NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
शिक्षा
भारत
राजनीति
शिक्षक, पुस्तक लेके रहेंगे!
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत राज्य के स्कूल-कॉलेजों में ‘शौर्य दीवार’ बनाने की बातें करते हैं। जबकि स्कूल-कॉलेजों में सबसे ज्यादा जरूरी किताबें और शिक्षक हैं।
वर्षा सिंह
10 Jul 2019
किताबों और शिक्षकों की मांग को लेकर पिथौरागढ़ ज़िले के युवा आंदोलन कर रहे हैं।

WhatsApp Image 2019-07-09 at 6.44.05 PM.jpeg

न किताब छन, न मासाब छन, की छ पै? कि चै पै? किताब और मासाब !

(न किताब है, न मास्टर साहब हैं, क्या है फिर, क्या चाहिए फिर, किताब और मास्टर साहब)

ये मौन गर टूटेगा, सैलाब बन कर फूटेगा !

उम्मीद है तभी चुप हैं...वरना....

 WhatsApp Image 2019-07-09 at 6.43.42 PM.jpeg

किताबों और शिक्षकों की मांग को लेकर पिथौरागढ़ ज़िले के युवा आंदोलन कर रहे हैं। ये उनके लिखे कुछ नारे हैं। इस आंदोलन की लहर अब देहरादून तक पहुंच गई है। देहरादून से आंदोलन को खत्म करने का दबाव पिथौरागढ़ तक पहुंचने लगा है।

 सीमांत ज़िले पिथौरागढ़ के लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने 17 जून से धरना शुरू किया। इस आंदोलन को लेकर छात्रसंघ अध्यक्ष राकेश जोशी कहते हैं कि पांच बार ज़िलाधिकारी कार्यालय के माध्यम से भी किताबों और शिक्षकों को लेकर ज्ञापन भेजा जा चुका है। एक बार नैनीताल जाकर कुलपति और उच्च शिक्षा निदेशालय से भी बात की गई थी। ये सारी कोशिश सार्थक नहीं हुईं। धरने पर बैठने से पहले अंतिम कोशिश के तौर पर उन्होंने ज़िलाधिकारी के माध्यम से कुलपति और शिक्षा मंत्रालय को पत्र भेजा। एक हफ्ते तक जवाब न आने पर आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया गया।

 WhatsApp Image 2019-07-09 at 6.43.52 PM.jpeg

किताबों और शिक्षकों के लिए आंदोलनरत युवाओं को देखकर मुझे निर्भया आंदोलन की भी याद आती है। जब महिलाओं पर जुल्म के खिलाफ दिल्ली के युवा हाथ में पोस्टर-बैनर लेकर सड़कों पर उतरे थे। जिन पर पानी की बौछारें और पुलिस की लाठियां दोनों पड़ी थीं। इस आंदोलन का मिज़ाज दूसरा है। बच्चे बारिश और धूप में भी किताबों की खातिर धरने पर बैठे हैं। परीक्षाओं के बीच भी धरना दे रहे हैं। उनके पोस्टर पर लिखे नारे बताते हैं कि पिथौरागढ़ जैसे पहाड़ी ज़िले के युवाओं के भविष्य से किस तरह खिलवाड़ किया जा रहा है और वे कितने रचनात्मक बच्चे हैं।

छात्र-छात्राओं के इस आंदोलन को अभिवावकों के साथ शिक्षकों का भी समर्थन हासिल है। हालांकि शिक्षक खुले तौर पर सामने नहीं आ रहे हैं। अभिवावकों ने भी पुस्तक-शिक्षक आंदोलन के समर्थन में जिले के सड़कों पर रैली निकाली। छात्र-छात्राओं ने मुंह पर काली पट्टी बांध कर रैली निकाली, ये बताते हुए कि वे चुप नहीं मौन हैं, क्योंकि उम्मीद अभी बाकी है।

66417342_2295645303865259_2596970628569366528_n.jpg

पिथौरागढ़ महाविद्याल के विद्यार्थियों की मांगें

·       किताबों की उपलब्धता सुनिश्चित करायी जाए।

·       प्राध्यापकों के रिक्त पदों को तुरंत भरा जाए और नए पदों का सृजन हो

·       शोधार्थियों को शोध सहायता दी जाए

·       सब-रजिस्ट्रार कार्यालय खोला जाए, जिसके न होने की वजह से छात्रों को डिग्री लेने या मार्क शीट में गलती होने जैसी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए नैनीताल जाना पड़ता है।

·       कुलपति महाविद्यालय में आकर बच्चों की समस्याएं सुनें

 हम नब्बे के दशक की किताबें पढ़ रहे हैं

पिथौरागढ़ महाविद्यालय से बीएससी-एमएससी करने के बाद पीएचडी की तैयारी कर रहे छात्र शिवम पांडेय बताते हैं कि यहां की लाइब्रेरी में अब भी नब्बे के दशक की किताबें हैं। प्रयोगशालाएं धूल खा रही हैं और विज्ञान के विद्यार्थियों को शायद ही कभी इन प्रयोगशालाओं में ले जाया गया हो। किताबें न होने की सूरत में एक-दूसरे के नोट्स की फोटोकॉपी की जाती है या फिर परीक्षा में पास होने लायक गाइड का सहारा लिया जाता है। शिवम कहते हैं कि विज्ञान जैसे विषय की हमने इन्हीं नोट्स से पढ़ाई की है, फिर ऐसी डिग्री का क्या फायदा।

