NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
तालिबान को अंतरराष्ट्रीय वैधता खोने का ख़तरा
बाइडेन प्रशासन ने दोहा संधि के तहत  अफ़ग़निस्तान से मई तक सभी अमेरिकन फौज की वापसी की प्रतिबद्धता से स्पष्ट तौर पर अपने को दूर रखा है। कोई भी नहीं चाहता कि अफ़ग़निस्तान में मौजूदा स्तर की हिंसा आगे भी जारी रहे।
एम. के. भद्रकुमार
01 Feb 2021
तालिबान
मुल्ला बरादर की अगुवाई में तालिबान का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए 26 जनवरी को तेहरान पहुंचा। 

तालिबान के वरिष्ठ नेता और दोहा वार्ता के मुख्य वार्ताकार मुल्ला अब्दुल गनी बरादर की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने 26 जनवरी से लेकर 29 जनवरी के बीच तेहरान और मास्को में बातचीत की। यह बातचीत उस समय में हुई जब अफगान शांति प्रक्रियाओं को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। 

अमेरिकी सरकार द्बारा वित्त पोषित आरएफईआरएल (RFERL) की एक टिप्पणी में बृहस्पतिवार को कहा गया है कि “अमेरिका-तालिबान के बीच पिछले एक साल पहले हुआ समझौता अधर में है,” क्योंकि राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार “तालिबान और वाशिंगटन के बीच बढ़ती रार का फायदा उठाने के लिए बेताब हैं और इस (दोहा) समझौते को बाधित करने के लिए कुछ भी उठा नहीं रख रहे हैं।” 

आरएफईआरएल (RFERL)  ने आगे बताया : “ऐसे में अपने फायदे की बात को आगे बढ़ाने का नायाब मौका हाथ आया मानते हुए अफगान के अधिकारी अब अमेरिका के आतंकनिरोधी बल की स्वदेश वापसी टालने तथा उसे मई से आगे भी यहां तैनात रखने के लिए अपना सारा जोर लगा रहे हैं। (अमेरिकी राष्ट्रपति) बाइडेन अफगानिस्तान में आतंक के संभावित खतरे को टालने के लिए आतंकनिरोधी बल को एक प्रतिरोधक के रूप में बनाये रखने की लम्बे समय से वकालत करते रहे हैं।”

सचमुच, अगर अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की तैनाती की मियाद को आगे बढ़ाने के लिए किसी बहाने की जरूरत होती, तो निवर्तमान ट्रंप प्रशासन ने केवल एक बहाना बनाया होता कि ट्रेजरी विभाग ने पेंटागन को सूचित करते हुए 4 जनवरी को एक ज्ञापन दिया है कि;

  • “2020 में अल-कायदा अफगानिस्तान में मजबूत हो रहा है, जबकि वह लगातार तालिबान के साथ तालिबान के संरक्षण में काम कर रहा है”;
  •  “अल-कायदा अपने उन संरक्षकों और सलाहकारों के नेटवर्क के जरिये तालिबान के साथ अपने संबंधों को सुधार रहा है, जो तालिबान से गहरे अंतर्गुम्फित हैं, उन्हें सलाह देते हैं, उनका मार्गदर्शन करते हैं और उन्हें वित्तीय सहायता देते हैं”; 
  • “ वरिष्ठ हक्कानी नेटवर्क के नेताओं ने अल कायदा के सहयोग और धन के बल पर एक साझा हथियारबंद दस्ता तैयार करने के लिए बातचीत की है।” 

पिछले साल फरवरी में दोहा समझौते में यह अनुमान किया गया था कि 2021 के मई में अमेरिकी फौजों की अफगानिस्तान से पूरी तरह वापस हो जाएगी, लेकिन अल कायदा के साथ तालिबान की सांठगांठ को देखते हुए यह समझौता सशर्त होगी। सिद्धांतत: अब यह शर्त समझौता तोड़क होने जा रही है। तालिबानी नेता अपने को ठगा-सा महसूस करते हैं और गुस्से में यह कहते हुए प्रतिक्रिया जताई है, “कुछ लोग अपने स्वार्थ और दुष्टतापूर्ण मकसदों की खातिर अफगान राष्ट्र के खिलाफ थोपी गई जंग को और फैलाने की मांग कर रहे हैं।” तालिबान को शक है-नेक कारणों से-कि अमेरिका अफगानिस्तान की खुफिया एजेंसियों की उपलब्ध करायी गई सूचना रपटों के आधार पर अपने मकसदों में फेरबदल कर रही है। 

