NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
संविधान-समीक्षा का सही समय
हमारे सामने कुछ और भी बड़े सवाल हैं, अब जिन पर मंथन आवश्यक है। हमारी अदालतें अब "एक्टिविस्ट" बन गई हैं।
पी. के. खुराना
28 Dec 2017
भारतीय संविधान
Image Courtesy : Asianet Newsable

न्यायमूर्ति ओ.पी. सैनी ने 2जी मामले में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है। उन्होंने कहा है कि सात साल तक वे इंतज़ार करते रहे कि उन्हें अभियुक्तों पर लगे आरोपों को सिद्ध करने के लिए कोई प्रमाण उपलब्ध करवाया जाये ताकि वे कोई फैसला कर सकें। उनका यह भी कहना है कि इस दौरान वे छ़ट्टियों में भी इस उम्मीद पर अदालत खोल कर बैठते थे कि कभी न कभी तो प्रमाण मिलेगा ही, लेकिन उन्हें कोई भी प्रमाण नहीं मिला इसलिए उनके पास सभी अभियुक्तों को बरी करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था।

न्यायमूर्ति सैनी की इस टिप्पणी से कई सवाल उठना जायज़ है। मसलन, इस दौरान केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस मामले में ढील क्यों दिखाई और आरोपियों को दोषमुक्त हो जाने का मौका क्यों दिया? लेकिन कुछ और सवाल हैं जो इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं और उन पर चर्चा होना और भी ज्यादा आवश्यक है। न्यायमूर्ति ओपी सैनी की अदालत सीधे सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में काम कर रही थी। सर्वोच्च न्यायालय ने 2जी मामला प्रकाश में आने पर 122 लाइसेंस कैंसल किये थे, जिसका सीधा-सा मतलब है कि माननीय न्यायालय के पास किसी घोटाले के कुछ ऐसे प्रमाण अवश्य रहे होंगे जिनके कारण लाइसेंस कैंसल करने की नौबत आई। फिर ऐसा क्यों हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति ओ.पी. सैनी को वे दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं करवाये? और अब जब न्यायमूर्ति ओ.पी. सैनी की अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है तो कैंसल किये गए उन लाइसेंसों का भविष्य क्या होगा? क्या वे दोबारा बहाल किये जाएँगे? और यदि ए. राजा उच्च न्यायालय में दोषी पाये जाएँ और वे सर्वोच्च न्यायालय में दोबारा अपील करें तो उस मुकद्दमे का भविष्य क्या होगा (क्योंकि तब खुद सर्वोच्च न्यायालय ही उसमें एक पक्ष होगा)? सर्वोच्च न्यायालय ने 122 लाइसेंस कैंसल किये हैं तो ए. राजा की उस अपील के वक्त सर्वोच्च न्यायालय को हर कीमत पर अपने इस फैसले को सही ठहराना होगा। तब क्या वह एक संवैधानिक संकट नहीं होगा? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि यदि ऐसा हो गया, तो यह स्थिति रुचिकर होगी या कि संकट?

हमारे सामने कुछ और भी बड़े सवाल हैं, अब जिन पर मंथन आवश्यक है। हमारी अदालतें अब "एक्टिविस्ट" बन गई हैं।

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और सोवियत रूस के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव ने सन् 1988 में सोवियत रूस की सहायता से भारतवर्ष में दो न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने के लिए करार किया लेकिन रूस में राजनीतिक उथल-पुथल और अमरीका के ऐतराज के कारण इस पर सन् 2001 में काम शुरू हुआ। तमिलनाडु के जिला तिरुनवेली के कुडानकुलम में जब जून 2012 में पहला न्यूक्लियर पावर प्लांट कामकाज के लिए तैयार हो गया तो स्थानीय लोगों और विभिन्न संगठनों ने आंदोलन प्रारंभ कर दिया और मद्रास उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर दी। यह याचिका पहले मद्रास उच्च न्यायालय ने निरस्त की और बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने। यानी, न्यायालय ने यह मान लिया कि यह न्यूक्लियर रियेक्टर सुरक्षित है। यदि कभी वहाँ कोई दुर्घटना हो जाए तो क्या सरकार और इंजीनियर यह नहीं कहेंगे कि इस पावर प्लांट के सुरक्षित होने की गवाही तो खुद सर्वोच्च न्यायालय ने भी दे रखी है? इससे भी आगे बढ़ते हैं तो हमारे पास ऐसे भी उदाहरण हैं जहाँ नीति संबंधी मामलों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने दखलअंदाज़ी की है। मसलन कुछ समय पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह खाद्य पदार्थों के फालतू स्टाक को कम कीमत पर बेच दे। इस आदेश के बाद यदि अगले वर्ष भयंकर सूखा पड़ जाता, और अकाल की स्थिति होती तो क्या सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के कारण अपनी जिम्मेदारी से बचने का मौका नहीं मिल जाता ?

