NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
सरकारी स्कूलों को बचाना ज़रूरी है, क्योंकि...
अमीर को स्कूल चुनने की आज़ादी है, ग़रीब को नहीं। आज़ादी का अर्थ तो ग़रीब से ग़रीब को शिक्षा पाने का हक़ देता है। मूल प्रश्न यह है कि एक ग़रीब का बच्चा अपनी ग़रीबी की वजह से बराबरी और बेहतर शिक्षा से बेदखल क्यों रहे?
शिरीष खरे
13 Nov 2019
सरकारी स्कूलों को बचाना ज़रूरी है

आम धारणा है कि प्राइवेट स्कूलों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से अधिक होशियार होते हैं। इसके समर्थन में कई लोग बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे भी दिखा सकते हैं। लेकिन, आज इस बिंदू पर विचार करने की ज़रूरत है। पहली बात तो यह है कि प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को दाखिला देने के पहले ही चुना जाता है। कई बार उन्हें चुने जाने के लिए कठिन परीक्षा भी आयोजित कराई जाती है। अब कठिन परीक्षाओं को पास करके आने वाले बच्चों को तो प्राइवेट स्कूलों ने पहले ही चुन लिया तो हो सकता है वे अपेक्षाकृत अधिक होशियार हों भी।
फिर प्राइवेट स्कूलों में उन अमीर बच्चों को ही लिया जाता है, जिनके परिजनों को यदि लगा कि बच्चे की ट्यूशन भी ज़रूरी है तो वे उसकी ट्यूशन भी लगवा देते हैं।

अब यदि इन सारी अतिरिक्त सुविधाओं को हटा लिया जाए तो बहुत संभव हैं कि प्राइवेट स्कूलों के नतीजे भी सरकारी स्कूलों जैसे ही रहें।

यहां एक बात यह भी महत्त्वपूर्ण है कि स्कूल की गुणवत्ता का मतलब सामान्यत: महंगी बिल्डिंग, अंगेजी माध्यम और पढ़ाई के लिए काम आने वाली चीजों से लगाया जाने लगा है। लेकिन, बहुत कम सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इसलिए, संभवत: प्राइवेट स्कूलों से सरकारी स्कूलों के मुकाबले की बातों का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

दूसरी तरफ, यह भी कहा जाता है कि सरकारी शिक्षक यदि सही ढंग से अपनी ड्यूटी निभाएं तो सरकारी स्कूलों को प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले सुधारा जा सकता है।

यह कहते हुए इस हक़ीक़त को भुला दिया जाता है कि उनके हिस्से में बच्चों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत-सी ‘नेशनल ड्यूटीज’ हैं। सरकारी स्कूल के शिक्षक चुनाव, जनगणना, पशुओं की गणना या ऐसे ही दूसरे कई कामों में व्यस्त रहते हैं। यह कहने में कैसी झिझक कि एक सरकारी शिक्षक के ऊपर काम का बोझ बढ़ रहा है।
बुरे नतीजों के पीछे सरकारी शिक्षक और बच्चों के बीच का असंतुलित अनुपात भी जिम्मेदार है। आप सरकारी स्कूलों में बच्चों की भारी संख्या को देखिए, उसके मुकाबले आपको शिक्षकों की संख्या कुछ भी नहीं लगेगी।
फिर प्रश्न यह भी है कि एक ऐसा परिवार जो अपने बच्चों की मंहगी पढ़ाई का बोझ उठा सकता है, उसके सामने ‘सबकी शिक्षा एक समान’ जैसी बातों का क्या मतलब रह जाता है? उसे तो ऐसी बातें स्कूल चुनने की आजादी को रोकने जैसी लगेंगी?

इस प्रश्न को थोड़ा यूं करके देखें तो अमीर को स्कूल चुनने की आज़ादी है, ग़रीब को नहीं। आज़ादी का अर्थ तो ग़रीब से ग़रीब को शिक्षा पाने का हक़ देता है। मूल प्रश्न यह है कि एक ग़रीब का बच्चा अपनी गरीबी की वजह से बराबरी और बेहतर शिक्षा से बेदखल क्यों रहे? खास तौर पर प्राथमिक स्कूल से। अब तो प्राथमिक स्कूल की पढ़ाई को मौलिक हक़ के रुप में अपना लिया गया है। फिर भी मौटे तौर पर कहा जाता है कि देश के सौ में से करीब आधे बच्चे प्राइमरी स्कूल नहीं जाते है।

सीधी बात है कि शिक्षा में कई स्तरों पर असमानताएं हैं। दूसरी तरफ निजीकरण की तीव्र गति के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दूरियां बढ़ रही हैं। इन परिस्थितियों में अलग-अलग वर्गों के बच्चों के हितों को देखना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्राइवेट सेक्टर का कारोबार तो फलेगा-फूलेगा, किंतु सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानताएं दिन-ब-दिन बढ़ती जाएंगी।

