NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
मज़दूर-किसान
खाद की किल्लत में कहीं सब्सिडी पर खेल न हो जाए?
खाद की दुकानों पर ताला लटका है। खाद की मांग है लेकिन खाद नहीं मिल पा रही। इसलिए खाद की कालाबाजारी हो रही है। मगर वाकई देश में खाद कम है। अगर खाद कम है तो क्यों कम है?
अजय कुमार
24 Oct 2021
fertilizer
सौजन्य :socialmediagossips.com

देश में खाद की किल्लत खतरनाक स्तर पर बढ़ गई है। कहीं किसानों को लाठी मारकर भगाया जा रहा है तो कहीं किसान भरी बरसात में लाइन लगाने के बाद बिना खाद लिए लौट जा रहे हैं। मध्य प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश के कई खाद्य वितरकों के दुकानों पर ताला लगा है। खाद की किल्लत होने की वजह से कालाबाजारी भी बढ़ी है। सही दाम पर खाद नहीं मिल पा रही, खाद उन्हें ही मिल पा रही है जिनकी जेब में पैसे की दिक्कत नहीं है। जब बात पैसे की दिक्कत की आती है तो भारत में 90 फ़ीसदी से अधिक किसान अपने आप बाहर हो जाते हैं।

खाद के तौर पर मुख्य तौर पर भारत में नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल किया जाता है। जमीन से जुड़े इन पोषक तत्व की भरपाई किसान यूरिया, डीएपी (डाई अमोनिया फास्फेट) और MOP (मयुरियेट ऑफ पोटाश) की खाद की बोरियां खरीद कर करते हैं। कृषि जानकारों के मुताबिक एक हेक्टेयर जमीन पर 110 किलो यूरिया, 50 किलो डीएपी और 20 किलो MOP का इस्तेमाल होता है।

किसानों के शब्दों में ही कहे तो डीएपी बाजार में नहीं है। जिसमें तकरीबन 46 फ़ीसदी फास्फोरस होता है। यह पौधे की जड़ों को जमीन में मजबूत करने में भूमिका निभाता है। इसलिए बुवाई के समय इसकी सबसे अधिक जरूरत होती है। यह समय रबी के फसल की बुवाई का है। देशभर में गेहूं चना मटर सरसों आलू जैसे फसलों की खेती इसी समय होती है। कृषि जानकारों के मुताबिक बुवाई के तकरीबन 20-25 दिन के बाद यूरिया दी जा सकती है। लेकिन डीएपी की जरूरत बुवाई के समय ही पड़ती है। नवंबर के पहले सप्ताह के भीतर अगर डीएपी की बोरियां जरूरी मात्रा में सभी किसानों के पास नहीं पहुंचती है तो रबी का यह सीजन किसानों के लिए बहुत अधिक नुकसानदायक हो सकता है।

इस महीने खाद का स्टॉक पिछले साल के इसी महीने खाद के स्टॉक से आधे से भी कम है। यूरिया, DAP और MOP इन सभी की बोरिया उतनी नहीं है जितनी किसानों को चाहिए।

वरिष्ठ कृषि पत्रकार हरीश दामोदरन बताते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमतों में अचानक से हुई बढ़ोतरी है।

इसे भी पढ़े: https://hindi.newsclick.in/Why-is-the-government-creating-large-database-related-to-agriculture

लागत और भाड़े को मिला दिया जाए तो प्रति टन डीएपी की आयातित कीमत 675 डॉलर से लेकर 680 डॉलर तक पहुंच गई है। पिछले साल यह कीमत महज 375 डॉलर प्रति टन के आसपास थी। पिछले साल दूसरे देशों से MOP प्रति टन 230 डॉलर में मिल जाता था अब यह 500 डॉलर प्रति टन ही नहीं मिल रहा है। कीमतों में इसी तरह की बढ़ोतरी यूरिया अमोनिया फास्फेट सल्फर सभी तरह के खाद के घटकों के साथ हुई है।

इसका मतलब है कि इस समय तीन तरह की परेशानियां पैदा हो गई हैं। दूसरे देशों में कीमत बढ़ने से आयात महंगा हो गया है। खाद की लागत बढ़ने से इसकी बिक्री की कीमत बढ़ेगी। बिक्री कीमत बढ़ने से भार किसानों पर पड़ेगा।

खाद की कीमतों से पैदा होने वाले भार को कम करने के लिए भारत सरकार सब्सिडी पर किसानों को खाद देती आई है। लेकिन पिछले कुछ सालों से खाद की कीमतों में बहुत अधिक बढ़ोतरी हो रही है। और सरकार की सब्सिडी कम होती जा रही है। साल 2014-15 में सरकार ने खाद्य सब्सिडी के तौर पर बजट में 71000 करोड रुपए का आवंटन किया था। साल 2020-21 में भी यही राशि सब्सिडी के तौर पर सरकार द्वारा दी जा रही है। लेकिन तब से लेकर अब तक महंगाई और ब्याज दरों को समायोजित करके देखा जाए तो यह किसानों के लिए घाटे वाला सौदा है। ऐसी बात है जैसे सरकार यह कह दे कि वह किसानों को सब्सिडी दे रही है जबकि हकीकत में सब्सिडी उतनी नहीं दी जा रही हो जितनी दी जानी चाहिए।

 इसे भी पढ़े: https://hindi.newsclick.in/Bihar-Farmers-are-not-getting-urea-fertilizer-at-reasonable-price-retail-traders-are-also-forced-to-sell-it-at-higher-price

