NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
संघ-भाजपा का राष्ट्रवाद सिर्फ़ धूर्त सांप्रदायिकता है
अब तक भाजपा ने अपनी व्यापक चुनाव प्रचार रैलियों में ग़ैर-मुद्दों को मुद्दा बनाया है।
योगेश एस.
20 May 2019
Translated by महेश कुमार
संघ-भाजपा का राष्ट्रवाद सिर्फ़ धूर्त सांप्रदायिकता है

"अच्छे दिन" से लेकर "भारत माता की जय" और "वंदे मातरम" से "जय श्री राम" तक, - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रचारक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार के पाँच साल का कुल योग यही है। 2014 के लोकसभा चुनावों में अपने प्रचार अभियान के दौरान मोदी के "विकास" का वादा था "अच्छे दिन"। हालांकि, जब भाजपा ने 282 सीटों के साथ सरकार बनाई, तो यह निश्चित था कि भारत एक ऐसी राजनीति का गवाह बनेगा जो सांप्रदायिक रूप से अशांत है और भावनाओं पर आधारित है। अब जबकि पांच साल बाद जैसा कि लोकसभा 2019 चुनाव के लिए मतदान समाप्त होने वाला है, वादा किया गया "विकास" कहीं नज़र नहीं आ रहा है, लेकिन जो लोग उग्र हैं और जिनके भीतर घृणा भरी है ऐसे गौ रक्षक समूह और अन्य मज़बूत हिंदुत्ववादी ताक़तें; नागरिक जो इस सरकार से सवाल करने से भी डरते हैं; ऐसे लोग शैक्षिक, वित्तीय, अनुसंधान संस्थानों में संघ परिवार के सदस्यों के रूप में घुसपैठ करने में आगे हैं।

चूँकि वादा किया गया “विकास” दिखाई नहीं दे रहा है, इसलिए भाजपा ने इस बार राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाया है और वोट मांगने के लिए नरेंद्र मोदी को भगवान का रूप दे दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों पर कोई ध्यान न देते हुए, मोदी-शाह ने बालाकोट में पुलवामा हमलों और हवाई हमलों का इस्तेमाल वीडी सावरकर के हिंदुत्व राष्ट्रवाद के प्रवचन को सुदृढ़ करने के लिए किया और हर एक हिंदू को देशभक्त क़रार दिया और प्रत्येक भारतीय को हिंदू कहा। उदाहरण के लिए, कर्नाटक के बगलकोट ज़िले में चुनाव प्रचार रैली में बोलते हुए, पीएम ने पूछा था, "मुझे बताएँ, कि कांग्रेस और जेडी (एस) का वोट बैंक कहाँ है? क्या यह बगलकोट या बालाकोट में है? इसका फ़ैसला कांग्रेस-जेडी (एस) को करना है।” चिककोड़ी में, उन्हें यह कहते हुए सुना गया था, “कि आपका वोट तय करेगा कि लोग भारत माता की जय का सम्मान करेंगे या टुकड़े-टुकड़े गिरोह (देश विरोधी) का जो आपके पास आएंगे और भारत के विनाश के बारे में नारे लगाएंगे।"

देश भर में भाजपा द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्रचार उपकरणों में से एक मोबाइल ऑडियो-वीडियो स्क्रीन थी, जिसमें भाजपा को लगातार पुलवामा हमले के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देते हुए दिखाया जा रहा था। ऐसा क्यों किया गया? नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों की भावनाओं को भड़काने के लिए, जो ‘हवाई हमले’ करने से पाकिस्तान को “सबक सिखाने” की बात कर रहे थे।