जब सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो उनके बीच की असमानताओं के चलते दिक्कते नहीं आएंगी क्या?
यह बात लोकतंत्र के दृष्टिकोण से फिट नहीं बैठती है। अब तो दुनिया भर की किताबों में समाज और स्कूल की विविधताओं को न केवल स्वीकार किया जा रहा है, उनका सम्मान भी किया जा रहा है। कई देशों जैसे अमेरिका या इंग्लैण्ड में अलग-अलग वर्गों से आने वाले बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। वहां अलग-अलग योग्यता रखने वाले बच्चे एक साथ बैठते-उठते, रहते, रमते पढ़ते और लिखते हैं। सभी बराबरी के साथ बेहतर मौके तलाशते हैं। वहां की शिक्षा पब्लिक के हाथों में है। वहां के स्कूलों से ऊंच-नीच की सारी असमानताओं को हटा दिया गया है। वहां के स्कूलों में प्रवेश के पहले चुना जाना जरूरी नहीं है।

जबकि भारत में? यहां प्राइवेट स्कूलों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है। इससे प्राइवेट सेक्टर से जुड़े लोगों को मनमाने तरीके से मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। दूसरी तरफ कहने को सरकार की कई योजनाएं हैं। लेकिन, सबके अर्थ अलग-अलग हैं। जैसे कुछ योजनाएं शिक्षा के लिए तो कुछ महज साक्षरता को बढ़ाने के लिए चल रही हैं। इसकी जगह सरकार को एक ऐसे स्कूल की योजना बनानी चाहिए जो सारे अंतरों का लिहाज किए बगैर सारे बच्चों के लिए खुली हो।

अब प्रश्न है कि इस तरह से तो सरकारी स्कूलों में भी असमानताएं हैं?

बिल्कुल, जैसे कि पहले कहा जा चुका है कि केंद्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केंद्रीय स्कूल, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल, मेरिट लिस्ट के बच्चों के लिए नवोदय स्कूल। बात साफ है कि सभी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ताएं अलग-अलग हैं। इसी तरह शिक्षक को चुने जाने के लिए भी अलग-अलग स्कूलों में योग्यता के अलग-अलग पैमाने रखे गए हैं।

इसके बाद बात आती है कि समाज में जो भेदभाव है, वही तो स्कूल की चारदीवारी में है। इसलिए, समाज से स्कूल में घुसने वाले उन कारणों को तलाशना होगा, जो ऊंच-नीच की भावना बढ़ाते हैं। यदि समाज में समानता लानी ही है तो सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि इसकी शुरूआत शिक्षा और बच्चों से ही की जाए।
इसके लिए फिर दोहराना होगा कि सबके लिए एक समान स्कूल की बात करनी होगी। लेकिन, यह बात इतनी सीधी नहीं लगती है।

जब पानी से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक की चीजों को बाजार में ला दिया गया हो तो यह बात बेतुकी लग सकती है। लेकिन, शिक्षा की जर्जर हालत को देखते हुए तो यह बात बड़े तुक की लगती है। सामाजिक न्याय, समरसता और बदलाव के लिए यही एक रास्ता है। इसमें देश भर के सभी बच्चों के लिए एक ऐसी व्यवस्था की वकालत की गई है, जिसमें हर वर्ग के बच्चे को बगैर किसी भेदभाव के एक साथ पढ़ने-बढ़ने का अधिकार सुरक्षित है। यही वजह है सबके लिए एक समान शिक्षा के अभाव में समाज के ताकतवर लोगों ने सरकारी स्कूलों को ठुकरा दिया है।

(लेखक कम्युनिकेशन मैनेजर, कंटेंट राइटर और शिक्षा के क्षेत्र में एक ट्रेनर की भूमिका निभा रहे हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

Government schools
school facilities
public schools in India
public schooling system
save government education institutions

Related Stories

उत्तराखंड : ज़रूरी सुविधाओं के अभाव में बंद होते सरकारी स्कूल, RTE क़ानून की आड़ में निजी स्कूलों का बढ़ता कारोबार 

सरकार ने बताया, 38 हजार स्कूलों में शौचालयों की सुविधा नहीं

वायु प्रदूषण: दिल्ली में स्कूल, कॉलेज, सरकारी कार्यालय 29 नवंबर से फिर खुलेंगे

स्कूल तोड़कर बीच से निकाल दी गई फोर लेन सड़क, ग्रामीणों ने शुरू किया ‘सड़क पर स्कूल’ अभियान

कोविड-19: बिहार में जिन छात्रों के पास स्मार्ट फोन और इंटरनेट नहीं, वे ऑनलाइन कक्षाओं से वंचित

वॉल मैगजीन कैम्पेन: दीवारों पर अभिव्यक्ति के सहारे कोरोना से आई दूरियां पाट रहे बाल-पत्रकार 

शिक्षा के 'केरल मॉडल' को दूसरे राज्यों को भी क्यों फॉलो करना चाहिए?

भारत का एजुकेशन सेक्टर, बिल गेट्स की निराशा और सिंगापुर का सबक़

देश में करीब आधे सरकारी स्कूलों में बिजली और खेल के मैदान नहीं : संसदीय समिति

विशेष : भारत के एक गांव में एक शिक्षिका अलग से लगाती हैं संविधान की क्लास


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License