NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
अगर पेड़ों पर जीवन टिका है तो एक पेड़ की कीमत ₹75 हज़ार से ज़्यादा तय होने पर खलबली क्यों नहीं?
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की इस रिपोर्ट के अनुसार अगर पेड़ की उम्र 100 साल से अधिक है तो एक पेड़ की कीमत ₹1 करोड़ से अधिक की हो सकती है। 
अजय कुमार
04 Feb 2021
tree

दुनिया के सभी देशों की तरह भारत भी हर दिन किसी न किसी गंभीर परेशानी से जूझता रहता है। इन सभी परेशानियों को दरकिनार कर दुनिया के किसी कोने में बैठ कर एक सेलिब्रिटी के जरिए किए गए 6 शब्दों के ट्वीट से अगर भारत के अभिजात्य वर्ग सहित पूरी भारत सरकार उस सेलिब्रिटी के पीछे पड़ जाती है, तब तो यह कहना ही पड़ेगा कि हम अपने परेशानियों को लेकर गंभीर नहीं हैं। एक समाज और सरकार दोनों के लिहाज से हम बहुत अधिक सतही बनते जा रहे हैं। हमारी संवेदनशीलता बहुत अधिक उथली हो चुकी है। हमारी सारी समझदारी चमक दमक के नशे में डूबी हुई है। ऐसे में वह तमाम खबरें हर रोज अपना दम तोड़ देती हैं, जिन्हें चमक दमक का सहारा नहीं मिलता है।

जब सोशल मीडिया की पूरी दुनिया सहित भारत सरकार एक सेलिब्रिटी के ट्विट पर जुत्तम चप्पल कर रही थी तभी सुप्रीम कोर्ट की कमेटी का पेड़ों को लेकर एक अहम फैसला आया। जिस पर कोई चर्चा नहीं हुई।

चर्चा हो भी क्यों? हमारा समाज एक मसाला समाज में बदलता जा रहा है। और मसाला समाज बनाने का काम खुद हमारी सरकार कर रही है।

पश्चिम बंगाल में तकरीबन साढे 350 से ज्यादा पेड़ काटकर पांच रेलवे ब्रिज बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। इसी सुनवाई के दौरान पेड़ों की कीमत तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय के जरिए पेश की गई पिछले साल की रिपोर्ट का पहली बार सार्वजनिक तौर पर खुलासा हुआ।

इस रिपोर्ट के मुताबिक साल भर में एक पेड़ की कीमत तकरीबन ₹74500 आंकी गई है। यानी अगर पेड़ की उम्र 100 साल से अधिक है तो एक पेड़ की कीमत ₹1 करोड़ से अधिक की हो सकती है। इस रिपोर्ट का कहना है कि कभी कभार ऐसा होता है कि एक प्रोजेक्ट के लिए जब 100 से अधिक पेड़ गिराए जाते हैं तो इस प्रोजेक्ट की मौद्रिक कीमत गिराए गए पेड़ों की आर्थिक और पर्यावरणीय कीमत से कम होती है।

आप चौक गए होंगे? सोच रहे होंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? आखिरकर लकड़ी की कीमत इतनी कैसे हो सकती है? अगर आपके दिमाग में रिहाना, कंगना, अक्षय कुमार, सचिन तेंदुलकर, अजय देवगन जैसे लोगों का भूत सवार होगा तो यह बात सुनकर चौंकना लाजमी है। और अगर आप देश दुनिया को थोड़ा गहरे तरीके से देख रहे होंगे तो पेड़ों की इतनी कीमत क्यों है, इसे समझ गए होंगे। इसे थोड़ा पर्यावरण के लिहाज से समझिए। सुप्रीम कोर्ट के पास प्रोजेक्ट लगाते समय पर्यावरण पर होने वाले नुकसान को लेकर कई सारे मामले आए। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई। जिसका मकसद महज पेड़ों की लकड़ी का कीमत तय करना नहीं था। बल्कि यह तय करना था कि पेड़ों की पर्यावरणीय कीमत कितनी है। यानी पेड़ जितना ऑक्सीजन छोड़ते हैं, मिट्टी के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व की तरह काम करते हैं, मिट्टी के लिए खाद की तरह काम करते हैं, जलवायु और मौसम नियंत्रण की तरह काम करते हैं जैसे पेड़ों से जुड़ी पर्यावरण की सभी उपयोगिता को जोड़ लिया जाए तो पेड़ों की कीमत क्या होगी? इन सभी पहलुओं को जोड़कर पेड़ों की कीमत तय करने के लिए पांच सदस्यों की सुप्रीम कोर्ट की कमेटी बनी थी।

