NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
भारत
राजनीति
सोनभद्र आदिवासी जनसंहार : कौन है इसका ज़िम्मेदार?
आ रही ख़बरों में अधिकांश मीडिया द्वारा पूरे मामले को दो समुदायों (गुर्जर और आदिवासी) के बीच हिंसक भूमि विवाद से जोड़कर बताया जा रहा है। वहीं कई विपक्षी दल इसे सिर्फ़ राज्य के अपराध मुक्त ना होने से जोड़कर विरोध प्रकट कर रहें हैं।
अनिल अंशुमन
19 Jul 2019
Against the Sonbhadra massacre

अजीब विडम्बना है... एक ओर राज्यसभा में सरकार के आला मंत्री ऐलान करते हैं कि – “देश की एक-एक इंच ज़मीन से बाहर किए जाएँगे घुसपैठिए" ... लेकिन देश के अंदर प्राचीन काल से रहनेवाले सभी आदिवासियों की ज़मीनें छिने जाने के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहते। इतना ही नहीं सोनभद्र क्षेत्र के आदिवासियों द्वारा अपनी परंपरागत ज़मीनें छीने जाने का विरोध करने पर दबंग स्थानीय प्रधान द्वारा 10 लोगों को सरेआम गोलियों से भून देने के अमानवीय कृत्य पर देश के गृहमंत्री की तरफ़ से कोई बयान तक नहीं आता है। इस अमानवीय–बर्बर कृत्य के दौरान वहाँ उपस्थित पुलिस का तमाशाई बने रहना भी सवाल खड़े करता है कि शासन–क़ानून की नज़र में आदिवासी समाज की अपने ही आज़ाद देश में वास्तविक नागरिक हैसियत क्या है? हालांकि प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा इस जनसंहार कांड की जांच कमिटी बनाने व पीड़ितों के परिजनों को मुआवज़े की घोषणा देने की रस्म निभा दी गयी है। साथ ही सोनभद्र ज़िला अधिकारी को यह रिपोर्ट देने को कहा गया कि इन ग्रामवासियों को अभी तक ज़मीन के पट्टे क्यों नहीं दिये गए।

आ रही ख़बरों में अधिकांश मीडिया द्वारा पूरे मामले को दो समुदायों (गुर्जर और आदिवासी) के बीच हिंसक भूमि विवाद से जोड़कर बताया जा रहा है। वहीं कई विपक्षी दल इसे सिर्फ़ राज्य के अपराध मुक्त ना होने से जोड़कर विरोध प्रकट कर रहें हैं। जबकि तस्वीर का सबसे अहम पहलू है, यहाँ के आदिवासियों को उनकी पारंपरिक–पुश्तैनी ज़मीनों पर सरकारों द्वारा क़ानूनी अधिकार नहीं दिया जाना। जिसे संविधान की पाँचवी अनुसूची के विशेष प्रावधानों और 2006 के वनाधिकार क़ानून के तहत बहुत पहले ही दे दिया जाना चाहिए था। इसका ही भयावह नतीजा है 17 जुलाई का जनसंहार कांड।

सोनभद्र 1.jpg

सिर्फ़ आंकड़े में ही नहीं बल्कि कड़वा यथार्थ यह भी है कि आज के समय में जिस रफ़्तार से सरकारों के संरक्षण में निजी व कॉर्पोरेट कंपनियों और ज़मीन माफ़ियाओं के बेलगाम खनिज लूट और प्रकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को ही ‘तेज़ विकास दर‘ का मानक बना दिया गया है। जिसके लिए आदिवासियों को बेदख़ल कर उनके जंगल–ज़मीनों को हड़पने के बढ़ते सिलसिले ने आदिवासी समाज के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है। क्योंकि आम समाज में ज़मीन सिर्फ़ भौतिक वस्तु है जिसकी भरपाई उचित मुआवज़े से हो सकती है। लेकिन आदिवासी समाज के लिए यह उसके सम्पूर्ण अस्तित्व और अस्मिता से जुड़ा हुआ मामला है। इसीलिए सोनभद्र से लेकर पूरे भारत वर्ष और दुनिया भर के आदिवासी जंगल–ज़मीन पर अधिकार के सवाल को ही आज सर्वप्रमुख बनाए हुए हैं। जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी विशेष सामाजिक मान्यता देने के लिए हर वर्ष 10 अगस्त को ‘अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस‘ मनाने की घोषणा कर रखी है।

