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सोशल मीडिया का आभासी सम्मोहन और उसके ख़तरे
नवविकासवाद और घटिया उपभोक्तावाद पर सवार चतुर नव साम्राज्यवादी ताकतें सोशल मीडिया के माध्यम से आम लोगों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और बहुत हद तक आचार और व्यवहार को भी परिवर्तित करने में कामयाब होती हुई दिख रही है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर व्यापक रूप से पड़ेगा।
डॉ. डी के सिंह
21 Jul 2019
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : Hindustan

सोशल मीडिया अंतर भावनाओं का प्रकटीकरण करने, रिश्तों को पुनर्जीवन देने, मनपसंद लोगों को ढूंढने और उनसे दोस्ती करने तथा अपनी रचनात्मकता को बहुत बड़े वर्ग तक पहुंचाने वाले एक बड़े प्लेटफार्म  के रूप में आज हम सबके सामने है। परंतु दूसरी तरफ यह प्लेटफार्म समय की बर्बादी, निजता का हनन, इसके ज्यादा प्रयोग से होने वाले विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तथा लोगों के व्यवहार में बदलाव का भी कारण बनता जा रहा है। हम में से ज्यादातर लोग यह नहीं जानते हैं कि फेसबुक और मैसेंजर के ऊपर जो कुछ भी हम पोस्ट, लाइक, कमेंट, मेंशन, शेयरिंग आदि करते हैं, हमारा व्यक्तिगत डेटा संग्रहित होता रहता है। जिस के दुरुपयोग की खबरें समय-समय पर प्रकाशित भी होती रही हैं। फेसबुक और मैसेंजर के ज्यादा प्रयोग से उत्पन्न होने वाली बीमारी फेसबुक एडिक्ट डिसऑर्डर ( एफएडी) आजकल काफी चर्चा में है।

इसे भी पढ़ें : फेसबुक क्या आपकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहा है?

भारत में फेसबुक, मैसेंजर,  व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और टि्वटर का प्रयोग करने वाले लोगों की संख्या में विगत दो वर्षों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। भारत में वर्तमान में लगभग 49.30 करोड़ लोग सोशल मीडिया का प्रयोग कर रहे हैं जिसमें फेसबुक प्रयोग करने वालों की संख्या सर्वाधिक है। फेसबुक भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय होने के बाद अभी भी फेस ज्यादा और बुक के रूप में कम प्रचलित है, अर्थात फेसबुक मौलिक विचारों से ज्यादा फोटो और अन्य प्रकार की व्यक्तिगत उपलब्धियों और कार्य पद्धतियों के संप्रेषण का केंद्र बना हुआ है। फेसबुक पर जहां तक रचनात्मकता का सवाल है तो ज्यादातर लोग दूसरे के द्वारा लिखे हुए विषय वस्तु को ही पोस्ट या शेयर करते रहते हैं, तो ऐसे में किसी के भाषा, चेतना, बुद्धिमत्ता और एकाग्रता के स्तर का पता लगाया जाना भी संभव नहीं है । सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म के ऊपर लाइक-कमेंट का खेल आभासी लोकप्रियता  और कुछ हद तक आम लोगों को सेलिब्रिटी होने का  भ्रम भी पैदा कर रहा है। अर्ध सत्य के इस युग में सोशल मीडिया के रंगीन और आभासी पहलू को ही पूर्ण सत्य मानने वालों की संख्या में  लगातार वृद्धि होती जा रही है।

भारत में व्यक्तिगत चैटिंग के लिए व्हाट्सएप और फेसबुक के मैसेंजर प्लेटफार्म का प्रयोग सर्वाधिक हो रहा है। व्हाट्सएप और मैसेंजर में उपलब्ध ऑडियो-वीडियो-चैटिंग की आसान और लोकप्रिय सुविधा ने हमारे घरों की दीवारों को भेदते हुए  निश्चित रूप से अब हमारे  बेडरूम तक जगह बना ली है। इनकी चमक इतनी तेज है कि सामने घट रही अनिष्टकारी घटनाएं तब तक दृष्टिगोचर नहीं होतीं जब तक कि उससे घर बार मे आग न लग जाए। बेहोशी का आलम यहां तक है कि सब कुछ लुटने और नष्ट होने के बाद भी हम सभी एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं। फ्रेंड-अनफ्रेंड, ब्लॉक-अनब्लॉक करने के आत्म सम्मोहन में पड़ा व्यक्ति  कब फर्जी अकाउंट धारी  गलत लोगों द्वारा चलाई जा रही अवैध  गतिविधियों  के जाल में स्वयं फंस सकता है, इसका अनुमान लगाया जाना संभव नहीं है।

