NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
संसदः किसानों, श्रमिकों और नौकरियों का क्या?
संसद का मॉनसून सत्र शुरू हो चुका है लेकिन देश के पीड़ित किसानों और श्रमिकों के लिए पेश करने को सदन के पटल पर कुछ भी नहीं है।
सुबोध वर्मा
19 Jul 2018
Parliament doesn't care for farmers and workers

मशहूर तीन बुद्धिमान बंदर जो किसी भी बुराई को देखने, सुनने या बोलने से इनकार करते हैं उनके सिद्धांत को उलट दिया गया है शायदI 18 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हो चुका है लेकिन देश के लाखों किसानों और श्रमिकों के लिए सदन के पटल पर कोई एजेंडा नहीं है। उन्हें न देखें, उन्हें न सुनें और उनके बारे में बात न करें- वामपंथी को छोड़कर  सभी प्रमुख दलों की प्रवृत्ति ऐसी ही लगती है।

पीआरएस के मुताबिक़ चर्चा के बाद पारित किया जाने के लिए आधिकारिक एजेंडे में 25 विधेयक शामिल हैं। वहीं 18 अन्य नए विधेयकों को पेश किया जाना है। विपक्षी पार्टियों का अविश्वास प्रस्ताव भी 20 जुलाई को पेश किया जायेगा। राज्यसभा को नया डिप्टी चेयरमैन चुनना है जो एक कड़ा मुक़ाबला होगा। संभावना है कि तीखी बयानबाज़ी होगी और निस्संदेह सदन की कार्यवाही में व्यवधान भी होगा।

इनमें से कोई भी विधेयक किसानों और कृषि मज़दूरों से संबंधित नहीं है। एक विधेयक [कारख़ाना (संशोधन) विधेयक, 2016] मज़दूरों से संबंधित है। इस विधेयक में एक चौथाई में ओवरटाइम काम की सीमा मौजूदा 50 घंटों से बढ़ाकर 125 घंटे तक करने की बात है। मज़दूरों को ज़्यादा काम करना चाहिए! लेकिन इसके अलावा औद्योगिक मज़दूरों या सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों या अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए कुछ भी नहीं है। बेरोज़गारी हर तरफ जिंदग़ियाँ ले रही है और परिवारों को बर्बाद कर रही है। नौकरियों को लेकर भी अभी तक कोई चर्चा नहीं है!

किसान आंदोलन

पिछले साल नवंबर महीने में किसानों ने संसद भवन के ठीक बाहर दिल्ली की सड़कों पर दो दिवसीय किसान संसद का आयोजन किया था। वे अपने उत्पादन के लिए बेहतर कीमतों की मांग कर रहे थें और हर तरह के कर्ज़ माफ़ करने की मांग कर रहे थें। यहाँ तक कि उन्होंने दो विधेयक का मसौदा ठीक विधायी भाषा की तरह विस्तृत तरीक़े से तैयार किया और इसे पारित किया। 21 राजनीतिक दलों ने उन्हें समर्थन दिया। किसान संसद से पहले किसानों ने देश भर में विशाल किसान मुक्ति यात्रा निकाल कर 10,000 किलोमीटर की यात्रा की। इसमें लाखों किसानों ने समर्थन दिया। महाराष्ट्र में चर्चित लॉन्ग मार्च और राजस्थान में आंदोलन सहित 13 राज्यों में किसानों ने आंदोलन किया था।

इस साल भी ये आंदोलन जारी रहा है। संसद सत्र के समानांतर, क़ीमत और कर्ज़ माफ़ी को लेकर एक संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा 10 करोड़ (100 मिलियन) किसानों के हस्ताक्षर एकत्र किए जा रहे हैं। इसे 9 अगस्त को ज़िला अधिकारियों को सौंप दिया जाएगा। इस दिन 1942 में शुरू हुए ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के ख़िलाफ़ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की वर्षगांठ है। किसान के संगठनों ने इस संकट पर चर्चा के लिए संसद के एक विशेष सत्र की माँग भी की है।

ज़ाहिर है कृषि संकट और कृषक समुदाय के लिए इसके उपजे विनाशकारी परिणामों से देशभर में काफी रोष है। देश की लगभग आधी आबादी कृषि कार्यों में लगी हुई है। फिर भी सरकार तीन बंदरों की तरह बर्ताव कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने 14 कृषि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों (एमएसपी) में 'वृद्धि' की घोषणा की है जो कि एक पाखंड है क्योंकि यह उत्पादन की कुल लागत से 50% की वृद्धि के उनके वायदों के आस-पास भी नहीं है। इस धोखाधड़ी की घोषणा के साथ उन्होंने और उनकी सरकार ने किसानों की माँग को पूरी तरह नज़अंदाज़ कर दिया है।

