NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
भारत
राजनीति
आओ जाति-जाति खेलें!
त्रिपुरा में एक अधिकारी द्वारा आम नागरिक को पीटने की बात ने जातिवादी रंग ले लिया। एक यादव कलेक्टर ने पंडित जी को मारा, इससे सोशल मीडिया दो भागों में बँट गया। एक, जो इस बात पर उद्वेलित थे कि यादव कलेक्टर ने ज़ान-बूझ कर पंडित को जातीय द्वेष के चलते मारा। दूसरे, इस बात से ख़ुश हुए कि पंडित चकरघिन्नी खा गया। ये दोनों ही बातें भारतीय जनता पार्टी की घृणा की राजनीति को स्पष्ट करती हैं।
शंभूनाथ शुक्ल
28 Apr 2021
shailesh yadav DM tripura

पश्चिमी त्रिपुरा ज़िले के डीएम शैलेश कुमार यादव ने पश्चिमी त्रिपुरा थाना इलाक़े में स्थित मानिक्या कोर्ट नामक एक बारात घर में पहुँच कर विवाह समारोह में आए सभी लोगों को डाँट-डपट कर भगाया। एकाध को थप्पड़ भी मारे। वर और पंडित को भी लपड़ियाया गया। चूँकि यह समारोह देर रात तक चालू था और वहाँ नाइट कर्फ़्यू भी लगा हुआ था, इसलिए पूरे मामले की वीडियोग्राफ़ी भी की गई। किसी ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। इसके बाद तो हंगामा मच गया। त्रिपुरा की बिप्लब कुमार देब सरकार की नाकामियों को दरकिनार कर मामला जाति पर आ गया। एक यादव कलेक्टर ने पंडित जी को मारा, इससे सोशल मीडिया दो भागों में बँट गया। एक, जो इस बात पर उद्वेलित थे कि यादव कलेक्टर ने ज़ान-बूझ कर पंडित को जातीय द्वेष के चलते मारा। दूसरे, इस बात से ख़ुश हुए कि पंडित चकरघिन्नी खा गया। ये दोनों ही बातें भारतीय जनता पार्टी की घृणा की राजनीति को स्पष्ट करती हैं।

कोई भी व्यक्ति इस बात पर बहस नहीं कर रहा कि ज़िला दंडाधिकारी (डीएम या डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट) ने अपनी ताक़त का दुरुपयोग किया। उसे क़ानून के उल्लंघन पर आर्थिक दंड और हल्की-फुल्की शारीरिक सजा देने का हक़ तो है, लेकिन खुद किसी को पीटने का नहीं। डीएम ने ऐसा कर अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल किया है। यह एक तरह से मानवाधिकारों का उल्लंघन है। मगर भारतीय जनता पार्टी की उन्मादी नीतियों ने समाज को जिस दिशा में मोड़ दिया है, उसमें इस तरह के लोकतांत्रिक चिंतन के लिए स्थान ही नहीं बचा और लोग पूरे मामले को यादव बनाम पंडित के रूप में देख रहे हैं। उस ज़िलाधिकारी को निलम्बित कर दिया गया है। किंतु इससे मामले का पटाक्षेप नहीं हो जाता। बल्कि इससे तो जातीय घृणा को और आग मिलेगी। एक पक्ष को लगेगा कि डीएम साहब इसलिए सस्पेंड किए गए क्योंकि उन्होंने एक पुरोहित को झापड़ मारा जबकि वे तो सिर्फ़ क़ानून की पालना करवा रहे थे। इस लपेटे में जो भी आ गया वह पिट गया।

तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस व अन्य सेकुलर दलों को कोसने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस मामले में भी तुष्टिकरण की ही नीति अपनाई। चूँकि भाजपा का कोर वोट बैंक सवर्ण है, इसलिए उसे नाख़ुश न होने देने के लिए बिप्लब देब सरकार ने आनन-फ़ानन ज़िलाधिकारी का निलम्बन कर दिया। उधर यादव समेत अन्य पिछड़ों को यह संदेश भी दिया कि हमारे राज में पिछड़ा भी पुरोहित या पंडित को पीट सकता है। मूल प्रश्न वहीं का वहीं रह गया कि एक ज़िलाधिकारी के इस कृत्य को मानवाधिकारों का उल्लंघन कहा जाए या नहीं। अगर ज़िलाधिकारी को यह अधिकार दिया गया, तो कल को पता चला डीएम साहब ही जाकर सीधे एनकाउंटर करने लगे। तब फिर मानव अधिकारों का क्या होगा! लेकिन भाजपा को तो लोकतंत्र चाहिए ही नहीं। भाजपा हर मामले के जातीय और साम्प्रदायिक कोणों को उभारना चाहती है। इससे उसकी सत्ता को हाल-फ़िलहाल कोई ख़तरा नहीं होगा। जब भी सत्ता को ख़तरा दिखे बस जातियों अथवा सम्प्रदायों को आमने-सामने कर दो। पूँजी का केंद्रीकरण करने वाले घरानों को भी ऐसी सरकार पसंद होती है। जो हर आर्थिक लूट को संप्रदाय और जातिवाद से ढक दे। लोगों के बीच के सौहार्द और सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दे। भाजपा इस कला में ख़ूब पारंगत है। इसलिए त्रिपुरा के ज़िलाधिकारी के इस कृत्य को उसने जातिवादी नज़रिए से देखा। डीएम को निलम्बित करने की बजाय बेहतर रहता कि त्रिपुरा सरकार ज़िलाधिकारी से यह पूछ-ताछ करती कि उसने ख़ुद जाकर मार-पीट क्यों की? वह एक स्पष्ट गाइड लाइन तय करती कि कर्फ़्यू का उल्लंघन करने वालों पर क्या कार्रवाई हो? बजाय मार-पीट के उन पर कड़ा आर्थिक दंड लगाया जा सकता था। जैसा कि यूरोपीय देशों में है। इससे एक अच्छा संदेश जाता। आख़िर मास्क नहीं पहनने वाले लोगों पर आर्थिक दंड का ही प्रावधान है। किंतु यह सब न कर उसने वह किया जिसके चलते पूरा प्रकरण संकीर्ण जातिवादी घेरे में आ गया।

हालाँकि यह वीडियो वायरल होने के बाद ज़िलाधिकारी की जब निंदा होने लगी, तो 27 अप्रैल को उन्होंने अपने व्यवहार के लिए माफ़ी माँगी। उन्होंने कहा कि उन्हें जानकारी मिली थी कि रात 11 बजे उस समारोह स्थल पर कार्यक्रम जारी था और काफ़ी भीड़ वहाँ पर थी। इस भीड़ को हटाने के लिए वे वहाँ गए और लोगों को हटाने के कारण धक्का-मुक्की हो गई। लेकिन पीड़ित पक्ष सुभ्राजीत देब ने कहा है, कि उनके पास इस समारोह की अनुमति थी। इस अनुमति पत्र में शादी समारोह से लेकर पार्किंग तक की मंज़ूरी प्रशासन से उन्होंने ले रखी थी। उनके अनुसार कुल 30 के क़रीब लोग ही उस समारोह में थे। दरअसल इस वीडियो में डीएम साहब दूल्हे को भी थप्पड़ मारते दिख रहे हैं और पुरोहित को भी। दुल्हन भी हड़बड़ाहट में भागती हुई जा रही है। पुरोहित, दूल्हा व दुल्हन आयोजक नहीं माने जा सकते। इसलिए इस घटना की ख़ूब निंदा हुई।परंतु किसी ने भी निंदा को मानव अधिकारों के उल्लंघन से नहीं जोड़ा। सरकार ने दबाव में आकर डीएम को सस्पेंड तो कर दिया मगर यह प्रश्न अनुत्तरित है कि आख़िर क्यों प्रशासनिक अधिकारी लोगों से मार-पीट करने लगते हैं? क्यों नहीं डीएम लॉक डाउन के लिए आर्थिक दंड की व्यवस्था करते? इसके लिए मार-पीट, गाली-गलौज तो व्यवस्था की अपनी ख़ामियों को ही दिखाता है। इसका एक ही जवाब है कि सरकार अपने अधिकारियों को किस तरह के दिशा-निर्देश देती है। त्रिपुरा में एक लंबे समय तक वाम दलों की सरकार रही है। उस समय तो कभी ऐसी हरकतें किसी अधिकारी ने नहीं कीं। क्योंकि उन्हें पता था कि सरकार ऐसी स्थिति में बख्शेगी नहीं। साथ ही मानवीय मूल्यों की गरिमा का पाठ भी उन्हें पढ़ाया जाता था। किंतु अब सरकार ने एक लाइन में आदेश पारित कर दिया और हुक्म हुआ कि इस पर पालना हो। तो बस उसी आदेश को लागू करने के लिए अधिकारी अपनी मन-मर्ज़ी पर उतर आए। इस पूरे मामले में जाति देखना दिमाग़ी दीवालियापन है।

