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भारत
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TRAI के पब्लिक WIFI की ज़रुरत है जिससे लोगों तक इंटरनेट पहुँच सके
दूरसंचार दिग्गज जियो, एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया पब्लिक ओपन वाईफाई परियोजना का विरोध कर रही हैं क्योंकि यह उनके एकाधिकार को ख़त्म कर देगा।
प्रणेता झा
12 Jul 2018
Public WIFI

भारत की टॉप प्राइवेट दूरसंचार कंपनियां रिलायंस जियो, भारती एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआई) की पब्लिक ओपन वाईफाई परियोजना का विरोध कर रही हैं। इस परियोजना से इंटरनेट खर्च में 90% तक कटौती की उम्मीद है।

ट्राई ने कहा कि इस परियोजना के तहत पूरे देश में पब्लिक डेटा ऑफिस (पीडीओ) की स्थापना करने की योजना है जो पहले के पीसीओ की तर्ज पर उपयोगकर्ताओं को बहुत सस्ते क़ीमतों (2 रुपये से प्रारंभ) पर इंटरनेट (बैंडविड्थ) रीसेल करेगा और ये पीडीओ हॉटस्पॉट के रूप में काम करेगा।

रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले साल अक्टूबर में देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी पायलट परियोजना के तहत 603 वाईफाई हॉटस्पॉट की सफलता के बाद दूरसंचार विभाग ने एक महीने में पूरे देश में 10,000 ऐसे वाईफाई हॉटस्पॉट लॉन्च करने की योजना बना रहा है।

कोई भी व्यापार इकाई यहां तक कि चाय-दुकान मालिक जैसे छोटे उद्यमी आसानी से एक पेड पब्लिक वाईफाई एक्सेस पॉइंट/ हॉटस्पॉट स्थापित करने में सक्षम होंगे और पीडीओ एग्रीगेटर्स नामक इकाइयों से सस्ते दरों पर बैंडविड्थ (bandwidth) खरीद सकेंगे। ये एग्रीगेटर कई इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (आईएसपी) से इंटरनेट बैंडविड्थ को एक समूह में इकट्ठा कर देगा और इसे पीडीओ को बेचेगा और इस एग्रीगेटर्स को दूरसंचार लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होगी लेकिन केवल दूरसंचार विभाग (डीओटी) के साथ पंजीकरण करने की आवश्यकता होगी।

सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) के बैनर के तले दूरसंचार सचिव अरुणा सुंदरराजन को इन चार कंपनियों ने एक पत्र लिखा है। .उन्होंने इस बात पर एतराज़ किया कि इससे "असमान अवसर" पैदा होगा चूंकि ये एग्रीगेटर्स अपने बैंडविड्थ को हज़ारों या उससे अधिक पीडीओ को बेचेंगे, उन्हें लाइसेंस शुल्क, स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क का भुगतान नहीं करना होगा और न ही उन्हें सरकार को राजस्व का हिस्सा देने की आवश्यकता होगी।

दूरसंचार कंपनियों ने यह भी दावा किया है कि लाइसेंस के अभाव में "राष्ट्रीय सुरक्षा" के लिए ख़तरा पैदा होगा लेकिन न्यूज़क्लिक से बात करते हुए विशेषज्ञों ने इस तथाकथित चिंता को ख़ारिज कर दिया था। डीओटी ने पहले से ही अनिवार्य कर दिया है कि एग्रीगेटर्स ई-केवाईसी (अपने ग्राहक की जानकारी), प्रमाणीकरण और रिकॉर्ड रखने की आवश्यकताओं को सुनिश्चित करते हैं। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षैतिज प्रणाली के हर स्तर पर नज़र रखना और अवरोध संभव होगा, क्योंकि ये पीडीओ प्रदाता और एग्रीगेटर्स मौजूदा आईएसपी का इस्तेमाल करेंगे और सरकार आसानी से शामिल संगठनों के लिए ज़्यादा सुरक्षा मानकों और संबंधित मानदंडों को अनिवार्य कर सकती है।

आईटी फॉर चेंज के परमिंदर जीत सिंह ने न्यूजक्लिक से बात करते हुए कहा कि मुख्य मुद्दा यह है कि ये दूरसंचार कंपनियां अपने उद्देश्य के लिए ग्राहक (अंतिम ग्राहक के रूप में जानी जाने वाली) तक आखिरी लिंक का एकाधिकार/स्वामित्व लेना चाहती है।

