NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
त्रिपुरा चुनाव: प्रगतिशील बनाम राष्ट्रविरोधी ताकतों के बीच चुनाव
विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा और भाजपा के बीच एक ऐसी लड़ाई देखेंगे जो अलगाववादी आदिवासी संगठन की पीठ पर सवार है।
सुबोध वर्मा
20 Jan 2018
Translated by महेश कुमार
tripura elections

त्रिपुरा में आगामी विधानसभा चुनाव, जो भारत के सबसे छोटे राज्यों में से एक है, बहुत महत्वपूर्ण हो गया है और पूरे देश का ध्यान अपनी और खींच रहा है। यह इसलिए क्योंकि भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार वाम दल भाजपा के साथ राज्यव्यापी लड़ाई में सीधे टक्कर में हैं। उन राज्यों में जहाँ वामपंथी मज़बूत हैं जैसे केरल, पश्चिम बंगाल वहाँ भाजपा हमेशा छोटी ताकत रही है और वहाँ इस तरह का टकराव पहले कभी नहीं हुआ है।

दरअसल, त्रिपुरा में भी भाजपा एक छोटी पार्टी रही है। 2014 के लोकसभा चुनावों में, जब मोदी सत्ता में आए, तो भाजपा को त्रिपुरा में मात्र 6% वोटों मिले, जबकि वाम मोर्चे को 65% मत मिले। पिछले विधानसभा चुनावों में, वाम मोर्चा के 52.3% वोटों के हिस्से की तुलना में भाजपा को सिर्फ 1.5% वोट ही मिले थे।

तो सवाल यह उठता है कि, भाजपा अचानक वाम मोर्चे के लिए चुनौती कैसे बन गई है? जवाब बेहद शिक्षित करने वाला है और इसे देश भर के लोगों को जानना चाहिए। इससे देश पर शासन करने वाली पार्टी के सच्चे चरित्र का पता चलता है और उनके नेताओं, जिनमें प्रधान मंत्री मोदी भी शामिल हैं, जो 'राष्ट्रवाद', 'देशभक्ति' पर सभी लोगों का उपदेश देते हैं और दावा करते हैं कि वे हमेशा 'भारत पहले' की बात कहते हैं।

त्रिपुरा में, भाजपा ने खुलेआम एक अलगाववादी आदिवासी संगठन के साथ गठबंधन किया है जिसे देशज पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) कहा जाता है। इस संगठन के इतिहास के बारे में त्रिपुरा की जनता अच्छी तरह से वाकिफ है। यह अलगाववादी आदिवासी संगठनों की एक लंबी रेखा का पुनर्जन्म है जिसमें एक तथ्य सभी के लिए समान है: कि आदिवासी और गैर-आदिवासी संघर्ष को बढ़ावा देने के लिए हिंसा का उपयोग करना और एक अलग आदिवासी राज्य की मांग करना।

भाजपा उम्मीद कर रही है कि इस उग्रवादी राष्ट्र विरोधी संगठन के साथ मिलकर यह उन आदिवासी वोटों को आकर्षित करने में सक्षम होगी, जो कि राज्य के एक तिहाई मतदाताओं का हिस्सा है। 2017 में, आईपीएफटी के नेताओं ने कथित तौर पर सरकार के वरिष्ठ अफसरों/मंत्रियों से मुलाकात की जिसमें गृह मंत्री सहित पीएमओ के मंत्री शामिल थे और इस बैठक का संचालन खुद प्रधान मंत्री ने किया। ऐसी जानकारी है कि वे बीजेपी के कई बड़े नेताओं के संपर्क में हैं, जिनमें हेमंत बिस्वा शर्मा भी शामिल हैं, जो कि कांग्रेस से भाजपा में आये हैं, और जो अब असम की भाजपा नेतृत्व वाली राज्य सरकार में मंत्री हैं। और त्रिपुरा में चुनाव अभियान के प्रभारी भी हैं। और 5 जनवरी को इसी वर्ष वे गठबंधन को पक्का करने के लिए प्रधान मंत्री मोदी से भी मिले थे।

यह वही आईपीएफटी है जिसने जुलाई 2017 में त्रिपुरा को बाकी देश से जोड़ने वाले एकमात्र राष्ट्रीय राजमार्ग को दो सप्ताह तक नाकाबंदी को लागू करके अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को उजागर किया। इस नाकाबंदी के माध्यम से जो मांग उठायी गयी वह स्पष्ट थी कि: अलग त्रिपुरा के भीतर से एक नए राज्य तिप्रालैंड बनाया जाए। यह भी बताया गया कि पीएमओ से बातचीत के बाद नाकाबंदी को हटा दिया गया था।

इससे पहले, मार्च 2017 में, आईपीएफटी का एक समूह इस आरोप के बाद अलग हो गया कि दूसरे ने भाजपा से 2 लाख रुपये स्वीकार किए हैं ताकि भाजपा को उनका सहयोग मिल सके। कथित रिश्वत लेने वालों का नेतृत्व नरेश चंद्रा देबबर्मा कर रहे थे। यह वह गुट है जो अब भाजपा के साथ गठजोड़ के लिए बाध्य है।

