NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सीबीआई की जंग : ‘कठपुतलियों’ को तो कोई और ही नचा रहा है
शीर्ष स्तर पर यह खुला युद्ध है और पर्दे के पीछे इन कठपुतलियों को नचाने वाले राजनीतिक गलियारों में मौजूद हैं।
सुबोध वर्मा
24 Oct 2018
Translated by महेश कुमार
cbi vs cbi
Image Courtesy: Economic Times

मोंटी पायथन का स्केच 'डेड तोता' याद है जिसमें एक ग्राहक पालतू जानवर के मालिक को मनाने की कोशिश करता है कि उसने जो तोता खरीदा है वह मरा हुआ है? भारत की प्रमुख जांच एजेंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो में कुछ ऐसा ही चल रहा है। मजेदार बात है कि सीबीआई को वास्तव में सुप्रीम कोर्ट की तुलना में पांच साल पहले ही 'बन्दी तोते' होने का दोषी ठहराया दिया गया था।

अक्टूबर 2017 में, नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पसंदीदा गुजरात कैडर के अधिकारी राकेश अस्थाना को सीबीआई में नंबर 2 के पद पर नियुक्त किया था। आगे चलकर उन्हें शीर्ष पद पर नियुक्त किया जाना था। लेकिन अस्थाना की एक अन्य राजनीतिक तौर पर नियुक्त निदेशक आलोक वर्मा से भिड़ंत हो गयी। दोनों एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार जैस संगीन आरोप लगा रहे हैं – भ्रष्टाचार, जैसा कि कहा जाता है जिसके खिलाफ लड़ना सीबीआई के दायरे में है। और इस तरह के भ्रष्टाचार में कुछ मुट्ठी भर रुपया शामिल ही नहीं है। बल्कि वर्मा का कहना है कि अस्थाना ने मांस निर्यातक के ऊपर जांच का दबाव कम करने के लिए 3 करोड़ रुपये की रिश्वत ली है। निदेशक होने के नाते, वर्मा ने न केवल अस्थाना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, बल्कि इसे आधिकारिक वेबसाइट पर भी डाल दिया, जिससे यह लड़ाई दुनिया के सामने खुल कर आ गयी है। सीबीआई मुख्यालय की एक टीम ने दिल्ली में सीबीआई मुख्यालय के अंदर उनके कार्यालय से अस्थाना के सहयोगी होने के नाते एक अन्य अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया। इस बीच, अस्थाना ने आरोप लगाया है कि यह वर्मा है जो रिश्वत ले रहा है और इसके बारे में उसने (अस्थाना) दूसरों को शिकायत की है।

शीर्ष स्तर पर यह खुला युद्ध है और पर्दे के पीछे इन कठपुतलियों को नचाने वाले राजनीतिक गलियारों में मौजूद हैं, और इस स्थिति ने इस बात की पुष्टि की है जिसे लंबे समय से संदिग्धता के दायरे में देखा जा रहा था कि संरक्षक और कानून के समर्थक इतने समझौतापरस्त हो गए हैं और व्यवस्था इतनी सड़ गयी है कि कोई भी अब उन पर विश्वास नहीं कर सकता है। यह तो होना ही था, लेकिन इसमें काफी समय लग गया। मोदी सरकार द्वारा प्रमुख पदों पर केवल सबसे वफादार और अनाड़ी अधिकारियों की नियुक्ति की प्राथमिकता, नियमों को ताक पर रख और बिना तफसील के इन नियुक्तियों ने यह सुनिश्चित किया कि इस तरह का शानदार ड्रामा इस तरह से बाहर आए।

एक राजनीतिक औज़ार के रूप में सीबीआई

सीबीआई 1963 में अस्तित्व में आई थी, हालांकि इसे 1941 में युद्ध में सट्टेबाज़ी की जांच के लिए ब्रिटिश द्वारा विशेष पुलिस महकमे के नाम  पर स्थापित किया गया था जिसे बाद में सी.बी.आई. का नाम दिया गया। रिश्वत और भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच के अलावा, गंभीर अपराधों और वित्तीय कानूनों के उल्लंघनों की जांच करना भी सीबीआई जांच के दायरे में लाया गया था। यह तकनीकी रूप से कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (कार्मिक मंत्रालय, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय) के तहत है, लेकिन इसके निदेशक को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति द्वारा नियुक्त किया जाता है जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा संसद में एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (या एक प्रतिनिधि जो सुप्रीम कोर्ट के जज हों) अन्य सदस्यों के रूप में होते हैं।