वास्तव में, अमेरिकी के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंक ने 27 जनवरी को अपना पदभार ग्रहण करने के बाद वाशिंगटन में अपने पहले प्रेस कान्फ्रेंस में यह संकेत दिया कि अफगानिस्तान-अमेरिकी नीति की समीक्षा पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि “पहले इस एक चीज को समझने की आवश्यकता है कि अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते में दरअसल है क्या ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हम उस वादे को समझते हैं, जो तालिबान ने हमसे किये हैं और हमने ऐसी कोई प्रतिबद्धता जो हमने की है।”

28 जनवरी को ब्लिंक ने राष्ट्रपति अशरफ गानी से बातचीत की और उनसे “यह कहा कि अमेरिका फरवरी 2020 में दोहा में तालिबान के साथ हुए समझौते की समीक्षा कर रहा है कि क्या तालिबान आतंकवादी समूहों से अपने संबंध तोड़ने, अफगानिस्तान में हिंसा कम करने तथा अफगान सरकार एवं इस मसले अन्य सहभागियों के साथ सार्थक बातचीत के अपने वादे को निभा रहा है या नहीं।”  

बाइडेन प्रशासन ने दोहा समझौते के मुताबिक मई तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकन फौज की वापसी का साफ-साफ वादा करने से अपने को दूर-दूर ही रखा है। कोई भी नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में मौजूदा स्तर की हिंसा आगे भी जारी रहे। इसलिए, मुल्ला बरादर के तेहरान दौरे के मौजूदा वक्त को देखते हुए क्षेत्रीय समर्थन पाने के तालिबान की बेताबी के इसी संदर्भ में रखा जा सकता है। दिलचस्प है कि बरादर ने 27 जनवरी को ईरान की नेशनल सिक्युरिटी कौंसिल के प्रमुख अली शामखानी के साथ अपनी बैठक के बारे में बताया,“हम अमेरिका पर एक इंच भी भरोसा नहीं करते। हम ऐसी किसी भी पार्टी से लड़ेंगे, जो उसके भाड़े का टटू होगा।” 

बरादर ने शामखानी को भरोसा दिलाया कि अफगानिस्तान के भविष्य को एक रूपरेखा देने के लिए तालिबान से खुले मन से सभी जातीय समूहों की भागीदारी चाहता है। तालिबान अफगान-ईरान सीमा पर सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। यह मामला तेहरान की मुख्य चिंता का विषय है। हालांकि, शामखानी ने इस पर कोई वादा नहीं किया, यद्यपि उन्होंने अमेरिकी मंशा की मुखालफत की। समझा जाता है कि शामकहानी ने इस बात पर जोर देकर कहा कि ईरान तालिबान के हाथ अफगानिस्तान की सत्ता सौंपे जाने के ख्याल के एकदम  खिलाफ है। उन्होंने सत्ता की साझेदारी तथा समावेशी शांति के बंदोबस्त की अहमियत पर भी जोर दिया। 

अमेरिका और ईरान में तनाव के बावजूद, तेहरान अफगानिस्तान में स्थिरता को ऊंची अहमियत देने का पक्षधर है और ऐसा कोई काम नहीं करेगा, जिससे हुआ समझौता टूट जाए। बुनियादी रूप से, ईरान को यह थाह है कि आज की तारीख में अमेरिका एक घटती शक्ति है और वह इस स्थिति में नहीं है कि वह क्षेत्रीय झगड़े में अपनी कोई मर्जी थोप सके या एकतरफा कोई फैसला ले सके।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान मामलों के प्रख्यात ईरानी जानकार पीर मोहम्मद मोल्लाजी, ने ट्रंप प्रशासन और तालिबान के बीच बंद कमरे में हुए समझौते को अफगानिस्तान में स्थानीय कट्टर इस्लामी ताकतों की लामबंदी की एक कोशिश के रूप में उल्लेख किया, जिन्होंने इराक और सीरिया में जंग लड़ी थी, उन्हें अब रूस, चीन और ईरान के खिलाफ जंग में उतारना था। लेकिन उनका आकलन था कि बाइडेन की टीम तालिबान को पूरी तरह सत्ता की चाबी थमाने की इजाजत नहीं देगा। उसकी योजना रूस, चीन और यहां तक कि ईरान को भी इसमें शामिल करने की हो सकती है।