जब कभी भी ऐसा होता है कि जनहित को ध्यान में रखकर न्यायपालिका कोई निर्देश देती है तो हम खूब खुश होते हैं। आप जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि हमारे संविधान में सरकार के तीन अंगो में शक्तियों का बँटवारा तर्कसंगत नहीं है और न ही उनमें संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रावधान किये गए हैं। यह माना जाता है कि हमारा संविधान संसद की सर्वोच्चता के नियम पर चलता है लेकिन व्यवहार में यह नियम पूर्णत: असफल है क्योंकि जिस दल अथवा गठबंधन को बहुमत मिलता है, उसकी सरकार बनती है और उस सरकार को चलाने वाले बड़े नेतागण ही तय करते हैं कि संसद का सत्र कब बुलाया जाए, यहाँ तक कि वे संसद को उसकी अवधि पूरी होने से पहले ही भंग करने की सिफारिश भी कर सकते हैं। चूंकि संसद में सत्तारूढ़ दल अथवा गठबंधन का बहुमत होता है अत: उस दल अथवा गठबंधन के बड़े नेताओं की सहमति से पेश किये जाने वाले बिल ही कानून बन पाते हैं। यानी दरअसल, कानून बनाने का काम संसद नहीं बल्कि सरकार करती है। इससे भी आगे बढ़ें तो यह भी स्पष्ट है कि सरकार ही कानून बनाती है और सरकार ही कानून लागू करती है। इस अजीबो-गरीब स्थिति के कारण संसद की शक्तियाँ सिमट कर सरकार के हाथ में आ जाती हैं। सब जानते हैं कि सरकार चलाने का असली काम दल के दो-तीन बड़े नेता ही करते हैं। यूपीए के समय में अंतिम निर्णय सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की सहमति से होता था और वर्तमान भाजपा सरकार में नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली की मर्ज़ी चलती है। इसका अर्थ यह है कि कुछ लोगों का छोटा सा गुट पूरे संसद को नियंत्रित करता है। जब किसी एक व्यक्ति या गुट के हाथ में सारी शक्तियाँ आ जायें तो उस व्यक्ति या गुट की तानाशाही चलती है। इस प्रकार लोकतांत्रिक ढंग से चुना गया व्यक्ति भी तानाशाह की तरह व्यवहार करने लगता है। ऐसे में जब प्रशासन बेखबर हो जाता है, जनता की सुनवाई नहीं होती तो न्यायालय का एक्टिविस्ट हो जाना भी हमें अच्छा लगता है। समस्या यह है कि आज हम इसके दूरगामी परिणामों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, और खेद इस बात का है कि शिक्षित और बुद्धिजीवी समाज भी इसके खतरों से अनजान नज़र आता है। यदि हमने भ्रष्टाचार नियंत्रित करने की मंशा से न्यायपालिका को मनमानी करते रहने की छूट दे दी तो कभी ऐसा हो सकता है कि न्यायपालिका सर्वशक्तिमान बन जाए, और ऐसे में न्यायपालिका भी वह सब कुछ कर सकती है जो हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में वहाँ की सेना कर रही है।

अभी समय है कि हम सोचें कि इस स्थिति से बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं। इसका सीधा-सा समाधान तो यही है कि सरकार के तीनों अंगों की शक्तियों और सीमाओं का विस्तृत विवेचन हो, देश भर में उन पर बहस चले, कानूनविद् अपनी राय दें, जनता अपनी राय दे, जनप्रतिनिधि अपनी राय दें और फिर ऐसे संविधान की रचना की जाए जिसमें न केवल सरकार के तीनों अंगों की शक्तियाँ और सीमाएँ स्पष्ट रूप से परिभाषित हों बल्कि सरकार का हर अंग, शेष दोनों अंगों पर कुछ नियंत्रण रख सके, ताकि कोई एक अंग भी भ्रष्ट या तानाशाह न बन सके। समाधान यह है कि हमारे वर्तमान संविधान की विशद समीक्षा हो और इसमें शामिल कमियों को दूर किया जाए। यह भी आवश्यक है कि संविधान की समीक्षा के समय कोई सीमा न हो, हम विश्व के हर संविधान की खामियों और खूबियों पर खुलकर विचार करें और फिर तय करें कि हमारा नया संविधान संसदीय प्रणाली का हो, राष्ट्रपति प्रणाली का हो, या मिश्रित प्रणाली से बनाया जाए। इसी में देश का भला है। आशा है कि हमारे देश का जागृत समाज इस दिशा में आगे बढ़ने की पहल करेगा।     v

