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भारत
राजनीति
सूचना आयोगों में ख़ाली पड़े पद लोगों के 'सूचना के अधिकार’ का गला घोंट रहे हैं
केन्द्रीय सूचना आयोग के समक्ष 23,500 लंबित अपील और शिकायतें लंबित हैं जबकि महाराष्ट्र के राज्य सूचना आयोग के सामने अपील और शिकायतों के 40,000 लंबित मामले हैं।
विवान एबन
27 Jun 2018
rti

भारत के सबसे महत्वपूर्ण अधिनियमों में से एक सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (आरटीआई अधिनियम) है जिसकी स्थिति बेहद ख़राब है। यह स्थिति सिद्धांतहीन संशोधन से पैदा नहीं हुई बल्कि उपेक्षा के चलते हुई है। राज्य और संघ स्तर पर सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों की कमी है और वे वैधानिक रूप से अनिवार्य इन्हीं ,कम आयुक्तों से ही काम का निपटारा कर रहे हैं। ऐसे में अपील और शिकायतों की संख्या में काफी इज़ाफा हो गया है। ऐसी स्थिति कोई रात भर में पैदा नहीं हो गई है बल्कि समय के साथ हो रही है। इस तरह बदतर होती पारदर्शिता के इस क़ानून के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा संबंधित सरकारों को जारी किए गए दिशा निर्देशों को लागू कराने की मांग की है:

-    अपने- अपने सूचना आयोगों की रिक्तियों को भरें।

-    रिक्तियां होने से कम से कम तीन महीने पहले चयन प्रक्रिया शुरू करें।

-    संबंधित सूचना आयोगों को उम्मीदवारों को शॉर्ट-लिस्ट करने से संबंधित मशविरा और तर्कसंगत मानदंडों के सभी रिकॉर्ड प्रकाशित करें।

-    मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों का चयन करने की एक पारदर्शी प्रणाली तैयार करें।

इस पीआईएल में याचिकाकर्ता पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए अपने काम के लिए जाने जाते हैं। अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी दोनों ने सूचना अधिकार अधिनियम से पहले पारदर्शिता के क्षेत्र में काम किया है। दोनों नेशलनल कैंपेन फॉर पिपुल्स राइट टू इंफॉर्मेशन के साथ साथ सतर्क नगारिक संगठन के सदस्य हैं। इस मामले में अन्य याचिकाकर्ता एक सेवानिवृत्त नौसेना कमोडोर लोकेश के. बत्रा हैं। कमोडोर बत्रा आरटीआई के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और वे एक पारदर्शिता प्रचारक हैं। चुनाव बॉन्ड योजना के संबंध में उन्होंने आरटीआई अधिनियम के तहत आवेदन भी किया है। इसके उत्तरदाता भारत के संघ के साथ-साथ आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, नागालैंड, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकारें हैं।

ये याचिका साल 2015 से शुरू होने वाली घटनाओं की एक श्रृंखला पर आधारित है जिससे याचिकाकर्ताओं ने निराशा हुई है।

केन्द्रीय सूचना आयोग

2 सितंबर 2016 को केंद्र सरकार ने केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के दो पदों के लिए आवेदन आमंत्रित करने की अधिसूचना जारी की थी क्योंकि ये पद दिसंबर 2016 और फरवरी 2017 में खाली होने वाले थे। 31 दिसंबर 2016 को केंद्रीय सूचना आयुक्त एमए खान यूसुफी सेवानिवृत्त हुए। इस तारीख़ तक सीआईसी में एक मुख्य सूचना आयुक्त और दस सूचना आयुक्त थें। इन्हीं आयुक्तों से सीआईसी में काम किया जा रहा था। 15 फरवरी 2017 को बसंत सेठ ने मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और सेवानिवृत्त हो गए। इस तरह सीआईसी में दो रिक्तियां हो गईं जिनमें से कोई भी भरी नहीं गई। 5 जून 2017 को याचिकाकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को सीआईसी में रिक्तियों को भरने के लिए आग्रह करते हुए एक पत्र लिखा था। क़रीब तीन महीने के बाद 8 सितंबर 2017 को अंजलि भारद्वाज ने आरटीआई के तहत लिखे गए पत्र की स्थिति से संबंधित जानकारी मांगने के लिए आवेदन किया। इसकी प्रतिक्रिया से पता चला कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पत्र को एक शिकायती पत्र के रूप में देखा था और इसे सरकार के ऑनलाइन पोर्टल पर रख दिया था। हालांकि जब याचिकाकर्ताओं ने इस 'शिकायत' को ट्रैक किया तो इस वेबसाइट से पता चला कि इसे बंद कर दिया गया था क्योंकि मामला लंबित था। 22 सितंबर 2017 को शरत सभरवाल ने मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और सेवानिवृत्त हो गए। इस तरह सीआईसी में रिक्तियों की संख्या तीन तक पहुंच गई। 15 जनवरी 2018 को मंजुला प्राशर सीआईसी से सेवानिवृत्त हुईं। इस तरह ये रिक्तियां चार पहुंच गईं। 4 अप्रैल 2018 तक सीआईसी वेबसाइट से पता चला कि 23,500 से ज़्यादा अपील और शिकायत लंबित हैं। कुछ तो दो वर्षों से लंबित है।

