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भारत
राजनीति
सुप्रीम कोर्ट का आदेश दलबदल विरोधी क़ानून को प्रभावहीन करता है
दलबदल विरोधी क़ानून, यानी एंटी-डिफ़ेक्शन लॉ छिटपुट तरीक़े से दल बदलने वाले नेताओं को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करता है लेकिन बड़ी संख्या में दलबदल की स्थिति वास्तविक समस्या है। ये विकृत अधिनियम अपने उद्देश्य को पूरा नहीं करता है। इसलिए एक नए क़ानून की आवश्यकता है।
संजय हेगड़े
22 Jul 2019
Anti-Defection Act
SC-Anti-Defection Act

राजनीति में सुधार के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रयास से संविधान की दसवीं अनुसूची में दलबदल विरोधी अधिनियम जोड़ा गया था।

केंद्र में सत्तारुढ़ जनता पार्टी के विधायक दल ने मुख्यमंत्री के रूप में देवीलाल को हटाने के लिए भजनलाल का चयन किया। जब 1980 में इंदिरा गांधी केंद्र में सत्ता में लौटीं तो भजनलाल पूरे जनता विधायक दल के साथ कांग्रेस पार्टी में चले गए। तो पहले की जनता पार्टी अब कांग्रेस विधायक दल बन गई।

राजीव गांधी सरकार का मानना था कि सत्ता के लिए इस तरह दल बदलना लोकतंत्र विरोधी था। इसलिए वे दलबदल विरोधी अधिनियम लाए जो विधायिका के किसी एक सदस्य को किसी पार्टी में जाने की अनुमति नहीं देता है। इस क़ानून के तहत विधायी दल के कम से कम एक-तिहाई सदस्य अलग हो सकते हैं और दूसरी पार्टी में जा सकते हैं। इसके अलावा सदन के अध्यक्ष अयोग्यता के सवालों पर निर्णय करेंगे।

साथ ही इस अधिनियम ने छिपपुट दलबदल को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करके बड़े स्तर पर दलबदल को क़ानूनी घोषित कर दिया अर्थात जब तक कि सदन के अध्यक्ष सहमत नहीं हो जाते। इस तरह अध्यक्ष काफ़ी शक्तिशाली व्यक्ति बन गए। विशेष रूप से छोटे राज्य की विधानसभाओं में यदि आप सरकार की संररचना को बदलना चाहते हैं तो आपको अपने पक्ष में अध्यक्ष को करना होगा। इसने अध्यक्ष को इतना शक्तिशाली बना दिया कि गोवा में 1990 के दशक में दलबदल संकट के दौरान तत्कालीन अध्यक्ष लुइस प्रोटो बारबोसा ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया और फिर ख़ुद मुख्यमंत्री बन गए।

अध्यक्षों द्वारा नवपरिवर्तन के उदाहरण भी थे। उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष जब बहुजन समाज पार्टी के दलबदल करने वाले नेताओं का सामना किया जो विधायी दल के एक तिहाई सदस्य भी नहीं थे तो उन्होंने ऐसा ही एक नया प्रस्ताव रखा। वरिष्ठ वकील से राजनेता बने और फिर अध्यक्ष बने केशरी नाथ त्रिपाठी(वर्तमान में बिहार के राज्यपाल) ने निरंतर विभाजन के सिद्धांत को स्थापित किया। ये सिद्धांत यह था कि कोई विभाजन केवल कुछ विधायकों के साथ शुरू हो सकता है लेकिन धीरे धीरे यह आवश्यक एक तिहाई अंक तक पहुंच जाएगा।

इसलिए दलबदल विरोधी क़ानून के आशय को नाकाम बनाने के क्रम में अध्यक्ष ने सभी प्रकार के संशोधन करना शुरु कर दिया और ये प्रश्न अदालतों के सामने आने लगे जो प्रत्येक विशेष मामले की तथ्यपरक स्थितियों के आधार पर उन पर फ़ैसला सुनाते थे।

