NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सूचना आयोगों में ख़ाली पड़े पद लोगों के 'सूचना के अधिकार’ का गला घोंट रहे हैं
केन्द्रीय सूचना आयोग के समक्ष 23,500 लंबित अपील और शिकायतें लंबित हैं जबकि महाराष्ट्र के राज्य सूचना आयोग के सामने अपील और शिकायतों के 40,000 लंबित मामले हैं।
विवान एबन
27 Jun 2018
rti

भारत के सबसे महत्वपूर्ण अधिनियमों में से एक सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (आरटीआई अधिनियम) है जिसकी स्थिति बेहद ख़राब है। यह स्थिति सिद्धांतहीन संशोधन से पैदा नहीं हुई बल्कि उपेक्षा के चलते हुई है। राज्य और संघ स्तर पर सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों की कमी है और वे वैधानिक रूप से अनिवार्य इन्हीं ,कम आयुक्तों से ही काम का निपटारा कर रहे हैं। ऐसे में अपील और शिकायतों की संख्या में काफी इज़ाफा हो गया है। ऐसी स्थिति कोई रात भर में पैदा नहीं हो गई है बल्कि समय के साथ हो रही है। इस तरह बदतर होती पारदर्शिता के इस क़ानून के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा संबंधित सरकारों को जारी किए गए दिशा निर्देशों को लागू कराने की मांग की है:

-    अपने- अपने सूचना आयोगों की रिक्तियों को भरें।

-    रिक्तियां होने से कम से कम तीन महीने पहले चयन प्रक्रिया शुरू करें।

-    संबंधित सूचना आयोगों को उम्मीदवारों को शॉर्ट-लिस्ट करने से संबंधित मशविरा और तर्कसंगत मानदंडों के सभी रिकॉर्ड प्रकाशित करें।

-    मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों का चयन करने की एक पारदर्शी प्रणाली तैयार करें।

इस पीआईएल में याचिकाकर्ता पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए अपने काम के लिए जाने जाते हैं। अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी दोनों ने सूचना अधिकार अधिनियम से पहले पारदर्शिता के क्षेत्र में काम किया है। दोनों नेशलनल कैंपेन फॉर पिपुल्स राइट टू इंफॉर्मेशन के साथ साथ सतर्क नगारिक संगठन के सदस्य हैं। इस मामले में अन्य याचिकाकर्ता एक सेवानिवृत्त नौसेना कमोडोर लोकेश के. बत्रा हैं। कमोडोर बत्रा आरटीआई के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और वे एक पारदर्शिता प्रचारक हैं। चुनाव बॉन्ड योजना के संबंध में उन्होंने आरटीआई अधिनियम के तहत आवेदन भी किया है। इसके उत्तरदाता भारत के संघ के साथ-साथ आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, नागालैंड, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकारें हैं।

ये याचिका साल 2015 से शुरू होने वाली घटनाओं की एक श्रृंखला पर आधारित है जिससे याचिकाकर्ताओं ने निराशा हुई है।

केन्द्रीय सूचना आयोग

2 सितंबर 2016 को केंद्र सरकार ने केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के दो पदों के लिए आवेदन आमंत्रित करने की अधिसूचना जारी की थी क्योंकि ये पद दिसंबर 2016 और फरवरी 2017 में खाली होने वाले थे। 31 दिसंबर 2016 को केंद्रीय सूचना आयुक्त एमए खान यूसुफी सेवानिवृत्त हुए। इस तारीख़ तक सीआईसी में एक मुख्य सूचना आयुक्त और दस सूचना आयुक्त थें। इन्हीं आयुक्तों से सीआईसी में काम किया जा रहा था। 15 फरवरी 2017 को बसंत सेठ ने मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और सेवानिवृत्त हो गए। इस तरह सीआईसी में दो रिक्तियां हो गईं जिनमें से कोई भी भरी नहीं गई। 5 जून 2017 को याचिकाकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को सीआईसी में रिक्तियों को भरने के लिए आग्रह करते हुए एक पत्र लिखा था। क़रीब तीन महीने के बाद 8 सितंबर 2017 को अंजलि भारद्वाज ने आरटीआई के तहत लिखे गए पत्र की स्थिति से संबंधित जानकारी मांगने के लिए आवेदन किया। इसकी प्रतिक्रिया से पता चला कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पत्र को एक शिकायती पत्र के रूप में देखा था और इसे सरकार के ऑनलाइन पोर्टल पर रख दिया था। हालांकि जब याचिकाकर्ताओं ने इस 'शिकायत' को ट्रैक किया तो इस वेबसाइट से पता चला कि इसे बंद कर दिया गया था क्योंकि मामला लंबित था। 22 सितंबर 2017 को शरत सभरवाल ने मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और सेवानिवृत्त हो गए। इस तरह सीआईसी में रिक्तियों की संख्या तीन तक पहुंच गई। 15 जनवरी 2018 को मंजुला प्राशर सीआईसी से सेवानिवृत्त हुईं। इस तरह ये रिक्तियां चार पहुंच गईं। 4 अप्रैल 2018 तक सीआईसी वेबसाइट से पता चला कि 23,500 से ज़्यादा अपील और शिकायत लंबित हैं। कुछ तो दो वर्षों से लंबित है।