"यह आपके घर की ओर जाने वाली एक एकाधिकार मार्ग के स्वामित्व की तरह है ताकि आप के साथ होने वाली घटना को आप नियंत्रण कर सकें। इस तरह आप इस एकल मार्ग के माध्यम से मौजूदा लंबवत एकीकृत प्रणाली में एक दूसरे के शीर्ष पर अन्य सेवाओं और उत्पादों का इस्तेमाल कर सकते हैं। वास्तविक निरंतर आय उस मार्ग से आती है जो आप उस एकल मार्ग पर प्रचार और बिक्री करते हैं न कि कनेक्टिविटी से।" उदाहरणस्वरूप रिलायंस जियो अब ई-कॉमर्स में शामिल होने की तलाश में है। वे साझा किए गए, क्षैतिज रूप से फैले मॉडल में नियंत्रण खो देंगे।

दरअसल ट्राई स्वयं ही कहती है कि इन लक्ष्यों में से एक लक्ष्य "एकाधिकार को खत्म करना" है। दूरसंचार नियामक ने कहा है कि ये "मल्टी-प्रोवाइडर, इंटर-ऑपरेबल, कोलेबोरेटिव मॉडल इस प्रणाली में इस समग्र नवीनता को बढ़ाता है, एकाधिकार को खत्म करता है और अंतिम उपयोगकर्ता को लाभ देने के लिए प्रोत्साहित करता है।"

ये मॉडल यह सुनिश्चित करता है कि सभी प्रकार के प्रदाता (पीडीओ प्रदाता, हार्डवेयर/सॉफ्टवेयर का एक्सेस पॉइंट, उपयोगकर्ता प्रमाणीकरण और केवाईसी प्रदाता, और भुगतान प्रदाता) असमूहीकृत हैं, जो "पारिस्थितिक तंत्र में कई पार्टियों के एक साथ आने और बड़े पैमाने पर स्वीकार करने में सक्षम" बनाने की अनुमति देता है।

उन्होंने कहा कि बड़ी दूरसंचार कंपनियों द्वारा इंटरनेट का इतना सस्ता और व्यापक व्यवस्था संभव नहीं है क्योंकि उनके सेवा कार्य की लागत उच्च होती है, चूंकि वे जिस पैमाने पर काम करते हैं उसके कारण बहुत अधिक इनपुट लागत होती है। ये उच्च लागत उन्हें उन लोगों के वर्गों को सस्ती दर पर बेचने और कम करने इजाज़त नहीं देगा जिनसे लाभ आसानी से हासिल नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि छोटे कंपनियों को शामिल होना ज़रूरी है।

दिग्गज दूरसंचार कंपनियों के अनुसार इन एग्रीगेटर्स को सरकार के साथ राजस्व साझा नहीं करना पड़ेगा, सिंह ने कहा कि वे जो राजस्व साझा करते हैं उसे थोक मूल्य में जोड़ दिया जाता है जिसका मतलब है कि यदि आप राजस्व साझा कर रहे हैं तो उसे आपके द्वारा चार्ज की जाने वाली कीमतों में वसूल किया जा सकता या प्राप्त कर लिया जाता है।

इसके अलावा सिंह ने कहा कि "थोक और खुदरा का क्षैतिज पृथक्करण" ज़रूरी है यदि हम वास्तविक तटस्थता का लक्ष्य रखना चाहते हैं, क्योंकि यह दिए जाने वाले सेवाओं के एकीकरण की अनुमति नहीं देगा और वास्तव में समान अवसर का निर्माण करेगा।

और यहां तक कि ये एग्रीगेटर्स बड़ी इकाइयां (कोई भी स्वामित्व, कंपनी, सोसायटी, गैर लाभ आदि जो मानदंडों को पूरा करते हैं एग्रीगेटर्स के रूप में प्रारंभ कर सकता है) होती हैं और भले ही वे इस बैंडविड्थ को कुछ हज़ार पीडीओ को बेच देते हैं तो फिर भी यह संभावना होगी "एक ज़िला या शायद दो" का आकार हो, इसलिए वे किसी भी मामले में इन बहुराष्ट्रीय दूरसंचार कंपनियों के साथ तुलनीय नहीं हैं।

लेकिन इंटरनेट के खुदरा बेचने पर एकाधिकार को खत्म करने और भारत के लोगों तक पहुंच का यही एकमात्र तरीका है, जहां "फाइबर/दूरसंचार के खराब कवरेज और सेलुलर डेटा के निषिद्ध मूल्य निर्धारण के कारण डेटा तक पहुंच सीमित है" और ट्राई के अनुसार, "फ्रांस में 13 मिलियन और संयुक्त राज्य अमेरिका में 10 मिलियन की तुलना में भारत में केवल 31,000 पब्लिक वाईफाई हॉटस्पॉट हैं।"

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