NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
भारत
राजनीति
स्वच्छ भारत मिशन : देश की 15 फीसदी जिला अदालतों में नहीं है महिलाओं के लिए टॉयलेट
'विधि' की सर्वे रिपोर्ट जिला अदालतों में महिलाओं के लिए शौचालयों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। गोवा, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मिजोरम ऐसे राज्य हैं जहां सबसे कम अदालत परिसरों में टॉयलेट हैं।
सोनिया यादव
02 Aug 2019
toilet facilities for women

एक ओर जहां पूरे देश में स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालयों के निर्माण में करोड़ों रुपये खर्च करने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं एक हक़ीक़त ये है कि 15 प्रतिशत जिला अदालत परिसरों में भी महिलाओं के लिए टॉयलेट की सुविधा उपलब्ध नहीं है।  

केंद्र सरकार की प्रमुख योजना स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल नवंबर में अदालती परिसरों, विशेषकर जिला न्यायालयों में टॉयलेट (शौचालय) के नवीनीकरण और मरम्मत करने के लिए स्वच्छ न्यायालय परियोजना लॉन्च की थी। इस परियोजना को सभी 16,000 अदालत परिसरों में स्थित टॉयलेट को छह महीनों के अंदर बेहतर स्थिति में करने के लिए लॉन्च किया गया था। लेकिन गुरुवार को जारी, दिल्ली में न्यायिक सुधार पर काम करने वाली स्वायत्त संस्था 'विधि' की सर्वे रिपोर्ट जिला अदालतों में महिलाओं के लिए शौचालयों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

इस सर्वेक्षण में अदालत परिसरों में स्थित टॉयलेट की दयनीय स्थिति का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार देश की 665 जिला अदालतों में से करीब100 जिला अदालत ऐसी हैं, जिनमें महिलाओं के लिए टॉयलेट की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, जम्मू एवं कश्मीर, झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, मणिपुर, नगालैंड, ओडिशा, पंजाब, पुडुचेरी, राजस्थान,तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं जिसके कई ज़िलों में तो अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए टॉयलेट ही नहीं हैं।

रिपोर्ट में कहा गया, "आंध्र प्रदेश में 69 प्रतिशत अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए टॉयलेट नहीं हैं। ओडिशा में 60 प्रतिशत और असम में 59 प्रतिशत अदालत परिसरों में यही स्थिति है।"

गोवा, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मिजोरम ऐसे राज्य हैं जहां सबसे कम अदालत परिसरों में टॉयलेट हैं। जहां झारखंड में आठ प्रतिशत अदालत परिसरों में टॉयलेट पूरी तरह संचालित हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में 11 प्रतिशत और मिजोरम में यह आंकड़ा 13 प्रतिशत है। सर्वेक्षेण के अनुसार, झारखंड की राजधानी रांची के जिला अदालत परिसर में महिला और पुरुष किसी के लिए भी टॉयलेट नहीं है।

आप सोच सकते हैं कि यहां महिलाएं कैसे काम करती होंगी या रोज़ाना उन्हें कितना संघर्ष करना पड़ता होगा। सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि आधे से ज्यादा जिला अदालतों में सुविधाओं का आभाव है। यहां तक कि सिर्फ 39 फीसदी अदालतों में ही पोस्ट ऑफिस, बैंक ब्रांच, कैंटीन, फोटो कॉपी,टायपिस्ट और नोटरी जैसी सुविधा उपलब्ध हैं।

अब सवाल ये उठता है कि सरकार कोर्ट परिसर को अपडेट करने के लिए करीब 7000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। आखिर वो कहां खर्च किए जा रहे हैं। सर्वे के मुताबिक देश में सिर्फ 40 फीसदी जिला अदालत ऐसी हैं, जहां पूरी तरह सर्वसुविधायुक्त महिला शौचालय मौजूद हैं।

