NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उ. प्र, में भाजपा की जीत देखने का दूसरा कोण अनुपस्थित क्यों
ये विधानसभा चुनाव सत्ता के उस सामंत कालीन युद्ध से अधिक कुछ नहीं रहे जिसमें सब कुछ ज़ायज होता है।
वीरेन्द्र जैन
25 Mar 2017
उ. प्र, में भाजपा की जीत देखने का दूसरा कोण अनुपस्थित क्यों
संस्कृत में एक श्लोक है-
 
विद्यायाम विवादाय, धनं मदाय, शक्तिम परेशां परपीडनाय
खलस्य साधूनाम विपरीत बुद्धि, ज्ञानाय, दानाय च रक्षणाय
 
अर्थात दुष्ट लोगों के पास विद्या विवाद के लिए, धन घमण्ड के लिए और ताकत दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के लिए होती है, जबकि सज्जन पुरुषों के पास विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए, और ताकत दूसरों की रक्षा के लिए होती है। वृत्ति बदलने से उपयोग बदल जाते हैं।
यह सूचना का युग है और सूचना के आदान प्रदान की नवीनतम सुविधा मनुष्यता को बड़ी ताकत देती है। यह कम श्रम और व्यय में कई गुना और शीघ्र से शीघ्र जानकारी दे सकती है जो क्षणों में दूर दूर तक प्रसारित की जा सकती है। किंतु इसके साथ ही इसके स्तेमाल करने वाले की प्रवृत्ति इसके सदुपयोग या दुरुपयोग को तय कर सकती है। चिंता की बात है कि हमारे देश में लोकतंत्र के नाम पर सत्ता हथियाने को उतावले समूह इसका निरंतर दुरुपयोग कर रहे हैं। वे असत्य, अर्धसत्य, और भ्रमों का प्रसारण अपनी पहचान छुपा कर कर रहे हैं। झूठ बोलने की आज़ादी को अभिव्यक्ति की आज़ादी की ओट में पाला जा रहा है। सच तो यह है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी देश के नागरिकों के लिए है न कि अनजान अज्ञात, अशरीरी लोगों के लिए है। इसके दुरुपयोग का जो दुष्परिणाम होता है उसके लिए दण्ड देने का कोई स्पष्ट कानून नहीं है और जो छोटा मोटा कानून है भी वह किसी अदृश्य व्यक्ति पर कैसे फैसला दे  सकता है! राजनीति के क्षेत्र में इसके दुरुपयोग ने लोकतंत्र पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है, क्योंकि आदर्श लोकतंत्र में सुशिक्षित, सूचना सम्पन्न, विचारवान जागरूक नागरिकों द्वारा बहुमत के आधार पर  सरकारें चुनने का सपना देखा गया है। ऐसा आदर्श समाज अभी बनना शेष है। जब देश के नागरिकों को जानबूझ कर गलत सूचना देकर उनसे प्रतिक्रिया पूछी जायेगी तो वैसी ही होगी।  
 
गलत सूचना फैला कर उसकी प्रतिक्रिया को अपने हित में मोड़ लेने का इतिहास भाजपा के पूर्व नाम जनसंघ के ज़माने से ही शुरू हो जाता है, जो अब रहस्य नहीं रह गया है। जल विद्युत योजनाओं को पानी में से बिजली निकाल कर उसे फसल हेतु अनुपयोगी बना देने की अफवाह हो, या दो बैलों की जोड़ी पर क्रास की मुहर का मतलब गौवंश को कत्ल हेतु भेजने का दुष्प्रचार हो, कम्युनिष्टों को गद्दार बताने की बात हो या ऐसी ही सैकड़ों अफवाहें हों, उनकी सारी चुनावी सफलताएं एक असत्य को स्थापित कर उसके आधार पर अपने विरोधी को परास्त करना होता है। उत्तर प्रदेश के ताजा विधानसभा चुनाव भी उससे अछूते नहीं रहे। मोदी व शाह के नेतृत्व में लड़े गये लोकसभा चुनाव से ही सूचना माध्यमों को खरीदने, उन्हें भ्रष्ट करने या अन्य दबावों से नियंत्रित करने का काम व्यापक पैमाने पर शुरू कर दिया गया था। हजारों की संख्या में ट्रालर्स भर्ती किये गये थे जो सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहे। मोदी के फालोवर और प्रशंसकों की संख्या की कलई बीबीसी ने  खोल दी थी किंतु नियंत्रित मीडिया द्वारा इसे नकारात्मक खबर वाले स्थान पर नहीं दिखाया गया था। इनकी अनंत कथाओं को छोड़ते हुए अगर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 पर ही केन्द्रित किया जाये तो सूचना माध्यमों ने पाँच राज्यों में हुए चुनावों को केवल उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों तक ही सीमित करके सच को छुपाने की कोशिश की। जबकि सच यह है कि दो राज्यों में भाजपा बहुमत में आयी है व एक में पूर्ण बहुमत के साथ दो विधान सभाओं में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर काँग्रेस तीन में आगे रही।
 