तमाम तरह के सामाजिक शोध व विश्लेषणों में यह बात मानी गयी है कि आदिवासी हमारे समाज के सबसे मूल निवासियों में से हैं। जिनके पूर्वजों ने ही सबसे पहले जंगलों को साफ़-सुथरा कर मनुष्य के रहवास और जीविका के लिए भूमि तैयार की। इसीलिए जब अंग्रेज़ यहाँ आए और उन्होंने आदिवासियों को उनके जंगल-ज़मीनों से बेदख़ल करना चाहा तो कोल–विद्रोह, संताल–हूल और बिरसा मुंडा के उलगुलान जैसे अनगिनत बहादुराना विद्रोहों से उसका जवाब दिया गया था।

विडम्बना है कि कॉर्पोरेट व निजी कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए 2006 में बनाए गए ‘केंद्रीय वन अधिकार क़ानून‘ को लागू करने में कोताही कर केंद्र से लेकर सभी राज्य सरकारों ने समस्त आदिवासी समुदायों के साथ छलकपट किया। आंकड़े बताते हैं कि किसी भी प्रदेश में इसे मज़बूती से लागू नहीं किया गया। जिससे हज़ारों हज़ार आदिवासी बरसों बरस से अपने पुरखों की पुश्तैनी ज़मीन के क़ानूनन मालिक नहीं बन पाये। वर्तमान सरकार की तो ‘सुनियोजित लापरवाही‘ के कारण ही आज देश के लाखों आदिवासियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अतिक्रमणकारी क़रार देकर, उन पर बेदख़ली की तलवार लटक रही है।

सोनभद्र 2.PNG

सोनभद्र उत्तर प्रदेश के सघन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। गोंड सहित अन्य कई आदिवासी समुदायों के लोग अपने पुरखों द्वारा बसाई ज़मीन पर आज़ादी के पहले से ही खेती–बाड़ी करके यहाँ रह रहें हैं। वन विभाग, ज़मीन लुटेरे नौकरशाह और भू माफ़ियाओं की नज़रें हमेशा से इनकी ज़मीनों पर लगी हुई हैं। इस क्षेत्र के आदिवासियों का कहना है कि शायद ही कोई ऐसा आदिवासी बचा होगा जिसे वन विभाग ने अब तक फ़र्ज़ी मुक़दमों में न फँसाया हो। क़ानूनी तिकड़म से 1955 में इस क्षेत्र की काफ़ी आदिवासी ज़मीनों को हड़पने हेतु ‘आदर्श कोपरेटिव सोसाईटी‘ के नाम से फ़र्ज़ी रजिस्ट्री करा ली गयी थी। बाद में एक आईएएस ने इसपर पूरा क़ब्ज़ा कर सारी ज़मीनें पत्नी व पुत्री के नाम कर दीं। इसकी जानकारी होते ही आदिवासी समाज डटकर खड़ा हो गया और ज़मीन दख़ल की सारी कोशिशों को नाकाम करता रहा। 2017 में इन ज़मीनों का बड़ा हिस्सा मूर्तिया पंचायत के दबंग प्रधान ने अवैध ढंग से अपने नाम करा ली। लेकिन स्थानीय आदिवासियों के प्रतिरोध के कारण ज़मीन दख़ल करने में बार-बार असफल होने पर 17 जुलाई को बड़े ही सुनियोजित तैयारी से जनसंहार कांड को अंजाम दिया गया।

