NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
शरणार्थी संकट और उन्नत पश्चिमी दुनिया
प्रभात पटनायक
07 Oct 2015

जिस ‘‘शरणार्थी संकट’’ ने इस समय यूरोप को घेर रखा लगता है, उसके मामले में वास्तव में एक ही बात नयी है कि इतिहास में यह पहला ही मौका है जब ‘‘बाहरी इलाकों’’ के जनगणों पर साम्राज्यवाद द्वारा ढहायी गयी त्रासदियों के दुष्परिणाम, ‘‘शरणार्थियों’’ के रूप में खुद विकसित दुनिया के देशों के दरवाजे तक पहुंच गए हैं। चाहे बीसवीं सदी के आरंभ में फिलीपीन्स पर अमरीका की विजय हो, जिसमें ढाई लाख फिलीपीनी मारे गए थे या इससे भी पहले दुनिया भर में ब्रिटेन, फ्रांस तथा हॉलेंड की औपनिवेशिक विजयें हों या फिर अपेक्षाकृत हाल के कोरियाई या वियतनामी युद्घ हों, इनमें से तो किसी भी मामले में ‘‘शरणार्थियों’’ की बाढ़, उन्नत पश्चिमी देशों के तटों तक नहीं पहुंची थी। इन ‘‘बाहरी इलाकों’’ पर साम्राज्यवाद द्वारा ढहायी गयी मौत, कंगाली तथा अकालों को जो लोग खामोश रहकर झेल ही नहीं गए थे, इस आफत से बचने के लिए शरणार्थी बनकर भागे जरूर थे, लेकिन इन ‘‘बाहरी इलाकों’’ में ही पडऩे वाले पड़ौसी देशों में ही, न कि विकसित दुनिया तक। इस बार वे शरणार्थी बनकर विकसित दुनिया तक पहुंच रहे हैं और यह एक नया घटनाविकास है।

पलायन की दो अलग-अलग धाराएं

वास्तव में साम्राज्यवाद इसका हमेशा से खास ध्यान रखता आया है कि ‘‘बाहरी इलाकों’’ से, विकसित दुनिया की ओर आबादी का प्रवाह, मुस्त्तैदी से नियंत्रित किया जाए। पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान जहां 5 करोड़ योरपीय अपनी बस्तियां कायम करने के लिए दुनिया के अन्य समशीतोष्ण क्षेत्रों में गए थे, जहां उन्होंने मूलनिवासियों से जमीनें छीन कर अपनी बस्तियां बसायी थीं, तभी भारत तथा चीन जैसे ऊष्णकटिबंधीय या उप-ऊष्णकटिबंधीय देशों से 5 करोड़ मजदूरों को कुलियों या इंडेन्चर्ड लेबर के रूप में अन्य ऊष्णकटिबंधीय या उप-ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पहुंचाया गया था। बाद वाले आंकड़े में खदानों व बागानों में काम करने के अफ्रीका से पकड़ कर ले जाए गए गुलामों का आंकड़ा शामिल नहीं है। बहरहाल, इन बाद वाले मजदूरों को कभी भी इसकी स्वतंत्रता नहीं थी कि यूरोप में या गोरों द्वारा बसाए गए किसी भी समशीतोष्ण क्षेत्र में जाकर बस जाएं।

दूसरे शब्दों में पलायन या आबादी के तबादले की इन दो धाराओं को कड़ाई से अलग-अलग रखा गया था और यही बात, समकालीन विश्वीकरण के दौर में आज तक भी सही है। वास्तव में साम्राज्यवाद को अपनी मर्जी से कहीं भी हस्तक्षेप करने की, दुनिया भर पर तथा इसलिए तीसरी दुनिया पर अपनी मर्जी के हिसाब से वह जैसी चाहे व्यवस्था थोपने की जो खुली छूट मिली रही है, उसके पीछे यह पूर्वशर्त लगी रही है कि इस तरह के हस्तक्षेप से जो भी तबाहियां होंगी, तीसरी दुनिया तक ही सीमित रहेंगी। इन तबाहियों से संबंधित क्षेत्रों के आस-पड़ौस में भले ही उलट-पुलट हो, विकसित दुनिया के जनसांख्यिकीय, सामाजिक तथा राजनीतिक संतुलन में, वह जैसा भी हो, कोई खलल नहीं पड़ेगा। बहरहाल आज, पश्चिमी दुनिया में प्रवासन पर पाबंदियां अब भी बने रहने के बावजूद, उक्त पूर्व-शर्त हमले के दायरे में आ गयी है।

