NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मोदी सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स का बोझ आम जनता पर लादा
सीमा शुल्क संग्रह में गिरावट बताती है कि आयात को आसान बनाया जा रहा है जो भारतीय उत्पादकों को तबाह कर रहा है।
सुबोध वर्मा
25 Oct 2021
Translated by महेश कुमार
tax.

कभी इस कहावत को काफी प्रसिद्ध शब्दों कहा गया था कि कार्यपालिका (यानी सरकार) किसी भी समाज में शासक वर्ग के मामलों को आगे बढ़ाने वाली समिति के अलावा और कुछ नहीं है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार इस सच्चाई का एक बेहतरीन उदाहरण है। भारत के शक्तिशाली कॉरपोरेट को लाभ पहुंचाने के लिए इसने जिस खुले और निर्लज्ज तरीके से काम किया है, उसकी दुनिया में बहुत कम मिसाल मिलती है। 

कराधान या टैक्स का उदाहरण लें, जो केवल सरकारों का संप्रभु अधिकार है। 'विकास' और 'रोजगार' को बढ़ावा देने के नाम पर मोदी सरकार ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कराधान या टैक्स के माध्यम से आम लोगों पर बोझ लादते हुए बड़े व्यवसायों पर लगाए गए करों को निर्णायक रूप से कम कर दिया है। इसने देश में विदेशी उत्पादों के प्रवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सीमा शुल्क (आयात पर कर) को भी कम कर दिया है, जिससे घरेलू उद्योग, विशेष रूप से मध्यम और छोटे पैमाने के उद्योगों को भारी नुकसान पहुंचा है।

कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती

जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट से पता चलता है, मोदी के सत्ता में आने पर 2014-2015 में आयकर संग्रह 2.6 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 5.6 लाख करोड़ रुपये हो गया था – यानी यह 117 प्रतिशत की वृद्धि थी। इसी दौरान, कॉरपोरेट्स पर लगाया जाने वाला निगम कर केवल 28 प्रतिशत बढ़ा यानी वह 4.3 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 5.5 लाख करोड़ रुपये हो गया था।

इसी अवधि में, सकल कर राजस्व में 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो स्पष्ट रूप से कॉर्पोरेट कर और आयकर वृद्धि दर में उच्च स्तर की विषमता को दर्शाता है।

ऊपर दिया गया चार्ट सीमा शुल्क संग्रह के भाग्य को भी दर्शाता है। इनमें लगभग 28 प्रतिशत  की पूरी की पूरी गिरावट आई है, जो 2014-15 में 1.9 लाख करोड़ रुपये से 2021-22 में 1.4 लाख करोड़ रुपये रह गई है। दरअसल, गिरावट इससे कहीं अधिक तेज है। 2016-17 तक, सीमा शुल्क राजस्व बढ़कर 2.3 लाख करोड़ रुपये हो गया था, लेकिन फिर यह अपने वर्तमान स्तर तक गिर गया, जो लगभग 40 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है।

यह सारा डेटा विभिन्न वर्षों के केंद्रीय बजट दस्तावेजों से लिया गया है, जो बजट को समर्पित वित्त मंत्रालय की साइट पर उपलब्ध है। 2021-22 के आंकड़े एक बजट अनुमान हैं, जबकि 2020-21 के आंकड़े संशोधित अनुमान हैं और अन्य सभी वास्तविक हैं।

इसे दूसरे तरीके से भी देखा जा सकता है, जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है:

सकल कर राजस्व में कॉर्पोरेट कर की हिस्सेदारी 2014-15 में 34.5 प्रतिशत से घटकर 2021-22 में 24.7 प्रतिशत हो गई है। इसी अवधि में सीमा शुल्क राजस्व 15 प्रतिशत से घटकर केवल 6 प्रतिशत रह गया है। लेकिन इनकम टैक्स रेवेन्यू 20.8 प्रतिशत से बढ़कर 25.3 प्रतिशत हो गया है।

कंपनियों को तौफ़ा 

जैसा कि पहले चार्ट में देखा जा सकता है, कॉर्पोरेट कर संग्रह में गिरावट 2019 से शुरू हुई जब वित्तमंत्री ने कॉर्पोरेट कर दरों को घटाकर 30 प्रतिशत से 22 प्रतिशत की मौजूदा मूल दर कर दिया था जोकि अपने में अभूतपूर्व कटौती थी। कई अन्य प्रोत्साहनों की भी घोषणा की गई थी।