जीने के लिए लड़ रहे हैं मज़दूर

इस बीच औद्योगिक मज़दूर और कर्मचारी बेहतर मज़दूरी, बेहतर नौकरी सुरक्षा और सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों की बिक्री बंद करने के लिए तीन वर्षों से अधिक समय से ज़िंदगी-मौत जैसी लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन मोदी सरकार उनकी निरंतर अपीलों को लेकर बेहद उदासीन रही है।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से क़ीमतों में 28% की वृद्धि हुई है। लेकिन मज़दूरी क़रीब-क़रीब स्थिर रही है और भारतीय श्रम सम्मेलन द्वारा तय किए गए और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत निर्धारित मानकों से काफी कम है। इस सरकार ने लगभग 2 लाख करोड़ रुपए (200 बिलियन रुपए) की सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को निजी संस्थाओं को बेच दिया है। आउट-कॉन्ट्रैक्टिंग सिस्टम ने निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में लाखों श्रमिकों को नियोक्ताओं की दया पर छोड़ दिया है। इस सिस्टम में नौकरी की असुरक्षा के साथ-साथ लाभ भी कम हैँ। कारख़ाना विधेयक 2016 की तरह श्रम क़ानूनों में संपूर्ण परिवर्तन ज़्यादा शोषण करने और श्रम लागत कम करने के लिए तैयार है। इस विधेयक को संसद के इस सत्र में लाए जाने की संभावना है।

2 सितंबर 2015 को इन माँगों को लेकर क़रीब 1.5 करोड़ से ज्यादा (15 मिलियन) श्रमिक हड़ताल पर चले गए। इस पर सरकार से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। फिर साल 2016 में इसी तारीख को 1.8 करोड़ (18 मिलियन) श्रमिकों ने काम रोक दिया जिसे दुनिया भर में सबसे बड़ी हड़ताल कार्यवाही कहा गया। इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

पिछले साल नवंबर में इन श्रमिकों ने किसानों के इकट्ठा होने से ठीक पहले संसद के पास तीन दिनों का महापड़ाव किया। सरकार, बैंक, बीमा कर्मचारी और योजना श्रमिकों के अलावा कई उद्योगों (जैसे कोयला, इस्पात, परिवहन, दूरसंचार, बंदरगाह, अन्य खनन, तेल तथा गैस इत्यादि) के 3 लाख से अधिक (3,00,000) श्रमिकों ने दिल्ली को लगभग रोक दिया। वे माँग कर रहे थे कि सरकार उनकी बात सुने। लेकिन सरकार से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली क्योंकि तीन बंदर उनके सिर पर सवार थे।

संसद किसका प्रतिनिधित्व करता है?

इस देश के 90% मतदाता किसान, श्रमिक या कर्मचारी और उनके परिवार हैं। वे संसद के सदस्यों का चुनाव करते हैं। क्या भारत में काम करने वाले लोगों की दुर्दशा को लेकर संसद की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है? सदनों में किसानों और श्रमिकों पर क्या चर्चा नहीं होनी चाहिए? देश भर में बढ़ रही बेरोज़गारी के कारणों पर संसद को चर्चा नहीं करनी चाहिए?

monsoon session
farmers distress
Indian workers
Modi government
kisan sansad
Workers' Mahapadav
मॉनसून सत्र
किसान संसद
मज़दूरों का महापड़ाव

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

ज्ञानवापी विवाद, मोदी सरकार के 8 साल और कांग्रेस का दामन छोड़ते नेता


बाकी खबरें

  • russia
    एम के भद्रकुमार
    सैन्य अभियान पूरा करने को लेकर रूसी सेना पहले से कहीं ज़्यादा प्रतिबद्ध
    16 Mar 2022
    यूक्रेन की सैन्य क्षमताओं को काफ़ी हद तक कमज़ोर करने के बाद मास्को उस विशेष अभियान को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है, जिससे कि जीत हासिल की जा सके।
  • DHAMI
    योगेश के नेगी
    उत्तराखंड विधानसभा चुनाव परिणाम: हिंदुत्व की लहर या विपक्ष का ढीलापन?
    16 Mar 2022
    वैसे तो उत्तर-प्रदेश के मुकाबले उत्तराखंड के चुनावी नतीजे देश की राजनीति में कुछ खास मायने नहीं रखते हैं, मग़र फिर भी हिंदी-भाषी राज्यों में हिंदुत्व की राजनीति की दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण भी हैं।
  • corona
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,876 नए मामले, 98 मरीज़ों की मौत
    16 Mar 2022
    देश में कोरोना से अब तक 5 लाख 16 हज़ार 72 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • women
    अजय कुमार
    क्या भाजपा को महिलाओं ने जिताया? राशन योजना का वोटिंग पर क्या रहा असर 
    16 Mar 2022
    पोस्ट पोल सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि इस बार यूपी में महिलाओं ने समाजवादी पार्टी के मुकाबले भाजपा को जमकर वोट किया है।
  • सत्यम कुमार
    देहरादून: सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के कारण ज़हरीली हवा में जीने को मजबूर ग्रामीण
    16 Mar 2022
    कूड़ा निस्तारण के लिए उत्तराखंड राज्य का पहला सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट देहरादून के नजदीक, आसान नदी के किनारे शीशम बाड़ा में बनाया गया है, चार साल पहले बने इस कूड़ा निस्तारण प्लांट का मुख्य कार्य…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License