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आंदोलन
भारत
राजनीति
क्या छात्र-युवा फिर बनेंगे परिवर्तन के वाहक?
शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन कर रहे छात्र-युवा सरकारी दमन के बावजूद शासन-प्रशासन को अहिंसा और संविधान का पाठ पढ़ा रहे हैं। छात्रों के इस रुख से सत्तारूढ़ दल परेशान है। सरकार को इस परिस्थिति से उबरने का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है।
प्रदीप सिंह
20 Jan 2020
Protest

दिसंबर-जनवरी के महीने में समूचा उत्तर भारत कपकंपाती ठंड और कोहरे की चादर में कैद है। लेकिन इस ठंड में भी देश की सड़कों पर उतरा युवाओं का हुजूम हुकूमत को पसीने से तर-बतर कर रहा है। पिछले एक महीने से जगह-जगह देश भर में शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन चल रहे हैं। देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर असंतोष है और छात्र आंदोलन की राह पर हैं। सत्तारूढ़ संघ-बीजेपी इस छात्र-युवा आंदोलन को तोड़ने के लिए सांप्रदायिकता, हिंसा और पुलिस दमन का सहारा ले रही है।

विपक्ष इस समूचे परिदृश्य से बाहर है। शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन कर रहे छात्र-युवा सरकारी दमन के बावजूद शासन-प्रशासन को अहिंसा और संविधान का पाठ पढ़ा रहे हैं। छात्रों के इस रुख से सत्तारूढ़ दल परेशान है। सरकार को इस परिस्थिति से उबरने का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है। छात्रों-युवाओं की एकजुटता ने देश के राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है। और यह आंदोलन देश की एकरस हो चुकी राजनीति में उत्प्रेरक का काम कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या छात्रों-युवाओं का यह आंदोलन उनकी मांगों के पूरा होने के बाद थम जाएगा या यह वर्तमान राजनीतिक निज़ाम को बदलने तक जाएगा?

देश-विदेश में छात्र आंदोलनों का लंबा इतिहास है। छोटी-छोटी मांगों को लेकर शुरू हुए छात्र आंदोलनों ने कई देशों के सत्ता प्रतिष्ठान को उखाड़ फेंका है तो कई देशों के राजनीति की दशा और दिशा को बदल दिया है। सबसे पहले हम भारत में सत्तर के दशक में हुए छात्र आंदोलन (जेपी मूवमेंट) को देखते हैं जिसने अपराजेय इंदिरा गांधी को करारी शिकस्त देकर कांग्रेस को ऐसा आघात दिया कि आज तक वह उससे उबर नहीं पा रही है।

आज के राजनीतिक माहौल जैसा ही सत्तर के दशक में भी देश का राजनीतिक माहौल था। कांग्रेस शासन से लोगों का मोहभंग होने लगा था। मजबूत विपक्ष के अभाव में कांग्रेस अपनी मनमर्जी चला रही थी। 1971 में पाकिस्तान को हराकर बांग्लादेश बनाने के बाद कांग्रेस का गुरूर आसमान पर पहुंच गया था। इंदिरा गांधी ‘गरीबी हटाओ का नारा देकर फिर से सत्ता पर काबिज हो गई थीं। लेकिन गरीबी हटाओ का उनका नारा धीर- धीरे ‘गरीब हटाओ’ में बदल गया। गरीबों की जिंदगी बदतर हो गई।

अकाल और महंगाई ने जनता के दुख को दो गुना कर दिया। बुनियादी वस्तुओं के लिए अंतहीन कतारें देश में एक आम दृश्य बन चुकी थीं। दिसंबर 1973 में गुजरात में मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के कुछ छात्रों ने अपने मेस चार्ज में भारी वृद्धि के खिलाफ विरोध प्रकट किया था। राज्य और केंद्र सरकार अपने सभी प्रयासों के बावजूद इस असंतोष को हल करने में नाकाम रही। अंतत: यह छात्र आंदोलन पूरे देश में फैल गया। इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगानी पड़ी और साल भर बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी की जीत के साथ कांग्रेस सत्ता से हाथ धो बैठी।

इसी तरह 1968 में पेरिस विश्वविद्यालय से शुरू हुआ छात्र आंदोलन देखते ही देखते पूरे फ्रांस में फैल गया। इस आंदोलन में ग्यारह लाख कर्मचारियों और छात्रों ने हिस्सा लिया था, जो पूरे फ्रांस की जनसंख्या का 22 प्रतिशत था। दो सप्ताह तक चले इस आंदोलन के दौरान फ्रांस सरकार पूरी तरह से पंगु हो गई थी। हालात इतने बिगड़ गए थे कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति चार्ल्स डि गॉल को भाग कर जर्मनी में शरण लेनी पड़ी थी। इसी तरह रूस, चीन, जापान, इंडोनेशिया में हुए छात्र आंदोलनों ने वहां की राजनीति में आमूल-चूल परिवर्तन किए।

