NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
त्रिपुरा: वाम किले में सेंध लगाना आसान नहीं
हाल ही में हुए सभी चुनावों में त्रिपुरा में वाम मोर्चे को लगातार बहुमत मिल रहा है।
सुबोध वर्मा
16 Feb 2018
Translated by महेश कुमार
त्रिपुरा चुनाव 2018
Newsclick Image by Sumit

त्रिपुरा विधानसभा के लिए 18 फरवरी को मतदान के लिए उलटी गिनती शुरू हो रही है, भाजपा के छोटे से उत्तर-पूर्व राज्य में महँगे और भारी अभियान ने मुख्यधारा के मीडिया में एक धारणा पैदा कर दी है कि इस बार, भाजपा ने वाम किले को फतह करने की तैयारी कर ली है। हालांकि ज़मीन पर ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता है, चापलूस मीडिया सरकार के मंत्रियों (राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, नितिन गडकरी और अन्य) की यात्रा की पल-पल की खबर दे रहा है, और साथ ही राम माधव और सुनील देवधर की अगवायी में आरएसएस के बड़े नेता भी इसमें कूदे हुए हैं, और हाँ प्रधानमंत्री मोदी को भूलना यहाँ सही नहीं होगा।

ग्राउंड रिपोर्टों से पता चलता है कि राज्य के हर क्षेत्र में फैले बड़े पैमाने पर वाम मोर्चा अभियान भाजपा-आईपीएफटी गठबंधन के उच्च प्रोफ़ाइल प्रचारकों की तुलना में अपने कवरेज में बहुत अधिक संख्या में लोगों को आकर्षित कर रहा है। इसके बाद वहाँ वाम मोर्चे के स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर और गाँव-गाँव अभियान चलाया जा रहा है, इसके उल्ट बीजेपी का प्रचार उत्तर-प्रदेश और गुजरात से लाये गये आरएसएस के काडर और ‘विस्तारक’ चला रहे हैंI

पिछले कुछ वर्षों में, राज्य के कई चुनावों में वाम मोर्चे की निर्णायक जीत हुई है। इन चुनावों के समबन्ध में नोट करने की बात कि सभी में वाम मोर्चे को 50 प्रतिशत से अधिक मत मिले हैं।

त्रिपुरा चुनाव 2018

यह महत्वपूर्ण बात है क्योंकि कई दूर बैठे चुनावी पंडित बहस कर रहे हैं कि चूंकि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को बीजेपी-आईपीएफटी ने समाप्त कर दिया है, इसलिए सभी वाम विरोधी मतों को भाजपा गठबंधन जीतेगा और वामपंथ के अभेद किले को जीत लेगा। पिछले चुनाव के नतीजे बताते हैं कि किसी भी तरह का गठबंधन अभी तक वाम मोर्चा से ज़्यादा वोट पाने में सफल नहीं हुआ है।

पिछली विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा को 52% मत मिले, जबकि 2014 के आम चुनाव में (जहाँ एक तरफ मोदी की लहर केंद्र में भाजपा को सत्ता में लायी थी) त्रिपुरा में वाम मोर्चे को 65 प्रतिशत मत मिले थे। यह संभवतः चुनाव परिणामों में कांग्रेस के पतन का परिणाम था। दिसंबर 2014 में आयोजित तीन-स्तरीय पंचायत चुनावों में, फिर से वाम मोर्चा को 51 प्रतिशत मत प्राप्त हुए और सत्ता में आ गये। 2015 में, वाम मोर्चा ने त्रिपुरा जनजातीय स्वायत्त क्षेत्र जिला परिषद (टीटीएएडीसी) के चुनाव में 54 प्रतिशत मत प्राप्त किये और बाद के वर्ष में, शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों में 310 सीटों में से 291 सीटें हासिल की और 66 प्रतिशत वोट प्राप्त कर काफी शानदार जीत हासिल की।

यद्यपि मोदी-शाह जोड़ी ने यह विश्वास पैदा किया है कि चुनाव केवल एक अभियान प्रबंधन का काम है और उनकी यह किशोर समझ समय-समय पर धराशायी होती रही है। सभी सूक्ष्म-प्रबंधन और डेटा विश्लेषिकी और धन-संचालित उच्च प्रोफ़ाइल अभियान के बावजूद भाजपा बिहार और दिल्ली विधानसभा चुनावों में बुरी तरह हार गई और हाल ही में गुजरात में उसके लिए भारी मुश्किलें खड़ी हुईं थी।