जैसा कि उन्होंने कहा, बाइडेन काबुल की भावी सत्ता-संरचना में मौजूदा तीन भागीदारों के बीच शामिल करेंगे-अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह, अशरफ गानी और तालिबान में। और ऐसा होता है, तो यह नई सरकार होगी, जिसके सभी घटक सत्ता में शामिल होंगे। मजे की बात यह है कि, ईरान इस बात को लेकर पाकिस्तान से नाराज है कि वह तालिबान की सत्ता में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने का इच्छुक है।

तेहरान से बातचीत के बाद, तालिबान का प्रतिनिधिमंडल मास्को रवाना हो गया, जहां उसने 29 जनवरी को रूसी अधिकारियों से बातचीत की। इस बातचीत के बाद, रूस के विदेश मंत्रालय की विज्ञप्ति में कहा गया,“रूस ने जितनी जल्दी हो सके, सार्थक और रचनात्मक अंतर-अफगान वार्ता करने के पक्ष में है ताकि रक्त-रंजित गृह युद्ध समाप्त हो और अफगानिस्तान मं एक प्रभावी राष्ट्रीय सरकार की स्थापना हो सके।”

ईरान की ही तरह, रूस और अमेरिका के साथ संबंधों में तनाव है, इसके बावजूद मास्को ने अभी तक तालिबान के साथ अमेरिकी कूटनीति को कमतर करने की कोशिश से अपने को दूर रखा है। विदेश मंत्रालय के साप्ताहिक प्रेस कान्फ्रेंस में 16 दिसम्बर को प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने विशेष रूप से इस आयाम पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा,“ हाल के वर्षों में रूसी फेडरेशन और अमेरिका ने अफगानिस्तान के शांतिपूर्ण निदान के लिए रचनात्मक बातचीत की है। इस मुद्दे पर हमारे विशेष राजदूत एक दूसरे के सम्पर्क में है। और 2019 से ही हमारे साझेदार चीन और पाकिस्तान के साथ, हमने “त्रोइका” के ढांचे को विस्तारित किया है, जो अंतर-अफगान संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान में प्रभावी सिद्ध हुआ है।”

“हम उम्मीद करते हैं कि एक बार जब अमेरिका में नये राष्ट्रपति पदभार ग्रहण कर लेंगे, जितनी जल्दी संभव होगा, अफगानिस्तान में शांति हासिल करने के लिए रूस-अमेरिका बातचीत जारी हो जाएगा। इसके साथ ही, आतंकवाद, उग्रवाद और देश से होने वाले मादक द्रव्यों के व्यापार के खतरों को रोकने के प्रयास किये जाएंगे।”

सिद्धांतत: रूस तालिबान को सभी आतंकवादी समूहों (जिसमें चेचन्या के चेचेन और मध्य एशिया के आतंकवादी भी शामिल हैं) के साथ अपने संबंध को तोड़ने के लिए अमेरिका के बार-बार जोर देने से इत्तेफाक रखता है। रूस रचनात्मक माहौल में शांति वार्ता होने देने के लिए सीज-फायर पर भी सहमत है। इस मामले में चीन की स्थिति, अफगान की सरजमीं पर उइगर मुसलमानों की हरकतों को देखते हुए, इन देशों से भिन्न नहीं हो सकती। और इनका यह रुख बाइडेन प्रशासन के रूस और चीन के प्रति मन बदलने के बावजूद रहेगा। 

सब मिलाकर, अगर बाइडेन प्रशासन “अफगानिस्तान में एक स्थिर, सम्प्रभु, लोकतांत्रिक और अफगानिस्तान के सुरक्षित भविष्य के लिए सामूहिक रणनीति बनाने के अपने वादे को याद रखेंगे,”-जैसा कि ब्लिंक ने गनी से बृहस्पतिवार की बातचीत में तालिबान को अफगान सरकार एवं अन्य सहभागियों के साथ सार्थक बातचीत के लिए टेबुल पर लाने का वादा किया है, तो  उसको अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलेगा। 

