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भारत
राजनीति
स्वास्थ्य क्षेत्र के लोगों ने बताई कश्मीर की सच्चाई!
डॉक्टरों और चिकित्सा से जुड़ी पत्रिकाओं द्वारा उठाई जा रही वाजिब चिंता को ख़ारिज करना ग़लत है।
सुभाष गाताडे
23 Aug 2019
Translated by महेश कुमार
jammu and kashmir
प्रतीकात्मक तस्वीर Image Courtesy: Indian Express

यह अजीब समय है। एक पूरे राज्य का 'नामोनिशान' देश के नक़्शे से मिटाया जा रहा है। लाखों नागरिकों के मूल अधिकारो और मानवाधिकारों को संवैधानिक सरपरस्ती से वंचित कर दिया गया है, जबकि देश के बाक़ी हिस्सों में लोग इसका 'आनन्द' उठा रहे हैं।

मीडिया के एक बड़े हिस्से ने लोकतंत्र के पहरेदार के रूप में अपनी भूमिका को छोड़ दिया है लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कुछ पेशेवर लोग सत्ता के सामने सच बोलने के लिए आगे आ रहे हैं।

रिपोर्ट्स में सामने आया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवर डॉ. रमणी अत्कुरी सहित देश के अठारह डॉक्टरों ने एक प्रमुख चिकित्सा पत्रिका बीएमजे को लिखा है, जिसमें उन्होने केंद्र सरकार से "कश्मीर में संचार और यात्रा पर लगे प्रतिबंध" को हटाने और हर वह उपाय करने का आह्वान किया है, जिससे कि रोगियों को बिना किसी बाधा के स्वास्थ्य सेवा का उपयोग करने की अनुमति मिल सके। "

डॉक्टरों के इस समूह ने घाटी में चल रहे मानवीय संकट पर काफ़ी महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है। उनके मुताबिक़ इस संकट का एक भयानक परिणाम "जीने के अधिकार और स्वास्थ्य देखभाल का उल्लंघन है।"

कश्मीर में इस अभूतपूर्व सुरक्षा कवच को लगाए दो सप्ताह से अधिक हो गया है। माना जा रहा है कि, ऐसा अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए के निरस्त करने के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए किया गया है जिसने जम्मू और कश्मीर (जम्मू-कश्मीर) को एक राज्य से दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया है।

इसका तात्कालिक परिणाम तो यह है कि न केवल रोगियों बल्कि चिकित्सा कर्मचारियों को भी घाटी के अस्पतालों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। स्टॉक मे दवाएं ख़त्म हो रही हैं। जैसा कि डॉक्टरों का कहना है, "इस स्थिति ने पहले से ही मौजूद मनोसामाजिक स्थिति के उंचे दबाव में रहने वाली आबादी के बीच बहुत अधिक मानसिक तनाव पैदा कर दिया है।"

राज्य में लागु तालाबंदी के तहत सैकड़ों राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया है, साथ ही संचार के सभी साधनों को अवरुद्ध कर दिया गया है, घाटी के लोगों को स्वास्थ्य सेवा केंद्र तक पहुंचने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा हैं।

यह भी रेखांकित करने की बात है कि डॉक्टरों का यह समूह इस क्षेत्र में जीवन और स्वास्थ्य की देखभाल के अधिकार पर अपनी चिंता व्यक्त करने वाला अकेला नहीं है। लैंसेट, जोकि प्रमुख ब्रिटिश मेडिकल जर्नल है, ने फीयर एंड अनसरटेंटी अराउंड कश्मीर फ्यूचर के संपादकीय में रेखांकित किया है कि किस तरह से "हिंसा की वजह से क्षेत्र में एक भयानक मानसिक स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया है"।

