NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सरकार को हुज़ूर नहीं जी हुज़ूर जज चाहिए
कांग्रेस राज के समय न्यायपालिका में हस्तक्षेप की दुहाई देकर मौजूदा सरकार अपने हस्तक्षेप पर पर्दा डाल रही है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
27 Apr 2018
Supreme Court

सरकार को हुज़ूर नहीं जी हुज़ूर जज चाहिए, सुप्रीम कोर्ट की घटनाओं को ग़ौर से देखिए

क्या आप सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच जो कुछ चल रहा है, उसे बारीकी से देख रहे हैं? जो भी ख़बरें छप रही हैं, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार करने वाली हैं। कांग्रेस राज के समय न्यायपालिका में हस्तक्षेप की दुहाई देकर मौजूदा सरकार अपने हस्तक्षेप पर पर्दा डाल रही है। यह सरकार इसलिए नहीं है कि कांग्रेस के गुनाहों को दोहराती रहे। क्या जजों की नियुक्ति के मामले में मोदी सरकार ने कोई अलग नैतिक पैमाना कायम किया है? सुप्रीम कोर्ट के चार मुख्य न्यायाधीशों और चार पूर्व जजों ने जजों की नियुक्ति के मामले में सरकार के हस्तक्षेप को लेकर चिन्ता जताई है। ये सभी जज कांग्रेस के महाभियोग के प्रस्ताव को खारिज भी कर चुके हैं। इनका सवाल है कि चीफ जस्टिस मिश्रा ने कोलेजियम के प्रस्ताव को ठुकराने की अनुमति सरकार को कैसे दे दी है?

पूर्व चीफ जस्टिस आर एम लोढा ने कहा है कि सरकार ने कोलेजियम द्वारा भेजे गए नामों में पसंद के आधार पर चुन कर स्वीकृति देकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला कर दिया है। उत्तराखंड हाई कोर्ट जस्टिस के एम जोसेफ का नाम अलग कर दिया, उनके नाम पर अभी तक सहमति नहीं दी है और कोलेजियम के भेजे दूसरे नाम इंदु मल्होत्रा पर सहमति जताई है, यह ठीक नहीं है। ऐसा करके सरकार ने भविष्य में कुछ जजों के चीफ जस्टिस बनने की संभावना को ठुकरा दिया है। कोलेजियम द्वारा भेजी गई फाइल पर हफ्तों बैठे रहना और उसके बाद एक नाम को छोड़ एक पर सहमति भेजना कोई नया खेल खेला जा रहा है।

जस्टिस आर एम लोढा ने कहा है कि ऐसी स्थिति में चीफ जस्टिस मिश्रा को तुरंत कोलेजियम की बैठक बुलाकर सरकार से बात करनी चाहिए। जस्टिस लोढा ने कहा कि चीफ जस्टिस भी फाइल पर अनिश्चितकाल के लिए बैठे नहीं रह सकते हैं और न ही सरकार। चीफ जस्टिस को अभी और तुरंत अपनी दावेदारी करनी चाहिए। परंपरा यही है कि सरकार कोलेजियम के भेजे गए नामों में से पसंद के आधार पर नहीं छांट सकती है। मगर जस्टिस लोढा के कार्यकाल में भी सरकार ने एक नाम को अलग किया था। एक्सप्रेस की सीमा चिश्ती ने अपनी रिपोर्ट में यह लिखा है। जस्टिस लोढा ने याद करते हुए कि जब वे बाहर थे तब सरकार ने बिना उनकी जानकारी के गोपाल सुब्र्हमण्यम को अलग कर दिया था। उनके जज बनाए जाने को मंज़ूरी नहीं दी थी ।

जस्टिस लोढा ने कहा कि यह बहुत ग़लत था, मैंने तुरंत कानून मंत्री को पत्र लिखा कि फिर से ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी चीफ जस्टिस के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। जस्टिस लोढा ने कहा कि हम इसे अंजाम तक ले जाते मगर गोपाल सुब्रमण्यम ने ही अपना नाम वापस ले लिया था।

