NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
तेलंगाना चुनाव : टीआरएस शासन में श्रमिकों को नज़रअंदाज़ किया गया
नए राज्य के रूप में तेलंगाना बड़े तथा छोटे उद्योगों के बंद होने का साक्षी बन गया है। इसने हज़ारों श्रमिकों को बेरोज़गार कर दिया। वर्ष 2014 से लेकर अब तक लगभग 1500 छोटे कारखाने बंद हो गए हैं।
पृथ्वीराज रूपावत
03 Dec 2018
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: PARI

के चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में तेलंगाना राष्ट्र समिति के शासन में संगठित तथा असंगठित क्षेत्रों में श्रमिकों और कर्मचारियों के मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया गया है जिससे तेलंगाना में लाखों लोग बदतर हालत में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि न केवल ट्रेड यूनियन का अधिकार बल्कि लगभग सभी क्षेत्रों में श्रमिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) तेलंगाना के महासचिव वी रत्नाकर राव कहते हैं कि ठेके पर रखे गए श्रमिकों के औपचारिकरण तथा न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि करने के निरंतर वादों के बावजूद टीआरएस ने इन श्रमिकों को असुरक्षित तथा बिना शरण के छोड़ दिया है जिससे लाखों मज़दूर कम मज़दूरी में ही जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राव ने न्यूज़़क्लिक से कहा कि "टीआरएस सरकार ने बीजेपी की अगुआई वाली केंद्र सरकार के मज़दूर-वर्ग विरोधी नीतियों को बढ़ावा देने वाली नीति का पालन किया है। जब मोदी सरकार ने श्रमिकों को कमज़ोर करते हुए उद्योगपतियों के हितों को आगे बढ़ावा देने का मकसद से 44 श्रम कानूनों को चार श्रम संहिता में विलय का प्रस्ताव दिया तो तेलंगाना सरकार ने इस प्रस्तावित क़दम का स्वागत किया था।" उन्होंने कहा कि टीआरएस सरकार ने राज्य में किसी भी सूचीबद्ध नियोजन के न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम में संशोधन नहीं किया।

तेलंगाना में विभिन्न श्रेणियों के उद्योगों में 72 आधिकारिक नियोजित उद्यम हैं जैसे फार्मा, कॉटन, तंबाकू, इलेक्ट्रॉनिक्स, लौह, टाट आदि।

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीआईटीयू) के तेलंगाना प्रदेश के उपाध्यक्ष आर सुधा भास्कर ने न्यूज़क्लिक से कहा कि 71 नियोजित उद्यम के कर्मचारी मांग कर रहे हैं कि उत्तरोत्तर सरकारों ने एक दशक से अधिक समय से उपयुक्त सरकारी आदेश (जीओ) को तैयार किया और इस क्षेत्र में पहले की सरकारों से टीआरएस सरकार कोई अलग नहीं है।

ट्रेड यूनियनों के अनुमानों के अनुसार असंगठित क्षेत्र में लगभग 90 लाख लोग (राज्य की आबादी का एक चौथाई हिस्सा) शामिल हैं जिनमें गमाली श्रमिक (चढ़ाने और उतारने वाले श्रमिक), परिवहन क्षेत्र (ऑटो, लॉरी और टैक्सी ड्राइवर), विनिर्माण क्षेत्र, बीड़ी श्रमिक तथा कृषि श्रमिक शामिल हैं। सार्वजनिक क्षेत्र, आरटीसी कर्मचारियों और आईटी कर्मचारियों सहित आठ लाख कर्मचारी संगठित क्षेत्र में हैं।

राज्य में उद्योग (फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, एसईजेड) मुख्य रूप से हैदराबाद और आस-पास के ज़िलों जैसे मेडचल, संगारेड्डी, मेडक और नलगोंडा में केंद्रित हैं। खम्मम, आदिलाबाद और करीमनगर के इलाके में एनटीपीसी संयंत्रों सहित सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां हैं। निजामाबाद और नलगोंडा ज़िलों में क्रमशः कई चीनी मिल और सीमेंट कारखाने स्थित हैं।

न्यूनतम वेतन मामला सीएमओ से संबद्ध

वर्ष 2014 में टीआरएस सरकार ने न्यूनतम मज़दूरी सलाहकार बोर्ड का गठन किया और इसके प्रमुख के रूप में गृह, श्रम तथा रोज़गार के राज्य कैबिनेट मंत्री नयीनी नरसिम्हा रेड्डी को नियुक्त किया। पांच नियोजित उद्यम में 12,000 रुपये की न्यूनतम मजदूरी बढ़ाना बोर्ड की सिफारिशों में से एक है।

सुधा भास्कर ने कहा, "ट्रेड यूनियनों ने नयीनी नारसिम्हा रेड्डी से प्रस्तावित सिफारिशों के कार्यान्वयन की मांग करते हुए मुलाकात की लेकिन हर बार मंत्री कहतीं कि यह मामला सीएमओ (मुख्यमंत्री कार्यालय) का है।" रेड्डी एक बड़े व्यापार संघ हिंद मज़दूर सभा के प्रदेश अध्यक्ष भी है।