विडंबना यह है कि सरकार ने इसे किसी किस्म के रोजगार बढ़ाने वाले कदम के रूप में पेश  करने की कोशिश की थी। उनका विचित्र तर्क यह था कि कर रियायतों से कॉरपोरेट्स की तरफ से निवेश में वृद्धि होगी और बदले में, अधिक नौकरियां पैदा होंगी। जैसा कि पूरे के पूरे घटनाक्रम ने दिखाया है, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। 2019 में नौकरी में कोई वृद्धि नहीं हुई थी, और फिर, 2020 में, महामारी ने भारत को जकड़ लिया, जिसने कई महीनों तक विभिन्न रूपों में चलने वाले गैर-कल्पनीय लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था को और अधिक नष्ट कर दिया।

अजीब बात तो यह है कि कॉरपोरेट क्षेत्र महामारी और लॉकडाउन की तबाही के बावजूद काफी बेहतर तरीके से उभरा! जैसा कि न्यूज़क्लिक में पहले भी चर्चा की गई थी, सूचीबद्ध कंपनियों का मुनाफा 2020 के अंत तक रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया था, निस्संदेह कॉर्पोरेट को न केवल टैक्स  दरों में भारी कटौती से मदद मिली, बल्कि महामारी के दौरान श्रम लागत बचाने के लिए श्रमिकों को काम से हटाने या बर्खास्त करने के लिए उद्योग को दी गई खुली छूट से भी मदद मिली।

कॉरपोरेट के लिए कर में कटौती करके राहत देने के अलावा, कॉरपोरेट क्षेत्र को कई अन्य कार्यकारी उपायों से भी लाभ हुआ है, जिसमें विभिन्न प्रकार की रियायतें और छूट शामिल हैं, हाल के कुछ वर्षों में इस छूट का पैमाना 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक है (यह सब बजट पेपर्स में उपलब्ध डेटा है), इसमें बैंकों के कर्ज़ को बट्टे खाते में डालना, बड़े उद्योगों को छोटे उद्योगों को दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) के माध्यम से हथियाने में मदद करना, विभिन्न चूकों के लिए दंड को कम करने के लिए कंपनी कानून में छूट देना आदि शामिल है। 

इसके अलावा, मोदी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (काफी कम लागत पर) को फिर से उसी कॉर्पोरेट क्षेत्र में बेचने में कहीं अधिक तत्परता दिखाई है। टाटा समूह को एयर इंडिया की हालिया बिक्री एक ऐसा ही मामला है जहां सारे के सारे कर्ज़ सरकार के खाते में रह गए (46,000 करोड़ रुपये), जबकि टाटा को एयरलाइन की खरीद के लिए मात्र 27,500 करोड़ रुपये का भुगतान करन पड़ा। 

कामकाजी लोगों पर बढ़ता बोझ

मोदी सरकार या तो खर्च में कटौती करके या विभिन्न प्रकार के कराधान यानी टैक्स के माध्यम से, गरीबों से संसाधनों को हटाकर अपने हाथ में ले रही है ताकि वह अपनी उदार आर्थिक नीतियों का वित्तपोषण कर सके। इस तरह खर्च में कटौती लगभग सभी मंत्रालयों में देखी जा सकती है, लेकिन यह कटौती विशेष रूप से उन मंत्रालयों में नज़र आती है जो लोगों के कल्याण पर पैसा खर्च करने के लिए जन कल्याण के कार्यक्रमों को चलाते हैं। 

पैसे बचाने के लिए, खाद्यान्न वितरण या रसोई गैस सब्सिडी पर किए जाने वाले जरूरी खर्च को को काफी कम कर दिया गया है। सरकारी गोदाम अनाज के भंडार से लबालब भरे हुए हैं फिर भी सरकार अपनी कानूनी प्रतिबद्धता के अलावा अनाज का एक भी दाना अतिरिक्त सहायता के रूप में बांटने को तैयार नहीं है – वह ऐसा सिर्फ पैसे बचाने के लिए कर रही है।

पेट्रो उत्पाद की कीमतों में लगातार वृद्धि का मामला अड़ियल अप्रत्यक्ष टैक्स का एक स्पष्ट उदाहरण है। जैसा कि न्यूज़क्लिक में पहले बताया गया है कि, मोदी सरकार ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस पर उत्पाद शुल्क इतना बढ़ा दिया है कि इससे उसका राजस्व 2014-15 में लगभग 99,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2020-21 में 3.73 लाख करोड़ रुपये हो गया है यानी सात वर्षों में लगभग 277 प्रतिशत की वृद्धि! नतीजतन, पेट्रोल की कीमतों में 79 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि इसी अवधि में डीजल की कीमतों में 101 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पिछले एक साल में रसोई गैस की कीमतों में 300 रुपये से अधिक की वृद्धि हुई है, यहां तक कि 2019 में सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी भी बंद कर दी गई है। 