यूरोप के दरवाजे तक आयी साम्राज्यवादी तबाही

इसके कई कारण हैं। पहला तो यही कि अपेक्षाकृत हाल के वर्षों में साम्राज्यवाद ने अस्थिरता के जो मुख्य मैदान रचे हैं, उनमें से कुछ अगर खुद यूरोप में ही नहीं हैं, तब भी यूरोप से एकदम लगते हुए जरूर हैं। यूगोस्लाविया तो योरपीय देश ही था, जिसके टुकड़े कराने में, जर्मन साम्राज्यवाद का उल्लेखनीय हाथ रहा था। अचरज की बात नहीं है कि शरणार्थियों में काफी संख्या बाल्कान से आनेवालों की है, जो इस क्षेत्र में पैदा हो गयी गड़बड़ी से बचकर भागे हैं।

इसी प्रकार सीरिया, जहां से सबसे ज्यादा शरणार्थी आए हैं और जहां असद निजाम के खिलाफ पश्चिमी ताकतों ने हस्तक्षेप किया है, उस क्षेत्र का हिस्सा है जिसे किसी जमाने में ‘निकट पूर्व’ कहा जाता था। यही बात इराक पर भी लागू होती है, जोकि शरणार्थियों का एक और प्रमुख स्रोत है और जिसने बाकायदा साम्राज्यवादी हमला झेला है। लीबिया भी, जहां गद्दाफी निजाम के खिलाफ पश्चिमी हस्तक्षेप ने ही अव्यवस्था पैदा की है तथा यूरोप के लिए हजारों शरणार्थियों को भेजा है, योरपीय महाद्वीप से ज्यादा दूर नहीं है। वास्तव में अफगानिस्तान भी, जिसे पश्चिमी हस्तक्षेप का निशाना बनना पड़ा है तथा इसके चलते जबर्दस्त अस्थिरीकरण झेलना पड़ा है और जहां से भी बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी यूरोप पहुंचे हैं, योरपीय महाद्वीप से इतना ज्यादा दूर नहीं है।

संक्षेप में यह कि हाल के वर्षों के साम्राज्यवादी अस्थिरीकरण के मैदान, यूरोप से अपेक्षाकृत पास में हैं। इन क्षेत्रों से शरणार्थियों के प्रवाह का, लगते हुए इलाकों पर भी ‘‘बहुगुणनकारी प्रभाव’’ पड़ा है। ये ऐसे इलाके हैं जिन्होंने निकट अतीत में साम्राज्यवाद की सीधे दखलंदाजी भले न झेली हो, उस ‘‘विफल राज्य’’ सिंड्रोम के शिकार जरूर हैं, जो परोक्ष रूप से साम्राज्यवाद द्वारा ही तीसरी दुनिया के देशों में पैदा किया जा रहा है। यह किया जा रहा है इस क्षेत्र पर राजकोषीय कमखर्ची के जरिए, आर्थिक संकुचन तथा दूसरी ओर पूंजी के आदिम संचय की प्रक्रियाएं थोपने के जरिए और इस सबके साथ जुड़ी हुई इथनिक, धार्मिक या कबीलाई विभाजक राजनीति के प्रसार के  जरिए।

इस बाद वाले ग्रुप में, जिसे मैंने साम्राज्यवाद के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप वाले क्षेत्रों के आस-पड़ौस के इलाके से पलायन के ‘‘बहुगुणनकारी प्रभाव’’ का नाम दिया है, इरिट्रिआ जैसे देेश शामिल हैं, जहां अत्याधिक दमनकारी निजाम कायम हैं या फिर नाइजीरिया जैसे देश शामिल हैं, जो बोका हराम के गतिविधियों के चलते गृहयुद्घ के जैसे हालात झेल रहे हैं। इन दोनों देशों से भी शरणार्थी यूरोप पहुंच रहे हैं और इसके लिए वे अपने पड़ौसी देशों के शरणार्थियों के लिए खोले गए रास्तों का उपयोग कर रहे हैं।