आंध्र प्रदेश राज्य सूचना आयोग

मई 2017 में आंध्र प्रदेश के राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया क्योंकि इसके सभी सदस्य सेवानिवृत्त हो गए थें। अगस्त 2017 में आंध्र प्रदेश सरकार ने एसआईसी का गठन करने का आदेश जारी किया था। फिर भी कोई नियुक्ति नहीं हुई है।

गुजरात राज्य सूचना आयोग

19 जनवरी 2018 को गुजरात के मुख्य राज्य सूचना आयुक्त सेवानिवृत्त हो गए। इस पद को अब तक नहीं भरा गया है।

कर्नाटक राज्य सूचना आयोग

कर्नाटक का राज्य सूचना आयोग पांच सूचना आयुक्तों से काम कर रहा है जबकि 31 अक्टूबर 2017 तक इसके समक्ष 33,000 अपील और शिकायत लंबित है।

केरल राज्य सूचना आयोग

31 अक्टूबर 2017 तक केरल राज्य सूचना आयोग केवल एक सूचना आयुक्त के ज़रिए ही काम कर रहा है। इस आयोग के समक्ष 14,000 अपील लंबित थे।

महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग

अप्रैल 2017 में महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) के मुख्य सूचना आयुक्त सेवानिवृत्त हुए। अब तक नए मुख्य सूचना आयुक्त को नियुक्त नहीं किया गया है। फरवरी 2018 तक महाराष्ट्र एसआईसी ग्यारह की स्वीकृत पदों के बावजूद महज सात सूचना आयुक्तों से ही काम कर रहा है। फरवरी के अंत में क़रीब 40,000 से ज़्यादा अपील और शिकायतें इसके समक्ष लंबित थे।

नागलांड राज्य सूचना आयोग

28 सितंबर 2017 को तोशी अय्यर नागालैंड राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) के मुख्य सूचना आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हुए। तब से नागालैंड का एसआईसी मुख्य सूचना आयुक्त के बिना ही काम कर रहा है।

ओडिशा राज्य सूचना आयोग

ओडिशा राज्य सूचना आयोग केवल तीन सूचना आयुक्तों से काम कर रहा है और इसके समक्ष 10,000 से ज़्यादा अपील और शिकायत लंबित है।

तेलंगाना राज्य सूचना आयोग

तेलंगाना राज्य सूचना आयोग में केवल दो सूचना आयुक्त हैं जबकि इसके सामने 15,500 से ज़्यादा अपील और शिकायतें लंबित हैं।

पश्चिम बंगाल राज्य सूचना आयोग

नवंबर 2015 से जुलाई 2016 के बीच पश्चिम बंगाल के राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) ने कोई काम नहीं किया और कोई अपील नहीं सुना क्योंकि वहां केवल एक ही आयुक्त थें। अप्रैल 2017 से जुलाई 2017 के बीच पश्चिम बंगाल के एसआईसी ने एक बार फिर कोई काम नहीं किया क्योंकि एसआईसी में केवल एक ही सदस्य थे। 31 अक्टूबर 2017 तक पश्चिम बंगाल के एसआईसी के समक्ष 8,000 से ज़्यादा अपील लंबित थे।

