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अपराध
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राजनीति
सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के बाद भी जारी है बलात्कार पीड़िताओं का 'टू फिंगर टेस्ट'  
बलात्कार पीड़िताओं ने उच्चतम न्यायालय को एक पत्र लिखकर उन डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द करने की मांग की है, जो शीर्ष अदालत की पाबंदी के बावजूद ''शर्मिंदगी पूर्ण दो उंगलियों वाला परीक्षण करते हैं।”
सोनिया यादव
10 Aug 2019
molestation

बलात्कार किसी महिला या नाबालिग बच्ची के लिए किस कदर भयावह हो सकता है, इसकी कल्पना भी शायद हम और आप नहीं कर सकते। बलात्कारी तो एक बार महिला की अस्मिता पर हमला करता है लेकिन हमारी व्यवस्था, हमारा समाज उस महिला को बार-बार मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनाता है। इसी मानसिक यातना का एक हिस्सा है दुष्कर्म पीड़िता का दो उंगलियों वाला परीक्षण यानी टू फिंगर टेस्ट, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन आज भी देश में कई डॉक्टर इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।

यौन हिंसा की शिकार 12 हजार से अधिक पीड़िताओं और उनके परिजनों के मंच 'राष्ट्रीय गरिमा अभियान’ की ओर से दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित कार्यक्रम में बताया गया कि बलात्कार की करीब 1500 पीड़िताओं और उनके परिजनों की ओर उच्चतम न्यायालय को एक पत्र लिखकर उन डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द करने की मांग की है जो शीर्ष अदालत की पाबंदी के बावजूद ''शर्मिंदगी पूर्ण दो उंगलियों वाला परीक्षण करते हैं।”

यह पत्र मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई  को संबोधित करते हुए लिखा गया है।

पत्र में कहा गया है, ''परीक्षण को इसलिए प्रतिबंधित किया गया क्योंकि यह न केवल पीड़िता के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है बल्कि यह अवैज्ञानिक है और इसे पीड़िता के पिछले यौन संबंधों के इतिहास को लेकर उसे शर्मसार करने के लिए अदालत में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।”

राष्ट्रीय गरिमा अभियान ने डॉक्टरों द्वारा इस तरह के उल्लंघन के कई मामले एकत्र किये हैं।  इस कार्यक्रम के संयोजक आसिफ शेख ने न्यूज़क्लिक को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के 2013 में प्रतिबंध लगाने के बाद, आज भी देश में बालात्कार पीड़ितों का दो उंगली परीक्षण जारी है। वे पत्र के माध्यम से इस परीक्षण को करने वाले डॉक्टरों के लाइसेंस को रद्द करने की मांग करते हैं। आसिफ का कहना है, ‘हमारे पास रिकॉर्ड है जिसमें 57 डॉक्टरों ने माना है कि वो अभी भी ‘टू फिंगर टेस्ट’ से ही बलात्कार की पुष्टि करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट को लिखे इस पत्र में प्रमुखता से चार मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। इसमें बच्चों की तस्करी के बाद उनका यौन शोषण,दो उंगली परीक्षण, दुष्कर्म पीड़ित नाबालिग बच्चियों का गर्भ धारण करना और समय पर पीड़ितों को मुआवज़ा ना मिलना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं।

आसिफ ने आगे बताया कि देश में बच्चों को अगवा कर तस्कर समूह उनका यौन शोषण करते हैं लेकिन पुलिस मामला केवल तस्करी का दर्ज करती है। इस पत्र के माध्यम से उनकी मांग है कि ऐसे मामलों को पॉक्सो एक्ट 2012 के अंतर्गत दर्ज किया जाए, जिससे इस तरह के मामलों का जल्दी निपटारा हो सके और पुनर्वास की योजना भी बन सके।

गौरतलब है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के साथ बढ़ रहे यौन अपराधों के मामलों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए एक रिपोर्ट तलब की थी।जिसके बाद राज्य सरकारों की तरफ से बताया गया कि देशभर में 1 जनवरी, 2019 से गत 30 जून तक बच्चों के साथ यौन अपराधों की कुल24,212 घटनाएं दर्ज हुईं। उसके बाद कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में जांच प्रक्रिया में तेजी लायी जाए। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के लिए राष्ट्रीय गरिमा अभियान ने कोर्ट का धन्यवाद ज्ञापन किया है।

आसिफ ने आगे कहा कि, 65 ऐसे मामलों को इस पत्र में रेखांकित किया है जिसमें बलात्कार के बाद नाबालिग बच्चियों ने गर्भ धारण कर लिया है। उन्होंने न्यायालय से गुहार लगाई है कि बलात्कार पीड़िता की केवल एक बार जांच करके न छोड़ दिया जाए बल्कि उन्हें लगातार तीन महीने तक निगरानी में रखा जाए जिससे समय रहते उनके गर्भ की स्थिति का पता लगाया जा सके और उसका समाधान निकाला जा सके।

इस पत्र में दुष्कर्म पीड़ितों को समय पर उचित मुआवज़ा मिल सके इसकी मांग भी उठाई गई है। आसिफ ने बताया कि उनके सामने 202 ऐसे मामले आए हैं जिसमें कई सालों के बाद भी पीड़ितों को मुआवजा नहीं मिला है।

बता दें कि हमारे समाज में आज भी यौन शोषण के मामलों में अपराधी की जगह पीड़िता ही प्रताड़ित हो जाती है। कई बार पीड़ित के चरित्र पर उंगली उठाई जाती हैं, तो कई बार उसके मान-सम्मान को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आज जरूरत है समाज को मानसिकता बदलने की। पीड़िता के पक्ष में खड़े होने की, जिससे उसे सामाजिक और मानसिक मजबूती मिल सके, वो अपनी न्याय की लड़ाई लड़ सके।

Two Finger Testing
Rape Survivor
Supreme Court
Rashtriya Garima Anhiyan
Ban on Two Finger Testing

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