आंदोलन को लेकर छात्र-छात्राओं के तैयार किये गये नोट में एम.ए. इतिहास के छात्र किशोर जोशी ने लिखा है कि “हम अब भी 90 के दशक की किताबें पढ़ रहे हैं, उन किताबों में सोवियत रूस अभी भी महाशक्ति है और शीत युद्ध चरम पर है, ऐसे में हमसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि तेज़ी से बदल रहे वैश्वीकरण के इस दौर में हम अच्छे शिक्षण संस्थाओं से मुकाबला करें।”

WhatsApp Image 2019-07-09 at 6.42.37 PM.jpeg

इस महाविद्यालय में करीब सात हज़ार छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। सीमांत क्षेत्र का सबसे बड़ा महाविद्यालय होने की वजह से यहां पड़ोसी ज़िले अल्मोड़ा और चंपावत से भी बड़ी संख्या में युवा पढ़ाई करने के लिए आते हैं। नेपाली छात्र-छात्राएं भी यहां अच्छी संख्या में हैं। इस सबके बावजूद यहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। सात हज़ार विद्यार्थियों पर 120 प्राध्यापकों के पद ही सृजित हैं, जिनमें से लगभग तीन दर्जन पद रिक्त पड़े हैं। गेस्ट टीचर्स का सहारा लिया जाता है। शिवम बताते हैं कि होम साइंस डिपार्टमेंट में तो कोई शिक्षक ही नहीं है।

पिथौरागढ़ के युवाओं की कोशिश के चलते इस आंदोलन की ख़बरें ज़िले की सीमाओं को पारकर दिल्ली-देहरादून तक पहुंचीं। सोशल मीडिया पर इन छात्रों की पोस्ट वायरल हुई। अब तक छात्रों की सुध न ले रहे प्रिंसिपल डॉ. डीएस पांगती आंदोलन खत्म करने का दबाव बनाने लगे। शिवम पांडेय बताते हैं कि प्रिंसिपल ने उनसे कहा कि हम कुछ किताबें मंगवा देंगे, आप लोग अपना आंदोलन खत्म करो। वो बताते हैं कि जो ज़िलाधिकारी ये कह रहे थे कि तुम लोगों का काम ही क्या है धरना-प्रदर्शन के अलावा, वो भी फ़ोन करने लगे और मिलने के लिए बुलाया।

राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत, जो कॉलेजों में ड्रेसकोड लागू कराने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयासरत रहे, उन्हें आभास हुआ कि विद्यार्थियों का ये मौन अगर फूटेगा तो सचमुच कहर बनकर टूटेगा तो उन्होंने भी दिल्ली से नैनीताल और पिथौरागढ़ तक फोन खड़काया। लेकिन सार्वजनिक तौर पर इस आंदोलन को लेकर अब तक कुछ नहीं कहा। मज़ेदार ये है कि डॉ. धन सिंह रावत की प्रतिक्रिया लेने के लिए फ़ोन करने पर पता चला कि सार्वजनिक फोन नंबर पर इनकमिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं है। उनकी फेसबुक वॉल पर बधाइयों के ताज़ा संदेश हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के सदस्यता अभियान में व्यस्त हैं।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत राज्य के स्कूल-कॉलेजों में शौर्य दीवार बनाने की बातें करते हैं। जबकि स्कूल-कॉलेजों में सबसे ज्यादा जरूरी किताबें और शिक्षक हैं।

66354101_2254811641238875_6131879316205600768_n.jpg

शिक्षक, पुस्तक लेके रहेंगे!

पिथौरागढ के विद्यार्थियों का ये आंदोलन दरअसल सिर्फ इस सीमांत ज़िले की स्थिति नहीं है। पूरे उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था चौपट है। पहाड़ों के स्कूल खाली हो रहे हैं। खाली स्कूल में शिक्षकों की तैनाती कर दी जा रही है। शिक्षा राज्य में पलायन की बड़ी वजह है। राज्य के स्कूल-कॉलेजों में इन्हीं स्थितियों में पढ़ रहे छात्र कहते हैं कि पढ़ने के बाद यहां नहीं ठहरना है, नौकरी के लिए पहाड़ से उतरना है।

वर्ष 2013 से राज्य में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रुसा) शुरू हुआ। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता लाने के उद्देश्य से शुरू किये गये इस अभियान में दिसंबर 2018 तक 159.96 करोड़ रुपये दिये जा चुके हैं। जिसका 87.87 प्रतिशत खर्च किया जा चुका है। इसके बावजूद राज्य के महाविद्यालयों की लाइब्रेरी नई किताबों के इंतज़ार में है। पिथौरागढ़ महाविद्यालय की स्थिति इससे भी समझी जा सकती है कि नैक की टीम ने इसे बी++ ग्रेड दिया है और ये कुमाऊं विश्वविद्लय से जुड़े अव्वल महाविद्यालयों में से एक है।