उत्तर प्रदेश में ही नहीं उत्तराखण्ड में भी भाजपा ने सबसे अधिक दलबदल को प्रोत्साहन दिया  उन्होंने इस तरह आने वाले लोगों को आनन फानन में टिकिट देकर भी उपकृत किया। अपने व्यक्तिगत जातिवादी प्रभाव को मिला कर इनमें से ज्यादातर जीत भी गये। मोदी के पौरुष को बखानने वाले मीडिया ने दलबदलुओं को टिकिट देने की कभी आलोचना नहीं की। क्या केन्द्र में सत्तारूढ देश की प्रमुख पार्टी के लिए यह नैतिक है कि वो इस पैमाने पर दल बदल को प्रोत्साहित करे। किंतु मीडिया में इस पर कहीं भी आलोचनात्मक रुख देखने को नहीं मिला। बाद में अल्पमत में आकर भी गोआ और मणिपुर में जिस तरह समर्थन प्राप्त किया गया उसने तो सारे नैतिक मानदण्डों और स्वाभिमान को ताक पर रख दिया। जिस व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिला कर उसके अनचाहे देश के रक्षा मंत्री का भार दिया गया था उस फैसले को कुछ दलों ने समर्थन के सौदे में बदलवा दिया। इन दलों ने चुनावों के दौरान भाजपा और पर्रीकर की कटु आलोचना भी की थी। राष्ट्रवाद का दम भरती पार्टी एक छोटे से राज्य में सरकार बनाने की जोड़तोड़ में देश की रक्षा की जिम्मेवारी के साथ समझौता कर लेती है।   
 
किसी दल की नीतियों के प्रभाव की समीक्षा उसके द्वारा जीती गई सीटों के आधार पर नहीं अपितु उसको मिले मतों की संख्या के आधार पर ही मापी जा सकती है। गत लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को 3,43,18854 मत मिले थे जो कुल डाले गये मतों के 42.63% थे जबकि ताजा विधानसभा चुनाव में कुल मत प्रतिशत बढ जाने के बाद भी उसे 3,12,38214 मत मिले अर्थात 31 लाख मत कम मिले। लोकसभा चुनावों में उन्हें 334 विधानसभा क्षेत्रों में बढत हासिल हुयी थी किंतु उक्त चुनाव में वे केवल 312 सीटें ही जीत सके। इसके विपरीत बहुजन समाज पार्टी को लोकसभा चुनावों के दौरान मिले 1,59,14194 [19.77%] के समक्ष 1,74,81654 मत मिले अर्थात 15 लाख मत अधिक मिले।
 
चुनावों के दौरान जितनी मात्रा में नगदी और शराब आदि पकड़ी गई है, जो कुल उपयोग का बहुत मामूली प्रतिशत होता है, यह बताता है कि नोटबन्दी के फ्लाप ड्रामे के बाबजूद भी चुनावों के तौर तरीकों में कोई फर्क नहीं आया है। यह तो स्पष्ट ही है कि चुनावों में या तो कार्पोरेट चन्दा लगता है जो वस्तुतः सत्तारूढ या सम्भावित बड़े दलों के लिए सुविधा शुल्क ही होता है या वह अवैध ढंग से कमाया हुआ पैसा ही होता है। स्वाभाविक ही है कि सत्ता से जुड़े दल ही इसे खर्च करते हैं।
 
