NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
उत्पीड़न
नज़रिया
समाज
भारत
राजनीति
अपने आदर्शों की ओर लौटने का आह्वान करती स्वतंत्रता आंदोलन की भावना
स्वतंत्रता आंदोलन ने प्रेस की स्वतंत्रता और सबको साथ लेकर चलने के विचारों का समर्थन किया था और ये आदर्श भारत छोड़ो आंदोलन की विरासत हैं। ये इसलिए भी प्रासंगिक हैं क्योंकि भारत इस समय लोकतांत्रिक पैमाने से नीचे खिसकता जा रहा है।
एस एन साहू 
18 Aug 2021
quit india
फ़ोटो साभार: फर्स्टपोस्ट

भारत छोड़ो आंदोलन की 79वीं वर्षगांठ के कुछ दिनों बाद ही रविवार को भारत ने अपनी स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनायी। ब्रिटिश शासन से मुक्ति के अलावा इन आंदोलनों ने भारत के एक लोकतांत्रिक नज़रिये को अपनाया, भाषण की स्वतंत्रता को बरक़रार रखा और विविधता, बहुलतावाद और दुनिया के प्रति एक खुले नज़रिये को मज़बूती के साथ अपनाया। लेकिन, इस समय सत्ता में बैठे लोग संविधान और स्वतंत्रता को रौशन करने वाले इन मूल विचारों को कुचल दे रहे हैं।

भारत को एक स्वतंत्र देश का दर्जा हासिल था, लेकिन अब कई सूचकांकों में यह स्वतंत्रता आंशिक रूप से नीचे की ओर जा रहा है। कुछ लोग इसे निर्वाचित निरंकुशता भी कहते हैं क्योंकि मौदूदा शासन स्वतंत्रता का लगातार गला घोंट रहा है।

जब ब्रिटिश शासकों ने एकतरफ़ा तौर पर भारत को दूसरे विश्व युद्ध में घसीट लिया था तब स्वतंत्रता के लिए लॉन्चपैड बना भारत छोड़ो आंदोलन, प्रेस सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि के ख़िलाफ़ सामने आया था। स्वतंत्रता सेनानियों की इच्छा के उलट, स्वतंत्रता संग्राम के शीर्ष नेतृत्व के विरोध के स्वर को दबाने के लिए देश पर प्रेस सेंसरशिप थोप दी गयी थी।

मिसाल के तौर पर, अहिंसा पर गांधी के लेखन को भी सेंसरशिप के हवाले कर दिया गया था। अंग्रेज़ों ने उन्हें अपने विचार व्यक्त करने से इसलिए रोक दिया था क्योंकि भारत ने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया था और युद्ध गतिविधियों में लगा हुआ था। जो थोड़ी-बहुत बोलने की आज़ादी थी, उस पर सख़्ती के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया था। गांधी ने 1941 में "व्यक्तिगत सत्याग्रह" शुरू करके उस सेंसरशिप का विरोध किया। प्रेस की स्वतंत्रता की हिफ़ाज़त के लिहाज़ से यह उनका एकमात्र सत्याग्रह था। उन्होंने पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही के रूप में विनोबा भावे को चुना। उनकी गिरफ़्तारी के बाद जवाहरलाल नेहरू और दूसरे नेताओं ने उस सत्याग्रह के लिए ख़ुद को सामने कर दिया। गांधी ने लिखा, "भाषण और कलम की आज़ादी स्वराज की बुनियाद है। अगर इस बुनियाद का पत्थर ख़तरे में है, तो आपको उस पत्थर की हिफ़ाज़त को लेकर अपनी पूरी ताक़त झोंक देनी होगी।”

आज़ादी और भारत छोड़ो आंदोनलन के क्रमश: 75 और 79 साल बाद प्रेस, स्वराज की उसी बुनियाद पर गंभीर हमले हो रहे हैं और पत्रकारों पर उनके काम करने को लेकर देशद्रोह के आरोप लगाये जा रहे हैं। सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को जेल में रखना और उनके मोबाइल फ़ोन को निशाना बनाना और उनकी सभी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए सैन्य-ग्रेड स्पाइवेयर का कथित इस्तेमाल करना,इन सब हरक़तों ने  प्रेस से जुड़े लोगों के लिए एक अभूतपूर्व ख़तरा पैदा कर दिया है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की ओर से तैयार किये गये 2021 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 142 वें स्थान पर है और पत्रकारों के लिए "दुनिया के सबसे ख़तरनाक देशों में से एक" है। प्रेस के लिए ऐसा डरावना माहौल तो भारत की आज़ादी पर ही हमला है।

गांधी के कुछ शब्द प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आकार लेते कथित नये भारत में गूंजते हैं। उन्होंने चेताते हुए कहा था, "मेरे मन में यह बात पूरी तरह साफ़ है कि ब्रिटिश भारत में बोलने की वास्तविक आज़ादी बहुत कम है, 'भारतीयों का भारत' अब भी थोड़ा ही है और कोई स्वतंत्र न्यायपालिका भी नहीं है।" न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगते सवालिया निशान और संस्थानों पर होते लगातार हमले हमें ब्रिटिश शासन की उन्हीं आलोचनाओं की याद दिलाते हैं।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 15 सितंबर,1940 को गांधी ने कहा था, “(यूके में) सेंट पॉल कैथेड्रल को क्षतिग्रस्त  होते देखते हुए मुझे दुख होता है। इससे मुझे उतना ही दुख होता है, जितना दुख हमें यह सुनकर होता कि काशी विश्वनाथ मंदिर या जामा मस्जिद क्षतिग्रस्त हो गयी है...”। सबको साथ लेकर चलने वाले ये आदर्श 1992 में भारत में तब तबाह हो गए, जब बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया और ज़िम्मेदार लोगों में से किसी को भी सज़ा नहीं मिल पायी। तब से चीज़ें बदतर ही होती जा रही हैं।