भारत में जब कोई राजनेता राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन की बात करता है तो उसे “युवा तुर्क” की संज्ञा देते हैं। यह “युवा तुर्क” शब्द भी छात्र-युवा आंदोलन से निकला है। तुर्की में छात्रों ने उस्मानिया साम्राज्य के निरंकुश राजतंत्र को समाप्त करके वहां संवैधानिक राजतंत्र स्थापित करने का आंदोलन चलाया था। यह छात्र आंदोलन इतना कामयाब रहा कि 1908 में सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय का एकछत्र शासन समाप्त हुआ और तुर्की में बहुदलीय लोकतांत्रिक शासन का आरम्भ हुआ। इस आन्दोलन की कमान छात्रों के हाथ में थी ऐसे में इसे ‘युवा तुर्क आंदोलन’ और इसमें शामिल युवाओं को “युवा तुर्क” कहा गया।

जिस तरह से छात्रों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का विरोध किया है, यह भारत की राजनीतिक गतिरूद्धता को तोड़ता है। राजनीतिक विश्लेषक इस आंदोलन को नए राजनीतिक समीकरण के उदय का संकेत मान रहे है।

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं, “आज के समय को हम कांग्रेस के पतन, भाजपा का उदय और क्षेत्रीय दलों की निरंतर कम होती प्रासंगिकता के तौर पर देख सकते हैं। पिछले 30 वर्षों में भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति उभरी है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दल देश के पूरे राजनीतिक स्थान को भर नहीं पा रहे हैं। जनता अन्य प्रासंगिक विकल्पों की तलाश कर रही है। सत्तारूढ़ दल औऱ मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां जनता की अपेक्षाओं, आवश्यकताओं और बुनियादी सवालों को हल करने के बजाय दबाने में लगी हैं। राज्य की बड़ी विफलता के चारों ओर मुखर और गतिशील विरोध की कोशिश हो रही है। बेरोजगारी, कृषि संकट, शहरीकरण, संवैधानिक संस्थाओं में संस्थागत सुधार का अभाव और महंगाई जैसे मुद्दे इसके लिए परिपक्व मौका उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में देश का युवा वर्ग एक बड़े आंदोलन और विकल्प के लिए तैयार है।”

वर्तमान राजनीति परिदृश्य से भी हम इसका जवाब पा सकते हैं। देश के राजनीतिक दलों को मुख्यत: चार जमातों में बांटा जा सकता है। जिसमें कांग्रेस, संघ-बीजेपी, कम्युनिस्ट पार्टी और समाजवादी विचारधारा से प्रभावित मध्यमार्गी पार्टियां-सपा,राजद,जेडीयू जैसे दल हैं। देश में दस वर्षों (2004-14) तक कांग्रेस का शासन रहा। भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते कांग्रेस को जाना पड़ा। ऐसे में जनता के बीच कांग्रेस की साख कोई अच्छी नहीं है। सपा-बसपा, राजद और जेडीयू जैसी पार्टियों के कई बड़े नेता भी अक्सर भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरते रहे हैं जिसके चलते वे भी नाज़ुक मौकों पर सत्ता के सामने डटकर खड़े नहीं हो पाते। कम्युनिस्ट पार्टियों के पास भी न तो उस तरह के संसाधन है और न ही ऐसा जनाधार कि देश में अकेले दम पर कोई बड़ा जनांदोलन खड़ा हो सके।

वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी कहते हैं कि, “आज युवा भारत का सबसे बड़ा मतदाता वर्ग है। वह सांप्रदायिक आधार पर निर्णय नहीं करता है। जो मुद्दे जो उनकी अंतरात्मा को आंदोलित करता है और देश के सामूहिक भविष्य को प्रभावित करता है, वे उस पर एकजुट हो जाते हैं। लेकिन अवसरवादी राजनीतिक दल अपने लाभ के आधार पर मुद्दे तय करते हैं। एक ढर्रे पर चलने के कारण मुख्यधारा के राजनीतिक दल इस समय छात्रों का नेतृत्व नहीं कर पा रहे हैं।”

पिछले छह वर्षों से देश की सत्ता पर धुर दक्षिणपंथी विचारधारा वाले संघ-बीजेपी का कब्जा है। सत्ता में आते ही मोदी सरकार जनता के बुनियादी सवालों को पीछे कर हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने में व्यस्त है। मोदी सरकार अपनी असफलताओं का भी ठीकरा विपक्ष के माथे फोड़ रही है और विपक्ष प्रतिवाद करने के बजाय समर्पण की मुद्रा अख्तियार किए हुए है।

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश कहते हैं,“छात्रों-युवाओं का यह आंदोलन देश के लोकतंत्रीकरण में अहम योगदान दे रहा है। युवा जाति,धर्म औऱ क्षेत्र से ऊपर उठ कर संविधान और लोकतंत्र को सर्वोपरि मानते हुए आगे बढ़ रहे हैं। सरकार दमन के सहारे है और य़ुवा गांधी के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।”

लम्बे समय से छात्र-युवा देश और अपनी जिंदगी की बेहतरी का सपना देख रहे थे। सत्ता पक्ष और विपक्ष युवाओं की आकांक्षाओं को समझने और उनका नेतृत्व करने में असफल रहा है। ऐसे में अब आंदोलनकारी छात्र स्वयं अपने नेता और मार्गदर्शक की भूमिका में हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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