NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
समाज
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
तो आईये पर्यावरण के लिए कुछ जवाबदेही हम भी तय करें...
समाज के साथ साथ सरकार को भी इस ओर गंभीरता से सोचना व बढ़ना होगा केवल पर्यावरण समर्थकों और संरक्षकों के हिस्से पर्यावरण की सुरक्षा सौंप देना भर काफी नहीं।
सरोजिनी बिष्ट
05 Jun 2019
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के लिए हम क्या करें,  इस सवाल को सामने रखने से पहले यदि हम अपने से यह प्रश्न करें कि हमारी भूमिका पर्यावरण को दूषित करने में किस हद तक है तो शायद हम इस सच्चाई को समझ सकें कि हम या हमारा बाज़ार किस कदर अपने पर्यावरण के दुश्मन बनते जा रहे हैं। कम से कम पर्यावरण दिवस के मौके पर तो खुद से विचार मन्थन होना ही चाहिए। और इसी मन्थन से एक बिन्दु जो पिछले कुछ सालों से उभर कर सामने आ रहा है उसने पर्यावरण के लिए एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।

यदि हम कहें कि एक लड़की या महिला का मासिक धर्म और पर्यावरण का आपस में गहरा नाता है तो शायद सुनने में कुछ अटपटा सा लगे। आप सोचेंगे कि मासिक धर्म का होना तो बायोलॉजिकल प्रोसेस है इसमें पर्यावरण क्यूँ और कैसे शामिल हो गया। अब यदि कहा जाये कि करीब 43.2 करोड़ उपयोग किये गए सेनेटरी नैपकिन हर महीने फेंक दिए जाते हैं जो नोन बायोडिग्रेबल (स्वभाविक तरीके से नष्ट न होने वाला) होने की वजह से सीवर, मैदानों और जल स्रोतों में जमा हो रहे हैं। तो समझा जा सकता है कि जाने-अनजाने हम अपने माहवारी के समय किस हद तक पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। सोखने की क्षमता बढ़ाने के लिए इन प्लास्टिक मिश्रित नेपकीन में सेल्यूलोज, रेयान,  डायोक्सिन जैसे हानिकारक तत्वों के साथ ब्लीचिंग का भी प्रयोग किया जाता है जिसमें से ऐसे कैमिकल्स निकलते हैं जो न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य में विपरीत असर डाल रहे हैं बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं। इनको जलाया जाना भी पर्यावरण में जहर ही घोल रहा है। इन नेपकीन के जलने पर धुएँ  के रूप में जो कैमिकल्स निकलते हैं वह मौत के निमन्त्रण से कम नहीं। पर्यावरण को बचाने की मुहिम में जुटे लोग मानते हैं कि यदि अभी भी समय रहते इन प्लास्टिक मिश्रित सेनेटरी पैड्स के उचित निस्तारण के बारे में नहीं सोचा गया तो आगे वाले समय में इनका इतना कचरा इकट्ठा हो जाएगा कि उसे नष्ट करने में सैकड़ों साल लग जायेंगे।

इसमें दो राय नहीं कि जितनी तेजी से इन नॉन बायोडिग्रेडबल सेनेटरी नैपकीन का खतरा हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बढ़ता जा रहा है उससे दोगुना तेजी से इनका बाज़ार बढ़ रहा है। आज मार्किट में कई तरह के सेनेटरी पैड्स मौजूद हैं जिनको बनाने में खतरनाक कैमिकल्स का इस्तेमाल हो रहा है। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों से पर्यावरण समर्थक इको फ्रेंडली नेपकीन बनाने और इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं जैसे दुबारा प्रयोग में लाये जाने वाले कपड़े से बने पैड, बायोडिग्रेडबल पैड व मैनस्टुअल कप आदि।  बाजार में मौजूद सेनेटरी नेपकीन के कचरे से पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान को देखते हुए ही पिछले साल  "ग्रीन डिस्पो " नाम की एक ऐसी मशीन बाजार में आई है जो सेनेटरी नेपकीन जैसे अपशिष्टों के निपटारे में बहुत मददगार साबित हो रही है। इससे पर्यावरण को भी भारी नुकसान से बचाया जा सकता है।  इस आठ सौ डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाली मशीन नुमा भट्ठी ग्रीनडिस्पो में अपशिष्ट तुरंत नष्ट हो जाता है। यह मशीन हैदराबाद के इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मैटेरियल्स (एआरसीआई), नागपुर स्थित नेशनल राष्ट्रीय पर्यावरणीय अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) और सिकंद्राबाद की कंपनी सोबाल ऐरोथर्मिक्स ने मिलकर बनाई है। दि क्लीन इंडिया जनरल के मुताबिक भारत में सालाना 43.4 करोड़ सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल होता है जिससे सालाना 9000 टन कचरा पैदा हो रहा है। जनरल के मुताबिक, इस नैपकिन में प्लास्टिक मिला होता है, इसलिए इसे डिकंपोज होने में 500-800 साल लगते हैं। जरनल के मुताबिक ये नैपकिन सेहत के साथ पर्यावरण के लिए  भी नुकसानदेह है।                                               