अमीरों को रियायतें देने और गरीब तथा मध्यम वर्ग से निचोड़ने की इस आर्थिक नीति के अन्याय के अलावा, यह अदूरदर्शी और आत्म-पराजय भी है। अमीरों को इतनी रियायतें  अर्थव्यवस्था को बढ़ावा नहीं देंगी क्योंकि जरूरत तो लोगों के हाथों में खरीदने की शक्ति बढ़ाने की है, न कि अमीरों के हाथों को इसकी जरूरत है। इसे केवल सरकारी खर्च बढ़ाकर और अमीरों पर टैक्स बढ़ाकर ही हासिल किया जा सकता है। लेकिन मोदी सरकार आंख मूंदकर उल्टी दिशा में काम कर रही है - जिससे भारत के लोगों को भारी और निरंतर पीड़ा झेलनी पड़ रही है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Under Modi, Tax Burden has Shifted from Corporates to People

Corporate tax Rebates
Tax Burden
indirect taxes
fuel prices
Food grain Distribution
customs duty
Tax Collections
tax revenue

Related Stories

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

महानगरों में बढ़ती ईंधन की क़ीमतों के ख़िलाफ़ ऑटो और कैब चालक दूसरे दिन भी हड़ताल पर

ईंधन की क़ीमतों में बढ़ोतरी से ग़रीबों पर बोझ न डालें, अमीरों पर लगाएं टैक्स

प्रोग्रेसिव टैक्स से दूर जाती केंद्र सरकार के कारण बढ़ी अमीर-ग़रीब के बीच असमानता

महंगे ईंधन से थोक की क़ीमतें बढ़ीं, कम मांग से कम हुई खुदरा क़ीमतें

हम महज़ एक साल में एलपीजी सिलेंडर के लिए 300 रुपये से ज़्यादा का भुगतान कर रहे हैं !

घर-परिवार और राज्य: राजस्व घाटे से जुड़े भ्रमों के पीछे क्या है?

आसमान छू रहीं ईंधन क़ीमतों के ख़िलाफ़ हुए अखिल भारतीय प्रदर्शन में शामिल हुए किसान संगठन

महामारी और लॉकडाउन के बीच तेल की क़ीमतें बढ़ाना मूर्खता है

लगातार 5वें दिन बढ़े पेट्रोल के दाम


बाकी खबरें

  • राज वाल्मीकि
    अब साहित्य का दक्षिण टोला बनाने की एक कोशिश हो रही है: जयप्रकाश कर्दम
    13 Feb 2022
    इतवार विशेष: दलित साहित्य और दलित लेखकों के साथ भेदभाव हो रहा है जैसे गांव में होता है न, दलित बस्ती दक्षिण टोला। दलित साहित्य को भी यह मान लीजिए कि यह एक दक्षिण टोला है। इस तरह वे लोग दलित साहित्य…
  • Saharanpur
    शंभूनाथ शुक्ल
    यूपी चुनाव 2022: शांति का प्रहरी बनता रहा है सहारनपुर
    13 Feb 2022
    बीजेपी की असली परीक्षा दूसरे चरण में हैं, जहां सोमवार, 14 फरवरी को वोट पड़ेंगे। दूसरे चरण में वोटिंग सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, संभल, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बदायूँ, शाहजहांपुर ज़िलों की विधानसभा…
  • Uttarakhand
    कृष्ण सिंह
    चुनाव 2022: उत्तराखंड में दलितों के मुद्दे हाशिये पर क्यों रहते हैं?
    13 Feb 2022
    अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी दलित समाज के अस्तित्व से जुड़े सवाल कभी भी मुख्यधारा के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्न नहीं रहे हैं। पहाड़ी जिलों में तो दलितों की स्थिति और भी…
  • Modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: अगर आरएसएस न होता...अगर बीजेपी नहीं होती
    13 Feb 2022
    "...ये तो अंग्रेजों की चापलूसी में लगे थे। कह रहे थे, अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं"
  • election
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: चुनाव आयोग की साख पर इतना गंभीर सवाल!
    13 Feb 2022
    हर हफ़्ते की कुछ खबरें और उनकी बारिकियाँ बड़ी खबरों के पीछे छूट जाती हैं। वरिष्ठ पत्रकार जैन हफ़्ते की इन्हीं कुछ खबरों के बारे में बता रहे हैं। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License