NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
#सोशल_मीडिया : क्या फेसबुक सत्ताधारियों के साथ है?
अमित शाह पर चुनाव आयोग को अपने हलफनामे में गलत जानकारियां देने का आरोप लगाने वाली खबर कैसे रोकी गई।
सिरिल सैम, परंजॉय गुहा ठाकुरता
31 Jan 2019
सांकेतिक तस्वीर

ये आरोप अक्सर लगते हैं कि नरेंद्र मोदी के समर्थक ऑनलाइन माध्यमों के जरिये गलत सूचनाएं फैलाते हैं। उन पर यह भी आरोप है कि कई बार वे यह काम कंटेंट मार्केटिंग कंपनियों के साथ मिलकर करते हैं।

दूसरी तरफ कुछ मीडिया संस्थानों और पत्रकारों की यह शिकायत है कि अगर वे सत्ताधारी पार्टी या केंद्र की मौजूदा सरकार की आलोचना करने वाली खबरें करते हैं तो उन्हें फेसबुक जानबूझकर दरकिनार करता है। इनका कहना है कि कई बार तो फेसबुक सेंसर यानी काट-छांट का काम भी करता है। इसे कुछ उदाहरणों के जरिए समझा जा सकता है।

दिल्ली प्रेस की एक प्रतिष्ठित पत्रिका है कारवां। इसकी वेबसाइट भी लोकप्रिय है। 10 अगस्त, 2018 को कारवां ने फेसबुक पर एक ऐसी खबर बूस्ट करने की कोशिश की जिसमें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह पर सवाल उठाए गए थे। फेसबुक पर कोई भी खबर या पोस्ट बूस्ट करने का मतलब यह होता है कि आप फेसबुक को अपने लक्षित पाठक वर्ग तक पहुंचने के लिए पैसे देते हैं और फेसबुक उन लोगों को आपकी खबर का लिंक दिखाने लगता है। बूस्ट के कारोबार के जरिये फेसबुक कंपनी काफी पैसे कमाती है।

कारवां की अमित शाह से संबंधित स्टोरी में यह दावा किया गया था कि शाह ने चुनाव आयोग के सामने जो हलफनामा दिया है उसमें अपनी संपत्तियों और देनदारियों से संबंधित जानकारियां गलत हैं। कारवां इस खबर को फेसबुक पर बूस्ट करना चाह रहा था।

फेसबुक पर कोई भी स्टोरी आप तब ही बूस्ट कर सकते हैं जब फेसबुक इसकी अनुमति दे। कारवां की इस खबर के लिए फेसबुक ने 11 दिनों के बाद मंजूरी दी। तब तक इस खबर का महत्व कम हो चुका था क्योंकि तब तक खबरों का चक्र आगेबढ़ गया था।

इस बारे में जब हमने कारवां के कार्यकारी संपादक विनोद के. जोस से जानना चाहा तो उन्होंने ईमेल के जरिए भेजे जवाब में बताया, ‘हमारे लिए यह हैरान करने वाली घटना थी। 10 अगस्त को हमारी विशेष रिपोर्ट को फेसबुक ने बूस्ट नहीं करने दिया। हमारी इस खास खबर में यह बताया गया था कि कैसे अमित शाह ने चुनावी हलफनामे में अपनी कर्ज की देनदारियों को छुपाया है। फेसबुक पर कारवां का वेरिफाइड अकाउंट है। पहले भी हम फेसबुक के साथ मिलकर कुछ सार्वजनिक कार्यक्रम कर चुके हैं।’

जोस ने बताया कि उनकी डिजिटल मार्केटिंग टीम कई दिनों तक फेसबुक के जवाब का इंतजार करती रही। लेकिन फेसबुक की ओर से कोई जवाब नहीं आया।

जोस कहते हैं, ‘इसके बाद हमारे मन में संदेह पैदा हुआ। हमने अपने एक रिपोर्टर को इस बारे में पता लगाने के लिए कहा। हमारे रिपोर्टर ने भारत में फेसबुक के जनसंपर्क के प्रभारी अधिकारी से संपर्क किया। इसके बावजूद कोई जवाब नहीं मिला। वेबसाइट पर खबर प्रकाशित होने के 11 दिनों के बाद फेसबुक ने खबर बूस्ट करने की मंजूरी दी। तब तक इस खबर की असर डालने की क्षमता खत्म हो गई थी।’

