NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
तो मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी तय करेंगे ‘शहीद’ और ‘शहादत’!
हेमंत करकरे ने एक सैनिक से बढ़कर शौर्य दिखाया और जीवन का त्याग किया। देश ने उनकी शहादत को अशोक चक्र देकर स्वीकार किया। मालेगांव के आरोपी चाहे प्रज्ञा हों या रमेश उपाध्याय, उनसे यह सम्मान कभी नहीं छीन पाएंगे।
प्रेम कुमार
27 Apr 2019
मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय (बाएं) और प्रज्ञा ठाकुर (दाएं)।

मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी शहीद की परिभाषा दे रहे हैं। पहले प्रज्ञा ठाकुर और अब रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय। अशोक चक्र विजेता हेमंत करकरे को ये अत्याचारी बताते हैं। निश्चित रूप से ये उनके निजी अनुभव हो सकते हैं लेकिन इस बात का ‘शहीद’ और ‘शहादत’ से कोई संबंध नहीं। हेमंत करकरे की शहादत पर सवाल उठाते हुए उनके लिए नफ़रत भरे शब्द बड़े सवाल पैदा कर रहे हैं, “कोई भी पुलिसकर्मी कहीं भी मरे, वह शहीद नहीं कहलाता है। शहीद केवल स्वतंत्रता सेनानी और सैनिक होते हैं।”

शहीद-ए-आज़म को भी सरकार ने कहां माना है ‘शहीद’? : सवाल यही है कि क्या केवल स्वतंत्रता सेनानी और सैनिक ही शहीद होते हैं? भगत सिंह ‘शहीद-ए-आज़म’ माने गये। आज़ादी से पहले या बाद की किसी सरकार ने यह पदवी नहीं दी। ऐसा कोई सरकारी विवरण भी उपलब्ध नहीं है कि उन्हें शहीद कहा गया हो। अलबत्ता 23 मार्च को देश जरूर शहादत दिवस मनाता है।

आज़ाद हिन्द फौज के सेनानी क्यों नहीं कहे गये ‘शहीद’? : सैनिकों को भी हमेशा शहीद का सम्मान मिला हो, ऐसा नहीं है। आज़ाद हिन्द फौज के सेनानियों को देश में कभी सैनिक तक नहीं माना गया। उनकी कुर्बानियों को शहादत का दर्जा देना तो बहुत दूर की बात है।

अंग्रेजों के लिए दुनिया भर में लड़े और मरे सैनिकों में से भी अधिकतर को शहादत का दर्जा नहीं मिल पाया।

2015 में केंद्रीय गृहराज्य मंत्री किरण रिजिजू ने जब यह कहा था कि शहीद की कोई परिभाषा नहीं बन पायी है तो आश्चर्य जरूर हुआ था, मगर सच यही था। आज भी स्थिति वही है। शहादत की कोई सरकारी परिभाषा नहीं है, मगर मातृभूमि के लिए वीरगति को प्राप्त होना, हंसते-हंसते मौत को स्वीकार कर लेना, जनता के लिए अपनी सर्वोच्च कुर्बानी देते हुए जान दे देना और बहुत सारी ऐसी ही स्थितियां हैं जिन्हें शहादत मान लिया जाता है।

सीमा पर मरने वाले सैनिक ही क्यों, अर्धसैनिक भी कहे जाएं ‘शहीद’ : अब यह मान लिया गया है कि सीमा पर लड़ते हुए जो सैनिक मारे जाएंगे, वे शहीद हैं चाहे वह घोषित युद्ध हो या न हो। मगर, सवाल ये है कि सीमा पर लड़ते हुए अर्धसैनिक मारे जाएं, तो वह क्यों नहीं शहीद का सम्मान पाने के योग्य हों?