जिसके मुताबिक साल भर में एक पेड़ के जरिए निकलने वाले ऑक्सीजन की कीमत ₹65000 आंकी गई। पेड़ से बनने वाले जैविक खाद की कीमत ₹20000 आंकी गई। बाकी पेड़ों से जुड़ी दूसरी तरह की उपयोगिताओं को जोड़कर पेड़ों की साल भर की कीमत ₹75500 आंकी गई।

इसलिए कमेटी का कहना है कि अगर पेड़ की सारी उपयोगिता एक साथ मिलाकर देखें तो कई मामलों में प्रोजेक्ट लगाने के लिए काटे गए पेड़ की कीमत प्रोजेक्ट की मौद्रिक कीमत से ज्यादा हो सकती है। यह रिपोर्ट इतनी गंभीर है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी इसे स्वीकार नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अगर इस रिपोर्ट को हूबहू स्वीकार किया गया तो किसी भी सरकार का दिवालिया निकल सकता है। इसलिए इस रिपोर्ट को संतुलित करने की भी जरूरत है। केंद्र और राज्य सरकार को इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की जिस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि अगर 300 पेड़ों को सौ वर्ष या अधिक समय तक जीने दिया जाता है तो ये 2.2 अरब रुपये के उत्पाद देंगे। 300 पेड़ों की भविष्य की यही कीमत है। अगर 59.2 किलोमीटर सड़क पर विचार किया जाए तो ये एक दशक या इससे कुछ अधिक समय में भीड़भाड़ वाले होंगे और अधिकारियों को इसका चौड़ीकरण करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा और इस तरह से 4056 पेड़ों को काटने की जरूरत होगी।’उस सूरत में 100 वर्षों में उत्पादों की कीमत 30.21 अरब रुपये होगी। इसलिए इस पर्यावरणीय आपदा से बचने के लिए नियमित ढांचे से बाहर के समाधान की जरूरत है।’

कमेटी ने यह भी सुझाव दिया है कि हाईवे प्रोजेक्ट के लिए पेड़ काटने से पहले दूसरे विकल्पों की तरफ भी देखा जाना चाहिए। जैसा देखा जाना चाहिए क्या रेलवे और जल मार्ग के जरिए आवाजाही हो सकती है या नहीं? जब कोई विकल्प कारगर न दिखे तभी जाकर अंत में पेड़ काटने का फैसला करना चाहिए।

मौजूदा समय में बहुत सारी आधुनिक तकनीक आ चुकी हैं जो पेड़ को जड़ से उठाकर दूसरी जगह पर रख सकती हैं। इनका भी इस्तेमाल होना चाहिए। एक पेड़ काटकर पांच पौधे लगाने का चलन है। लेकिन एक पेड़ के काटने से जितना बड़ा पर्यावरणीय प्रभाव पड़ता है उसका मुकाबला महज 5 पौधे नहीं कर सकते। इसलिए पेड़ की शाखाओं और उम्र के मुताबिक पेड़ काटने पर पौधे लगाने की संख्या भी बदलती रहनी चाहिए। अगर छोटी शाखा वाला पेड़ काटा जा रहा है तो उसकी जगह पर 10 पौधे लगनी चाहिए। और अगर बहुत बड़ी शाखा वाला पेड़ काटा जा रहा है तो उसकी जगह पर कम से कम 50 नए पौधे लगने चाहिए।