इसे भी पढ़ें : सोशल मीडिया की अफवाह से बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा

फेसबुक और मैसेंजर पर  जितनी तेजी से रिश्ते बनते हैं  उतने ही तेजी से ज्यादातर मामलों में वह समाप्त भी  होते रहते हैं । यहां भावनात्मक जुड़ाव जिस स्तर पर दिखाया जाता है,  वास्तविकता के धरातल पर या लोगों के अंतर्मन में ऐसा होता नहीं  है। सोशल मीडिया पर  हर विषय वस्तु  हर व्यक्ति को उसका स्वाभाविक स्तर और भिन्नता की परवाह  किये बिना  अबाध रूप से उपलब्ध है जो इस बात का कोई ध्यान नहीं रखती की किसी व्यक्ति की उम्र क्या है, उसकी परिपक्वता का स्तर क्या है, उसकी जरूरत क्या है, उसका मानसिक स्तर क्या है या उसकी प्राथमिकता क्या है। मजबूत पारिवारिक मूल्यों और परम्परागत संस्कारों से दूर  होता हमारा समाज इसकी बड़ी कीमत अब चुकाने लगा है और इसका सबसे बड़ा असर  हमारे बच्चों पर पड़ रहा है । पांच वर्ष के बच्चों से लेकर तरुण होते युवा  फेसबुक, मैसेंजर और व्हाट्सएप  के विभिन्न टूल और तकनीक के माध्यम से समस्त लौकिक ज्ञान एक झटके में  प्राप्त कर ले रहे हैं, जो उनके अंदर उत्तेजना तो पैदा कर रहा है परंतु साथ ही उन्हें शीघ्र ही निराशा के गर्त में भी पहुंचा दे रहा हैं। बार-बार स्टेटस चेक करना तथा  मन में सदैव यह  भाव बने रहना  कि पता नहीं क्या नया घटित हुआ होगा, यह कार्य मानसिक रूप से आम लोगों को भी कमजोर बना रहा है। परिपक्व व्यक्ति को आभासी और यथार्थ  दुनिया की समझ हो सकती है  परंतु बच्चे जो यथार्थ की जिंदगी पर अभी चले ही नहीं है  उन पर खतरा कई गुना ज्यादा बढ़ गया है ।

सोशल मीडिया पर अपने आपको अलग तरह से दिखाने की ललक ने ज्यादातर  बच्चों में दिखावे की प्रकृति को बहुत हद तक  बढ़ावा दिया है। हवा में तैरती सर्व सुलभ अश्लीलता का सम्मोहन बच्चों और किशोरों के मेरुदंड को सीधे क्षत-विक्षत कर रहा है जिससे वह अपना बचपना भी खोते जा रहे हैं ।

सोशल मीडिया पर एक गजब की मृग मरीचिका जिसमें प्रेम, संवेदनाऔर चेतना का आभास होते हुए भी  ठोस वास्तविकता के धरातल पर ज्यादातर मामलों में कुछ भी हाथ नहीं लगता और अंत में आपके साथ वही लोग रह जाते हैं जो कि वास्तविक जीवन में भी आपके शुभेच्छु और मित्र हैं।

नवविकासवाद और घटिया उपभोक्तावाद पर सवार चतुर नव साम्राज्यवादी ताकतें सोशल  मीडिया के माध्यम से आम लोगों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और बहुत हद तक आचार और व्यवहार को भी परिवर्तित करने में कामयाब होती हुई दिख रही है , जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर व्यापक रूप से पड़ेगा । इस बात को मानने में कोई गुरेज नहीं है सोशल मीडिया वर्तमान का अपरिहार्य तत्व है, इसलिए सोशल मीडिया द्वारा उत्पन्न होने वाली विभिन्न प्रकार के सम्मोहन,लत और बीमारियों का समाधान परिवार और समाज के स्तर पर जागरूकता के द्वारा ही हो सकता है। परिवार के स्तर पर पहले अभिभावकों को स्वयं जागरूक होना होगा और उसके बाद बच्चों में भी जागरूकता  उत्पन्न करनी होगी की सोशल मीडिया का प्रयोग कितना और किस प्रकार से किया जाए। यही कार्य स्कूल और कॉलेज स्तर पर सोशल मीडिया के गुण-दोष, वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता और आवश्यकता विषय पर वर्कशॉप आयोजित करके भी किया जाना आवश्यक है।

(लेखक बरेली कॉलेज, बरेली के विधि विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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