इन नवपरिवर्तनों को दूर करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता के लिए इस दलबदल-विरोधी क़ानून को सख़्त किया गया। लेकिन तथाकथित 'ऑपरेशन कमला’ ने इसे उलट दिया जैसा कि 2008 में कर्नाटक में हुआ था। बीजेपी राज्य में बहुमत से कुछ कम लेकिन अकेली बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी। इसने अपने पक्ष में सदन के सदस्य को करके नहीं बल्कि उनसे इस्तीफ़ा दिलवा कर बहुमत हासिल कर लिया। कांग्रेस या जनता दल (सेकुलर) के टिकट पर चुने गए विधायकों ने इस्तीफ़ा देकर प्रभावी रूप से सदन की संख्या को कम कर दिया। इसलिए बीजेपी जिनकी संख्या निरंतर बनी रही संख्या के मामले में अन्य दलों से आगे बढ़ गई और बहुमत प्राप्त कर लिया। बाद में विधान सभा के वे सदस्य (विधायक) बीजेपी के टिकट पर फिर से चुने गए। यह एक अन्य उदाहरण है कि छिटपुट दलबदल को वैधता कैसे मिली।

वास्तव में सवाल यह है कि क्या ये दलबदल विरोधी अधिनियम किसी उद्देश्य को पूरा करता है। छिटपुट इस्तीफ़े की अनुमति देने के लिए इसे पलट दिया गया था जो कि दलबदल को बढ़ावा देता था; लेकिन गंभीर रूप से इस अधिनियम ने अध्यक्ष की भूमिका का राजनीतिकरण कर दिया है। अध्यक्ष को एक स्वतंत्र, ग़ैर पक्षपातपूर्ण अनुभवी सदस्य माना जाता था जिसका हर कोई सम्मान करता था और जो सदन चलाता था। लेकिन अब अध्यक्ष प्रभावी रूप से एक न्यायाधिकरण जैसा बन गया है- जिसका झुकाव सत्ता पक्ष की तरफ़ होता है या सरकार को स्थिर बनाने में होता है।

एक अन्य समस्या यह है कि मौजूदा स्थिति में ये दलबदल विरोधी क़ानून विधायिका और न्यायपालिका के बीच संभावित टकराव का कारण है। अध्यक्ष के हर फ़ैसले को कभी-कभी अदालतों के सामने चुनौती दी जाती है और फिर अदालतें नए रास्ते निकालने लगती हैं। उत्तर प्रदेश का ही एक उदाहरण है जहां सुप्रीम कोर्ट ने जगदंबिका पाल मामले में कम्पोज़िट फ़्लोर टेस्ट का आदेश दिया था। इस मामले में दो लोगों ने मुख्यमंत्री पद के लिए दावा किया था जिसके बाद सदन ने उपयुक्त सदस्य के पक्ष में वोट किया था। यह संसदीय लोकतंत्र में अभूतपूर्व था।

कर्नाटक के हालिया आदेश में जहां सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विधायकों को विधानसभा में उपस्थित होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, ऐसे में यह अयोग्यता के सवाल को प्रभावी ढंग से बरक़रार रखता है। इस अंतरिम आदेश को सदन के भीतर से ही कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। अदालत और विधायिका अलग अलग अपने परिभाषित क्षेत्रों में काम करते हैं और एक-दूसरे के कामकाज में बाधा नहीं डालते हैं। दलबदल विरोधी अधिनियम अलगाव की इस दीवार को तोड़ता है और दोनों संस्थानों को पारगम्य बनाता है। मेरे ख़याल में यही एक अन्य कारण है कि दलबदल विरोधी क़ानून ने अपनी उपयोगिता को कम कर दिया है।

सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि इसने विधायी दलों के भीतर असहमति को कम कर दिया है और समग्रता की तुलना में व्यक्तिगत निर्णय को कम महत्व दिया है। इससे पहले एक विधायक या सांसद जो किसी विशेष क़ानून को पसंद नहीं करता था वह संसद में इसके ख़िलाफ़ बोल सकता था और अपनी असहमति को व्यक्त कर सकता था। अब हालांकि ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है। लोग यह मानते हैं कि यदि वे विधायी व्हिप के तहत आ जाते हैं और उनकी पार्टी कोई एक रास्ता तय करती है तो इसके ख़िलाफ़ बोलने का कोई मतलब ही नहीं है। यही कारण है कि महत्वपूर्ण कानून अब बिना चर्चा के पारित हो जाता है। हाल के दिनों में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों में से एक पर विचार करें जिसमें सामान्य वर्ग से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आरक्षण कोटा का 10% मिला। संसद ने इस फ़ैसले को एक दिन के भीतर पारित कर दिया दिया। जिसके सामाजिक प्रभाव पर कोई महत्वपूर्ण चर्चा नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि किसी विधायक को विधानसभा में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है जो दलबदल विरोधी कानून को प्रभावहीन करता है। वास्तव में इस अधिनियम को विधायी दल पर लागू किया जाता है जिसके पास व्हिप होता है। व्हिप जारी होने के बाद विधायक के रूप में अपने कार्यालय से अयोग्य घोषित किए जाने के डर से विधायक दल इसे मानने के लिए बाध्य होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक अंतरिम आदेश था लेकिन यह एक क़ानून भी बन जाएगा जो भारत में उच्च न्यायालयों के लिए बाध्यकारी है। मैं एक ऐसे समय को देख रहा हूं जब भविष्य में दलबदल के मामले में आदेश देते हुए विभिन्न उच्च न्यायालय इस आदेश का हवाला देंगे।

प्रभावी रूप से इस आदेश ने न्यायपालिका को देश के किसी भी हिस्से में किसी भी राजनीतिक संकट में बड़ी भूमिका की ओर खींचा है। यही कारण है कि कर्नाटक में अध्यक्ष और विधायकों ने इस आदेश को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है। सर्वोच्च न्यायालय से इसकी समीक्षा करने के लिए कहने के लिए एक उपाय भी है। सर्वोच्च न्यायालय क्या करेगा इसका अंदाज़ा लगाना संभव नहीं है, लेकिन सामान्य नियम यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों पर सदन के पटल पर बहस नहीं की जाती है और न ही न्यायालय द्वारा किसी सदन के कामकाज पर टिप्पणी की जाती है। विधानमंडल और न्यायालय के कामकाज को अलग करने वाली इस दीवार का सम्मान किया जाना चाहिए। यदि यह बारीक या पारगम्य हो जाता है तो दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम हो सकते हैं।

इसलिए जब दलबदल विरोधी अधिनियम दलबदल का बचाव करने में विफल हुआ है तो इसने असहमति को दबा दिया है, इसने विचारशीलता को ख़त्म कर दिया है और यह कभी-कभी न्यायपालिका और विधायिका को एक-दूसरे के आमने सामने खड़ा कर दिया है।

यदि हम इस अधिनियम को पूरी तरह से रद्द कर देते हैं और फिर से तैयार करते हैं तो पेड डिफ़ेक्शन (दलबदल) दोषों पर अंकुश लगाने का उद्देश्य बेहतर तरीक़े से प्राप्त किया जा सकता है। हमारे पास संभवतः एक नया विधानमंडल हो सकता है, जिसके लिए किसी पार्टी के टिकट पर चुने गए किसी भी सदस्य को, यदि वह इस्तीफ़ा देना चाहता है, तो उसके बाद एक निश्चित अवधि के लिए पुन: चुनाव के लिए पात्र नहीं होना चाहिए। उन्हें या तो किसी भी मंत्री कार्यालय या किसी भी कार्यालय के लिए योग्य नहीं होना चाहिए जो किसी मंत्री के बराबर हो।

एक निर्वाचित सदस्य को अपने दलबदल की परिस्थिति से दूर रखना चाहिए और संसदीय लोकतंत्र की संस्थाओं की रक्षा करनी चाहिए जो व्यक्तिगत असंतोष और अंतःदलीय लोकतंत्र पर भरोसा करते हैं।

संजय हेगड़े सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।

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