NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
उड़ता गुजरात पार्ट 5 - आदर्श गुजरात को कृषि संकट ने जकड़ा
कृषि उत्पादन स्थिर है, किसानों के कर्ज और आत्महत्याएं बढ़ रही हैं, 35 प्रतिशत किसानों ने खेती छोड़ दी है - गुजरात के विकास मॉडल ने किसानों के साथ धोखा किया है.
पृथ्वीराज रूपावत
29 Nov 2017
Translated by महेश कुमार
उड़ता गुजरात

भाजपा जिसे अक्सर शासन और विकास का एक बेहतरीन ‘मॉडल’ मानती है उस गुजरात में कृषि की स्थिति को लेकर कुछ चौकाने वाले तथ्य पेश हैं:

  • 2001 और 2011 के बीच, गुजरात में किसानों की संख्या 3,55,181 तक गिर गई, जिनमें से अधिकांश छोटे और सीमान्त किसान हैं (जो कि केवल एक वर्ष में 6 महीने तक खेती करते हैं). यह लगभग 35% की गिरावट है - देश में यह गिरावट सबसे बड़ी है. दूसरी ओर, खेतिहर मजदूरों की संख्या में 16.8 लाख या इससे अधिक की बढ़ोतरी हुयी है, यह बढ़ोतरी करीब-करीब 50 प्रतिशत की है और यह भी देश के पैमाने पर सबसे बड़ी बढ़ोतरी है.
  •  वर्षों से, किसान-आत्महत्याएं गुजरात के किसानों को सता रही हैं. पिछले तीन वर्षों (2013 से 2015) की अवधि में गुजरात में 1483 किसानों ने आत्महत्या की है.
  • राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण संगठन की 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में लगभग 43% किसानों पर कर्ज हैं और हर परिवार पर औसत कर्ज 1,26,109 रुपये है. गुजरात जैसे 'उन्नत' राज्य के लिए यह काफी गंभीर है क्योंकि पूरे भारत में इसका औसत 45% के ऋण का और 1,53,640 रूपये का औसत कर्ज का है.

उपरोक्त तथ्यों का महत्व क्या है?  वह यह है कि: गुजरात, मॉडल प्रशासन और समृद्धि की सभी बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद, देश में व्याप्त कृषि संकट में उसकी स्थिति काफी गंभीर बनी हुयी है. वर्षों के कृषि उत्पादन पर एक करीबी नज़र डालने से पता चलता है कि 2001-2006 के दौरान शुरुआती उछाल के बाद खाद्यान, तिलहन और कपास का उत्पादन पिछले 5-6 वर्षों के दौरान लगभग स्थिर रहा है, जो मुख्य रूप से नर्मदा के जल को दूर तक पहुंचने और बीटी कॉटन के कारण पश्चिमी गुजरात के किनारे में हुआ है.

विधानसभा चुनावों की घोषणा होते ही गुजरात की सत्तारूढ़ भाजपा अचानक अपनी कुछ गलतियों को सुधारने और किसानों को राहत देने की की कोशिश कर रही है. इसने राज्य में विभिन्न नकदी फ़सलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया है और सूक्ष्म-सिंचाई प्रणालियों का उपयोग करने वाले किसानों के लिए ‘माल और सेवा कर’ (जी.एस.टी.) में छूट का भी ऐलान किया है. लेकिन, इस साल की खरीफ की खेती की खरीद में देरी होने से किसानों के लिए संकट बढ़ गया है.

भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की बढ़ती सेना की स्थिति भी गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि राज्य में प्रति दिन न्यूनतम मजदूरी केवल 150 रुपये है, जोकि देश में सबसे कम है.

गुजरात के कृषि क्षेत्र में व्याप्त इस भयावह एवं निराशाजनक स्थिति के चलते और इससे जुड़े करोड़ों लोगों ने, भूमि अधिग्रहण से लेकर लाभकारी मूल्यों तक की कई समस्याओं के सम्बन्ध में किसानों के विरोध प्रदर्शन के साथ जुड़ गए हैं. ये सभी कारक इस बात की तस्दीक करते हैं कि शासन और विकास के गुजरात के मॉडल से जनता का मोहभंग हुआ है और आम जनमानस में उसके विरुद्ध असंतोष बढ़ रहा है.