-.-.-.-

पी. के. खुराना :: एक परिचय

पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वे मीडिया उद्योग पर हिंदी की प्रतिष्ठित वेबसाइट 'समाचार4मीडिया' के प्रथम संपादक थे।

सन् 1999 में उन्होंने नौकरी छोड़ कर अपनी जनसंपर्क कंपनी "क्विकरिलेशन्स प्राइवेट लिमिटेड" की नींव रखी, उनकी दूसरी कंपनी "दि सोशल स्टोरीज़ प्राइवेट लिमिटेड" सोशल मीडिया के क्षेत्र में है तथा उनकी एक अन्य कंपनी "विन्नोवेशन्स" देश भर में विभिन्न राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों के लिए कांस्टीचुएंसी मैनेजमेंट एवं जनसंपर्क का कार्य करती है। एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे एक नियमित स्तंभकार भी हैं और लगभग हर विषय पर कलम चलाते हैं।        

Indian constitution

Related Stories

यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का अमृतकाल है

डॉ.अंबेडकर जयंती: सामाजिक न्याय के हजारों पैरोकार पहुंचे संसद मार्ग !

ग्राउंड रिपोर्ट: अंबेडकर जयंती पर जय भीम और संविधान की गूंज

एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता

हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है

हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक

हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है

हम भारत के लोग : इंडिया@75 और देश का बदलता माहौल

हम भारत के लोग : हम कहां-से-कहां पहुंच गये हैं

संविधान पर संकट: भारतीयकरण या ब्राह्मणीकरण


बाकी खबरें

  • rahul modi
    लाल बहादुर सिंह
    मोदी-संघ की "विकास और विरासत" की फासीवादी मुहिम का जवाब रैडिकल लोकतान्त्रिक विमर्श है, हिन्दू बनाम हिंदुत्व नहीं
    21 Dec 2021
    जनता के जीवन के वास्तविक सवालों को महत्वहीन बना देने और इससे काटकर पूरे सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को हिन्दू पहचान, संस्कृति और विरासत के भावनात्मक, विभाजनकारी नैरेटिव पर केंद्रित कर देने की कोशिश हो…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 5,326 नए मामले, ओमिक्रॉन के मामले बढ़कर 174 हुए
    21 Dec 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.23 फ़ीसदी यानी 79 हज़ार 97 हो गयी हैं, लेकिन ओमिक्रॉन के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है | 
  • covid
    ज्योत्सना सिंह, आना व्रासर
    यात्रा प्रतिबंधों के कई चेहरे
    21 Dec 2021
    ओमिक्रॉन का पता चलने के बाद महामारी की जवाबी प्रतिक्रिया को लेकर ज़रूरी आपूर्ति की डिलीवरी को रोकते हुए और अविकसित देशों के प्रति अपने नस्लवादी पूर्वाग्रह दिखाते हुए कई अमीर देशों ने दक्षिणी अफ़्रीका…
  • Inequality
    भरत डोगरा
    भारत के पास असमानता से निपटने का समय अभी भी है, जानें कैसे?
    21 Dec 2021
    घोर पूंजीवाद के नेतृत्व में चलने वाली अर्थव्यवस्था और संयुक्त राज्य अमेरिका के मॉडल का अनुसरण करने वाला वर्तमान अत्यधिक असमान आर्थिक मार्ग सभी नागरिकों की ज़रूरतों को स्थायी रूप से पूरा नहीं कर सकता…
  • daily
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    पलवल में मुस्लिम युवक की हत्या, लोकसभा में चुनाव सुधार बिल पास और अन्य ख़बरें
    20 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी पलवल में मुस्लिम युवक की हत्या, चुनाव सुधार बिल लोकसभा में पास और अन्य ख़बरों पर।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License