18 जुलाई को लखनऊ में भाकपा माले (सीपीआई एमएल) द्वारा इस जनसंहार कांड के ख़िलाफ़ प्रतिवाद प्रदर्शित कर "सोनभद्र जनसंहार का कौन है ज़िम्मेदार?” पूछा जाना मायने रखता है। प्रतिवाद कार्यक्रम द्वारा राज्यपाल महोदय को भेजे गए ज्ञापन में - कांड के सभी दोषियों को कड़ी सज़ा देने और मृतकों के परिजनों को 25–25 लाख व सभी घायलों को 5–5 लाख रुपये मुआवज़ा देने की मांग की गयी। साथ-साथ यह भी मांग की गयी कि- आदिवासियों की पुश्तैनी ज़मीन का विनियमतीकरण उनके पक्ष में करते हुए जल्द से जल्द सभी को ज़मीन का पट्टा दिया जाय तथा बेदख़ली पर रोक लगाई जाए। सनद रहे कि चंद महीने पहले ही वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने अपने चुनावी अभियान के दौरे में झारखंड के आदिवासियों को यह कहकर आश्वस्त किया था कि– “जब तक आपका ये चौकीदार है, आपके जंगल–ज़मीन पर कोई पंजा नहीं मार सकेगा!” निस्संदेह, सोनभद्र के आदिवासी भी इसे यथार्थ में अपने यहाँ लागू होता देखना चाहेंगे।

sonbhadra killings
UP police
up govt
tribals
Forest Rights Act
tribal land
caste discrimination
caste politics
CPIML
yogi sarkar
Brahmanism

Related Stories

चंदौली पहुंचे अखिलेश, बोले- निशा यादव का क़त्ल करने वाले ख़ाकी वालों पर कब चलेगा बुलडोज़र?

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

चंदौली: कोतवाल पर युवती का क़त्ल कर सुसाइड केस बनाने का आरोप

प्रयागराज में फिर एक ही परिवार के पांच लोगों की नृशंस हत्या, दो साल की बच्ची को भी मौत के घाट उतारा

प्रयागराज: घर में सोते समय माता-पिता के साथ तीन बेटियों की निर्मम हत्या!

उत्तर प्रदेश: योगी के "रामराज्य" में पुलिस पर थाने में दलित औरतों और बच्चियों को निर्वस्त्र कर पीटेने का आरोप

यूपी में मीडिया का दमन: 5 साल में पत्रकारों के उत्पीड़न के 138 मामले

पीएम को काले झंडे दिखाने वाली महिला पर फ़ायरिंग- किसने भेजे थे बदमाश?

यूपी: मुज़फ़्फ़रनगर में स्कूली छात्राओं के यौन शोषण के लिए कौन ज़िम्मेदार है?

यूपी: प्रयागराज सामूहिक हत्याकांड में पुलिस की जांच पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जीत गया बलिया के पत्रकारों का 'संघर्ष', संगीन धाराएं हटाई गई, सभी ज़मानत पर छूटे
    25 Apr 2022
    तीनों पत्रकार अजीत ओझा, दिग्विजय सिंह व मनोज गुप्ता को कोर्ट से ज़मानत मिल गई है। यही नहीं, तीनों पत्रकारों पर लादी गई संगीन धाराएं भी हट गयी हैं।
  • रवि शंकर दुबे
    सपा प्रतिनिधिमंडल को न, दूसरे दलों को हां... आख़िर आज़म का प्लान क्या है?
    25 Apr 2022
    सीतापुर की जेल में बंद आज़म ख़ान से पहले शिवपाल यादव फिर कांग्रेस के आचार्य प्रमोद कृष्णम की मुलाकात नए सियासी समीकरण के संकेत दे रही है।
  • tiranga yatra
    न्यूज़क्लिक टीम
    जहांगीरपुरी की तिरंगा यात्रा! कायम की मिसाल, मीडिया कब सुधरेगा ?
    25 Apr 2022
    न्यूज़चक्र के इस एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं जहांगीरपुरी में हुई तिरंगा यात्रा की जिसने आपसी भाईचारे और शांति की एक मिसाल पेश की है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार की राजधानी पटना देश में सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर
    25 Apr 2022
    देश के 129 शहरों की सूची में पटना सबसे ज्यादा प्रदूषित है जिसका सूचकांक 365 पाया गया है। वहीं दूसरे स्थान पर बिहार का ही मुंगेर शहर है जिसका सूचकांक 358 पाया गया है।
  • परमजीत सिंह जज
    लाल क़िले पर गुरु परब मनाने की मोदी नीति के पीछे की राजनीति क्या है? 
    25 Apr 2022
    प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से सिखों के नौवें गुरु तेगबहादुर जी के जन्मदिवस पर भाषण दिया। इस भाषण के कई गहरे मायने निकाले जा रहे हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License