किसान विरोध

हाल ही में गुजरात सरकार ने खेदुत समाज गुजरात (के.एस.जी.) नामक एक किसान संगठन द्वारा दक्षिण गुजरात के भिलाड से उत्तर गुजरात के अमीरगढ़ तक चौदह दिवसीय मोटरबाइक रैली निकालने की अनुमति देने से इसलिए माना कर दिया क्योंकि वे भाजपा की किसान-विरोधी नीतियों के विरुद्ध भाजपा के खिलाफ मतदान के लिए आम जनता, खासकर किसानों का आह्वान करना चाहते थे. भाजपा सरकार द्वारा कच्छ में 2005 में कृषि क्षेत्र की 45.6 लाख हेक्टेयर भूमि को कॉर्पोरेट कृषि के लिए आवंटित करने के प्रस्ताव के खिलाफ उत्पन्न रोष ने ज़मीन बचाओ आंदोलन के गठन को जनम दिया. कच्छ में ही,  जब गुजरात सरकार ने बॉम्बे टेनेंसी एंड एग्रिकलचरल लैंड एक्ट को 20,000 एकड़ जमीन पर फ्रीज/सिमित करने के प्रस्ताव के विरुद्ध किसान एकजुट हुए क्योंकि दशकों तक जमीन पर रहे उनके हक़ और अधिकार कह्तरे में पद गए, इसलिए इस प्रस्ताव से नाराज हो गए और भाजपा के खिलाफ हो गए. किसानों ने ही 2001-2002 में ओखमांडल के प्रस्तावित विशेष आर्थिक क्षेत्र (एस.ई.जेड.) के विरुद्ध दो साल तक स्थानीय स्तर पर संघर्ष कर परियोजना को रोकने में सक्षम रहे. विवादास्पद सरदार सरोवर परियोजना (एस.एस.पी.) के सम्बन्ध में नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेतृत्व में हुए आंदोलन में  गुजरात के किसानों ने भी हिस्सा लिया था. इस परियोजना से आहात कई विस्थापित किसानों को अभी तक मुवावजा नहीं मिला है और आज भी सूरत जिले में आंदोलन कर रहे हैं.

2013 में, जमीनी अधिकारी आंदोलन गुजरात (जेएएजी) के नेतृत्व में मारुती विनिर्माण संयंत्र को 50 हजार एकड़ उपजाऊ भूमि आवंटित करने के सरकारी फैंसले, जोकि 44 गाँवों के किसानों को प्रभावित करने वाली थी के खिलाफ, कई विरोध प्रदर्शनों किये और सरकार को परियोजना को मूल 44 गावों से आठ गांवों के क्षेत्र तक सिमित करने के लिए मजबूर कर दिया.

राज्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कार्यान्वयन के मामले में, जिस पर खेतिहर मजदूरों सहित वंचित वर्गों के लोगों की बड़ी तादाद निर्भर हैं, भाजपा सरकार का इस मामले में प्रदर्शन अन्य राज्यों के मुकाबले सबसे खराब है. 2014 तक, गुजरात एकमात्र ऐसा राज्य था, जहाँ पी.डी.एस. (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) के अनाज की प्रति व्यक्ति खरीद में काफी गिरावट आई है.

कृषि में बढ़ती निराशा ही जाति आधारित आंदोलनों में बढ़ोतरी का कारण है

गुजरात में कृषि संकट का एक सीधा परिणाम है, कि  किसानों के विभिन्न जाति-आधारित आंदोलनों का उदय तेज़ी से हुआ है, वे सरकार से नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहे हैं. इन आन्दोलनों में सबसे प्रमुख पतिदार आंदोलन है, जोकी  खुद बड़े पैमाने पर भूमि के मालिक हैं और व्यापार में भी शामिल हैं. ओ.बी.सी. जातियों के इस तरह के समान आंदोलन भी उभरे हैं. दलितों और आदिवासियों में, जिसमें कृषि मजदूरों या छोटे/सीमांत किसानों बड़ी संख्या है, अपने ऊपर हुए अत्याचारों के विरुद्ध या फिर अपने अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे हैं. हालांकि आगामी चुनावी लड़ाई ने इन आंदोलनों को काफी बढ़ा दिया है, लेकिन यह अपने आप में स्पष्ट है कि कृषि संकट ने ही इन आन्दोलनों की जड़ों को सींचा है. कृषि और उद्योगिक क्षेत्र, दोनों में ही बेरोजगारी बढ़ रही है, यह आग में ईंधन का काम कर रहा है. यह विकास के गुजरात मॉडल की व्यापक विफलता को दिखाता है.

Gujrat model
udata Gujrat
BJP
Modi
gujarat elections 2017

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License