विचारणीय बात यह है कि कोई भी नहीं चाहता कि इस स्तर की हिंसा अफगानिस्तान में जारी रहे। दूसरे शब्दों में, तालिबान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय रूप से अलग-थलग पड़ने की स्थिति का सामना कर रहा है, जैसा कि 1990 के दशक में उसके साथ हुआ था। हालांकि गनी सरकार ने खुद को हद तक अलोकप्रिय बना लिया है और बदनाम भी है, क्योंकि स्वार्थलोलुप भ्रष्ट लोग किसी राजनीतिक आधार अथवा वैधता से बचने के लिए षड्यंत्र करते हैं। 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Taliban Risks Losing International Legitimacy

TALIBAN
Mullah Abdul Ghani Baradar
Afghan peace process
US troop
Doha agreement
Biden administration

Related Stories

भारत को अफ़ग़ानिस्तान पर प्रभाव डालने के लिए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की ज़रूरत है

कैसे कश्मीर, पाकिस्तान और धर्मनिर्पेक्षता आपस में जुड़े हुए हैं

भारत और अफ़ग़ानिस्तान:  सामान्य ज्ञान के रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति

अगर तालिबान मजबूत हुआ तो क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ेगा असर?

बाइडेन प्रशासन अफ़ग़ानों के साथ जो कर रहा है वह क्रूरता है!

अफ़ग़ान छात्रों को भारत से वापस भेजे जाने पर तालिबान द्वारा हत्या का डर

150 से अधिक प्रतिष्ठित नागरिक जावेद अख़्तर और नसीरुद्दीन शाह के समर्थन में उतरे

तालिबान की अगली बड़ी चुनौती चारों तरफ़ फ़ैले आतंकी संगठन हैं

जेएनयू आतंकवाद रोधी पाठ्यक्रम: दबे स्वरों में होने वाली बेहूदा बकवास अब मुख्यधारा शिक्षा में शामिल

अफ़ग़ानिस्तान को पश्चिमी नजर से देखना बंद करे भारतीय मीडिया: सईद नक़वी


बाकी खबरें

  • Internet Shutdowns
    इशिता चिगिल्ली पल्ली
    क्यों भारतीय राज्य इंटरनेट शटडाउन पर अपनी निर्भरता बढ़ाता जा रहा है?
    21 Sep 2021
    एक बार फिर भारतीय राज्य ने इंटरनेट शटडाउन का विकल्प अपनाया है, इस बार हरियाणा में यह प्रतिबंध लागू किए गए हैं, ताकि क़ानून-व्यवस्था पर नियंत्रण किया जा सके। 
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    चरणजीत सिंह चन्नी बने पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री, यूपी में जानलेवा बुखार और अन्य खबरें
    20 Sep 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र होगी पंजाब के पहले मुख्यमंत्री के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी के शपथग्रहण समारोह, कर्नाटक के मुख्यमंत्री को जानलेवा धमकी देने वाला हिन्दू महासभा नेता की…
  • kashmir
    अनीस ज़रगर
    जम्मू के व्यापारियों ने लगाया भेदभाव का आरोप, 22 सितंबर को बंद का ऐलान
    20 Sep 2021
    सरकार द्वारा लिए गए रिलायंस के 100 रिटेल स्टोर खोलने के फ़ैसले का विरोध करते हुए व्यापारी संगठनों ने विरोध प्रदर्शन की भी चेतावनी दी है।
  • Yogi
    सोनिया यादव
    यूपी: ज़मीनी हक़ीक़त से बहुत दूर है योगी सरकार का  साढ़े 4 साल का रिपोर्ट कार्ड!
    20 Sep 2021
    कोरोना संकट की दूसरी लहर के दौरान अस्पतालों के बाहर बेड के इंतजार में तड़पते लोगों की तस्वीरें हों या युवाओं का सड़क पर रोज़गार को लेकर धरना, अखबारों में हाथरस, उन्नाव जैसे आए दिन छपते मामले हों, या…
  • crime
    एम.ओबैद
    बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में एमपी पहले और यूपी दूसरे स्थान परः एनसीआरबी
    20 Sep 2021
    बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में बीजेपी शासित मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर हैं। वहीं भ्रूण हत्या के मामले में गुजरात पहले स्थान पर है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License