मैं कोई तीन साल कोलकाता में जनसत्ता का संपादक रहा। इस दौरान पहले वहाँ ज्योति वसु की और फिर बुद्धदेब भट्टाचार्य की सरकार रही। मैं कभी-कभी बुद्धदेब बाबू से मिलने राइटर्स बिल्डिंग में जाया करता था। वहाँ कोई ताम-झाम नहीं न सुरक्षा का भारी-भरकम अमला। मुख्यमंत्री के सचिव सहज भाव से मुझे मीटिंग रूम में ले जाते और मुख्यमंत्री से बातें होतीं। उस समय वहाँ के पुलिस महानिदेशक दिनेश वाजपेयी मुझे बताया करते थे कि मुख्यमंत्री स्वयं हम लोगों से मीटिंग करते हैं और बताते हैं कि आम लोगों के साथ हमें दोस्ताना व्यवहार करना है। अपराधी को छोड़ना नहीं है पर उसके मानवाधिकारों का भी ख़्याल रखना है। ज़िला मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी तो दूर वहाँ के मंत्री भी किसी तरह का ताम-झाम लेकर नहीं चलते थे। कोई लाल बत्ती नहीं, मुख्यमंत्री के साथ कोई क़ाफ़िला नहीं, कोई पॉयलेट कार नही। तब वे जनता से सीधे संवाद करते थे। और क्या मजाल थी कि कोई अधिकारी सरकारी आदेश की पालन के लिए मार-पीट करे। लेकिन जब मुख्यमंत्री स्वयं जनता से रू-ब-रू नही होगा तो यही होगा जो ज़िला मजिस्ट्रेट शैलेश कुमार यादव ने किया।

अब सोशल मीडिया पर जाति-जाति खेलने से बेहतर है कि लोग इस हक़ीक़त को समझें। जैसा राजा होगा उसके अफ़सर भी वैसे ही होंगे।
 

tripura DM
DM shailesh yadav
marriage raid in tripura
Casteism
BJP
casteism in modi govt
biplab kumar deb
Narendra modi

Related Stories

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

रुड़की से ग्राउंड रिपोर्ट : डाडा जलालपुर में अभी भी तनाव, कई मुस्लिम परिवारों ने किया पलायन

हिमाचल प्रदेश के ऊना में 'धर्म संसद', यति नरसिंहानंद सहित हरिद्वार धर्म संसद के मुख्य आरोपी शामिल 

ग़ाज़ीपुर; मस्जिद पर भगवा झंडा लहराने का मामला: एक नाबालिग गिरफ़्तार, मुस्लिम समाज में डर

लखीमपुर हिंसा:आशीष मिश्रा की जमानत रद्द करने के लिए एसआईटी की रिपोर्ट पर न्यायालय ने उप्र सरकार से मांगा जवाब

टीएमसी नेताओं ने माना कि रामपुरहाट की घटना ने पार्टी को दाग़दार बना दिया है

चुनाव के रंग: कहीं विधायक ने दी धमकी तो कहीं लगाई उठक-बैठक, कई जगह मतदान का बहिष्कार

कौन हैं ओवैसी पर गोली चलाने वाले दोनों युवक?, भाजपा के कई नेताओं संग तस्वीर वायरल

तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़


बाकी खबरें

  • Women Hold Up More Than Half the Sky
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    महिलाएँ आधे से ज़्यादा आसमान की मालिक हैं
    19 Oct 2021
    हाल ही में जारी हुए श्रम बल सर्वेक्षण पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 73.2% महिला श्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करती हैं; वे किसान हैं, खेत मज़दूर हैं और कारीगर हैं।
  • Vinayak Damodar Savarkar
    डॉ. राजू पाण्डेय
    बहस: क्या स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए सावरकर जेल से बाहर आना चाहते थे?
    19 Oct 2021
    बार-बार यह संकेत मिलता है कि क्षमादान हेतु लिखी गई याचिकाओं में जो कुछ सावरकर ने लिखा था वह शायद किसी रणनीति का हिस्सा नहीं था अपितु इन माफ़ीनामों में लिखी बातों पर उन्होंने लगभग अक्षरशः अमल भी किया।
  • Pulses
    शंभूनाथ शुक्ल
    ‘अच्छे दिन’ की तलाश में, थाली से लापता हुई ‘दाल’
    19 Oct 2021
    बारिश के चलते अचानक सब्ज़ियों के दाम बढ़ गए हैं। हर वर्ष जाड़ा शुरू होते ही सब्ज़ियों के दाम गिरने लगते थे किंतु इस वर्ष प्याज़ और टमाटर अस्सी रुपए पार कर गए हैं। खाने के तेल और दालें पहले से ही…
  • migrant worker
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ 20 अक्टूबर को बिहार में विरोध प्रदर्शन
    19 Oct 2021
    "अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद घाटी की स्थिति और खराब हुई है। इससे अविश्वास का माहौल कायम हुआ है, इसलिए इन हत्याओं की जिम्मेवारी सीधे केंद्र सरकार की बनती है।”
  • Non local laborers waiting for train inside railwaysation Nowgam
    अनीस ज़रगर
    कश्मीर में हुई हत्याओं की वजह से दहशत का माहौल, प्रवासी श्रमिक कर रहे हैं पलायन
    19 Oct 2021
    30 से अधिक हत्याओं की रिपोर्ट के चलते अक्टूबर का महीना सबसे ख़राब गुज़रा है, जिसमें 12 नागरिकों की हत्या शामिल हैं, जिनमें से कम से कम 11 को आतंकवादियों ने क़रीबी टारगेट के तौर पर मारा है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License