NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सरकार को बढ़ती बेरोजगारी पर कोई चिंता नहीं
सीएमआईई के मुताबिक बेरोजगारी 78 सप्ताह के उच्चतम स्तर पर है जबकि सरकार के ऑनलाइन पोर्टल पर 8.6 लाख रिक्त नौकरियों के लिए 4.2 करोड़ पंजीकृत रोज़गार चाहने वाले हैं।
सुबोध वर्मा
20 Apr 2018
बेरोज़गारी

बेरोजगारी में हजारों घाव वाली मौत है, और भारत को इस मौत लाखों बार भुगतना पड़ता है। हाल ही में जारी आंकड़ों के दो हिस्सों से पुष्टि होती हैं जोकि सभी जानते हैं - कोई नौकरियां नहीं हैं और अधिक से अधिक लोग सड़कों पर इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मोदी सरकार द्वारा हर चीज़ को डिजिटल पोर्टल में बदलने की लगन सत्य है, एक उसने नौकरी तलाशने वालों और नौकरी की रिक्तियों के लिए एक बनाया जो राष्ट्रीय करियर सेवा पोर्टल कहलाता है। इस पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, तीन साल 2015-16 से 2017-18 में, कुछ 861,391 नौकरी की रिक्तियों को लगया गया था, जबकि नौकरी खोजने वालों की संख्या 4.2 करोड़ थी।

ये सही आंकड़े नहीं हैं। सभी लोग रोज़गार एक्सचेंजों या ऑनलाइन पोर्टल पर पंजीकरण नहीं करते हैं। और न ही सभी नियोक्ता कर्मचारियों की तलाश करने वाले आवेदन डिजिटल करते हैं। इससे पता चलता है कि वास्तविक दुनिया में क्या हो रहा है यह इसका एहसास देता है - प्रत्येक नौकरी पर 50 लोग आवेदन का रहे हैं। नौकरियों की ख़राब स्थिति के अलावा यह दिखाता है कि इस बेरोज़गारी की वजह से मजदूरी भी कम दी जा रही है। नियोक्ता मजदूरी दरों को मनमाने ढंग से तय करते हैं और उन लोगों को काम पर रखते हैं जो इतनी कम मजदूरी से सहमत हैं क्योंकि नौकरियों की तलाश में बहुत से युवक बेताब हैं और मारे-मारे फिर रहे हैं।

यहां डेटा का एक और सेट है। नवीनतम सीएमआईई अनुमानों से पता चलता है कि इस साल अप्रैल के पहले पखवाड़े में बेरोजगारी 7.25 प्रतिशत तकपहुंचा गयी है। ये शुरुआती साप्ताहिक अनुमान हैं और एक महीने में थोड़ा और नीचे जा सकता है, लेकिन फिर भी, यह 78 सप्ताह में उच्चतम स्तर है।

भारत में हर महीने श्रम शक्ति में लगभग 13 लाख लोग शामिल होते हैं। यह हर साल करीब 1.56 करोड़ का आंकड़ा बैठता है। फिर भी 2017 में नई नौकरी के निर्माण की दर मात्र 1 प्रतिशत से भी कम हो गई थी। दरअसल, श्रम शक्ति लगभग 44 करोड़ से घटकर 42 करोड़ हो गयी। ये दिमाग हिलाने वाले नंबर हैं और अकल्पनीय अनुपात की त्रासदी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

पिछले चार वर्षों में मोदी की सरकार की नए रोज़गार सृजन के मामले में सिर्फ उसकी अक्षमता ही नहीं देखी गई बल्कि नौकरियाँ पैदा करने के जुमले लगातार कभी इस परियोजना में इतने लाखों र्प्ज्गार होंगे से आश्वस्त करना और कभी कहना उस कार्यक्रम में बहुत से लोग को रोज़गार मिलेगा। उदाहरण के लिए, वित्त मंत्री जेटली ने अपने पिछले बजट भाषण में बड़े आराम से घोषणा की कि इस वर्ष 70 लाख नौकरियां पैदा होंगी। मगर कैसे? न तो वे जानते हैं और न कोई और जानता है।