मोदी सरकार ने कानून में संशोधन किया है ताकि नियुक्ति के लिए वैध निर्णय के लिए सभी तीन सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक न हो।

सन्‌ 1970 के दशक की शुरुआत से ही केंद्र सरकार का शिकंजा सीबीआई पर जकड़ता गया। 1971 में, डी. सेन को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा निदेशक नियुक्त किया गया था और उनका कार्यकाल 1977 तक कार्यकारी आदेश द्वारा बढ़ा दिया गया था। बाद में, शाह आयोग ने आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों की जांच की, 1975-77 के दौरान सत्ता के दुरुपयोग करने के लिए सेन की गंभीर आलोचना की गई।

तब से, विभिन्न सरकारों और बदलते निदेशकों के तहत, सीबीआई के खिलाफ अदालतों और जनता की प्रतिकूल टिप्पणियों में वृद्धि होने लगी। आरोप राजनीतिक पक्षपात के हैं - कुछ का पक्ष लेना, दूसरों पर छापे मारना - महत्वपूर्ण मामलों पर धीमी गति से चलना, यहां तक कि जांच को गड़बड़ा देना।

जाने-माने प्रसिद्ध जांच के मामलों में सीबीआई शक के दायरे में आ गई है जिसमें बोफोर्स की जांच, जैन हवाला मामला, भोपाल गैस त्रासदी, हर्षद मेहता मामला, एचडीडब्ल्यू सबमरीन मामला, एयरबस 320, चेक पिस्तौल, नुस्ली वाडिया, सेंट किट्स, चंद्रस्वामी, लखू भाई पाठक, झारखंड मुक्ति मोर्चा, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट, 2 जी घोटाला, कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला, और इसी तरह के अन्य मामले इसमें शामिल हैं।

विरोधियों को फंसाना

यह सिर्फ इतना नहीं है कि सीबीआई का इस्तेमाल अवैध तरीके से मामलों को दबाने/तय के लिए किया गया है। यह भी आरोप हैं कि सीबीआई का अधिक प्रचलित और शक्तिशाली उपयोग राजनीतिक विरोधियों को डराने और या उन्हे दबाने के लिए किया गया है। यह भी कांग्रेस युग में शुरू हुआ लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने राजनैतिक बदले की कार्रवाई को पूरी तरह से नया जीवन दिया है।

संदिग्ध विरोधियों पर छापे मारना, प्रायः प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर विभाग, और यहां तक कि अनुसंधान और विश्लेषण विंग (रॉ) जैसी अन्य कानूनी एजेंसियों की सहायता से आम हो गया है। यह, ज़ाहिर है, इसमे कई तरह की दुर्भावना से काम करने की शिकायते शामिल हैं, लेकिन सबकी प्रतिक्रिया में सवाल एक ही  कि यह खेल किस लिए खेला जा रहा है। यदि आप उनकी बात मानते हैं, तो दबाव कम हो जाता है। यदि आप नहीं मानते  तो दबाव बढ़ जाता है।

यह कुछ ऐसा है जिसके आधार पर अस्थाना पर आरोप लगाया जा रहा है, राजनीतिक केसो/मामलों को छोड़कर, यह सिर्फ पैसा नहीं है बल्कि राजनीतिक समर्थन की चाहत इसका मुख्य उद्देश्य है। अक्सर, जैसा कि लालू यादव के मामले में देखा गया है, किसी के प्रति राजनितिक दुर्भावना से काम करना व्यक्ति के राजनीतिक जीवन को व्यापक विनाश में बदल देता है। आरोप हैं कि बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह को भी सीबीआई मामलों के खतरों के माध्यम से दबाया जा रहा है, हालांकि वर्तमान में यह कहना मुश्किल है। पी. चिदंबरम के बेटे को घेरना भी इसी तरह के मामले के रूप में देखा जा रहा है।

न्यायालय की आलोचना और कानूनी स्थिति

कई मामलों में, जैसे पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार, राम कृष्ण डालमिया बनाम न्यायमूर्ति एसआर टेंडोलकर इत्यादि में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यकारी शक्ति की अत्यधिक एकाग्रता और इस तरह के उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग करने की आलोचना की है। इसके विपरीत, अदालत ने कई अवसरों पर अपना कर्तव्य पूरा नहीं करने के लिए सीबीआई पर डंडा भी चलाया है, इसके लिए सबसे प्रसिद्ध कोयले ब्लॉक आवंटन का मामला  है।