अब तक जो होता आया था उससे भिन्न, अब विकसित पश्चिम की ओर लोगों के पलायन के दूसरे कारण का संबंध, वैश्वीकरण के अपने तर्क से है। वैश्वीकरण ने देशों के बीच आवाजाही को तकनीकी लिहाज से आसान बनाकर, दुनिया में भौगोलिक दूरियों को छोटा तो किया ही है, इसके साथ ही उसने चीजों को अंधाधुंध ढंग से माल में तब्दील किए जाने को भी प्रोत्साहित किया है। बाकी हर चीज की तरह, शरणार्थियों को इधर से उधर पहुंचाने की ‘सेवा क्षेत्र गतिविधि’ ने अब एक खरीदे-बेचे जा सकने वाले माल का रूप ले लिया है। इसीलिए, अचरज की बात नहीं है कि जिन दारुण हालात से बचने के लिए लोग भागना चाहते हैं, उन्हीं का फायदा उठाकर उन्हें यहां से वहां पहुंचाने को, एक बहुत ही मुनाफादेह तथा तेजी से बढ़ते कारोबार में तब्दील कर दिया गया है।

अब भी तीसरी दुनिया में है असली शरणार्थी संकट

फिर भी, आज भी यह सचाई बदली नहीं है कि साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के मैदानों से शरणार्थियों का पलायन, सबसे बढक़र तीसरी दुनिया के देशों की ओर ही केेंद्रित है। दूसरे शब्दों में, साम्राज्यवाद का बुनियादी ढांचा अब भी कायम है, जिसमें साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के दुष्परिणाम, तीसरी दुनिया को ही झेलने पड़ते हैं। फर्क सिर्फ इतना आया है कि इन दुष्परिणामों के तीसरी दुनिया में इस तरह सोखे जाने के अलावा, हालांकि अब भी प्रमुख सचाई यही है, अब विकसित दुनिया की ओर भी कुछ पलायन हो रहा है, जो इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

 मिसाल के तौर पर सीरिया में जारी लड़ाई के चलते, देश की आधी से ज्यादा आबादी ने पलायन किया बताते हैं, जिनमें से ज्यादातर अब भी अपने देश की सीमाओं से बाहर नहीं गए हैं। और सीरिया से जो लोग दूसरे देशों में गए हैं, उनमें से भी ज्यादातर ने तो लेबनान में ही शरण ली है। वास्तव में हालांकि लेबनान की अपनी आबादी 45 लाख की ही है, वहां पूरे 12 लाख सीरियाइयों ने शरण ले रखी है। इसके विपरीत, इस साल अगस्त के आरंभ तक यूरोप में पहुंचे शरणार्थियों की कुल संख्या सिर्फ 2 लाख थी (देखें, गार्जियन, 10 अगस्त), जो कि यूरोप की आबादी के 0.027 फीसद के बराबर ही बैठता है। यूरोप में और लेबनान में पहुंचे शरणार्थियों के पैमानों की तुलना करते हुए, गार्जियन ने टिप्पणी की थी: ‘‘एक ऐसे देश ने जो योरपीय यूनियन से सौ गुना छोटा है, यूरोप भविष्य में जितने शरणार्थियों का पुनर्वास करने पर विचार तक कर सकता है, उससे पचास गुना ज्यादा शरणार्थियों को तो स्वीकार भी कर लिया है। लेबनान के सामने शरणार्थी संकट है। यूरोप और खासतौर पर ब्रिटेन के सामने नहीं।’’