हाल ही में जब उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में एक मस्जिद को तोड़ा गया, तो सत्ता में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को कोई मलाल तक नहीं था। जिन लोगों ने इसका विरोध किया या इस विध्वंस के ख़िलाफ़ क़ानूनी सहारा लेने की कोशिश की, उन्हें उन लोगों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ा, जो राज्य में सत्ता का मज़ा ले रहे हैं। भारत छोड़ो आंदोलन और आज़ादी के आंदोलन की सबको साथ लेकर चलने के इस अटूट जज़्बे को उस आक्रामक बहुसंख्यकवादी रुख़ के साथ जानबूझकर नकार दिया गया है, जो भारत की संवैधानिक दृष्टि का उल्लंघन है।

गांधी के उन दिनों के गूंजते शब्दों की याद दिलाते हुए आज फिर से लोग पूछ रहे हैं, “क्या भारत एक लोकतंत्र देश है”? लोकतंत्र को परिभाषित करने वाले और उसकी रक्षा करने वाले लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जान-बूझकर किये जा रहे हमलों के चलते लोगों में ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है। मई, 1944 में जब एक मित्र ने गांधी से पूछा था कि क्या भारत छोड़ो आंदोलन सत्ता पर काबिज़ होने को लेकर किया गया एक अहिंसक विद्रोह था, तो उन्होंने जवाब दिया था, “एक अहिंसक विद्रोह...सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के रूप में  सामने आने वाले रिश्तों का एक कार्यक्रम है... यह कभी भी ज़बरदस्ती का इस्तेमाल नहीं करेगा। इसके उलट विचार रखने वालों को भी इसके तहत पूरी सुरक्षा हासिल होगी।”

दुर्भाग्य से सरकार विपरीत विचार रखने वालों को निशाना बनाती है और सरकार से असहमति रखने वालों या उसकी आलोचना करने वालों को बदले की कार्रवाई के साथ अपराधी ठहराती है। प्रधान मंत्री ने हाल ही में कहा था कि भारत छोड़ो की इसी भावना से लोगों को "भारत जोड़ो" आंदोलन शुरू करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, लेकिन लोगों के बीच बढ़ती दूरी के लिहाज़ से यह आह्वान खोखला लगता है,क्योंकि सत्ता चलाने वाले ख़ुद इस दूरी को बढ़ा रहे हैं।

हम भारतीयों को लोकतंत्र की हिफ़ाज़त, सबको साथ लेकर चलने की मानसिकता, प्रेस की स्वतंत्रता और परस्पर विरोधी विचारों की स्वीकृति के लिहाज़ से भारत छोड़ो आंदोलन और आज़ादी के आंदोलन की सच्ची भावना के आह्वान की ज़रूरत है, यह उस भारत के विचार को बनाये रखने के लिए भी ज़रूरी है, जो इस समय ख़ुद ही ख़तरे में है।

स्वर्गीय केआर नारायणन के राष्ट्रपतित्व काल में एसएन साहू उनके विशेष कार्य अधिकारी थे। इनके व्यक्त विचार निजी हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

 https://www.newsclick.in/spirit-freedom-movement-calls-return-its-ideals

Quit India Movement
BJP
Dissent
Mahatma Gandhi
Independence Struggle
Narendra modi

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • spain
    डीडब्ल्यू
    स्पेन : 'कंप्यूटर एरर' की वजह से पास हुआ श्रम सुधार बिल
    08 Feb 2022
    स्पेन की संसद ने सरकार के श्रम सुधार बिल को सिर्फ़ 1 वोट के फ़ासले से पारित कर दिया- विपक्ष ने कहा कि यह एक वोट उनके सदस्य ने ग़लती से दे दिया था।
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव 2022 : बदहाल अस्पताल, इलाज के लिए भटकते मरीज़!
    08 Feb 2022
    भारतीय रिजर्व बैंक की स्टेट फाइनेंस एंड स्टडी ऑफ़ बजट 2020-21 रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड सरकार के द्वारा जन स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च किया गया है।
  • uttarakhand
    न्यूज़क्लिक टीम
    चमोली जिले का थराली विधानसभा: आखिर क्या चाहती है जनता?
    07 Feb 2022
    उत्तराखंड चुनाव से पहले न्यूज़क्लिक की टीम ने चमोली जिले के थराली विधानसभा का दौरा किया और लोगों से बातचीत करके समझने का प्रयास किया की क्या है उनके मुद्दे ? देखिए हमारी ग्राउंड रिपोर्ट
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    धर्म का कार्ड नाजी दौर में ढकेलेगा देश को, बस आंदोलन देते हैं राहत : इरफ़ान हबीब
    07 Feb 2022
    Exclusive इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने देश के Living Legend, विश्व विख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब से उनके घर अलीगढ़ में बातचीत की और जानना चाहा कि चुनावी समर में वह कैसे देख रहे हैं…
  • Punjab
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाबः बदहाल विश्वविद्यालयों पर क्यों नहीं बात करती राजनैतिक पार्टियाँ !
    07 Feb 2022
    पंजाब में सभी राजनैतिक पार्टियाँ राज्य पर 3 लाख करोड़ के कर्ज़े की दुहाई दे रही है. इस वित्तीय संकट का एक असर इसके विश्वविद्यालयों पर भी पड़ रहा है. अच्छे रीसर्च के बावजूद विश्वविद्यालय पैसे की भारी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License