यावादी और अयोध्यावासी का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा है और धर्म केंद्रित विकास की जगह आजीविका केंद्रित विकास की मांग हो रही…
  • mali
    पवन कुलकर्णी
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों की वापसी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक जीत है
    24 Feb 2022
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों को हटाने की मांग करने वाले बड़े पैमाने के जन-आंदोलनों का उभार 2020 से जारी है। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में, माली की संक्रमणकालीन सरकार ने फ़्रांस के खिलाफ़ लगातार विद्रोही…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License