अबकी बार की बढ़ोतरी से जब DAP कीमतें अधिक हुई तो मध्य प्रदेश के किसानों ने विरोध किया और सरकार की तरफ से किसानों पर लाठियां चलाई गई। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर मनीष कुमार मीडिया से मुखातिब होते हुए कहते हैं कि मई 2020 में खाद बेचने वाली कंपनियों की 50 किलो DAP की लागत 1200 रुपये आ रही थी। सरकार की तरफ से 500 रुपये की सब्सिडी सीधे खाद बनाने वाली कंपनियों को मिल जा रही थी इसलिए 700 रुपये की कीमत चुका कर किसान 50 किलो डीएपी की बोरी खरीद रहा था। इस साल अक्टूबर में फिर से अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने की वजह से खाद बनाने वाली कंपनियों की 50 किलो डीएपी की कीमत 1900 रुपये पहुंच गई। सरकार ने 500 रुपये सब्सिडी की जगह 1200 रुपये सब्सिडी कर दिया। लेकिन कीमतें फिर से बढ़ गई और खाद बनाने वाली कंपनियों की 50 किलो डीएपी खाद बनाने की कीमत 2400 रुपये पहुंच गई। सब्सिडी नहीं बढ़ाई गई और अब किसानों को 50 किलो डीएपी खरीदने के लिए 1200 रुपये की कीमत चुकानी पड़ रही है। ऐसे में क्या हो? गुस्सा तो निकलेगा ही?

इसे भी पढ़े: https://hindi.newsclick.in/farmers-are-right-corporate-control-over-food-sector-growing

ऐसे में खाद का प्रबंधन करने के लिए सरकार को कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है। पहले की अपेक्षा इस बार घरेलू स्तर पर भी खाद का कम उत्पादन हुआ। इस उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत है। सब्सिडी को बढ़ाने की जरूरत है। बढ़ा हुआ भार सरकार को खुद सहन करना चाहिए। अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो किसानों पर भयंकर मार पड़ेगी। वह पहले ही अपनी उपज को बहुत कम कीमतों पर बेचते हैं। सरकार जो MSP तय करती है, वह भी वाजिब नहीं होता। ऊपर से किसानों पर महंगे खाद का बोझ डाल दिया जाए तब तो असर भयंकर होगा। अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ तो सरकार तालमेल बिठा लेगी लेकिन सब्सिडी पर ही खेल करेगी। सब्सिडी पर खेल ना करे तभी  किसानों का भला होगा।

MSP
Fertiliser Usage
npk

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

अगर फ़्लाइट, कैब और ट्रेन का किराया डायनामिक हो सकता है, तो फिर खेती की एमएसपी डायनामिक क्यों नहीं हो सकती?

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

उत्तर प्रदेश चुनाव : डबल इंजन की सरकार में एमएसपी से सबसे ज़्यादा वंचित हैं किसान

उप्र चुनाव: उर्वरकों की कमी, एमएसपी पर 'खोखला' वादा घटा सकता है भाजपा का जनाधार

कृषि बजट में कटौती करके, ‘किसान आंदोलन’ का बदला ले रही है सरकार: संयुक्त किसान मोर्चा

केंद्र सरकार को अपना वायदा याद दिलाने के लिए देशभर में सड़कों पर उतरे किसान


बाकी खबरें

  • Afganistan
    शिरीष खरे
    वैश्विक महामारी कोरोना में शिक्षा से जुड़ी इन चर्चित घटनाओं ने खींचा दुनिया का ध्यान
    30 Nov 2021
    कोविड-19 महामारी से यूं तो दुनिया के ज्यादातर देशों में एजुकेशन सिस्टम प्रभावित हुआ है, लेकिन अमेरिका के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अन्य देशों के मुकाबले यह अपेक्षाकृत अधिक ताकतवर और विकसित…
  • muzaffarpur Motiabind Operation
    एम.ओबैद
    बिहारः डॉक्टरों की लापरवाही से 26 लोगों की गई आंखों की रोशनी, आंख निकालने की नौबत
    30 Nov 2021
    मुज़फ़्फ़रपुर आंखों के हॉस्पिटल में 60 लोगों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था, जिनमें 26 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई। संक्रमण इतना बढ़ गया है कि कुछ लोगों की आंख निकालनी पड़ सकती है।
  • UP TET
    भाषा
    टीईटी पेपर लीक मामला: उप्र एसटीएफ ने एक प्रिंटिंग प्रेस के मालिक को गिरफ़्तार किया
    30 Nov 2021
    एसटीएफ की नोएडा इकाई के एसपी राजकुमार मिश्रा ने बताया कि जांच में पता चला है कि कोलकाता, नोएडा, दिल्ली में स्थित विभिन्न प्रिंटिंग प्रेस में टीईटी की परीक्षा के प्रश्न पत्र छपवाए गए थे। 
  • Indian team
    भाषा
    दक्षिण अफ्रीका ने टीम इंडिया के लिए सुरक्षित बायो-बबल का वादा किया
    30 Nov 2021
    भारत ए मंगलवार से ब्लोमफोंटेन में दक्षिण अफ्रीका ए के खिलाफ दूसरा अनौपचारिक टेस्ट खेलेगा। विराट कोहली और उनकी टीम नौ दिसंबर को यहां पहुंचेगी लेकिन देश में कोविड का ओमीक्रोन प्रारूप मिलने के बाद दौरे…
  • MGNREGA
    रवीन्द्र नाथ सिन्हा
    पश्चिम बंगाल में मनरेगा का क्रियान्वयन खराब, केंद्र के रवैये पर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल
    30 Nov 2021
    मनरेगा जॉब कार्ड दिए जाने में पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस समर्थकों को ही प्रायः वरीयता दी जाती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी शिकायत की है कि केंद्र सरकार भी इस योजना के कार्यान्वयन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License