बहरहाल, हमारे दिमागों पर भी विकसित पश्चिम इस कदर हावी है कि लेबनान के सामने उपस्थित ‘‘शरणार्थी संकट’’ का तो कोई जिक्र तक नहीं हो रहा है, जबकि सारी दुनिया की नजरें यूरोप के ‘‘शरणार्थी संकट’’ पर ही लगी हुई हैं। यहां तक इसे बार-बार जो दूसरे विश्व युद्घ के बाद का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट कहा जा रहा है, उल्लेखनीय स्तर की यूरो-केंद्रीयता का ही सबूत है। हमारे अपने क्षेत्र में, 1947 में भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन के चलते, करोड़ों लोग शरणार्थी बनकर रह गए थे। पुन: 1971 में बांग्लादेश युद्घ के समय पर, दसियों लाख लोग अपने घरों से उजडक़र, शरणार्थी बनकर भारत आए थे। इन सभी मामलों में जिस पैमाने पर शरणार्थी बनकर लोगों का पलायन हुआ था, उसके सामने यूरोप के सामने आज आयी शरणार्थी समस्या का पैमाना तो बहुत छोटा है। इसके बावजूद, यूरोप के मौजूदा शरणार्थी संकट को जब दूसरे विश्व युद्घ के बाद का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट कहा जाता है, उक्त प्रकरणों को तो गिनती में ही नहीं लिया जाता है। संक्षेप में यह कि ‘‘शरणार्थी’’ तभी संकट बनते हैं, जब वे विकसित पश्चित के दरवाजे पर दस्तक देने लगते हैं।

शरणार्थी संकट के सामने विकसित यूरोप का रुख

स्वाभाविक रूप से यह सवाल सामने आ खड़ा होता है कि यूरोप, अपने इस ‘‘संकट’’ से किस तरह से निपटने जा रहा है? यूरोप में प्रगतिशील जनमत तो इन शरणार्थियों के प्रति उल्लेखनीय रूप से हमदर्दीपूर्ण रहा है, उनके प्रति इस जनमत का रुख साफतौर पर स्वागत करने वाला रहा है। यहां तक कि वामपंथी धड़ा तो यह दलील भी पेश करता आया है कि यह शरणार्थी समस्या वास्तव में संबंधित देशों में विकसित पश्चिम के हस्तक्षेप के चलते ही पैदा हुई है। जर्मनी जैसे देशों में, जहां बेरोजगारी का स्तर अपेक्षाकृत नीचा बना हुआ है, आम जनता के बीच शरणार्थियों के प्रति स्वागत का यह रुख इतने व्यापक पैमाने पर देखने को मिला है (पूर्वी योरपीय देशों में, जहां बेरोजगारी की दरें असाधारण रूप से ऊंची चल रही हैं, ऐसा रुख देखने में नहीं आया है) कि एक समय पर तो ऐसा लगने लगा था कि शायद जर्मनी तथा फ्रांस आधिकारिक रूप से शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल देंगे और योरपीय यूनियन के दूसरे देशों को भी ऐसा ही करने के लिए राजी करेंगे। वास्तव में जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने भी, जिनसे सामान्यत: उसी तरह की दक्षिणपंथी बकवास सुनने की अपेक्षा की जाती है, जैसी ग्रीस की ऋण वार्ताओं के दौरान सुनने को मिली थी, शरणार्थियों के मामले में उल्लेखनीय रूप से सहानुभूतिपूर्ण बातें कही थीं।

बहरहाल, तीसरी दुनिया में युद्घ और तबाही के मैदानों से बचकर भाग रहे शरणार्थियों का स्वागत करना, विकसित पूंजीवादी दुनिया के स्वभाव में नहीं है। जैसाकि अनुमान लगाया जा सकता था, एंजेला मार्केल के 4 सितंबर को शरणार्थियों के प्रति हमदर्दी जताने के चंद रोज बाद ही, 13 सितंबर को जर्मनी ने सीमा नियंत्रण कायम कर दिए। यह दूसरी बात है कि इस पल्टी को इस बहाने से सही ठहराने की कोशिश की गयी कि यह तो सिर्फ सीमा पर रस्मी जांच का, सिर्फ प्रक्रियागत मामला था, जिसे पल्टी नहीं कहा जाना चाहिए। बहरहाल, द इकॉनमिस्ट तक ने, जिस पर कम से कम वामपंथी झुकाव का आरोप कोई नहीं लगा सकता है, इस कदम की सचाई पर उंगली रख दी कि, जर्मन चांसलर अपनी बात से पलट गयी थी।