पिथौरागढ़ के विद्यार्थियों के समर्थन में देहरादून में भी शहीद स्मारक पर विरोध प्रदर्शन किया गया। सामाजिक कार्यकर्ता गीता गैरोला कहती हैं कि इस आंदोलन की ख़ास बात ये है कि वेतन बढ़ाने का आंदोलन नहीं है। बेरोजगारी का आंदोलन नहीं है। किताबों और शिक्षकों के लिए इससे पहले कब आंदोलन हुआ। उनका मानना है कि इस आंदोलन से राज्य की शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश करनी चाहिए।

पिथौरागढ़ महाविद्यालय के बाहर धरने पर बैठे बच्चे कुछ नए पोस्टर बना रहे हैं, नई इबारतें लिख रहे हैं, वे रचनात्मकता और पढ़ने की संस्कृति को आगे ले जाना चाहते हैं, वे कहते हैं कि आप यहां आइये, हमसे मिलिए, हम वैचारिक मज़बूती के साथ डटे हुए मिलेंगे।

UTTARAKHAND
Pithoragarh
Student Protests
Laxman Singh Mahar Govt.P.G.College Pithoragarh
Teachers and books demand

Related Stories

उत्तराखंड चुनाव: राज्य में बढ़ते दमन-शोषण के बीच मज़दूरों ने भाजपा को हराने के लिए संघर्ष तेज़ किया

रेलवे भर्ती मामला: बर्बर पुलिसया हमलों के ख़िलाफ़ देशभर में आंदोलनकारी छात्रों का प्रदर्शन, पुलिस ने कोचिंग संचालकों पर कसा शिकंजा

रेलवे भर्ती मामला: बिहार से लेकर यूपी तक छात्र युवाओं का गुस्सा फूटा, पुलिस ने दिखाई बर्बरता

‘(अ)धर्म’ संसद को लेकर गुस्सा, प्रदर्शन, 76 वकीलों ने CJI को लिखी चिट्ठी

अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे गोरखपुर विश्वविद्यालय के शोध छात्र, अचानक सिलेबस बदले जाने से नाराज़

देहरादून: प्रधानमंत्री के स्वागत में, आमरण अनशन पर बैठे बेरोज़गारों को पुलिस ने जबरन उठाया

झारखंड विधान सभा में लगी ‘छात्र संसद’; प्रदेश के छात्र-युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर

उत्तराखंड: NIOS से डीएलएड करने वाले छात्रों को प्राथमिक शिक्षक भर्ती के लिए अनुमति नहीं

उत्तराखंड: विकास के नाम पर 16 घरों पर चला दिया बुलडोजर, ग्रामीणों ने कहा- नहीं चाहिए ऐसा ‘विकास’

मेडिकल छात्रों की फीस को लेकर उत्तराखंड सरकार की अनदेखी


बाकी खबरें

  • punjab
    भाषा सिंह
    पंजाब चुनावः परदे के पीछे के खेल पर चर्चा
    19 Feb 2022
    पंजाब में जिस तरह से चुनावी लड़ाई फंसी है वह अपने-आप में कई ज़ाहिर और गुप्त समझौतों की आशंका को बलवती कर रही है। पंजाब विधानसभा चुनावों में इतने दांव चले जाएंगे, इसका अंदाजा—कॉरपोरेट मीडिया घरानों…
  • Biden and Boris
    जॉन पिलगर
    युद्ध के प्रचारक क्यों बनते रहे हैं पश्चिमी लोकतांत्रिक देश?
    19 Feb 2022
    हाल के हफ्तों और महीनों में युद्ध उन्माद का ज्वार जिस तरह से उठा है वह इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है
  • youth
    असद रिज़वी
    भाजपा से क्यों नाराज़ हैं छात्र-नौजवान? क्या चाहते हैं उत्तर प्रदेश के युवा
    19 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के नौजवान संगठनों का कहना है कि भाजपा ने उनसे नौकरियों के वादे पर वोट लिया और सरकार बनने के बाद, उनको रोज़गार का सवाल करने पर लाठियों से मारा गया। 
  • Bahubali in UP politics
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: सियासी दलों के लिए क्यों ज़रूरी हो गए हैं बाहुबली और माफ़िया?
    19 Feb 2022
    चुनाव में माफ़िया और बाहुबलियों की अहमियत इसलिए ज्यादा होती है कि वो वोट देने और वोट न देने,  दोनों चीज़ों के लिए पैसा बंटवाते हैं। इनका सीधा सा फंडा होता है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और…
  • Lingering Colonial Legacies
    क्लेयर रॉथ
    साम्राज्यवादी विरासत अब भी मौजूद: त्वचा के अध्ययन का श्वेतवादी चरित्र बरकरार
    19 Feb 2022
    त्वचा रोग विज्ञान की किताबों में नस्लीय प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक कमी ना केवल श्वेत बहुल देशों में है, बल्कि यह पूरी दुनिया में मौजूद है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License