21 अगस्त को कारवां को ईमेल पर फेसबुक का ये जवाब मिला, ‘हमने आपके विज्ञापन की फिर से समीक्षा की और यह पाया है कि ये हमारी नीतियों के अनुरूप है। आपके विज्ञापन को अनुमति दी जाती है। अब आपका विज्ञापन प्रकाशित कर दिया गया है और जल्दी ही लोगों तक पहुंचना शुरू हो जाएगा। आप इसके परिणाम फेसबुक एड्स मैसेंजर में देख सकते हैं।’

जोस इस बात पर हैरानी जताते हैं कि अगर 21 अगस्त को फेसबुक को कारवां की खबर में कुछ गलत नहीं लगा तो फिर फेसबुक ने 11 दिनों तक इस खबर को क्यों रोके रखा।

कारवां के रिपोर्टर तुषार धारा ने इस मसले को अमेरिका में फेसबुक के मुख्यालय के समक्ष भी ईमेल के जरिए उठाया। लेकिन दस दिनों तक उनके सवालों का जवाब फेसबुक की ओर से नहीं दिया गया।

व्यंग्य भरे लहजे में जोस कहते हैं, ‘फेसबुक को यह तय करना होगा कि उसे भारतीय इतिहास में किस तरह दर्ज होना है। उसे यह तय करना होगा कि लोकतंत्र में सूचनाओं के बगैर रोक-टोक के प्रवाह को बढ़ावा देने वाले चैनल के तौर पर लोग उसे याद रखें या फिर सूचनाओं की पहरेदारी करने वाले और इन्हें रोकने वाले माध्यम के रूप में।’

वे बताते हैं, ‘अमेरिका में फेसबुक ने 20 लोगों को इस काम पर लगा रखा था कि वे वहां की मध्यावधि चुनाव के दौरान फेसबुक पर आने वाली सामग्री पर नजर रखें। भारत अमेरिका से पांच गुना बड़ा लोकतंत्र है। जब आने वाले दिनों में भारत में चुनाव होंगे तो क्या फेसबुक भारत में 100 लोगों की टीम इस निगरानी के काम के लिए लगाएगा? दो अलग-अलग लोकतांत्रिक देशों के लिए कंपनियों के दो अलग-अलग मानक नहीं होने चाहिए।’

इसे भी पढ़ें : #सोशल_मीडिया : क्या व्हाट्सऐप राजनीतिक लाभ के लिए अफवाह फैलाने का माध्यम बन रहा है?

Social Media
#socialmedia
#Facebook
Real Face of Facebook in India
Narendra modi
Amit Shah
BJP
caravan

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • जितेन्द्र कुमार
    बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!
    04 Apr 2022
    आरएसएस-बीजेपी की मौजूदा राजनीतिक तैयारी को देखकर के अखिलेश यादव को मुसलमानों के साथ-साथ दलितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी यादवों के कंधे पर डालनी चाहिए।
  • एम.ओबैद
    बिहारः बड़े-बड़े दावों के बावजूद भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम नीतीश सरकार
    04 Apr 2022
    समय-समय पर नीतीश सरकार भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलेरेंस नीति की बात करती रही है, लेकिन इसके उलट राज्य में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होती जा रही हैं।
  • आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक:  ‘रोज़गार अभियान’ कब शुरू होगा सरकार जी!
    04 Apr 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को ‘स्कूल चलो अभियान’ की शुरुआत की। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा पे चर्चा की थी। लेकिन बेरोज़गारी पर कोई बात नहीं कर रहा है।…
  • जगन्नाथ कुमार यादव
    नई शिक्षा नीति, सीयूसीईटी के ख़िलाफ़ छात्र-शिक्षकों ने खोला मोर्चा 
    04 Apr 2022
    बीते शुक्रवार को नई शिक्षा नीति (एनईपी ), हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी (हेफ़ा), फोर ईयर अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUP),  सेंट्रल यूनिवर्सिटी कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (सीयूसीईटी) आदि के खिलाफ दिल्ली…
  • अनिल सिन्हा
    नेहरू म्यूज़ियम का नाम बदलनाः राष्ट्र की स्मृतियों के ख़िलाफ़ संघ परिवार का युद्ध
    04 Apr 2022
    सवाल उठता है कि क्या संघ परिवार की लड़ाई सिर्फ़ नेहरू से है? गहराई से देखें तो संघ परिवार देश के इतिहास की उन तमाम स्मृतियों से लड़ रहा है जो संस्कृति या विचारधारा की विविधता तथा लोकतंत्र के पक्ष में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License