सेंटर फॉर एन्वायरमेट एंड साइंस की निदेशक और इस कमेटी की एक सदस्य सुनीता नारायण का कहना है कि 100 साल से अधिक उम्र से मौजूद पेड़ों को पहचानना और उनका संरक्षण करना बेहद जरूरी है। इन्हें काटकर नए पौधे लगाकर इनकी उपयोगिता को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है। इन पेड़ों की पर्यावरण की उपयोगिता तो होती ही है। इसके साथ ऐसे पेड़ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होते हैं। हर हाल में इनका संरक्षण किया जाना चाहिए।

अंत में जरा सोचकर देखिए कि पर्यावरण से जुड़ी अहम खबर पर अगर उतनी चर्चा की जाए जितना 6 शब्दों के ट्वीट पर चर्चा की गयी है, तो पर्यावरण को लेकर कितनी जागरूकता फैलती। लेकिन अफसोस ऐसा नहीं होता है। चमक दमक के नशे में डूबी दुनिया से सबसे महत्वपूर्ण विमर्श चुपचाप गायब हो जाते हैं।

tree
heritage tree
supreme court panel on tree
environment degradation

Related Stories

तमिलनाडु: नागापट्टिनम में पेट्रोकेमिकल संयंत्र की मंजूरी का किसानों ने किया विरोध

उत्तराखंड: विकास के नाम पर 16 घरों पर चला दिया बुलडोजर, ग्रामीणों ने कहा- नहीं चाहिए ऐसा ‘विकास’

पर्यावरणीय पहलुओं को अनदेखा कर, विकास के विनाश के बोझ तले दबती पहाड़ों की रानी मसूरी


बाकी खबरें

  • Delhi: One Year After Suicide of LSR Student
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लेडी श्रीराम कॉलेजः छात्रा को दी गई श्रद्धांजलि, आत्महत्या के एक साल बाद भी नहीं जागा प्रशासन
    09 Nov 2021
    'ऐश्वर्या की संस्थागत हत्या को एक साल हो गए है। छात्रवृत्ति में देरी के कारण उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा।'
  • fire hospital
    अमेय तिरोदकर
    महाराष्ट्र के अस्पतालों में आग की घटनाओं ने खोल दी व्यवस्था की पोल
    09 Nov 2021
    राज्य सरकार ने अस्पतालों में बार-बार हो रहीं आग की घटनाओं पर मिले कई सुझावों के बावजूद, इसकी रोकथाम के लिए अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 10,126 नए मामले, 332 मरीज़ों की मौत
    09 Nov 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.41 फ़ीसदी यानी 1 लाख 40 हज़ार 638 हो गयी है।
  • kashi vishwanath
    विजय विनीत
    स्पेशल रिपोर्टः चोर दरवाजे से काशी विश्वनाथ मंदिर में कॉरपोरेट घरानों को घुसाने की तैयारी!
    09 Nov 2021
    काशी विश्वनाथ धाम परियोजना का ज्यादातर काम पूरा हो चुका है। अब इसे आमदनी का जरिया बनाने की कवायद शुरू कर दी गई है। मंदिर का रेवेन्यु मॉडल विकसित करने के लिए ब्रिटेन की बहुराष्ट्रीय कंपनी अर्न्स्ट एंड…
  • Demonetisation
    वी श्रीधर
    तबाही मचाने वाली नोटबंदी के पांच साल बाद भी परेशान है जनता
    09 Nov 2021
    2016 की नोटबंदी के दुस्साहसिक क़दम और उससे लगे आघात ने आम जनता की आजीविका को नष्ट कर दिया था और भारतीय मुद्रा प्रणाली की अखंडता को नुकसान पहुंचाया था, पांच साल गुज़रने के बाद, इसका भूत आज भी भारतीयों…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License