आंध्र प्रदेश राज्य सूचना आयोग

मई 2017 में आंध्र प्रदेश के राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया क्योंकि इसके सभी सदस्य सेवानिवृत्त हो गए थें। अगस्त 2017 में आंध्र प्रदेश सरकार ने एसआईसी का गठन करने का आदेश जारी किया था। फिर भी कोई नियुक्ति नहीं हुई है।

गुजरात राज्य सूचना आयोग

19 जनवरी 2018 को गुजरात के मुख्य राज्य सूचना आयुक्त सेवानिवृत्त हो गए। इस पद को अब तक नहीं भरा गया है।

कर्नाटक राज्य सूचना आयोग

कर्नाटक का राज्य सूचना आयोग पांच सूचना आयुक्तों से काम कर रहा है जबकि 31 अक्टूबर 2017 तक इसके समक्ष 33,000 अपील और शिकायत लंबित है।

केरल राज्य सूचना आयोग

31 अक्टूबर 2017 तक केरल राज्य सूचना आयोग केवल एक सूचना आयुक्त के ज़रिए ही काम कर रहा है। इस आयोग के समक्ष 14,000 अपील लंबित थे।

महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग

अप्रैल 2017 में महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) के मुख्य सूचना आयुक्त सेवानिवृत्त हुए। अब तक नए मुख्य सूचना आयुक्त को नियुक्त नहीं किया गया है। फरवरी 2018 तक महाराष्ट्र एसआईसी ग्यारह की स्वीकृत पदों के बावजूद महज सात सूचना आयुक्तों से ही काम कर रहा है। फरवरी के अंत में क़रीब 40,000 से ज़्यादा अपील और शिकायतें इसके समक्ष लंबित थे।

नागलांड राज्य सूचना आयोग

28 सितंबर 2017 को तोशी अय्यर नागालैंड राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) के मुख्य सूचना आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हुए। तब से नागालैंड का एसआईसी मुख्य सूचना आयुक्त के बिना ही काम कर रहा है।

ओडिशा राज्य सूचना आयोग

ओडिशा राज्य सूचना आयोग केवल तीन सूचना आयुक्तों से काम कर रहा है और इसके समक्ष 10,000 से ज़्यादा अपील और शिकायत लंबित है।

तेलंगाना राज्य सूचना आयोग

तेलंगाना राज्य सूचना आयोग में केवल दो सूचना आयुक्त हैं जबकि इसके सामने 15,500 से ज़्यादा अपील और शिकायतें लंबित हैं।

पश्चिम बंगाल राज्य सूचना आयोग

नवंबर 2015 से जुलाई 2016 के बीच पश्चिम बंगाल के राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) ने कोई काम नहीं किया और कोई अपील नहीं सुना क्योंकि वहां केवल एक ही आयुक्त थें। अप्रैल 2017 से जुलाई 2017 के बीच पश्चिम बंगाल के एसआईसी ने एक बार फिर कोई काम नहीं किया क्योंकि एसआईसी में केवल एक ही सदस्य थे। 31 अक्टूबर 2017 तक पश्चिम बंगाल के एसआईसी के समक्ष 8,000 से ज़्यादा अपील लंबित थे।

इस तरह यह साफ है कि आरटीआई अधिनियम को आधिकारिक उपेक्षा और नौकरशाही अस्पष्टता से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।.यह स्पष्ट आधिकारिक उदासीनता जानबूझकर नहीं होनी चाहिए। हालांकि इसका प्रभाव निश्चित रूप से डरावना है। यह मानते हुए कि आरटीआई अधिनियम धारा 7 की उपधारा 1 के तहत ज़रूरी है कि इस अधिनियम के तहत किसी आवेदन का जवाब 30 दिनों के भीतर दिया जाना चाहिए और इस प्रकार सूचना ने देना अपील के अधीन आता है। अपील के निपटारा के लिए पर्याप्त संख्या में अधिकारियों की नियुक्ति न करके एक प्रणाली का विकास हुआ है जिसमें कोई विभाग किसी आवेदन को अस्वीकार या अनदेखा करता है ऐसे में संबंधित विभागीय अधिकारियों के सेवानिवृत्त होने के बाद इस अपील का निपटारा कैसे किया जा सकता है। यह स्पष्ट रूप से पारदर्शिता और सुशासन के हित में नहीं हो सकता है।

हालांकि, ऐसा होता कि सुप्रीम कोर्ट तेज़ी से सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय देती और दोनों स्तर की सरकारें इन निर्णयों को मानने के लिए बाध्य होती।

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