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भारत
राजनीति
शिक्षकों की हड़ताल UP में बेरोज़गारी और शिक्षा संकट के गहरे जड़ को उजागर करता है
यहाँ शिक्षक पदों के लिए रिक्तियाँ काफी ज़्यादा है और छात्रः शिक्षक का अनुपात भी कम है।
न्यूजक्लिक रिपोर्ट
02 Jun 2018
UP Teachers

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हज़ारों अस्थायी शिक्षकों पर हालिया पुलिस कार्यवाही ने पूरे शहर में ठहराव ला दिया। स्थायी करने की माँग को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए राज्य के विभिन्न इलाके से लखनऊ में इकट्ठा हुए इन शिक्षकों पर पुलिस ने कार्यवाही की थी। हालिया हड़ताल इस तरह के विरोधों की एक श्रृंखला में नवीनतम थी जो उत्तर प्रदेश में गहरे रोज़गार संकट और ढ़हती शिक्षा प्रणाली का खुलासा करती है।

साल 2000 में संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों पर भारत द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद इसने 'सभी के लिए शिक्षा' के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अनुबंध आधार पर भर्ती की अनुमति दी। कई राज्य सरकारों ने 'शिक्षा मित्र' नियुक्त किए जो लोगों को स्कूलों में अपने बच्चों को दाख़िल करने के लिए राज़ी करेंगे और शिक्षा की आवश्यकता के बारे में जागरूकता फैलाएंगे।

इन शिक्षा मित्रों को केवल कक्षा 12वीं पूरी करने की आवश्यकता है और उनके स्थानीय पंचायत से सिफारिश की ज़रूरत है। इस कम वेतनमान ने राज्यों को बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षकों को भर्ती करने के लिए सक्षम किया जो कि खज़ाने पर ज़्यादा बोझ नहीं थे। सरकारों ने उन्हें आठवीं कक्षा तक के छात्रों को पढ़ाने में सक्षम बनाने के लिए उनकी भूमिकाओं को और बढ़ाया। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन डेटा से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों (स्वीकृत क्षमता 7, 59,898 पद) के लिए 1,74,666 रिक्तियों में से 1,72,000 शिक्षा मित्रों से भरी गई थी।

लेकिन साल 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित होने के बाद सब कुछ बदल गया। इन अधिनियम ने शिक्षकों की नियुक्ति के लिए नियम बनाने के लिए नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) को अधिकार दिया। इसने स्पष्ट किया कि देश में शिक्षण पदों के इच्छुक उम्मीदवारों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करनी होगी। इस बीच समाजवादी पार्टी सरकार ने बेसिक शिक्षा अध्यापक सेवा नियमावली, 1981 में संशोधन के माध्यम से टीईटी पास करने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया और शिक्षा मित्र को दो साल तक के लिए नियमित कर दिया। लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 सितंबर, 2015 को इस नियमित प्रक्रिया को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में अपने आदेश में उच्च न्यायालय के फैसले को बरक़रार रखा और कहा कि टीईटी पास करना ज़रूरी था। इसने सेवा देने वाले शिक्षकों को परीक्षा पास करने के दो मौके दिए।

विरोध करने वाले शिक्षकों ने शिकायत की कि उन्होंने सभी औपचारिकताओं को पूरा कर लिया है लेकिन सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग रही थी। इलाहाबाद में शिक्षा मित्र के रूप में कार्यरत कमलेश ने न्यूज़़क्लिक से बात करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार उन्हें नियमित करने के अपने वादे को पूरा नहीं कर रही थी। कमलेश ने आगे कहा कि "भारतीय जनता पार्टी ने वादा किया था कि उसके सत्ता में आने के तीन महीने के भीतर इस मुद्दे को हल कर लिया जाएगा। ऐसा करने के बजाय उन्होंने शिक्षकों के लिए एक नई परीक्षा शुरू की। उत्तराखंड सरकार ने पहले ही 4,200 रिक्तियों में 3,500 शिक्षकों को नियमित कर दिया है। अगर सरकार इस संकट को हल करना चाहती है तो उसे हमें नियमित करना ही होगा।"

उन्होंने कहा कि वे पहले से ही पैरा शिक्षकों के योग्य थे लेकिन बहुत कम भुगतान किया जा रहा था। एक पैरा शिक्षक 38,878 रुपए प्राप्त करने का हक़दार है लेकिन उन्हें 10,000 रुपए प्रति माह का भुगतान किया जा रहा है। उन्होंने कहा, महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव पहचान पत्र के ब्योरे को सत्यापित करने के लिए चुनाव से पहले लोगों का सर्वे करने के लिए बूथ लेवल ऑफिसर की ड्यूटी सौंपी गयी थी। उन्होंने कहा, "हम तेज़ गर्मी में बीएलओ के रूप में काम करते हैं लेकिन भुगतान नहीं पाते हैं।"

नियमितीकरण पर अनिश्चितता पहले से ही उत्तर प्रदेश में शिक्षा को प्रभावित कर रही है। राज्य में प्राथमिक शिक्षकों की रिक्तियों की सबसे ज़्यादा संख्या है। इसी तरह 2015-16 के आँकड़ों के अनुसार इस राज्य में देश में सबसे कम छात्र-शिक्षक अनुपात (राष्ट्रीय औसत 1:23 के विपरीत 1:39) है। ऐसी स्थिति में शिक्षा मित्रों की माँगों को सही ढंग से पूरा करने में सरकार की विफलता निकट भविष्य में इस संकट को और बढ़ा सकती है।

Uttar pradesh
Teachers' Strike
Violence
education

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