श्रम विभाग की हालिया अधिसूचना के अनुसार किसी भी प्रतिष्ठान में एक अकुशल श्रमिक का न्यूनतम वेतन केवल 8,777 रुपये प्रति माह है।

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर अजय गुडवर्थी ने न्यूज़़क्लिक से बात करते हुए कहा: "यह एक विडंबना है कि आर्थिक रूप से वंचित विभिन्न सामाजिक समूहों के अभूतपूर्व आंदोलन के बाद तेलंगाना का गठन पूरी तरह से श्रमिकों और कर्मचारियों के मुद्दे को आगे बढ़ाने में पूरी तरह विफल रहा है। राज्य के गृह मंत्री स्वयं एक ट्रेड यूनियन नेता थें लेकिन न्यूनतम मज़दूरी या संविदात्मक श्रमिकों के औपचारिकरण के सवाल पर वे खुद का सहयोग नहीं कर पाए। इसके बजाय तेलंगाना पूंजी के पलायन और शहरी विकास पर असर के ख़तरे का हवाला देते हुए 'व्यापार करने में आसानी' की दौड़ में सबसे आगे है।"

औद्योगिक रोज़गार की कमी

एक नए राज्य के रूप में तेलंगाना बड़े तथा छोड़े उद्योगों के बंद होने का साक्षी बन गया। सुधा भास्कर ने कहा, "पिछले चार वर्षों में बड़े उद्योग - आदिलाबाद में सिरपुर पेपर मिल, वार्दन्नपेट में एपी रेयंस कारखाना, बोडान में निजाम शुगर कारखाना, भोंगिर में सूर्यवम्सी स्पिनिंग मिल अचानक बंद हो गई जिससे मज़दूरों की स्थिति बेहद ख़राब हो गई। इसने अचानक 10,000 से अधिक लोगों को बेरोज़गार कर दिया। इन कारखानों में से किसी ने भी राज्य सरकार से अनिवार्य अनुमति प्राप्त नहीं किया।"

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 5 (बी) जो कि 100 से अधिक श्रमिकों को रोज़गार देने वाले किसी भी उद्योग को बंद करने से संबंधित है वह उद्योगों को बंद करने से पहले राज्य सरकार से अनुमति लेने को अनिवार्य करता है।

रिपोर्ट के अनुसार राज्य में वर्ष 2014 के बाद से क़रीब 1,500 लघु-स्तरीय कारखानों को बंद कर दिया गया है।

सरकारी क्षेत्र में लाखों रिक्तियां

यहां तक कि सरकारी क्षेत्र में भी नियमित रूप से भर्ती करने के बजाय टीआरएस सरकार ने ठेका पर कर्मचारियों को नियुक्त करने या काम को आउटसोर्स करने का फैसला किया था।

2 जून 2014 को जब तेलंगाना को आधिकारिक तौर पर गठित किया गया था उस दिन केसीआर ने घोषणा किया था कि सरकारी क्षेत्र में 1.07 लाख रिक्तियां थीं। रत्नाकर राव कहते हैं, "हालांकि, उनके कार्यकाल में केवल 15 लोगों को सरकारी नौकरियां मिलीं।"

टीआरएस सरकार ने हमेशा नियमित भर्ती की तुलना में अनुबंध तथा आउटसोर्सिंग नौकरियों को प्राथमिकता दिया है। रत्नाकर राव कहते हैं, "केसीआर ने 10 जिलों को 31 जिलों में बनाकर तेलंगाना के मानचित्र को फिर से तैयार किया है, लेकिन किसी भी विभाग में कोई नई नौकरी नहीं तैयार की गई है। 400 मॉडल स्कूल होने के बावजूद इस सरकार द्वारा नियमित रूप से किसी भी कर्मचारी की भर्ती नहीं की गई है"। वे कहते हैं, सरकारी विभागों में लगभग सभी कंप्यूटर ऑपरेटर आउटसोर्सिंग के ज़रिए काम करते हैं।

प्रवासी मज़दूरों को नज़रअंदाज़ किया गया

ईंट निर्माण, विनिर्माण, स्वास्थ्य तथा इसी तरह के अन्य क्षेत्रों के श्रमिक बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा तथा अन्य राज्यों से तेलंगाना में प्रवास करते हैं। उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए मौजूद कानून के बावजूद टीआरएस ने इन वर्गों की उपेक्षा की है। रत्नाकर राव कहते हैं, "कंपनी के मालिक प्रवासी श्रमिकों को पसंद करते हैं क्योंकि उनमें से ज़्यादातर संगठित नहीं होते हैं और अपने अधिकारों की मांग नहीं करते हैं। सरकार जिसे उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए उन्हें पूरी तरह से भुला दिया है शायद इसलिए कि वे यहां अपना वोट नहीं डालते हैं।"

प्रवासी श्रमिकों की दुर्दशा पर विस्तार से चर्चा करते हुए गुडवर्थी कहते हैं, "आज तेलंगाना में झारखंड के श्रमिक हैं जो बदतर स्थितियों में काम कर रहे हैं।"