इस स्थिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावे पर भी सवाल उठाया है कि क्या "स्वायत्तता को रद्द करने का निर्णय कश्मीर में समृद्धि लाएगा"? इसके बजाय, लांसेट का कहना है कि "पहले, तो कश्मीर के लोगों को इस दशकों पुराने संघर्ष के गहरे घावों का इलाज़ करने की आवश्यकता है, न कि आगे इसे हिंसा और अलगाव के ज़रिये ओर ज़्यादा बढ़ाने की ज़रूरत है।"

आंकड़े बताते हैं कि दशकों की अस्थिरता के बावजूद, आंकड़े बताते हैं कि कश्मीर का विकास शेष भारत की तुलना में बेहतर है। 2016 में, जीवन प्रत्याशा (जीने की उम्र)पुरुषों की 68.3 वर्ष और महिलाओं की 71.8 वर्ष थी, जो संबंधित राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। लांसेट के संपादकीय में इन आंकड़ों का विवरण भी दिया गया है।

जैसी उम्मीद की जा रही थी कि उसके मुताबिक़ ही लैंसेट के सवालों पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। आईएमए ने दावा किया है कि प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका ने कश्मीर की स्थिति पर अपनी राय बनाकर "औचित्य का उल्लंघन" किया है। आईएमए का तर्क है कि लैंसेट का कश्मीर से "कोई लेन-देना नहीं" है और उसने संपादकीय को "ग़लत इरादे से" लिखा गया बताया है।

आईएमए के डॉक्टर आम जनता के विचारों से अधिक प्रभावित होते हैं और इस समय कश्मीर में बड़े पैमाने पर निर्मित उन्माद से भी वे स्पष्ट रूप से प्रभावित हुए हैं।

कश्मीर में चल रहे मानसिक स्वास्थ्य संकट के बारे में लांसेट का दावा मेडिसिंस सैंस फ्रंटियर्स (एम.एस.एफ. या डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स) द्वारा किए गए अध्ययनों पर आधारित है, जो एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय निकाय है जो जम्मू-कश्मीर में कई वर्षों से सक्रिय है। एमएसएफ कश्मीरियों को मनोविज्ञाननिक परामर्श देता है और मनोविज्ञान विभाग, कश्मीर विश्वविद्यालय, और मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (IMHANS) के साथ सहयोग कर इस पर अध्ययन करता है।

यह वैज्ञानिक सर्वेक्षण इंटरनेट पर उपलब्ध है और यह चौंकाने वाले आंकड़े को रेखांकित करता है कि कश्मीर के 45 प्रतिशत लोग मानसिक दबाव का सामना कर रहे हैं। घाटी में लगभग 18 लाख वयस्क है जो अब गंभीर मानसिक संकट के लक्षण से ग्रस्त हैं। एमएसएफ़ के अध्ययन को अक्टूबर और दिसंबर 2015 के बीच आयोजित किया गया था।

उस सर्वेक्षण के अनुसार, श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य पर आयोजित एक संगोष्ठी में एक शोध पर आधारित सारांश जारी किया गया था,जिसमें 41 प्रतिशत लोगों में संभावित अवसाद के लक्षण पाए गए हैं, 26 प्रतिशत में संभावित चिंता के लक्षण और 19 प्रतिशत में संभावित किसी हमले के बाद के दर्दनाक तनाव विकार के लक्षण दिखाई दिए हैं ।

आईए स्थिति की गंभीरता पर नज़र डालते हैं: 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला कि पांच में से एक भारतीय अपने जीवनकाल में अवसाद(डिप्रेशन) से पीड़ित हो सकता है। यह 20 करोड़ लोगों के समान संख्या है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण ने यह भी दर्ज किया है कि लगभग 15 करोड़ भारतीयों को उनकी मानसिक स्वास्थ्य स्थिति की देखभाल करने की ज़रूरत है। इसी सर्वेक्षण में यह भी पता चला कि क़रीब 70 से 92 प्रतिशत मामलों में इलाज़ हासिल करने में असफल रहे।