सर्वे के अनुसार देश की 100 जिला अदालतों में महिलाओं के अलग से शौचालय की सुविधा तो बिल्कुल भी नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक सर्वे के लिए6650 लोगों से सवाल किए गए थे। सुरक्षात्मक पहलू से भी इस सर्वे में सवाल पूछे गए थे, जिसमें खुलासा हुआ कि सिर्फ 11 फीसदी कोर्ट कॉम्प्लेक्स में ही बैग की चैकिंग होती है और 30 फीसदी कोर्ट परिसर में आग लगने की स्थिति में निकासी की सुविधा उपलब्ध नहीं है। वहीं 48 फीसदी जिला अदालतों में आपातकालीन स्थिति में निकलने के लिए बोर्ड नहीं लगाए गए हैं।

जिला अदालतों की ऐसी स्थिति निश्चित तौर पर चिंताजनक है। महिलाओं के लिए तत्पर दिखने का दावा करने वाली सरकार इसे कितनी गंभीरता से लेती है ये देखना होगा।

Swachchh Bharat Abhiyan
Women's Toilets
Toilets
district court
Central Government
gender discrimination

Related Stories

सवाल: आख़िर लड़कियां ख़ुद को क्यों मानती हैं कमतर

मध्य प्रदेश: मुश्किल दौर से गुज़र रहे मदरसे, आधे बंद हो गए, आधे बंद होने की कगार पर

क्या दहेज प्रथा कभी खत्म हो पाएगी?

बोलती लड़कियां, अपने अधिकारों के लिए लड़ती औरतें पितृसत्ता वाली सोच के लोगों को क्यों चुभती हैं?

क्या पुरुषों का स्त्रियों पर अधिकार जताना ही उनके शोषण का मूल कारण है?

एकतरफ़ा ‘प्यार’ को प्यार कहना कहां तक जायज़ है?

क्या समाज और मीडिया में स्त्री-पुरुष की उम्र को लेकर दोहरी मानसिकता न्याय संगत है?

ब्राह्मणसत्ता और पुरुषसत्ता की दोहरी मार झेलती है दलित स्त्री

हर सभ्यता के मुहाने पर एक औरत की जली हुई लाश और...

भारत में स्त्री शिक्षा : प्रतिगामी शिथिलता


बाकी खबरें

  • अजय कुमार
    शहरों की बसावट पर सोचेंगे तो बुल्डोज़र सरकार की लोककल्याण विरोधी मंशा पर चलाने का मन करेगा!
    25 Apr 2022
    दिल्ली में 1797 अवैध कॉलोनियां हैं। इसमें सैनिक फार्म, छतरपुर, वसंत कुंज, सैदुलाजब जैसे 69 ऐसे इलाके भी हैं, जो अवैध हैं, जहां अच्छी खासी रसूखदार और अमीर लोगों की आबादी रहती है। क्या सरकार इन पर…
  • रश्मि सहगल
    RTI क़ानून, हिंदू-राष्ट्र और मनरेगा पर क्या कहती हैं अरुणा रॉय? 
    25 Apr 2022
    “मौजूदा सरकार संसद के ज़रिये ज़बरदस्त संशोधन करते हुए RTI क़ानून पर सीधा हमला करने में सफल रही है। इससे यह क़ानून कमज़ोर हुआ है।”
  • मुकुंद झा
    जहांगीरपुरी: दोनों समुदायों ने निकाली तिरंगा यात्रा, दिया शांति और सौहार्द का संदेश!
    25 Apr 2022
    “आज हम यही विश्वास पुनः दिलाने निकले हैं कि हम फिर से ईद और नवरात्रे, दीवाली, होली और मोहर्रम एक साथ मनाएंगे।"
  • रवि शंकर दुबे
    कांग्रेस और प्रशांत किशोर... क्या सोचते हैं राजनीति के जानकार?
    25 Apr 2022
    कांग्रेस को उसकी पुरानी पहचान दिलाने के लिए प्रशांत किशोर को पार्टी में कोई पद दिया जा सकता है। इसको लेकर एक्सपर्ट्स क्या सोचते हैं।
  • विजय विनीत
    ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?
    25 Apr 2022
    "चंदौली के किसान डबल इंजन की सरकार के "वोकल फॉर लोकल" के नारे में फंसकर बर्बाद हो गए। अब तो यही लगता है कि हमारे पीएम सिर्फ झूठ बोलते हैं। हम बर्बाद हो चुके हैं और वो दुनिया भर में हमारी खुशहाली का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License