भाजपा की समस्या - त्रिपुरा में आधार नहीं होने के बावजूद भी वह शासन करने की इच्छा पाल रही है – और यह आशा अलगाववादी आदिवासी गिरोह के साथ जाने से कभी पूरी नहीं होगी। जातीय आदिवासी मांगों को इस खतरनाक ढंग से उछाल कर, त्रिपुरा के अन्य गैर-आदिवासी निवासियों की प्रतिक्रिया कैसी होगी? इसलिए, भाजपा हिंदुत्व आधारित भावनाओं को भड़काने के लिए बंगाली आबादी के बीच काफी तेज़ी से काम कर रही है। ऐसा बताया गया है कि भाजपा बंगाली के बीच नाथ समुदाय को लुभाने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लाने की योजना बना रही है। स्थानीय स्तर पर, भाजपा कार्यकर्ता उत्साहपूर्वक बंगाली शताब्दी समूहों के साथ अपने आपको शामिल कर रहे हैं। त्रिपुरा में अमार बंगाली संगठन के नेतृत्व में उग्रवादी बंगाली हिंसा का इतिहास है, जिसका आनंद मार्ग द्वारा समर्थन किया गया था। भाजपा यह भी प्रचार कर रही है कि इसने नागरिकता अधिनियम 1955 में इस्लाम को छोड़कर सभी धर्मों के शरणार्थियों को भारत में नागरिकता प्राप्त करने की अनुमति देने के लिए संशोधन किया है।

इसलिए, भाजपा जो भारत को एकजुट करने का दावा करती है, एक छोटे से सीमावर्ती राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए इतनी बेताब है कि वह आदिवासियों और गैर-आदिवासियों और अलगाववादियों के साथ दशकों की सद्भावना को ध्वस्त करने के लिए तैयार है।

भाजपा ने तृणमूल के छह विधायकों सहित त्रिपुरा में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के सभी बदनाम सदस्यों को पाटी में शामिल कर लिया है। भाजपा दोनों दलों के कार्यकर्ताओं का पार्टी में  स्वागत करने के लिए सार्वजनिक कार्यकर्मों का आयोजन कर रही है। पिछले एक साल में उसने जिस महीन राजनीतिक आधार को पकड़ा है, उसके दम पर वह वाम मोर्चा को चुनौती देने के लिए उतरी है।

लेकिन ये सब धोखाधड़ी इस तथ्य को नहीं छिपा सकती है कि भाजपा वाम मोर्चे के सामने  एक कमजोर चुनौती है। इसका कारण यह है कि वाम मोर्चा ने अथक-और सफलतापूर्वक काम किया है - राज्य में चरमपंथी और हिंसक समूहों को हाशिए पर लाकर खडा कर दिया है। यह ऐसा कुछ है जो शायद ही कभी पूर्वोत्तर में देखा गया है। इस शांति ने राज्य को अपना लाभांश का भुगतान किया है क्योंकि इसके व्यापक असर को विकास कार्य करने के लिए वाम मोर्चा द्वारा उपयोग किया गया था। वाम मोर्चा ने आबादी में गहरे जड़ें जमायी है राज्य को विकसित किया है और एक ईमानदार, मेहनती और लोक-उन्मुख सरकार प्रदान की है। यही कारण है कि वाममोर्चा चुनावों में निरंतर जीतता रहा है - लोक सभा से लेकर पंचायत और स्वायत्त विकास परिषद की सीटों तक, सब में बौमत हासिल करता रहा है।

Tripura
Tripura Assembly Elections 2018
CPI(M)
BJP
BJP-RSS
communal polarization
Manik Sarkar

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • Western media
    नतालिया मार्क्वेस
    यूक्रेन को लेकर पश्चिमी मीडिया के कवरेज में दिखते नस्लवाद, पाखंड और झूठ के रंग
    05 Mar 2022
    क्या दो परमाणु शक्तियों के बीच युद्ध का ढोल पीटकर अंग्रेज़ी भाषा के समाचार घराने बड़े पैमाने पर युद्ध-विरोधी जनमत को बदल सकते हैं ?
  •  Mirzapur
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी: चुनावी एजेंडे से क्यों गायब हैं मिर्ज़ापुर के पारंपरिक बांस उत्पाद निर्माता
    05 Mar 2022
    बेनवंशी धाकर समुदाय सभी विकास सूचकांकों में सबसे नीचे आते हैं, यहाँ तक कि अनुसूचित जातियों के बीच में भी वे सबसे पिछड़े और उपेक्षित हैं।
  • Ukraine return
    राजेंद्र शर्मा
    बैठे ठाले:  मौत के मुंह से निकल तो गए लेकिन 'मोदी भगवान' की जय ना बोलकर एंटिनेशनल काम कर गए
    05 Mar 2022
    खैर! मोदी जी ने अपनी जय नहीं बोलने वालों को भी माफ कर दिया, यह मोदी जी का बड़प्पन है। पर मोदी जी का दिल बड़ा होने का मतलब यह थोड़े ही है कि इन बच्चों का छोटा दिल दिखाना ठीक हो जाएगा। वैसे भी बच्चे-…
  • Banaras
    विजय विनीत
    बनारस का रण: मोदी का ग्रैंड मेगा शो बनाम अखिलेश की विजय यात्रा, भीड़ के मामले में किसने मारी बाज़ी?
    05 Mar 2022
    काशी की आबो-हवा में दंगल की रंगत है, जो बनारसियों को खूब भाता है। यहां जब कभी मेला-ठेला और रेला लगता है तो यह शहर डौल बांधने लगाता है। चार मार्च को कुछ ऐसा ही मिज़ाज दिखा बनारस का। यह समझ पाना…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में क़रीब 6 हज़ार नए मामले, 289 मरीज़ों की मौत
    05 Mar 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 5,921 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 29 लाख 57 हज़ार 477 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License