NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
#सोशल_मीडिया : क्या नरेंद्र मोदी की आलोचना से फेसबुक को डर लगता है?
नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के फेसबुक अकाउंट कौन ब्लॉक कर देता है?
सिरिल सैम, परंजॉय गुहा ठाकुरता
02 Feb 2019
सांकेतिक तस्वीर

भारत में कई पत्रकार और मीडिया संस्थान फेसबुक पर यह आरोप लगाते हैं कि उनकी खबरों को जानबूझकर इस प्लेटफॉर्म पर रोका जाता है। कई पत्रकारों का यह भी कहना है कि कुछ मौकों पर उन्हें अपने फेसबुक अकाउंट में लॉग इन ही नहीं करने दिया जाता। 

जिन पत्रकारों के साथ फेसबुक ने ऐसा किया, उन सबमें एक बात समान है। ये सभी लोग सत्ताधारी पार्टी और मोदी सरकार के विरोध में लिख रहे थे। इनमें ‘जनता का रिपोर्टर’ के रिफत जावेद, ‘जनज्वार’ की प्रेमा नेगी और अजय प्रकाश, ‘कारवां डेली’ के कई पत्रकार और ‘बोलता हिंदुस्तान’ के पत्रकार शामिल हैं।

रिफत जावेद पहले बीबीसी में काम करते थे। 27 सितंबर को फेसबुक ने उन्हें अपने खाते में लॉग इन नहीं करने दिया। उन्होंने कोलकाता से निकलने वाले अखबार दि टेलीग्राफ को बताया कि ‘जनता का रिपोर्टर’ के फेसबुक पेज को 2017 में तब प्रतिबंधित कर दिया गया जब इस वेबसाइट ने रफ़ाल लड़ाकू विमान सौदे से संबंधित विवादों की खबर प्रकाशित की।

अपने ही फेसबुक खाते में प्रवेश प्रतिबंधित किए जाने के बारे में जावेद ने दि टेलीग्राफ के फिरोज एल. विंसेंट को बताया, ‘27 सितंबर को जब मैंने सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या मसले पर आए निर्णय के बाद कुछ लिखा तो कुछ ही मिनटों के अंदर फेसबुक ने मेरा खाता निष्क्रिय कर दिया। जब मैंने नोडल अधिकारी को लिखा तब एक दिन बाद जाकर मेरा खाता फिर से चालू किया गया।’ 

कारवां डेली और जनज्वार जैसे पोर्टल के अधिकांश पाठक फेसबुक के जरिये आते हैं। इन पर इस तरह की पाबंदियों का खास असर पड़ता है। 1 अक्टूबर, 2018 को कारवां डेली की पांच खबरों को फेसबुक ने स्पैम में डाल दिया। आम बोलचाल की भाषा में समझें तो इंटरनेट जगत में किसी सामग्री को स्पैम में डालने का मतलब यह होता है कि वह किसी काम की नहीं है। 

इन पांच खबरों में से एक खबर सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा की रिहाई से संबंधित थी। उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर रिहा किया गया था। प्रेमा नेगी और अजय प्रकाश कहते हैं, ‘जब हम 4 अक्टूबर को जगे तो हमें पता चला कि हमारे दोनों निजी फेसबुक खाते कंपनी ने बंद कर दिए हैं। अपने बंद किए गए खाते को दोबारा शुरू कराने के लिए हमसे एक बार से अधिक पहचान के सबूत मांगे गए।’

इसे भी पढ़ें : #सोशल_मीडिया : क्या फेसबुक सत्ताधारियों के साथ है?

बोलता हिंदुस्तान के पांच कर्मचारियों के फेसबुक खातों को भी फेसबुक ने बंद कर दिया। विंसेंट ने जब इस बारे में फेसबुक इंडिया के कम्युनिकेशन प्रमुख अमृत आहुजा की प्रतिक्रिया मांगी तो कहा गया कि 48 घंटे में जवाब भेजा जाएगा। लेकिन 8 अक्टूबर, 2018 को दि टेलीग्राफ की अपनी खबर में विंसेंट ने लिखा है कि 48 घंटे में जवाब देने की बात कहने के बावजूद फेसबुक की ओर से इस संबंध में कोई जवाब नहीं आया। इससे एक संकेत यह मिलता है कि फेसबुक कंपनी इन मामलों में कुछ छिपाने की कोशिश कर रही है।

इसे भी पढ़ें : #सोशल_मीडिया : क्या व्हाट्सऐप राजनीतिक लाभ के लिए अफवाह फैलाने का माध्यम बन रहा है?

Social Media
#socialmedia
Facebook India
#Facebook
Real Face of Facebook in India
Modi government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

ज्ञानवापी विवाद, मोदी सरकार के 8 साल और कांग्रेस का दामन छोड़ते नेता


बाकी खबरें

  • Sudan
    पवन कुलकर्णी
    कड़ी कार्रवाई के बावजूद सूडान में सैन्य तख़्तापलट का विरोध जारी
    18 Jan 2022
    सुरक्षा बलों की ओर से बढ़ती हिंसा के बावजूद अमेरिका और उसके क्षेत्रीय और पश्चिमी सहयोगियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र भी बातचीत का आह्वान करते रहे हैं। हालांकि, सड़कों पर "कोई बातचीत नहीं, कोई समझौता…
  • CSTO
    एम. के. भद्रकुमार
    कज़ाख़िस्तान में पूरा हुआ CSTO का मिशन 
    18 Jan 2022
    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बुधवार को क्रेमलिन में रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु के साथ कज़ाख़िस्तान मिशन के बारे में कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीट ऑर्गनाइजेशन की “वर्किंग मीटिंग” के बाद दी गई चेतावनी…
  • election rally
    रवि शंकर दुबे
    क्या सिर्फ़ विपक्षियों के लिए हैं कोरोना गाइडलाइन? बीजेपी के जुलूस चुनाव आयोग की नज़रो से दूर क्यों?
    18 Jan 2022
    कोरोना गाइडलाइंस के परवाह न करते हुए हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी तरह से प्रचार में जुटे हैं, ऐसे में विपक्षी पार्टियों पर कई मामले दर्ज किए जा चुके हैं लेकिन बीजेपी के चुनावी जुलूसों पर अब भी कोई बड़ी…
  • Rohit vemula
    फ़र्रह शकेब
    स्मृति शेष: रोहित वेमूला की “संस्थागत हत्या” के 6 वर्ष बाद क्या कुछ बदला है
    18 Jan 2022
    दलित उत्पीड़न की घटनायें हमारे सामान्य जीवन में इतनी सामान्य हो गयी हैं कि हम और हमारी सामूहिक चेतना इसकी आदी हो चुकी है। लेकिन इन्हीं के दरमियान बीच-बीच में बज़ाहिर कुछ सामान्य सी घटनाओं के प्रतिरोध…
  • bank
    प्रभात पटनायक
    पूंजीवाद के अंतर्गत वित्तीय बाज़ारों के लिए बैंक का निजीकरण हितकर नहीं
    18 Jan 2022
    बैंकों का सरकारी स्वामित्व न केवल संस्थागत ऋण की व्यापक पहुंच प्रदान करता है बल्कि पूंजीवाद की वित्तीय प्रणाली की स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License