पूर्व जस्टिस टी एस ठाकुर ने भी जस्टिस के एम जोसेफ का प्रमोशन रोकने को दुर्भाग्यपूर्ण कहा है। इसके अलावा दो और पूर्व चीफ जस्टिस और चार पूर्व जजों ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर एक्सप्रेस की सीमा चिश्ती से कहा है कि वे इस बात पर सहमत हैं कि चीफ जस्टिस मिश्रा को तुरंत सरकार से इस बारे में संवाद कायम करना चाहिए। तीन महीने हो गए हैं और अभी तक चीफ जस्टिस ने ऐसा कुछ नहीं किया है, इसे लेकर वे चिन्तित हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस ए पी शाह ने कहा है कि धीर धीरे कोलेजियम पर हमला बढ़ता जा रहा है। मैं हैरान हूं कि चीफ जस्टिस ने भरी अदालत में कहा कि जस्टिस के एम जोसेफ की फाइल लौटा देने में कुछ भी ग़लत नहीं है।

आप जानते हैं कि जस्टिस के एम जोसेफ ने उत्तराखंड में असंवैधानिक तरीके से राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के फैसले को पलट दिया था। अरुणाचल प्रदेश में भी इसी तरह 26 जनवरी की आधी रात को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, वह भी तो अदालत में नहीं टिक सका। मोदी लहर में जनता इन घटनाओं पर ध्यान नहीं दे रही थी, उसे अभी भी लग रहा है कि संविधान की धज्जियां तो कांग्रेस के शासन में उड़ती थीं, अब नहीं। वह नहीं देख पा रही है कि उसकी आंखों के सामने क्या हो रहा है। अब सबकी नज़र इस बात पर है कि क्या चीफ जस्टिस मिश्रा के बाद जस्टिस रंजन गोगोई को चीफ जस्टिस की कुर्सी मिलेगी? वरिष्ठता क्रम में उन्हीं का नंबर है। उस दिन तय हो जाएगा कि सरकार सिर्फ इरादा ही नहीं रखती है, इरादे में कामयाब भी हो चुकी है। आप जब पूछेंगे तो यही कहेगी कि कांग्रेस हमें लेक्चर न दें। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अपना रिकार्ड देखे। आप की गर्दन दूसरी दिशा में मुड़ जाएगी और इस तरह आप जो हो रहा है वो नहीं देखेंगे। दुखद है।

10 सितंबर 2017 को केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक ट्विट किया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार मोबाइल नंबर को आधार से लिंक कराना होगा। कई न्यूज़ संगठनों ने ऐसी ख़बरें दिखाई हैं कि मोबाइल सिम को आधार से लिंक करना अनिवार्य है और यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। मगर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सरकार के इस झूठ की पोल खुल गई। आधार की सुनवाई कर रहे बेंच के जजों में से एक जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने UIDAI के वकील राकेश द्विवेदी से पूछा कि सुप्रीम कोर्ट ने कब आदेश दिया है तब वकील साहब सकपका गए। पहले सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया कि कोर्ट ने ही कहा है कि सिम कार्ड को वेरीफाई कराना है मगर आधार से लिंक करने का आदेश तो उसमें था नहीं। अंत में उन्हें यह स्वीकार कर लेना पड़ा कि यह सही नहीं है और सरकार मिसगाइड कर रही थी यानी लोगों को भटका रही थी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का नाम लेकर देश से झूठ बोलने पर रविशंकर प्रसाद के साथ क्या किया जाना चाहिए? क्या उन्हें नैतिकता के आधार पर इस्तीफा नहीं देना चाहिए? संविधान की शपथ लेने वाला मंत्री अगर इस तरह से झूठ बोले तो उसकी नैतिकत जवाबदेही क्या ये है कि कांग्रेस के राज में भी मंत्री इस तरह की हरकत करते थे। रविशंकर प्रसाद के हर बयान को देखिए, लगता है कि अपनी फाइल कम पढ़ते हैं, कांग्रेस की फाइल दिन रात रटते रहते हैं। हिन्दी के अख़बारों में ऐसी ख़बरें छपती भी नहीं हैं। जनता को पता भी नहीं होता है। लेकिन क्या आपको लगता है कि मंत्री और सरकार की यह हरकत नैतिक और संवैधानिक है?

supreme court judges
Congress
Supreme Court

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

हार्दिक पटेल भाजपा में शामिल, कहा प्रधानमंत्री का छोटा सिपाही बनकर काम करूंगा

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

ED के निशाने पर सोनिया-राहुल, राज्यसभा चुनावों से ऐन पहले क्यों!

ईडी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी को धन शोधन के मामले में तलब किया

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

राज्यसभा चुनाव: टिकट बंटवारे में दिग्गजों की ‘तपस्या’ ज़ाया, क़रीबियों पर विश्वास


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License