नारों की राजनीति 

14 मई, 2019 को कोलकाता में अमित शाह की एक रैली में, पार्टी के पसंदीदा पौराणिक चरित्र राम सीता और हनुमान की वेशभूषा में लोग शामिल हुए थे, जिनके नाम पर पार्टी द्वारा वोट मांगने का इतिहास है। जय श्री राम के नारे लगाए गए थे।
एक तरफ़, ग़रीबी, बढ़ती बेरोज़गारी, बढ़ती असमानता, अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अत्याचार के बारे में बात करने के बजाय वे केवल राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में बोलते रहे, मोदी-शाह दोनों ने ही "राष्ट्र ख़तरे में है" की झूठी कहानी बनाई, जिसका प्रयास वे पिछले पाँच वर्षों से सरकार की विफ़लताओं को छिपाने के लिए कर रहे हें।

2014 में सत्ता में आते ही उन्होंने भारत माता की जय और वंदे मातरम (मातृभूमि को सलाम), कहने वाले को “सच्चे भारतीय” की पहचान बताने वाले नारे लगाए। भारत माता की जय नहीं बोलने वाले भारतीयों पर मीडिया और अन्य जगहों पर गर्म बहस को अच्छी तरह से याद किया जा सकता है। रोहतक में एक सार्वजनिक समारोह में योग शिक्षक और बिज़नेस टायकून बाबा रामदेव तो यह कहते हुए इस हद तक चले गए कि लाखों लोग अगर नारा लगाने से मना करेंगे तो उनके सिर कलम कर दिए जाएंगे; और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने कहा था "जो लोग नारा नहीं लगाते, उन्हें देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है।" उत्तर प्रदेश में भाजपा के विधायक सुरेंद्र सिंह जिन्होंने भविष्यवाणी की थी कि भारत 2024 तक एक हिंदू राष्ट्र होगा, ने यह भी कहा था कि जो लोग नारा नहीं लगाते वे पाकिस्तानी हैं।

इनके अलावा, ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं, जहाँ सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के लिए खड़े नहीं होने पर लोगों की पिटाई की गई। यह अवश्य ध्यान दें कि यह ग़ैर-मुद्दा भाजपा की सरकार बनने के बाद एक मुख्य मुद्दा बन गया। अब अगर पीछे मुड़कर देखें तो ऐसा लगता है कि मोदी-शाह और भाजपा को पहले से ही पता था कि 2019 के चुनाव का मुद्दा क्या होगा, क्योंकि जब उन्होंने 2014 में सरकार बनाई थी तो वे इन नारों का राजनीतिकरण करके ख़ुद को आगे के लिए तैयार कर रहे थे। इन चुनाव अभियानों में पूर्वता लेने वाले ये नारे उनके लिए "देजा वु" हैं।

भाजपा और मोदी-शाह का "राष्ट्रवाद"

सदानंद मेनन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हुए लिखते हैं, “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, किसी भी परिभाषा के अनुसार, राष्ट्रवाद का एक दुष्ट संस्करण है जो पहले से ही राष्ट्र राज्य की अवधारणाओं में मौजूद है। इसका चालाक एजेंडा एक राष्ट्र राज्य के विचार से राजनीतिक अधिकारों के सभी विचारों को पीछे छोड़ना और इसके स्थान पर इन खोखले नारों का प्रत्यारोपण करना है, जो सांस्कृतिक अधिकारों के विचार, ज़ाहिर तौर पर प्राइमोजेनरी, नस्लीय शुद्धता और आनुवांशिक वंशावली की अवधारणाओं के पक्ष में चलाए जाते हें जैसे कि जन्मभूमि या विचारों में निहित हैं जन्मभूमि/मातृभूमि और अन्य भावनात्मक पहलू जो साझा भाषा, भोजन और संरक्षण को स्पर्श करते हैं। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारकों ने हमेशा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पक्ष लिया है।”