इस तरह यह साफ है कि आरटीआई अधिनियम को आधिकारिक उपेक्षा और नौकरशाही अस्पष्टता से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।.यह स्पष्ट आधिकारिक उदासीनता जानबूझकर नहीं होनी चाहिए। हालांकि इसका प्रभाव निश्चित रूप से डरावना है। यह मानते हुए कि आरटीआई अधिनियम धारा 7 की उपधारा 1 के तहत ज़रूरी है कि इस अधिनियम के तहत किसी आवेदन का जवाब 30 दिनों के भीतर दिया जाना चाहिए और इस प्रकार सूचना ने देना अपील के अधीन आता है। अपील के निपटारा के लिए पर्याप्त संख्या में अधिकारियों की नियुक्ति न करके एक प्रणाली का विकास हुआ है जिसमें कोई विभाग किसी आवेदन को अस्वीकार या अनदेखा करता है ऐसे में संबंधित विभागीय अधिकारियों के सेवानिवृत्त होने के बाद इस अपील का निपटारा कैसे किया जा सकता है। यह स्पष्ट रूप से पारदर्शिता और सुशासन के हित में नहीं हो सकता है।

हालांकि, ऐसा होता कि सुप्रीम कोर्ट तेज़ी से सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय देती और दोनों स्तर की सरकारें इन निर्णयों को मानने के लिए बाध्य होती।

RTI
InformationCommissions
right to information

Related Stories

ओडिशा: अयोग्य शिक्षकों द्वारा प्रशिक्षित होंगे शिक्षक

बुंदेलखंड में LIC के नाम पर घोटाला, अपने पैसों के लिए भटक रहे हैं ग्रामीण

दिल्ली पुलिस के ख़िलाफ़ महिलाओं का प्रदर्शन, आरटीआई के 16 साल और अन्य ख़बरें

आरटीआई अधिनियम का 16वां साल: निष्क्रिय आयोग, नहीं निपटाया जा रहा बकाया काम

जब जज ही निशाने पर हों, तो फिर आरटीआई एक्टिविस्ट, व्हिसलब्लोअर की क्या बिसात

गुजरात: जातिगत अत्याचारों के ज्यादातर आरोपी खुले में घूम रहे, आसानी से मिल जाती है जमानत

आरटीआई से खुलासा: संकट में भी काम नहीं आ रही प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना

जम्मू-कश्मीर में आरटीआई क़ानून : एक मौक़ा जिसे गँवा दिया गया

मोदी राज में सूचना-पारदर्शिता पर तीखा हमला ः अंजलि भारद्वाज

क्या खान मंत्रालय ने खनन सुधारों पर अहम सुझावों की अनदेखी की?


बाकी खबरें

  • RELIGIOUS DEATH
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़
    27 Jan 2022
    कथित रूप से 'जबरन धर्मांतरण' के बाद एक किशोरी की हालिया खुदकुशी और इसके ख़िलाफ़ दक्षिणपंथी संगठनों की प्रतिक्रिया ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी क़ानून की मांग को फिर से केंद्र में ला दिया है।
  • cb
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: ‘बीजेपी-कांग्रेस दोनों को पता है कि विकल्प तो हम दो ही हैं’
    27 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड में 2000, 2007 और 2017 में भाजपा सत्ता में आई। जबकि 2002 और 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने सरकार बनाई। भाजपा और कांग्रेस ही बारी-बारी से यहां शासन करते आ रहे…
  •  नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    27 Jan 2022
    आज के एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं रेलवे परीक्षा में हुई धांधली पर चल रहे आंदोलन की। क्या हैं छात्रों के मुद्दे और क्यों चल रहा है ये आंदोलन, आइये जानते हैं अभिसार से
  • सोनिया यादव
    यूपी: महिला वोटरों की ज़िंदगी कितनी बदली और इस बार उनके लिए नया क्या है?
    27 Jan 2022
    प्रदेश में महिलाओं का उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने का औसत भले ही कम रहा हो, लेकिन आधी आबादी चुनाव जिताने का पूरा मददा जरूर रखती है। और शायद यही वजह है कि चुनाव से पहले सभी पार्टियां उन्हें लुभाने…
  • यूपी चुनाव:  उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    27 Jan 2022
    यूपी में महिला उम्मीदवारों के लिए प्रियंका गांधी की तलाश लगातार जारी है, प्रियंका गांधी ने पहले उन्नाव रेप पीड़िता की मां पर दांव लगाया था, और अब वो सोनभद्र नरसंहार में अपने भाई को खो चुकी महिला को…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License