आईए अब कश्मीर में (45 प्रतिशत) और शेष भारत में (15-20 प्रतिशत) मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों का सामना कर रहे लोगों के बीच के अंतर पर विचार करते हैं।

दूसरा, यह पहली बार नहीं है कि लैंसेट ने स्वास्थ्य से परे के मुद्दों को उठाया है। अगस्त में ही, इसने जाईर बोल्सोनारो की ब्राज़ील सरकार पर टिप्पणी की थी। लैंसेट ने उल्लेख किया था कि बोलसनारो के राष्ट्रपति बनने से 1988 के संविधान मे दी गयी गारंटी "ब्राज़ील की स्वदेशी आबादी के लिए सबसे गंभीर ख़तरा" बन गया है।

जून में, इसने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो द्वारा खाद्य वितरण को नियंत्रित करने और भोजन हैंडआउट को "राजनीतिक हथियार" के रूप में सब्सिडी देने की रणनीति पर सवाल उठाया था।

हाल ही के एक लेख, "मेंटल इलनेस ओफन स्टेम फ़्रोम अर्ली-लाईफ त्ट्रॉमा। इट्स हेपनिंग इन कश्मीर" में प्रोफ़ेसर विक्रम पटेल ने, और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में ग्लोबल हेल्थ के पर्सिहिंग स्क्वायर प्रोफ़ेसर ने इसी तरह की चिंताओं को उठाया है। इसमें मोहम्मद अल्ताफ़ पॉल और वहीदा ख़ान के एक लेख का ज़िक्र करता है जो सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य पत्रिका के वर्तमान अंक में प्रकाशित हुआ है, जो एक अध्ययन पर आधारित है जो घाटी में मौजूदा उठापठक से पहले किया गया था।

इस अध्ययन में कश्मीर घाटी के शोपियां जिले के 12 स्कूलों के एक हज़ार बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का आंकलन करने वाले सर्वेक्षण के परिणामों का वर्णन किया गया है। वे एक आश्चर्यजनक खोज को दर्शाते हैं: अध्ययन किए गए प्रत्येक तीन बच्चों में से एक नैदानिक रूप से मानसिक विकार का शिकार था, जो आमतौर पर मनोदशा,चिंता या व्यवहार संबंधी विकारों के रूप में मिलता है।

यह कोई पहली बार भी नहीं है कि घाटी में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति चिंता का विषय बन गई है। "कश्मीर: द अनटोल्ड स्टोरी”, हुमरा कुरैशी की एक किताब है जो कश्मीर संघर्ष के कई अस्पष्टीकृत पहलुओं को सामने लाई है। पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के मामलों में लेखक की जांच से पता चला है कि घाटी में एकमात्र सरकारी अस्पताल जो मनोवैज्ञानिक बीमारियों से जूझ रहा है, ने आउट-रोगी विभाग या ओपीडी में जाने वाले रोगियों की संख्या में बड़ा उछाल दिखाया है।

जबकि 1990 तक, इस तरह की ओपीडी में जाने वाले मरीज़ों की संख्या दिन में केवल औसत छह होती थी, जबकि वर्ष 2000 तक यह संख्या एक दिन में 250 या 300रोगियों तक पहुंच गई थी।

अस्पताल के रिकॉर्ड बताते हैं कि 1990 में अस्पताल में भर्ती मरीजों की संख्या 1760 थी। यह संख्या भी 1994 तक 18,000 तक पहुंच गई। और 2001 तक यह संख्या38,000 तक पहुंच गई। इस प्रकार ओपीडी में आने वाले रोगियों की संख्या में 40 गुना वृद्धि हुई है, भर्ती रोगियों की संख्या में 20 गुना की वृद्धि हुई है।

अब जब स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े पेशेवर लोगों ने इस क्षेत्र में स्वास्थ्य पर व्यापक मानवीय चिंताओं का खुलासा किया है, तो भारत की जनता को उन्हें सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए।

सुभाष गाताडे दिल्ली में स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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