वैश्विक निवेश केंद्रों के रूप में क्षेत्रीय स्थानों को बदलने के अलावा किसी भी दूसरे रिवायत की अनुपस्थिति में, "टीआरएस जैसे क्षेत्रीय दल मज़दूरों के हितों पर शायद ही विचार करते हैं और वैश्विक पूंजी के हितों का प्रतिनिधित्व करते रहते हैं। बेरोज़गार विकास के कॉर्पोरेट मॉडल के परिणामस्वरूप कोई नया या सार्थक रोज़गार अवसर पैदा नहीं हुआ है जो छात्र तथा युवाओं को अशांत कर रहा है जो आज तेलंगाना में टीआरएस के प्रमुख विपक्षी हैं।"

तेलुगू भाषा में एक लोकप्रिय कहावत है: 'तेलंगाना उद्यमाला गड्डा', जिसका अनुवाद है 'तेलंगाना' आंदोलनों की भूमि है'। वास्तव में तेलंगाना राज्य का गठन लोगों के आंदोलनों का परिणाम है और औद्योगिक श्रमिकों के बड़े वर्ग ने निश्चित रूप से नए राज्य में अपने अधिकारों की उम्मीद में इस आंदोलन में भाग लिया। लेकिन पिछले चार वर्षों में देश के अन्य हिस्सों की तरह राज्य के श्रमिकों ने बुनियादी अधिकारों के लिए कई संघर्ष किया है। उन्होंने श्रम कानून के उचित कार्यान्वयन, सामाजिक सुरक्षा और अपने परिवारों के लिए बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष किया है।

साधारण शब्दों में कहें तो मज़दूर अभी भी समान कार्य के लिए समान वेतन को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। विशेष रूप से मातृत्व अवकाश के लिए महिला श्रमिक संघर्षकर रही हैं जो तेलंगाना के हर हिस्से से स्पष्ट होता है।

Telangana
Telangana elections 2018
Anti Labour Policies
Labour Laws
workers protest

Related Stories

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

‘तेलंगाना की जनता बदलाव चाहती है’… हिंसा नहीं

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है

पश्चिम बंगाल: डिलीवरी बॉयज का शोषण करती ऐप कंपनियां, सरकारी हस्तक्षेप की ज़रूरत 

मध्य प्रदेश : आशा ऊषा कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन से पहले पुलिस ने किया यूनियन नेताओं को गिरफ़्तार

झारखंड: हेमंत सरकार की वादाख़िलाफ़ी के विरोध में, भूख हड़ताल पर पोषण सखी

दिल्ली: सीटू के नेतृत्व वाली आंगनवाड़ी वर्कर्स यूनियन ने आप सरकार पर बातचीत के लिए दबाव बनाया


बाकी खबरें

  • Governor
    अनिल जैन
    विचार-विश्लेषण: विपक्ष शासित राज्यों में समानांतर सरकार चला रहे हैं राज्यपाल
    22 Dec 2021
    संविधान निर्माताओं ने संविधान में जब राज्यपाल पद का प्रावधान किया था तो इसके पीछे उनका मकसद केंद्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल बनाना और देश के संघीय ढांचे को मजबूत करना था...मगर अफ़सोस ऐसा हो न सका…
  • aadhar
    अजय कुमार
    वोटर आईडी और आधार लिंकिंग : वोट कब्ज़ाने का नया हथियार!
    22 Dec 2021
    मोटे तौर पर कहें तो चुनाव संशोधन कानून 2021 पर भारत की विपक्षी पार्टियों का यही विरोध है कि जब वोटर आईडी को आधार कार्ड से लिंक कर दिया जाएगा तो ढेर सारी सूचनाओं की मालिक सरकार हो जाएगी। सरकार उन…
  • मौरिज़ियो कोपोला
    "क्यूबा की सोबराना वैक्सीन कोई चमत्कार नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्णयों का नतीजा है"
    22 Dec 2021
    15 से 25 नवंबर तक, 35 इटेलियन स्वयंसेवकों ने क्यूबा के हवाना में सोबराना वैक्सीन पर एक नैदानिक परीक्षण में भाग लिया। कैरेबियाई द्वीप दुनिया भर में एकमात्र कम आय वाला देश है, जिसने अपनी सार्वजनिक और…
  • biden
    एम. के. भद्रकुमार
    दुनिया को गौर करना चाहिए कि बाइडेन की प्रेसीडेंसी ढलान पर है
    22 Dec 2021
    वेस्ट वर्जीनिया के डेमोक्रेटिक सीनेटर जो मैनचिन के 2.2 ट्रिलियन डॉलर पैकेज के विधेयक की विनाशकारी आलोचना इस ओर इशारा करती है कि विश्व की महाशक्ति अपनी ताक़त से कहीं अधिक ऊपर उड़ाने की कोशिश कर रही है।
  • college
    दित्सा भट्टाचार्य
    केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में तकरीबन 33% शिक्षण पद खाली 
    22 Dec 2021
    संसद में कनिष्ठ मानव संसाधन मंत्री के अनुसार केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के लिए स्वीकृत 18,905 संकाय पदों में से 1 अक्टूबर 2021 तक 6,333 पद रिक्त पड़े हुए थे।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License