अब दोबारा आते हैं उसी अहम सवाल पर कि हम कितना पर्यावरण के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। आसानी से माहवारी का रक्त सोख लेने वाले बाजारी नेपकीन की बजाय यदि हमें कपड़ा इस्तेमाल करने की सलाह दी जाए तो क्या हम सहर्ष स्वीकार कर लेंगे,  इसका जवाब है "नहीं" पर इस "नहीं" की जगह हमें इसका कोई हल तो खोजना ही होगा। कभी तो इस बिंदु पर आकर हमें सोचना होगा। यह सच है कि समाज के साथ साथ सरकार को भी इस ओर गंभीरता से सोचना व बढ़ना होगा केवल पर्यावरण समर्थकों और संरक्षकों के हिस्से पर्यावरण की सुरक्षा सौंप देना भर काफी नहीं। अपने अपने हिस्से की जवाबदेही हमें खुद ही तय करनी होगी तो क्यूँ न इको फ्रेंडली सेनेटरी नेपकीन को अपना हमसफर बनाकर पर्यावरण को बचाने में थोड़ी भूमिका हैं भी अदा कर लें। 

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

Environment
environment day
Save environment
Sanitary napkins
Non biodegradable Sanitary napkins
Eco friendly Sanitary napkins
sanitary pad

Related Stories

नज़रिया : प्रकृति का शोषण ही मानव को रोगी बनाता है

प्लास्टिक कचरे के खिलाफ सरकार की असंतुलित मुहिम

पौधरोपण हो या स्वच्छता; अभियान की नहीं, व्यवस्था की ज़रूरत


बाकी खबरें

  • Hum Bharat Ke Log
    डॉ. राजू पाण्डेय
    संविधान पर संकट: भारतीयकरण या ब्राह्मणीकरण
    05 Feb 2022
    न्याय प्रणाली में मनुवादी सोच की पुनर्प्रतिष्ठा के प्रयासों को न्याय व्यवस्था के भारतीयकरण का नाम दिया जा रहा है। नागरिक अधिकारों और संविधान के संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय पर यदि ब्राह्मणवादी सोच हावी…
  • hisab kitab
    न्यूज़क्लिक टीम
    इस बजट से गरीबों को कोई फायदा नहीं
    04 Feb 2022
    हाल ही में वित्त मंत्री ने बजट पेश किया पर क्या इस बजट से बेरोज़गारी, गरीबी और अन्य चीज़ों पर कुछ असर पड़ेगा? आइये जानते हैं ऑनिंद्यो से
  • firing on owaisi
    रवि शंकर दुबे
    कौन हैं ओवैसी पर गोली चलाने वाले दोनों युवक?, भाजपा के कई नेताओं संग तस्वीर वायरल
    04 Feb 2022
    AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पर हमला करने वाले दोनों आरोपियों को 14 दिनों की पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है। एक आरोपी सचिन पंडित की तस्वीरें भाजपा के कई बड़े नेताओं के साथ वायरल होने से कई सवालों ने…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    ग्राउंड रिपोर्ट: हापुड़ का सूदना गांव सुना रहा अपनी चुनावी कहानी
    04 Feb 2022
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने हापुड़ के सूदना गांव में चल रही सैनेटरी पेड की फैक्ट्री में काम करने वाली महिलाओं, खेती से जुड़े समुदायों के सवालों-राजनीतिक रुझानों पर की चर्चा
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक : बस ये चुनाव और पार करा दे
    04 Feb 2022
    कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने शुक्रवार को राज्यसभा में कहा कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के संबंध में एक समिति बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License