पुलवामा में 42 सीआरपीएफ जवानों की मौत ‘शहादत’ क्यों नहीं? : युद्ध का स्वरूप बदला है। अब पाकिस्तान ने आतंकवादियों के हाथों छद्म युद्ध छेड़ रखा है। ऐसे में इन भाड़े के आतंकियों के हमले में मारे गये सैनिकों को शहीद क्यों नहीं कहा जाना चाहिए? सैनिक ही क्यों, अर्धसैनिकों को भी यह सम्मान मिलना चाहिए। पुलवामा में 42 सीआरपीएफ के जवानों को शहीद का दर्जा देने की मांग इसी मायने में जायज है।

हेमंत करकरे का बलिदान सर्वोच्च शहादत : पुलवामा से पहले हेमंत करकरे की शहादत यह सवाल उठा गयी थी। जिन आतंकियों से वे लोहा ले रहे थे, वे गुंडे और थर्ड वर्ल्ड के लोग नहीं थे। अर्धसैनिक या नागरिक पुलिस बल की ट्रेनिंग ऐसी नहीं कि आतंकियों के रूप में विदेशी सैनिकों का वे मुकाबला कर सकें। फिर भी, हेमंत करकरे ने एक सैनिक से बढ़कर शौर्य दिखाया और जीवन का त्याग किया। देश ने उनकी शहादत को अशोक चक्र देकर स्वीकार किया। मालेगांव के आरोपी चाहे प्रज्ञा हों या रमेश उपाध्याय, उनसे यह सम्मान कभी नहीं छीन पाएंगे।

गांधीजी की हत्या असंदिग्ध रूप से ‘शहादत’ : 30 जनवरी को भले ही देश शहादत दिवस मनाता हो, लेकिन नाथूराम गोडसे के हाथों महात्मा गांधी की हत्या को शहादत कहने पर सवाल उठाने वाले भी मिल जाएंगे। इस सवाल से बचने की नहीं, जवाब देने की ज़रूरत है। साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ और साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए गांधीजी ने अनगिनत मौकों पर अनशन किए और जान की बाजी लगायी। किसी भी घटना में उनकी जान जा सकती थी। गांधीजी के हत्यारों ने गांधीजी की हत्या का कारण देश को बांटने के लिए उन्हें जिम्मेदार होना बताया था। यह बात ही स्पष्ट करती है कि गांधीजी की जान किसी व्यक्तिगत दुश्मनी से नहीं ली गयी थी, उसकी वजह गांधीजी का सार्वजनिक जीवन था। यह कारण उन्हें ‘शहीद’ कहने के लिए हमेशा पर्याप्त रहेगा।

इंदिरा-राजीव की हत्या भी ‘शहादत’: इंदिरा गांधी की हत्या भी इसलिए की गयी क्योंकि हत्यारे उनके राजनीतिक निर्णय के कारण धार्मिक रूप से आहत थे। इंदिरा गांधी का राजनीतिक निर्णय देश के लिए था, प्रधानमंत्री पद पर अपनी जिम्मेदारी के अनुरूप था। लिहाजा उनकी हत्या भी शहादत का दर्जा पाने के सर्वथा योग्य है। मौत से पहले उन्हें अपनी हत्या का अंदेशा भी था। जानते-समझते हुए भी उन्होंने अपनी सुरक्षा में सिख की मौजूदगी ख़त्म करने से इनकार कर दिया था। जान की परवान न करते हुए कर्त्तव्य का यह बड़ा उदाहरण है।

राजीव गांधी की हत्या भी उनके प्रधानमंत्री रहते लिए गये निर्णयों की प्रतिक्रिया थी। देश से बाहर की शक्तियों की साजिश का नतीजा थी। इसलिए राजीव गांधी की हत्या भी असंदिग्ध रूप से शहादत है।

निर्मल गंगा के लिए 112 दिन अनशन के बाद मौत भी ‘शहादत’ : निर्मल और अविरल गंगा के लिए 112 दिन तक अनशन करते हुए प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानन्द का प्राण त्यागना क्या शहादत नहीं है? यह सच है कि इस शहादत में गोली नहीं चली, फांसी ने अपना काम नहीं किया, बम नहीं फटे। लेकिन, जान देने का मकसद जनता है, ज़िद सरकार से है। क्या सरकार मानेगी तभी यह मौत शहादत कहलाएगी?