इसके विपरीत, इस चुनाव में 1990 का राम जन्मभूमि आंदोलन, जो कि एक सांप्रदायिक एजेंडा था उसे उठाया गया, मुसलमानों को पाकिस्तान से जोड़ना, भारत को हिंदू और बांग्लादेश और रोहिंग्या के आप्रवासियों के मुद्दों को उठाकर और उन्हें धार्मिक मुद्दों में शामिल करके, पार्टी राष्ट्रवाद के नाम पर भावनाओं को भड़काती रही है। भाजपा के प्रयासों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक (प्रमुख) मोहन भागवत को यह दावा करने और भाजपा से संगठन को दूर करने के लिए मजबूर किया जिसमे आरएसएस ने 17-19 सितंबर 2018 को दिल्ली में तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला में अपने आपको एक ग़ैर-राजनीतिक संगठन बताया था। भाजपा का वर्तमान चुनाव प्रचार रैलियों का सबसे अच्छा उदाहरण है जो यह बता सकता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्या है।

भाजपा-आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विपरीत, जो देश को जनता के अधिकारों से ऊपर रखता है और लोगों की भलाई करता है, रवींद्रनाथ टैगोर ने 1917 में राष्ट्रवाद के बारे में लिखते हुए कहा था, कि "यह मेरा विश्वास है कि मेरे देशवासी सही मायने में उस शिक्षा के ख़िलाफ़ लड़कर जो उन्हें सिखाता है कि देश मानवता के आदर्शों से बड़ा है।” आरएसएस और मोदी-शाह, जैसा कि पहले तर्क दिया गया था, नागरिकों को उनकी समस्याओं और मुद्दों से ऊपर रखने के लिए प्रोत्साहित करने में लाभ देखते हैं।

Nationalism
Communalism
Modi Shah
Amit Shah
Narendra modi
Modi government
RSS
Mohan Bhagwat
Cultural Nationalism
elections 2019
Lok Sabha Elections 2019
Amit Shah in Kolkata
Amit Shah Rally
Baba Ramdev
Pragya Singh Thakur
Violation of Model Code of Conduct
election commission of India

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • Red Volunteers
    संदीप चक्रवर्ती
    बंगाल ट्रेन दुर्घटना के पीड़ितों की मदद करने के लिए आगे आये ‘रेड वालंटियर्स’
    15 Jan 2022
    जलपाईगुड़ी जिला अस्पताल में दुर्घटना में घायल यात्रियों को यथासंभव मदद पहुंचाने के लिए आपातकालीन स्थिति में रक्तदान करने के लिए करीब चालीस रेड वालंटियर्स फौरन पहुंचे।  
  • yogi
    एम.ओबैद
    दलितों के ख़िलाफ़ हमले रोकने में नाकाम रही योगी सरकार
    15 Jan 2022
    पिछले साल जारी एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में उत्तर प्रदेश में साल 2020 में दलितों के खिलाफ सबसे अधिक आपराधिक मामले दर्ज किए गए। यहां 12,714 मामले (25.2 प्रतिशत) दर्ज किए गए थे।
  • tubnisia
    काथरिन स्काएर, तारक गुईज़ानी
    ट्यूनीशिया: पहली डिजिटल राजनीतिक सुझाव प्रक्रिया पर लोगों में मत-विभाजन
    15 Jan 2022
    नए संविधान पर लोगों से डिजिटल तरीके से राजनीतिक सुझाव बुलवाए गए हैं। यह ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति काएस सईद का राजनीतिक संकट से निकलने का रास्ता हो सकता है। लेकिन सईद की मंशा की तरह, इस ऑनलाइन सुझाव…
  • Turkey
    एम. के. भद्रकुमार
    क्या अमेरिका और यूरोप के करीब आ रहा है तुर्की?
    15 Jan 2022
    लेकिन, हक़ीक़त यह है कि पश्चिम तुर्की को तो स्वीकार कर सकता है, लेकिन क्या वे एर्दोगन को स्वीकार करेगा?
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,68,833 नए मामले, 402 मरीज़ों की मौत
    15 Jan 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 3.85 फ़ीसदी यानी 14 लाख 17 हज़ार 820 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License