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भारत
राजनीति
सेक्युलर क्यों बनें, धर्मनिरपेक्ष सोच क्यों रखें
जीवन को बेहतर बनाने, खुश रहने, समझदार बनने और एक मुकम्मल इंसान होने के लिए आपको धर्मनिरपेक्ष होना ही होता है।
आलोक वाजपेयी
26 Dec 2017
Secularism
Image Courtesy : India Today

आज secularism को एक गाली सा बना दिया गया है। धर्म, धार्मिक चेतना को ही मनुष्य की मुख्य चेतना घोषित किया जा रहा है। जबकि सच यह है कि जिस देश में, जिस देश के लोगों की बुद्धि चेतना का मुख्य स्वर धर्मिरपेक्षता न हो वो धीरे-धीरे बर्बाद हो जाता है या फिर चालाक विकसित देशों का मानसिक या भौतिक गुलाम होके रह जाता है। तो बताने की कोशिश कर रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता किस प्रकार किसी समाज के लिए प्राण वायु का काम करती है और व्यक्ति के स्तर पर मनुष्य होने की बुनियादी शर्त समान है।

धार्मिक चेतना जिस व्यक्ति/समाज पर हावी हो जाती है, वो अपने दुनियावी हितों के लिए जागरूक नहीं हो पाता। उसमें एक झूठा गर्व उन्माद और जीवन संघर्ष के लिए पलायनवादी दृष्टिकोण भर देता है। जैसे-वो अत्याचार, शोषण, भेदभाव, गरीबी-अमीरी के कारणों की सही समीक्षा या कार्य कारण नहीं समझ पाता और सब भाग्य भरोसे छोड़े रहता है और इस समाज मे पिसता रह जाता है।

धार्मिक चेतनाग्रस्त व्यक्ति/समाज तार्किक ढंग से जीवन, प्रकृति के रहस्य, तमाम मानव संस्कृतियों की विभिन्नता के सुखद पहलुओं, कला, साहित्य, संगीत, आदि का रसास्वादन करने के लिए अपने को अक्षम बना लेता है। खुला दिल दिमाग रखना, अपने आस पास की और अपने से अलग चीजों से भी corelate कर मानवीय संवेदना युक्त व्यक्तित्व/समाज तब ही सम्भव है जब आप धार्मिक जकड़न से मुक्त हों।

हमेशा वही व्यक्ति /समाज खुश रह सकते हैं जो गतिशील हों। सड़ी गली मान्यताओं का परित्याग, अप्रासंगिक हो चुके और प्रगति में बाधा मूल्यों को तिलांजलि और सुंदर भविष्योन्मुखी सोच धर्म चिंतन से नही आ सकती। अक्सर धर्म शुरुआत तो सार्वभौमिक मूल्यों और आध्यात्मिक अहसास जैसे लुभावने शब्दों से करता है लेकिन जल्दी ही कट्टरता, कूपमंडूकता और खोखले कर्मकांडों की वकालत करने लगता है। फिर मन मे हिंसा,नफरत, आदि भरता है। यह सब मिलकर एक कुंठित समाज और ठस टाइप व्यक्तित्व बनाता है।

जीवन को बेहतर बनाने, खुश रहने, समझदार बनने और एक मुकम्मल इंसान होने के लिए आपको धर्मनिरपेक्ष secular होना ही होता है।

Courtesy: Hastakshep,
Original published date:
23 Dec 2017
सेकुलरिज्म
धर्मनिर्पेक्षता

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