‘शहीद’ और ‘शहादत’ सरकारी परिभाषा की गुलाम बनकर न रह जाए, इसका अस्तित्व सरकार की ओर से मिलने वाले फायदों से न बंध जाए- यह जरूरी है। बिना वर्दी में भी अगर भाड़े के आतंकियों की गोली से सामान्य नागरिक लड़ता हुआ मारा जाए, तो वह शहीद है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

SHAHADAT
Martyrdom
hemant karkare
malegaon blast
pragya thakur
Ramesh Upadhyay
Terrorism
saffron terror
Hindutva Agenda

Related Stories

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बढ़ती हिंसा व घृणा के ख़िलाफ़ क्यों गायब है विपक्ष की आवाज़?

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव परिणाम: हिंदुत्व की लहर या विपक्ष का ढीलापन?

ख़बरों के आगे पीछे: हिंदुत्व की प्रयोगशाला से लेकर देशभक्ति सिलेबस तक

‘सूर्य नमस्कार’ के बहाने ‘हिंदुत्व’ को शिक्षा-संस्थानों में घुसाने की कोशिश करती सरकार!

बहस: क्रिकेट कैसे किसी की देशभक्ति या देशद्रोह का पैमाना हो सकता है!

'कश्मीर में नागरिकों की हत्याओं का मक़सद भारत की सामान्य स्थिति की धारणा को धूमिल करना है'—मिलिट्री थिंक-टैंक के निदेशक

विश्वास और आस्था की विविधता ख़त्म करने का राजनीतिक मॉडल

हमारे वक़्त का अनोखा ‘भागवतपुराण’ : हम ‘ऑटोमेटिक देशभक्त’ कैसे बनें?

जब ‘हाउडी मोदी’ का मतलब हो गया ‘हाउडी ट्रंप’


बाकी खबरें

  • Hijab Verdict
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुसलमानों को अलग थलग करता है Hijab Verdict
    17 Mar 2022
  • fb
    न्यूज़क्लिक टीम
    बीजेपी के चुनावी अभियान में नियमों को अनदेखा कर जमकर हुआ फेसबुक का इस्तेमाल
    17 Mar 2022
    गैर लाभकारी मीडिया संगठन टीआरसी के कुमार संभव, श्रीगिरीश जलिहाल और एड.वॉच की नयनतारा रंगनाथन ने यह जांच की है कि फेसबुक ने अपने प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल होने दिया। मामला यह है किसी भी राजनीतिक…
  • Russia-Ukraine war
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या है रूस-यूक्रेन जंग की असली वजह?
    17 Mar 2022
    रूस का आक्रमण यूक्रेन पर जारी है, मगर हमें इस जंग की एक व्यापक तस्वीर देखने की ज़रूरत है। न्यूज़क्लिक के इस वीडियो में हमने आपको बताया है कि रूस और यूक्रेन का क्या इतिहास रहा है, नाटो और अमेरिका का…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    झारखंड में चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था और मरीज़ों का बढ़ता बोझ : रिपोर्ट
    17 Mar 2022
    कैग की ओर से विधानसभा में पेश हुई रिपोर्ट में राज्य के जिला अस्पतालों में जरूरत के मुकाबले स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी का खुलासा हुआ है।
  • अनिल जैन
    हिटलर से प्रेरित है 'कश्मीर फाइल्स’ की सरकारी मार्केटिंग, प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक
    17 Mar 2022
    एक वह समय था जब भारत के प्रधानमंत्री अपने समय के फिल्मकारों को 'हकीकत’, 'प्यासा’, 'नया दौर’ जैसी फिल्में बनाने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे और आज वह समय आ गया है जब मौजूदा प्रधानमंत्री एक खास वर्ग…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License