ईवीएम मशीनों के दुरुपयोग की शिकायतें तब तक बेमानी हैं जब तक कि उनमें छेड़छाड़ का कोई नमूना प्रदर्शित नहीं किया जाता। किंतु यह तो तय है कि पिछले दिनों जिस पैमाने पर मोदी सरकार के फैसले अप्रिय और जनविरोधी थे उससे किसी भी मीडिया या चुनावी विश्लेषक को ऐसे चुनाव परिणाम की उम्मीद नहीं थी। यही कारण रहा कि ईवीएम मशीनों के आरोपों को विचार योग्य माना जा रहा है। एग्जिट पोल की बड़ी भद्द पिटी किंतु उस सन्दर्भ में कहीं चर्चा नहीं हो रही है कि इस तरह की हवा हवाई बातें कब तक चलनी चाहिए। क्या ये पोल किसी भी तरह के चकित करने वाले फैसलों के लिए वातावरण बनाने का काम करते हैं।  
 
इन चुनावों में न तो कहीं मुद्दे उभर कर आये और न ही जन समस्याओं व नीतियों पर गम्भीर चर्चा रही। यद्यपि भाजपा ने प्रदेश की बीस प्रतिशत आबादी के किसी प्रतिनिधि को टिकिट न देकर परोक्ष में साम्प्रदायिक विभाजन प्रकट कर दिया था पर अल्पसंख्यकों का गैरभाजपा दलों की ओर झुकना भी एक विभाजन पैदा कर रहा है, जो खतरनाक है। कुल मिला कर ये विधानसभा चुनाव सत्ता के उस सामंत कालीन युद्ध से अधिक कुछ नहीं रहे जिसमें सब कुछ ज़ायज होता है।

बाकी खबरें

  • मोदी सरकार क्यों भूल गयी, " सबका साथ, सबका विकास" ?
    न्यूज़क्लिक टीम
    मोदी सरकार क्यों भूल गयी, " सबका साथ, सबका विकास" ?
    13 Aug 2021
    कानपुर में खुलेआम सड़क पर एक मुस्लिम आदमी को उसकी सात साल की बच्ची के सामने पीटा जाता है, जय श्री राम के नारे लगाए जाते हैं। और उधर आज प्रधानमंत्री मोदी गुजरात मे निवेशकों को सम्बोधित करते हैं।
  • वर्तमान और भविष्य के बीच संघर्ष का नाम है क्रांति : फिदेल कास्त्रो
    अनीश अंकुर
    वर्तमान और भविष्य के बीच संघर्ष का नाम है क्रांति : फिदेल कास्त्रो
    13 Aug 2021
    50 वर्षों तक क्यूबा के राष्ट्रपति रहे फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में उस समय क्रांति को अंजाम दिया जब लैटिन अमेरिका के लगभग सभी देश तानाशाही के अधीन थे। क्यूबा लैटिन अमेरिकी देशों में स्वतन्त्रता…
  • गाज़ा मत्स्य क्षेत्र का इस्तेमाल इज़रायल फ़िलिस्तीनीयों को सामूहिक सज़ा देने के लिए कर रहा है
    अब्दुल रहमान, अभिजान चौधरी
    गाज़ा मत्स्य क्षेत्र का इस्तेमाल इज़रायल फ़िलिस्तीनीयों को सामूहिक सज़ा देने के लिए कर रहा है
    13 Aug 2021
    रॉकेट हमलों का वास्ता देकर इज़रालय अक्सर मत्स्य क्षेत्र को प्रतिबंधित कर देता है, जिससे हज़ारों फ़िलिस्तीनियों की आजीविका और खाद्यान्न ख़तरे में आ जाते हैं।
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक; फुल ड्रेस रिहर्सल: क्या से क्या हो गए देखते-देखते!
    13 Aug 2021
    फुल ड्रेस रिहर्सल: साल दर साल...विकास के पथ पर सरकार। जी हां, देखिए इस ऐतिहासिक मौक पर गौर से देखिए, कोविड की मार के अलावा बेरोज़गारी और महंगाई आज चरम पर है। आम आदमी का दम निकल रहा है। दूसरी तरफ़ ‘…
  • लीबिया में युद्ध समाप्त करने और दिसंबर में चुनावों की रूपरेखा को अंतिम रूप देने को बातचीत फिर शुरू
    पीपल्स डिस्पैच
    लीबिया में युद्ध समाप्त करने और दिसंबर में चुनावों की रूपरेखा को अंतिम रूप देने को बातचीत फिर शुरू
    13 Aug 2021
    ये वार्ता एक संवैधानिक ढांचे पर एक समझौते की योजना बनाने की कोशिश कर रही है जो देश को एकजुट करने के उद्देश्य से आगामी राष्ट्रपति और संसदीय चुनावों को संचालित करेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License