औद्योगिक विकास, निवेश दर असल स्थिर हो रहा है, ग्रामीण रोजगार सृजन ख़राब स्थिति में है और ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत रोज़गार तालाशने के लिए लोगों की रिकॉर्ड संख्या जा रही है, निर्यात कम हो गया है - वास्तविक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ गई है, फिर जीडीपी या स्टॉक एक्सचेंज डेटा कुछ भी इससे फर्क नहीं पड़ता है I

इस दर्द को और अधिक तीव्रता से महसूस किया गया है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। यूपीए सरकार के तहत रोजगाररहित विकास के वर्षों के बाद, आशा की भावना जगी थी। लोगों ने बड़ी संख्या में मुख्य रूप से इस वादे से मुखातिब होकर वोट दिया था। उनके लिए फिर भी कुछ भी नहीं बदला है।

बल्कि, मोदी के नजरिए के तहत, भारत नौकरी से नुकसान की अर्थव्यवस्था में बदल गया है। आरबीआई की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, KLEMS डाटाबेस, भारत की रोजगार वृद्धि दर 2015-16 में 0.1% और 2016-17 में 0.2% की गिरावट आई है, हालांकि देश की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 7.4% और 8.2% की वृद्धि के बावजूद, उन वर्षों में क्रमशः विनिर्माण क्षेत्र के कृषि, खनन और उप क्षेत्र जैसे कई क्षेत्रों में श्रमिक विकास दर में गिरावट आई है।

काम की स्थितियों में भी सरकार में भारी गिरावट आई है। उन्होंने हाल ही में घोषित किया कि निश्चित अवधि के रोजगार सभी प्रकार के उद्योगों में कानूनी तौर पर अनुमत होंगे। इसका मतलब है कि अस्थायी या संविदात्मक कार्य अब आधिकारिक रूप से अनुमोदित हो गए है, जिससे नियोक्ताओं को नौकरी पर लेने और उन्हें नौकरी से हटाने के अनचाहे अधिकार दे दिए हैं।

चूंकि मोदी का कार्यकाल 2019 में खत्म हो रहा है, इसलिए लोग एक नए रास्ते का इंतजार कर रहे हैं जो अत्यधिक बेरोजगारी और जीवन स्तर में गिरावट से संबंधित है।

unemployment
BJP
बेरोज़गारी
नौकरी

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • जितेन्द्र कुमार
    मुद्दा: बिखरती हुई सामाजिक न्याय की राजनीति
    11 Apr 2022
    कई टिप्पणीकारों के अनुसार राजनीति का यह ऐसा दौर है जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिकी और देश-समाज की बदहाली पर राज करेगा। लेकिन विभिन्न तरह की टिप्पणियों के बीच इतना तो तय है कि वर्तमान दौर की राजनीति ने…
  • एम.ओबैद
    नक्शे का पेचः भागलपुर कैंसर अस्पताल का सपना अब भी अधूरा, दूर जाने को मजबूर 13 ज़िलों के लोग
    11 Apr 2022
    बिहार के भागलपुर समेत पूर्वी बिहार और कोसी-सीमांचल के 13 ज़िलों के लोग आज भी कैंसर के इलाज के लिए मुज़फ़्फ़रपुर और प्रदेश की राजधानी पटना या देश की राजधानी दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों का चक्कर काट…
  • रवि शंकर दुबे
    दुर्भाग्य! रामनवमी और रमज़ान भी सियासत की ज़द में आ गए
    11 Apr 2022
    रामनवमी और रमज़ान जैसे पर्व को बदनाम करने के लिए अराजक तत्व अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, सियासत के शह में पल रहे कुछ लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगे हैं।
  • सुबोध वर्मा
    अमृत काल: बेरोज़गारी और कम भत्ते से परेशान जनता
    11 Apr 2022
    सीएमआईए के मुताबिक़, श्रम भागीदारी में तेज़ गिरावट आई है, बेरोज़गारी दर भी 7 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा ही बनी हुई है। साथ ही 2020-21 में औसत वार्षिक आय भी एक लाख सत्तर हजार रुपये के बेहद निचले स्तर पर…
  • JNU
    न्यूज़क्लिक टीम
    JNU: मांस परोसने को लेकर बवाल, ABVP कठघरे में !
    11 Apr 2022
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दो साल बाद फिर हिंसा देखने को मिली जब कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संबद्ध छात्रों ने राम नवमी के अवसर कैम्पस में मांसाहार परोसे जाने का विरोध किया. जब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License