अगर यूरोप ने खुले दिल से इन शरणार्थियों का स्वागत किया होता और अपने दूसरे सरकारी खर्चों में कटौती न करते हुए भी, इन शरणार्थियों के पुनर्वास पर आवश्यक खर्चा किया होता, तो इससे वास्तव में योरपीय अर्थव्यवस्थाओं को आगे बढऩे के लिए सहारा ही मिला होता। दक्षिणपंथियों के दावों के विपरीत, योरपीय यूनियन पर ‘‘बोझ’’ डालने के बजाए, शरणार्थियों ने वास्तव में यूरोप को उसके मौजूद संकट से बाहर निकालने का ही काम किया होता। और ऐसा तत्काल-प्रभाव से हुआ होता और उन पर किए जाने वाले सरकारी खर्चे से सकल मांग को हाथ के हाथ बढ़ावा मिला होता। इसके अलावा, जैसाकि अक्सर कहा भी जाता रहा है, शरणार्थियों के आने से इन देशों की बुढ़ाती हुई आबादी में युवा श्रमशक्ति आने से, जो आर्थिक सहारा मिला होता वह अलग है।

शरणार्थी प्रश्न और वित्तीय पूंजी की अतार्किक दुनिया

लेकिन, अगर योरपीय यूनियन इस दलील को स्वीकार करले तब तो उसके पास ग्रीस के ऋण के मामले में उसने जैसा हठधर्मितापूर्ण रुख अपनाया था उसके लिए और सामान्य रूप से वह अपने सदस्य देशों पर जिस तरह के ‘कटौती’ के  कदम थोपती आयी है उनके लिए कोई बहाना ही नहीं रह जाएगा। संक्षेप में यह कि वित्तीय पूंजी उसी प्रकार ‘‘शरणार्थी संकट’’ पर मानवीय प्रतिक्रिया तथा इस तरह की प्रतिक्रिया से आने वाले खर्चे को स्वीकार नहीं कर सकती है, जैसे कि वह ऐसे मानवीय पूंजीवाद को स्वीकार नहीं कर सकती है, जिसके पांवों में ‘कटौती’ की बेडिय़ां न पड़ी हुई हों।

बेशक, अगर वामपंथ योरपीय यूनियन के देशों में शरणार्थियों को स्वीकार किए जाने के पक्ष में जनांदोलन छेड़ता है, तो वित्तीय पूंजी को इसके लिए जगह बनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। लेकिन, इस तरह का आंदोलन सिर्फ शरणार्थियों के प्रति ‘‘सदाशयता’’ की जरूरत को ही अपना आधार नहीं बना सकता है। इसके साथ, वित्तीय पूंजी द्वारा जिस तरह के राजनीतिक-अर्थशास्त्र को आगे बढ़ाया जा रहा है उसकी आलोचना को जोडऩा होगा और इन देशों की जनता के सामने एक वैकल्पिक राजनीतिक-अर्थशास्त्र को पेश करना होगा जो यह दर्शाए कि उसके और शरणार्थियों के हित एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वे ऐसी अतार्किक व्यवस्था के संदर्भ में ही विरोधी नजर आते हैं, जो सकल मांग के संकट के बीच, ‘कटौती’ का गुणगान करती है। दूसरे शब्दों में, शरणार्थियों की हिमायत में संघर्ष, वित्तीय पूंजी की अतार्किक दुनिया के खिलाफ संघर्ष भी है।    

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

यूरोप
सीरिया
शरणार्थी संकट
रूस
आईएस

Related Stories

लेनिन की सिर्फ मूर्ति टूटी है, उनके विचार नहीं

अयोध्या विवाद पर श्री श्री रविशंकर के बयान के निहितार्थ

कुर्दों पर सुलतान एरदोगन का युद्ध

फ़ोर्तालेज़ा में ब्रिक्स शिखर वार्ता को जस्ट नेट कोएलिशन का पत्र


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License