यह मांग की गई है कि सीबीआई की कानूनी स्थिति को समेकित किया जाए और अलग से इसकी पूर्ण स्वायत्तता को परिभाषित किया जाए। इतना ही नही, 2013 में, गोहाटी उच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसके अस्तित्व को बचा लिया था। 1978 में, एलपी सिंह कमेटी ने सीबीआई के कामकाज में सुधार के लिए व्यापक सिफारिशें की थी लेकिन ये कागज पर बने रहे। 1991-92 की संसद अनुमान समिति की सिफारिशों का भी हश्र कुछ ऐसा ही हुआ था।

कोई जवाबदेही नहीं

पिछले कुछ वर्षों में अधिक जवाबदेह बनने के बजाय सीबीआई को जानबूझकर समी़क्षा से बचाया गया है। यह इस तथ्य में सबसे स्पष्ट है कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए आरटीआई अधिनियम की परिधि से  स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया था।

चूंकि मोदी सरकार लोकपाल कानून लाने में नाकाम रही है, जिसके जरिये सीबीआई के अधिकारियों को भी जांच के दायरे में लाया जा सकता था, उनके लिए वस्तुतः कोई जवाबदेही नहीं है। इसे राजनीतिक संरक्षण के साथ मिलाएं तो आपके पास एक घातक कॉकटेल है जो नौकरशाही को मनमानी करने की छूट देती है। यही कारण है कि इसके दो हालिया निदेशक - रणजीत सिन्हा और एपी सिंह भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के दायरे में हैं। एक हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि 26 सीबीआई अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है।

अब, अस्थाना-वर्मा के झगड़े से सड़ांध ऊपर आने लगी है। और अजीब बात यह है कि पिछले कुछ दिनों से दोनों अधिकारी के पीएमओ द़फ्तर के चक्कर लगाने की सूचना मिली है। वे जानते हैं कि शक्ति कहां है। इस बीच, वे जिस एजेंसी का नेतृत्व करते हैं वह एक मृत तोते की तरह है।

cbi vs cbi
cbi chief
director Alok Varma
special director Rakesh Asthana
BJP
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • fertilizer
    तारिक अनवर
    उप्र चुनाव: उर्वरकों की कमी, एमएसपी पर 'खोखला' वादा घटा सकता है भाजपा का जनाधार
    04 Feb 2022
    राज्य के कई जिलों के किसानों ने आरोप लगाया है कि सरकार द्वारा संचालित केंद्रों पर डीएपी और उर्वरकों की "बनावटी" की कमी की वजह से इन्हें कालाबाजार से उच्च दरों पर खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में कोरोना से मौत का आंकड़ा 5 लाख के पार
    04 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,49,394 नए मामले सामने आए और 1,072 मरीज़ों की मौत हुई है। देश में कोरोना से अब तक 5 लाख 55 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • SKM
    रौनक छाबड़ा
    यूपी चुनाव से पहले एसकेएम की मतदाताओं से अपील: 'चुनाव में बीजेपी को सबक़ सिखायें'
    04 Feb 2022
    एसकेएम ने गुरुवार को अपने 'मिशन यूपी' अभियान को फिर से शुरू करने का ऐलान करते हुए कहा कि 57 किसान संगठनों ने मतदाताओं से आगामी यूपी चुनावों में भाजपा को वोट नहीं देने का आग्रह किया है।
  • unemployment
    अजय कुमार
    क्या बजट में पूंजीगत खर्चा बढ़ने से बेरोज़गारी दूर हो जाएगी?
    03 Feb 2022
    बजट में पूंजीगत खर्चा बढ़ जाने से क्या बेरोज़गारी का अंत हो जाएगा या ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही बात कह रही है?
  • farmers SKM
    रवि कौशल
    कृषि बजट में कटौती करके, ‘किसान आंदोलन’ का बदला ले रही है सरकार: संयुक्त किसान मोर्चा
    03 Feb 2022
    मोर्चा ने इस बात पर भी जोर दिया कि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक बार भी किसानों की आय को दुगुना किये जाने का उल्लेख नहीं किया है क्योंकि कई वर्षों के बाद भी वे इस परिणाम को हासिल कर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License