त्रिपुरा में, स्थिति भाजपा के लिए और भी मुश्किल है क्योंकि इसके पास यहाँ कोई काडर का आधार नहीं है, वास्तव में इसका अपना कोई आधार ही नहीं है। इसने अपने पूरे के पूरे संगठन को हाल ही में तृणमूल कांग्रेस से उधार में लिया है, जिसे वह बदनाम कांग्रेस से मिला है। भाजपा को स्पष्ट रूप से राज्य के बाहर से अपने अभियान को पूरा करने के लिए केडर पर निर्भरता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यह वाम मोर्चे के खिलाफ गलत शासन के जंगली आरोपों में भी परिलक्षित होता है और भाजपा द्वारा इसे साबित करने के लिए झूठे आंकड़े जारी किए जाते हैं।

अगर दोनों पिछले रिकॉर्ड और वर्तमान अभियान की बात की जाए तो पता चलेगा कि भाजपा-आईपीएफटी गठबंधन - अपने आप में एक सुविधाजनक विवादास्पद अवसरवादी गठबंधन है – और चुनावों में भारी हार की ओर अग्रसर है। अच्छे प्रशासन में लोगों का भरोसा चुनावों में अधिक महत्वपूर्ण है, बजाय स्टार प्रचारकों की चकाचौंध, जो उड़ान भर कर आते हैं और तुरंत वापस चले जाते हैं।

त्रिपुरा चुनाव 2018
वाम बनाम बीजेपी
बीजेपी के जुमले
सीपीआईएम

Related Stories

अविश्वास प्रस्ताव: विपक्षी दलों ने उजागर कीं बीजेपी की असफलताएँ

इन्वेस्टमेंट सम्मिट्स: जुमले हज़ार, मगर कहाँ रोज़गार

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव: 15% से ज़्यादा वोटिंग मशीनों में ख़राबी

त्रिपुरा: भाजपा की खुद की बड़ी गलतियों ने थोड़ी सी बची उम्मीद पर भी पानी फेर दिया

त्रिपुरा चुनाव 2018: भाजपा के अच्छे दिनों के दावे में कितना है दम!

त्रिपुरा में भाजपा के चुनावी साझेदार, आईपीएफटी का एक संक्षिप्त इतिहास

भाजपा बनाम वाम मोर्चा # 2: आदिवासियों को दी गयी भूमि का रिकॉर्ड क्या कहता है?

‘ईश्वर के देश’ को ध्रुवीकृत्त करने की हिन्दुत्ववादी कोशिश

आर.एस.एस.-बीजेपी के खिलाफ़ सीपीआईएम ने दिल्ली में किया प्रदर्शन

चावेज़ की याद में


बाकी खबरें

  • शिरीष खरे
    कोरोना लॉकडाउन के दो वर्ष, बिहार के प्रवासी मज़दूरों के बच्चे और उम्मीदों के स्कूल
    16 Apr 2022
    सरकारी स्कूलों में खास तौर से गरीब परिवारों के बच्चे बड़ी तादाद में आ रहे हैं। इनमें से कई बच्चे प्रवासी मजदूर परिवारों से हैं।
  • न्यायमूर्ति के चंद्रू
    जय भीम: माई जजमेंट इन द लाइट ऑफ़ अंबेडकर
    16 Apr 2022
    2 नवंबर, 2021 को दुनिया भर में विकिपीडिया में जिन शब्दों को सर्च किया गया था, उनमें सबसे लोकप्रिय शब्द जय भीम था।
  • मुकुंद झा
    दिल्ली पुलिस का ये कहना कि धर्म संसद में हेट स्पीच नहीं हुई, दुर्भाग्यपूर्ण है: पूर्व आईपीएस अधिकारी
    16 Apr 2022
    पूर्व आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में दिल्ली पुलिस के रवैये पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए इसे काफी दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि पुलिस नफ़रती भाषण देने वालों पर कार्रवाई नहीं…
  • विजय विनीत
    प्रयागराज: घर में सोते समय माता-पिता के साथ तीन बेटियों की निर्मम हत्या!
    16 Apr 2022
    घटनास्थल को देखकर लग रहा था कि मरने से पहले सभी ने हमलावरों का प्रतिरोध किया था। चारों के शवों पर कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए थे। इस वारदात को खुदकुशी का एंगल भी देने की कोशिश की गई है।
  • पी.रमन
    कैसे चुनावी निरंकुश शासकों के वैश्विक समूह का हिस्सा बन गए हैं मोदी और भाजपा
    16 Apr 2022
    मोदी और भाजपा को बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट फंडिंग, बड़े बजट के सोशल मीडिया और ग्राउंड नेटवर्क और अंततः हिंदी समाचार चैनल के कट्टर एंकरों और मालिकों का समर्थन हासिल हो चुका है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License